जितिया व्रत कथा, पूजा विधि Jitiya Vrat Katha in Hindi

जितिया व्रत कथा, पूजा विधि Jitiya Vrat Katha in Hindi

दोस्तों जैसा की हम सभी जानते है, कि भारत देश में अपने परिवार एवं अपनी रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के व्रत भक्तो द्वारा रखे जाते है, यह व्रत पत्नी द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, छात्रों द्वारा विद्या अर्जन के लिए, माता द्वारा अपने बच्चों के लिए रखे जाते है।

वैसे तो माताओं द्वारा अपने बच्चे की लंबी उम्र एवं उज्व्वल भविष्य के लिए कई तरह के व्रत रखे जाते है, उन्ही में से एक है, जितिया व्रत। आज हम बात करेंगे इस व्रत की विधि, कथा और लाभों के बारे में, तो शुरू करते है –

जितिया व्रत

जितिया व्रत को जीवित्‍पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। इस व्रत के कई अन्य नाम जैसे ‘जीतिया’ या ‘जीउतिया’ तथा ‘जिमूतवाहन व्रत’, आदि है। मिथिलांचल तथा उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में इस व्रत की बहुत मान्यता है। यह व्रत माताओं द्वारा अपने पुत्र की लंबी आयु व सुख की प्राप्ति के लिए रखा जाता है।

यह हिंदू विक्रम संवत के अश्विन माह में कृष्ण पक्ष के सातवें से नौवें चंद्र दिवस तक तीन दिन तक चलने वाला त्योहार होता है। जितिया व्रत के पहले दिन को नहाई-खाई के नाम से जाना जाता है। उस दिन माताएं स्नान करने के बाद ही भोजन ग्रहण करती हैं।

जितिया दिवस पर, एक सख्त उपवास, जिसे खुर जितिया कहा जाता है, यह पानी के बिना मनाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार पितरों के आशीर्वाद से ही पूरे वर्ष पुत्र पर किसी तरह का संकट नहीं आता है, इसीलिए पहले दिन महिलाएं सुबह पितरों की संतुष्टि के लिए उनको भोजन देकर व्रत रखती हैं। 

 तीसरे दिन व्रत का समापन पारण के साथ होता है, जो दिन का पहला भोजन होता है। जितिया पर्व महाभारत काल से होते आ रहा है।  मान्यता है कि हर मां अपने बच्चों के लिए उपवास रख कर जितिया व्रत धूमधाम से करती हैं। निर्जला उपवास कर माताएं पुत्रों के सुखमय भविष्य की कामना करती हैं। कहा जाता है कि जितिया व्रत करने से भगवान जीमूतवाहन, पुत्र पर आने वाली सभी समस्याओं से उसकी रक्षा करते हैं। इस व्रत को विवाहित महिलाएं करती हैं। पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से भी यह व्रत रखा जाता है।

इस दिन दो व्रत कथाए सुनी जाती है और दोनों कथाओं के श्रवण का विशेष महत्व है। इस व्रत में विधि विधान से पूजा करके व्रत कथा को ज़रूर पढ़ना या सुनना चाहिए।

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जितिया व्रत कथा-1

जीमूतवाहन गंधर्व के बुद्धिमान राजा थे। वह बहुत उदार और परोपकारी थे। बहुत कम उम्र में उन्हें सत्ता मिल गई थी, लेकिन वह संतुष्ट नही थे। इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था। परिणामस्वरूप उन्होंने अपने भाइयों को अपने राज्य की सभी जिम्मेदारियाँ दीं और अपने पिता की सेवा के लिए जंगल चले गए। वहीं उनका विवाह मलयवती नाम की एक राज कन्या से हुआ। वह अपने वैवाहिक जीवन से संतुष्ट थे।

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एक दिन वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन ने वृद्ध महिला को विलाप करते हुए दिखा। उसका दुख देखकर उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने वृद्धा की इस अवस्था का कारण जानना चाहा। इस पर वृद्धा ने बताया, ‘मैं नागवंश की स्त्री हूं और मेरा एक ही पुत्र है।

मैंने पक्षीराज गरुड़ के सामने प्रतिदिन खाने के लिए एक नाग सौंपने की प्रतिज्ञा की हुई है, जिसके अनुसार आज मेरे ही पुत्र ‘शंखचूड़’ को भेजने का दिन है। आप बताएं की मैं अपने इकलोते पुत्र को कैसे उसके पास भेज सकती हूँ, और यदि मेरा इकलौता पुत्र बलि पर चढ़ गया तो मैं किसके सहारे अपना जीवन व्यतीत करूंगी।

यह सुनकर जीमूतवाहन का दिल पिघल गया। उन्होंने कहा कि वे उनके पुत्र के प्राणों की रक्षा करेंगे। जीमूतवाहन ने कहा कि वे स्वयं अपने आपको उसके लाल कपड़े में ढककर शिला पर लेट जाएंगे, इस प्रकार उसकी पुत्र के प्राणों की रक्षा हो जाएगी।

जीमूतवाहन ने आख़िरकार ऐसा ही किया। ठीक समय पर पक्षीराज गरुड़ भी पहुंच गया और वे लाल कपड़े में ढके जीमूतवाहन को अपने पंजे में दबोचकर पहाड़ के शिखर पर जाकर बैठ गया। गरुण ने महसूस किया कि जिसे वो अपने पंजे में पकडे हुए है, वो अपनी आँखों से आँसू और मुंह से आह भी नही निकाल रहा।

ऐसा पहली बार हुआ था। आखिरकार गरुड़जी ने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा। पूछने पर जीमूतवाहन ने उस वृद्धा स्त्री से हुई अपनी सारी बातों को बताया। पक्षीराज गरुड़ हैरान हो गए। उन्हें इस बात का विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई किसी की मदद के लिए ऐसी कुर्बानी भी दे सकता है।

गरुड़जी इस बहादुरी को देख काफी प्रसन्न हुए और जीमूतवाहन को जीवन दान दे दिया। साथ ही उन्होंने भविष्य में नागों की बलि न लेने की भी बात कही। इस प्रकार एक मां के पुत्र की रक्षा हुई। मान्यता है कि तब से ही पुत्र की सुरक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की जाती है।

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जितिया व्रत कथा-2

नर्मदा नदी के पास कंचनबटी नामक नगर में मलयकेतु नाम का राजा राज्य करता था। नर्मदा नदी के पश्चिम दिशा में मरुभूमि थी, जिसे बालुहटा कहा जाता था, वही एक विशाल पाकड़ का पेड़ था। उस पेड़ पर एक चील रहती थी, और पेड़ के नीचे खोधर था, जहाँ सियारिन रहती थी।

चील और सियारिन, दोनों में गहरी दोस्‍ती थी। एक बार दोनों ने मिलकर महिलाओ को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और दोनों ने जीमूतवाहन की पूजा के लिए निर्जला व्रत रखा। तभी अचानक व्रत वाले दिन उस नगर के बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गयी। अब उसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल पर किया गया।

बो रात बहुत गहरी काली और घनघोर वर्षा वाली रात थी और तूफ़ानी भी, और अब तक सियारिन को भूख लगने लगी थी, मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया। लेकिन चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया।

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अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया। चील, जो बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया। शीलवती की शादी बुद्धि सेन के साथ हुई। सिया‍रन, जो छोटी बहन के रूप में जन्मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया।

उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई। अब कपुरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई। भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए, लेकिन कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर गये।

कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए और वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे। कपुरावती के मन में उन्‍हें देख ईर्ष्या की भावना आ गयी। उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर कटवा दिए और उन्‍हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया।

यह देख भगवान जीऊतवाहन ने चमत्कार करके मिट्टी से सातों भाइयों के सर बनाए और सभी के सिर को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया। इससे उनमें जान आ गई। सातों युवक जिंदा हो गए और घर लौट आए, जो कटे सर रानी ने भेजे थे, वे फल बन गए। इधर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी। जब काफी तक देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गयी। जहाँ सबको जिंदा देखकर वह आश्चर्यचकित रह गयी और बेहोश हो गयी।

जब उसे होश आया तो अपनी बहन को उसने सारी बात बताई। अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था। भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की सारी बातें याद आ गईं। वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी और उसे सारी बातें याद दिलाई। वहां अचानक ही कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई, जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्‍होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया।

मान्यताओं के अनुसार ऐसा माना जाता है, कि इस व्रत का संबंध महाभारत काल से भी है। महाभारत के युद्ध में अश्वत्थामा अपने पिता की मौत के बाद अत्यधिक नाराज़ थे। इसी के चलते उनके हृदय में बदले की भावना भड़क रही थी। बदला लेने के भाव से वह पांडवों के शिविर में घुस गये।

अश्वत्थामा ने शिविर के अंदर सो रहे 5 लोगो को पांडव समझकर मार डाला। असल में वे सभी द्रोपदी की पांच संतानें थीं। तभी अर्जुन ने उसे बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि छीन ली। अश्वत्थामा ने बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को गर्भ को नष्ट कर दिया।

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ऐसे में भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में फिर से जीवित कर दिया। गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उस बच्चे का नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा। तब से ही संतान की लंबी उम्र और मंगल के लिए जितिया का व्रत किया जाने लगा। 

ऐसा माना जाता है कि इस प्रसंग से संबंधित भगवान शिव ने भी भक्तों को वरदान देने की इच्छा प्रकट की थी। एक पौराणिक आख़्यान के अनुसार कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर जब माता पार्वती को यह कथा सुना रहे थे तब उन्होंने कहा कि ‘आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन उपवास रखकर जो स्त्री सायँ प्रदोषकाल में जीमूतवाहन की पूजा करती हैं और कथा सुनने के बाद आचार्य को दक्षिणा देती है, वह पुत्र का पूर्ण सुख प्राप्त करती हैं’।

व्रत की पूजा विधि

यह व्रत माताओं द्वारा अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए रखा जाता है। इस व्रत में महिलाएं जीमुतवाहन की पूजा करती हैं, जीमूत वाहन की प्रतिमा को धूप दीप, चावल, पुष्प, दही, चूरा अर्पित किया जाता हैं।  इसके साथ ही मिट्टी तथा गाय के गोबर से चील और सिवारिन की प्रतिमा बनायी जाती है।

पूजन समाप्त होने के बाद जितिया व्रत की कथा सुनी जाती है। पुराणों में वर्णित मान्यता है कि जो महिलाएं पूरे विधि-विधान से निष्ठापूर्वक कथा सुनकर ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देती हैं,  उन्हें पुत्र रत्न का सुख व समृद्धि की प्राप्ति होती है।

सनातन परंपरा में पितृ ऋण को प्रमुख माना गया है। पितरों को समर्पित आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितृ पक्ष कहा जाता है। यह जितिया पुरे दिन निर्जला उपवास रखा जाता है, व्रत खोलते समय भात, नोनी का साग, मरूआ की रोटी, खाजा आदि खाया जाता है।

सूर्य उदय होने से पहले तक ही व्रती द्वारा खान पान या जल ग्रहण किया जा सकता हैं लेकिन व्रत के समय आरंभ होने के बाद अन्न का एक दाना, या जल भी नहीं पी सकते। सुभ केवल मीठा ही खाया जा सकता है।

अंत में पूरा दिन व्रत करने के बाद शाम में या रात को भी आप कुछ नहीं खा सकते। क्योंकि यह व्रत अगली सुबह ही समाप्त होता है। व्रत का पारण दूसरे दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति के बाद किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार यह व्रत सच में अत्यंत फलदायी है।

मुख्य रूप से यह व्रत नेपाल के मिथिला और थरुहट, भारतीय राज्यों बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के नेपाली राज्यों में रखा जाता है। इसके अलावा, यह व्यापक रूप से पूर्वी थारू और सुदूर-पूर्वी मधेसी लोगों द्वारा मनाया जाता है। पश्चिमी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, और नेपाल के भोजपुरी क्षेत्र में, नोनी का साग , मारुवा की रोटी और तोरी की सब्जी के साथ व्रत का पारण किया जाता है।

दोस्तों यह थी जितिया व्रत कथा, जिसको करके माताए अपनी संतान की लंबी उम्र की कामना करती है। 

Source

https://en.wikipedia.org/wiki/Jivitputrika
http://www.weallnepali.com/nepali-festivals/jitiya-brata
https://youtu.be/wdMAHStjwUA

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