गुरु गोबिंद सिंह जी की जीवनी Guru Gobind Singh Ji History in Hindi

गुरु गोबिंद सिंह जी की जीवनी Guru Gobind Singh Ji Biography History in Hindi

  • जन्म नाम गोबिंद राय सोधी
  • जन्म 5 January, 1666, पटना साहिब, भारत
  • माता पिता माता गुजरी, गुरु तेग बहादुर
  • अन्य नाम दसवें सिख गुरु, सर्बांस दानी, मर्द अगम्र, दशमेश पिताह, बाज’अन वाले
  • पूर्ववर्ती गुरु – गुरु तेग बहादुर
  • उत्तराधिकारी गुरु – गुरु ग्रन्थ साहिब
  • पत्नियों के नाम – माता जीतो, माता सुंदरी, माता साहिब देवन
  • बच्चों के नाम – अजित सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह, फ़तेह सिंह
  • मृत्यु – 7 अक्टूबर, 1708 हजुर साहिब नांदेड, भारत
  • महान कार्य – खालसा(Khalsa) पंथ के संस्थापक और जाप साहिब, चंडी दी वार, तव – प्रसाद सवैये, ज़फर्नामः, बचित्तर नाटक, अकल उस्तात, सिख चौपाई. के लेखक (Jaap Sahib, Chandi di Var, Tav-Prasad Savaiye, Zafarnamah, Bachittar Natak, Akal Ustat, Sikh Chaupai)

गुरु गोबिंद सिंह जी की जीवनी Guru Gobind Singh Ji Biography History in Hindi

गुरु गोविन्द सिंह जी का सिख समुदाय के विकास में बहुत बड़ा हाथ है। Guru Gobind Singh जी सिख धर्म के संस्थापक तो थे पर सिख धर्म के आगे ले जाने में उनका बहुत बड़ा हाथ था जैसे उन्होंने सैन्य लोकाचार को शुरू किया जिसमें कुछ पुरुष सिखों को हर समय तलवारों  को साथ रखने को कहा गया। सिख समुदाय में वे आखरी सिख गुरु थे और उन्हें इसी कारण परम गुरु, गुरु ग्रन्थ साहिब (Guru Granth Sahib) के नाम से जाना जाता है।

गुरु गोबिंद सिंह का जन्म और प्रारंभिक जीवन Early Life

गोबिंद सिंह अपने पिता गुरु तेग बहादुर और माता गुजरी के एक मात्र पुत्र थे। उनका जन्म 5 जनवरी, 1666, को पटना साहिब, बिहार, भारत में हुआ था। उनके जन्म के समय उनके पिता बंगाल और असम में धर्म उपदेश देने के लिए गए हुए थे।

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उनका जन्म नाम गोबिंद राय रखा गया था। उनके जन्म के बाद वे पटना में वे चार वर्ष तक रहे और उनके जन्म स्थान घर का नाम “तख़्त श्री पटना हरिमंदर साहिब” के नाम से आज जाना जाता है।

1670 में उनका परिवार पंजाब वापस लौट आये। उसके बाद मार्च 1672 में वे चक्क ननकी चले गए जो की हिमालय की निचली घाटी में स्तिथ है। वहां उन्होंने अपनी शिक्षा ली। Chakk Nanki शहर की स्थापना गोबिंद सिंह के पिता तेग बहादुर जी ने किया था जिसे आज आनंदपुर साहिब के नाम से जाना जाता है। उस स्थान को 1665 में उन्होंने बिलासपुर(कहलूर) के शसक से ख़रीदा था।

अपनी मृत्यु से पहले ही तेग बहादुर ने गुरु गोबिंद जी को अपना उत्तराधिकारी नाम घोषित कर दिया था। बाद में मार्च 29, 1676 में गोबिंद सिंह 10वें सिख गुरु बन गए। यमुना नदी के किनारे एक शिविर में रह कर गुरु गोबिंद जी ने मार्शल आर्ट्स, शिकार, साहित्य और भाषाएँ जैसे संस्कृत, फारसी, मुग़ल, पंजाबी, तथा ब्रज भाषा भी सीखीं।

सन 1684 में उन्होंने एक महाकाव्य कविता भी लिखा जिसका नाम है “वर श्री भगौती जी की” Var Sri Bhagauti Ji Ki/Chandi Di Var. यह काव्य हिन्दू माता भगवती/दुर्गा/चंडी और राक्षसों के बिच संघर्ष को दर्शाता है।

गुरु गोबिंद सिंह की तीन पत्नियाँ थी Wifes

  • 21जून, 1677 को 10 साल की उम्र में उनका विवाह माता जीतो के साथ आनंदपुर से 10 किलोमीटर दूर बसंतगढ़ में किया गया। उन दोनों के 3 लड़के हुए  जिनके नाम थे – जुझार सिंह, जोरावर सिंह, फ़तेह सिंह।
  • 4अप्रैल, 1684 को 17 वर्ष की आयु में उनका दूसरा विवाह माता सुंदरी के साथ आनंदपुर में हुआ। उनका एक बीटा हुआ जिसका नाम था अजित सिंह।
  • 15अप्रैल, 1700 को 33 वर्ष की आयु में उन्होंने माता साहिब देवन से विवाह किया। वैसे तो उनका कोई संतान नहीं था पर सिख धर्म के पन्नों पर उनका दौर भी बहुत ही प्रभावशाली रहा।
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खालसा की स्थापना Khalsa Pant

गुरु गोबिंद सिंह जी का नतृत्व सिख समुदाय के इतिहास में बहुत कुछ नया सा लेकर आया। उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा Khalsa जो की सिख धर्म के विधिवत् दीक्षा प्राप्त अनुयायियों का एक सामूहिक रूप है उसका निर्माण किया।

सिख समुदाय के एक सभा में उन्होंने सबके सामने पुछा – कौन अपने सर का बलिदान देना चाहता है? उसी समय एक स्वयंसेवक इस बात के लिए राज़ी हो गया और गुरु गोबिंद सिंह उसे तम्बू में ले गए और कुछ देर बाद वापस लौटे एक खून लगे हुए तलवार के साथ।

गुरु ने दोबारा उस भीड़ के लोगों से वही सवाल दोबारा पुछा और उसी प्रकार एक और व्यक्ति राज़ी हुआ और उनके साथ गया पर वे तम्बू से जब बहार निकले तो खून से सना तलवार उनके हाथ में था।

उसी प्रकार पांचवा स्वयंसेवक जब उनके साथ तम्बू के भीतर गया, कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह सभी जीवित सेवकों के साथ वापस लौटे और उन्होंने उन्हें पंज प्यारे Panj Pyare या पहले खालसा का नाम दिया।

उसके बाद गुरु गोबिंद जी ने एक लोहे का कटोरा लिया और उसमें पानी और चीनी मिला कर दुधारी तलवार से घोल कर अमृत का नाम दिया। पहले 5 खालसा के बनाने के बाद उन्हें छटवां खालसा का नाम दिया गया जिसके बाद उनका नाम गुरु गोबिंद राय से गुरु गोबिंद सिंह रख दिया गया। उन्होंने क शब्द के पांच महत्व खालसा के लिए समझाया और कहा – केश, कंघा, कड़ा, किरपान, कच्चेरा।

साथ ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा योद्धा के लिए कुछ नियम तैयार किये जैसे –

  • वे कभी भी तंबाकू नहीं उपयोग कर सकते।
  • बलि दिया हुआ मांस नहीं खा सकते।
  • किसी भी मुस्लिम के साथ किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं बना सकते।
  • उन लोगों से कभी भी बात ना करें जो उनके उत्तराधिकारी के प्रतिद्वंद्वी हैं।

गुरु गोबिंद सिंह द्वारा लड़ाई किये हुए कुछ मुख्य युद्ध Guru Gobind Singh Ji Fights

यह कहा जाता है कि गुरु गोबिंद सिंह नें कुल चौदह युद्ध लढाई किया परन्तु कभी भी किसी पूजा के स्थल के लोगों को ना ही बंदी बनाया या क्षतिग्रस्त किया।

  • भंगानी का युद्ध Battle of Bhangani (1688)
  • नादौन का युद्ध Battle of Nadaun (1691)
  • गुलेर का युद्ध Battle of Guler (1696)
  • आनंदपुर का पहला युद्ध First Battle of Anandpur (1700)
  • अनंस्पुर साहिब का युद्ध Battle of Anandpur Sahib (1701)
  • निर्मोहगढ़ का युद्ध Battle of Nirmohgarh (1702)
  • बसोली का युद्ध Battle of Basoli (1702)
  • आनंदपुर का युद्ध Battle of Anandpur (1704)
  • सरसा का युद्ध Battle of Sarsa (1704)
  • चमकौर का युद्ध Battle of Chamkaur (1704)
  • मुक्तसर का युद्ध Battle of Muktsar (1705)
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परिवार के लोगों की मृत्यु Death of Family

कहा जाता है सिरहिन्द के मुस्लिम गवर्नर ने गुरु गोबिंद सिंह के माता और दो पुत्र को बंदी बना लिया था। जब उनके दोनों पुत्रों ने इस्लाम धर्म को कुबूल करने से मना कर दिया तो उन्हें जिन्दा दफना दिया गया।

अपने पोतों के मृत्यु के दुःख को ना सह सकने के कारण माता गुजरी भी ज्यादा दिन तक जीवित ना रह सकी और जल्द ही उनकी मृत्यु हो गयी। मुग़ल सेना के साथ युद्ध करते समय 1704 में उनके दोनों बड़े बेटों की मृत्यु हो गयी।

ज़फरनामा Zafarnama 

गुरु गोबिंद सिंह ने जब देखा कि मुग़ल सेना ने गलत तरीके से युद्ध किया है और क्रूर तरीके से उनके पुत्रों का हत्या कर दिया तो हथियार डाल देने के बजाये गुरु गोबिंद सिंग ने औरन्ज़ेब को एक जित पत्र “ज़फरनामा” जारी किया।

बाद में मुक्तसर, पंजाब में दोबारा गुरु जी ने स्थापित किया और अदि ग्रन्थ Adi Granth के नए अध्याय को बनाने के लिए खुद को समर्पित कर दिया जो पांचवें सिख गुरु अर्जुन द्वारा संकलित किया गया है।

उन्होंने अपने लेखन का एक संग्रह बनाया है जिसको नाम दिया दसम ग्रन्थ Dasam Granth और अपना स्वयं का आत्मकथा जिसका नाम रखा है बचितर नाटक.

गुरु गोबिंद सिंह जी की मृत्यु कब हुई थी? Shri Guru Gobind Singh Ji Death

सेनापति श्री गुर सोभा के अनुसार गुरु गोबिंद सिंह के दिल के ऊपर एक गहरी चोट लग गयी थी। जिसके कारण 7 अक्टूबर, 1708 को, हजूर साहिब नांदेड़, नांदेड़ में 42 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने शरीर को त्याग दिया।

22 thoughts on “गुरु गोबिंद सिंह जी की जीवनी Guru Gobind Singh Ji History in Hindi”

  1. बहुत बहादुर थे वो ,हम सब पूरे जीवन भर उनके गुणगान करे तब भी उनका एहसान कभी नही भूल सकते

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  2. बहुत ही अच्छी जानकारी मिली आपके लेख में कभी कभी हम इन जानकारियों पर ध्यान नहीं देते ।

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  3. जिस प्रकार उन्होंने समाज के नीचे k तब को ekatrit kar उन्हें एक ladaku ke roop mein parivartit kiya unke is yogdan ke liye हम सभी रिड़ी है

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  4. guru gobind singh ji hind veer the v unke chote donu bete bhi vhut bade veer the jo dada v pita ki batai hui bato ka bakhan karte karte jide dibaro me chin gaye unse hame pirerdna leni chahiye ki ham bhi apne bacho sikh de sake jo guru gobind singh ji apne beto ko di thi jay jay ho aap hind veer

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  5. Waheguru ji ka khalsa waheguru ji ki fateh
    Veer bhut vadiya lekh hi veer ji, hi mein tuhanu jo VI sikh bare koi vi sawal pusaga ta tuc menu das sakde ho
    Waheguru ji da khalsa
    Waheguru ji da fateh

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  6. सुना था संत सेवालाल महाराज नाम एक व्यक्ती गुरु गोविंद सिंग के साथ थे उनकेबारेमे कुछ जानकारीमिले तो कृपया शेअर करे.

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    • संत सेवालाल उनके साथ थे यह जानकारी तो हमें नहीं है परन्तु इन्टरनेट पर कई लेखों के अनुसार यह पता चलता है उनके कार्य भी गुरु गोविन्द सिंह से मिलते झूलते थे

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  7. वाहे गुरुजी रा खालसा वाहे गुरुजी री फतेह
    मुझे गर्व हे शिख धर्म पर

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  8. “धर्म” जीवन जीने के कुछ नियमों का ही तो संकलन होता है। ये दुनिया बड़ी विचित्र हैं, यहां कुछ लोग समाज का उत्थान करने में स्वयं व अपने परिवार तक को झोंक देते हैं और कुछ धर्म के नाम पर इंसानियत के ‘पतन’ का कारण बन जाते हैं। काश हर धर्म में कोई *गुरु गोबिंद सिंह* जी जैसा होता जो हर रोज़ पैदा हो रहे इन स्वार्थी धर्म गुरुओं पर रोक लगा सकता और इस सुंदर संसार को सुखमय व जीने लायक बना सकता – विजय सुलेख

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  9. अपने गुरु गोबिंद सिंह जी के ऊपर बहुत ही अच्छा आर्टिकल लिखा है, जो मुझे काफी पसंद भी आया है.

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