रहीम दास के दोहे अर्थ सहित Rahim Das Ke Dohe in Hindi Meaning

रहीम दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित Rahim Das Ke Dohe in Hindi Meaning (Class 7 और 9)

रहीम दास, मुग़ल सम्राट अकबर के शासन काल के एक महान कवी थे। उनका पूरा नाम नवाब अब्दुल रहीम खान-ई-खाना था। वो अकबर की सभा के महत्वपूर्ण दीवान में से एक थे जिन्हें नवरत्न भी कहा जाता था। रहीम अपने दोहों और ज्योतिष पर लिखे गए किताबों के कारण मशहूर हैं।

उनका जन्म 17 दिसम्बर 1556 को पाकिस्तान के लाहौर में हुआ था। रहीम दस जी ने अपने दोहों के माध्यम से जनता की नीति सम्बन्धी बातें बताई और उनका मार्ग दर्शन करने का भी प्रयास किया। उनको अवधी, ब्रज, अरबी, फ़ारसी, तुर्की, और हिंदी का अच्छा ज्ञान था। उनकी सभी कृतियाँ “रहीम ग्रंथावली” में समाहित हैं।

रहीम दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित Rahim Das Ke Dohe in Hindi Meaning

आज हम आपको कुछ मशहूर Rahim ke Dohe बताने जा रहे हैं जो लोगों के जीवन मे सकारात्मक सुविचार के साथ-साथ बहुत कुछ ज्ञान भी देते हैं।

कक्षा 7वीं रहीम के दोहे Rahim Ke Dohe for Class 7 in Hindi

1. कहि ‘रहीम’ संपति सगे, बनत बहुत बहु रीति।
बिपति-कसौटी जे कसे, सोई सांचे मीत॥

अर्थ : रहीम दास जी ने इस दोहे में सच्चे मित्र के विषय में बताया है। वो कहते हैं कि सगे-संबंधी रुपी संपत्ति कई प्रकार के रीति-रिवाजों से बनते हैं। पर जो व्यक्ति आपके मुश्किल के समय में आपकी मदद करता है या आपको मुसीबत से बचाता है वही आपका सच्चा मित्र होता है।

2. जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।
‘रहिमन’ मछरी नीर को तऊ न छाँड़ति छोह॥

अर्थ : इस दोहे में रहीम दास जी ने मछली के जल के प्रति घनिष्ट प्रेम को बताया है। वो कहते हैं मछली पकड़ने के लिए जब जाल पानी में डाला जाता है तो जाल पानी से बाहर खींचते ही जल उसी समय जाल से निकल जाता है। परन्तु मछली जल को छोड़ नहीं सकता और वह पानी से अलग होते ही मर जाता है।

3. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

अर्थ : रहीम दास जी इन पंक्तियों में कहते हैं जिस प्रकार पेड़ अपने ऊपर फले हुए फल को कभी नहीं खाते हैं, तालाब कभी अपने अन्दर जमा किये हुए पानी को कभी नहीं पीता है उसी प्रकार सज्जन व्यक्ति / परोपकारी व्यक्ति भी अपना इक्कठा किया हुआ धन से दूसरों का भला करते हैं।

4. थोथे बादर क्वार के, ज्यों ‘रहीम’ घहरात ।
धनी पुरुष निर्धन भये, करैं पाछिली बात ॥

अर्थ : रहीम जी कहते हैं जिस प्रकार क्वार महीने में (बारिश और शीत ऋतू के बिच) आकाश में घने बादल दीखते हैं पर बिना बारिश किये वो बस खाली गडगडाहट की आवाज़ करते हैं उस प्रकार जब कोई अमरी व्यक्ति कंगाल हो जाता है या गरीब हो जाता है तो उसके मुख से बस घमंडी बड़ी-बड़ी बातें ही सुने देती हैं जिनका कोई मूल्य नहीं होता।

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5. धरती की सी रीत है, सीत घाम औ मेह ।
जैसी परे सो सहि रहै, त्‍यों रहीम यह देह॥

अर्थ : इस दोहे में रहीम दास जी धरती के साथ-साथ मनुष्य के शरीर की सहन शक्ति का वर्णन किया हैं। वो कहते हैं इस शरीर की सहने की शक्ति धरती समान है जिस प्रकार धरती सर्दी-गर्मी वर्षा की विपरीत परिस्तिथियों को झेल लेती है उसी प्रकार मनुष्य का शरीर भी जीवन में आने वाले सुख-दुख लप सहने की शक्ति रखता है।

कक्षा 9वीं रहीम के दोहे Rahim Ke Dohe for Class 9 in Hindi

1. रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय ।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय ॥

अर्थ : कवी रहीम जी कहते हैं प्रेम रूप का धागा जब एक बार टूट जाता है, तो दोबारा पहले की तरह जोड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है या नहीं हो पता है। अगर उसे जोड़ भी दिया जाये तो उसमे गांठ आ जाता है। उनके अनुसार प्रेम का रिश्ता बहुत ही नाज़ुक होता है और बिना सोचे समझे इसे तोडना बिलकुल उचित नहीं होता। और टूटे हुए रिश्ते को फिर से जोड़ने पर संदेह हमेशा रह जाता है इसलिए प्रेम से रहना चाहिए ।

2. रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय॥

अर्थ : कवी रहीम जी इस दोहे में कहते हैं हमें अपने मन के दुख को अपने मन में ही रखना चाहिए क्योंकि किस दुनिया में कोई भी आपके दुख को बांटने वाला नहीं है। इस संसार में बस लोग दूसरों के दुख को जान कर उसका मजाक उडाना ही जानते हैं।

3. एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय ।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥

अर्थ : इस दोहे के दो अर्थ और सिख हमें मिलते हैं। पहला यह कि रहीम दस जी कहते हैं कि जिस प्रकार किसी पौधे के जड़ में पानी देने से वह अपने हर भाग तक पानी पहुंचा देता है उसी प्रकार मनुष्य को भी एक ही भगवान की पूजा-आराधना करनी चाहिए। ऐसा करने से ही उस मनुष्य के सभी मनोरथ पुरे होंगे। दूसरा अर्थ यह है कि जिस प्रकार पौधे को जड़ से सींचने से ही फल फूल मिलते हैं उसी प्रकार मनुष्य को भी एक ही समय में एक कार्य करना चाहिए तभी उसके सभी कार्य सही तरीके से सफल हो पाएंगे।

4. चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध-नरेस ।
जा पर बिपदा पड़त है, सो आवत यह देस॥

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अर्थ :इस दोहे में रहीम दस जी चित्रकूट को मनीराम और शांत स्थान बताते हुए सुन्दर रूप में वार्नर कर रहे हैं। वो कह रहे हैं चित्रकूट एक ऐसा भव्य स्थान है अवध के राजा श्री राम अपने वनवास के दौरान रहे थे। जिस किसी व्यक्ति पर भी संकट आता है वह इस जगह शांति पाने के लिए इस स्थान चला आता है।

5. दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं ।
ज्‍यों रहीम नट कुण्‍डली, सिमिटि कूदि च‍ढ़ि जाहिं॥

अर्थ : इस दोहे में रहीम दस जी एक दोहे की शक्ति की व्याख्या कर रहे हैं और समझा रहे हैं कि जिस प्रकार एक नट कुंडली मरने वाला व्यक्ति ऊंचाई को चुने के लिए अपने शरीर को घुमा कर छोटा कर लेता है उसी प्रकार एक दोहे में इतने कम अक्षर होते हुए भी इसके अर्थ कितने गहरे होते हैं।

6. धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय ।
उदधि बड़ाई कौन हे, जगत पिआसो जाय॥

अर्थ : रहीम दास जी इस दोहे में की कीचड़ का पानी बहुत ही धन्य है क्योंकि उसका पानी पी कर छोटे-मोटे कीड़े मकोड़े भी अपनी प्यास बुझाते हैं परन्तु समुद्र में इतना जल का विशाल भंडार होने के पर भी क्या लाभ जिसके पानी से प्यास नहीं बुझ सकती है। यहाँ रहीम जी कुछ ऐसी तुलना कर रहे हैं जहाँ उदहारण के लिए देखें तो ऐसा व्यक्ति जो गरीब होने पर भी लोगों की मदद करता है परन्तु एक ऐसा भी व्यक्ति है जिसके पास सब कुछ होने पर भी वह किसी की भी मदद नहीं करता है यानी की परोपकारी व्यक्ति ही महान होता है।

7.  नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत।
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत॥

अर्थ : रहीम दस जी इस दोहे में कहते हैं – मृग मधुर तान पर मोहित हो कर स्वयं को शिकारी को सौप देता है और मनुष्य किसी भी कला से मोहित हो कर उसे धन देते हैं। दुसरे पंक्ति में वो कहते हैं कि जो मनुष्य कला पर मुग्ध होने के बाद भी उसे कुछ नहीं देता है वह पशु से भी हीन है। हमेशा कला का सम्मान करो और उससे प्रभावित होने पर दान जरूर करें।

8. बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय ।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥

अर्थ : रहीम जी इस दोहे में कहते हैं जिस प्रकार फाटे हुए दूश को मथने से मक्खन नहीं निकलता है उसी प्रकार प्रकार अगर कोई बात बिगड़ जाती है तो वह दोबारा नहीं बनती। इसलिए बात को संभालें ना की बिगड़ने दें।

9. रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि ।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि॥

अर्थ : रहीम दस जी ने इस दोहे में बहुत ही अनमोल बात कही है। उनका कहना है जिस जगह सुई से काम हो जाये वहां तलवार का कोई काम नहीं होता है। हमें समझना चाहिए कि हर बड़ी और छोटी वस्तुओं का अपना महत्व अपने जगहों पर होता है और बड़ों की तुलना में चोटों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

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10. रहिमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय ।
बिनु पानी ज्‍यों जलज को, नहिं रवि सकै बचाय॥

अर्थ : रहीम जी इस दोहे में बहुत ही महत्वपूर्ण बा कह रहे है। वो कहते हैं जिस प्रकार बिना पानी के कमल के फूल को सूखने से कोई नहीं बचा सकता उसी प्रक्रार मुश्किल पड़ने पर स्वयं की संपत्ति ना होने पर कोई भी आपकी मदद नहीं कर सकता है। रहीम जी इस दोहे के माध्यम से संसार के लोगों को समझाना चाहते हैं की मनुष्य को निज संपत्ति का संचय करना चाहिए ताकि मुसीबत म्विन वह उसके काम आये।

11. रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥

अर्थ : कवी रहीम जी कहते हैं इस संसार में पानी के बिना सब कुछ बेकार है इसलिए पानी को हमें बचाए रखना चाहिए। पानी के बिना सब कुछ व्यर्थ है चाहे वह मनुष्य, जिव-जंतु हों या कोई वस्तु। ‘मोती’ के विषय में बताते हुए रहीम जी कहते हैं पानी के बिना मोती की चमक का कोई मूल्य नहीं है। ‘मानुष’ के सन्दर्भ में पानी का अर्थ मान-सम्मान या प्रतिष्ठा को बताते हुए उन्होंने कहा है जिस मनुष्य का सम्मान समाप्त हो जाये उसका जीवन व्यर्थ है।

12. छिमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥

अर्थ : रहीम जी कहते है जिस प्रकार कोई कीड़ा अगर लात मारता है तो कोई फर्क नहीं पड़ता है या हानि नहीं होती है उसी प्रकार छोटो को उत्पात यानि की बदमाशी शोभा देता है और बड़ों को उनके बदमाशी को माफ़ करना क्योंकि छोटे बच्चों का बदमाशी भी तो चोट ही होता है।

13. दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय॥

अर्थ : रहीम दास जी जीवन की एक बहुत बड़ी असलियत की व्याख्या करते हुए कह रहे हैं। दुख में सभी लोग याद करते हैं परन्तु सुख के समय कोई याद नहीं करता है। अगर सुख में भी याद करते तो कभी दुःख होता ही नहीं।

14. चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह॥

अर्थ : रहीम दास जी कहते हैं जिनको इस संसार से कोई मोह माया नहीं या कुछ नहीं चाहिए वो राजाओं के भी राजा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें ना तो किसी चीज की छह और ना ही कोई इच्छा।

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10 thoughts on “रहीम दास के दोहे अर्थ सहित Rahim Das Ke Dohe in Hindi Meaning”

  1. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति … शानदार पोस्ट …. Nice article with awesome depiction!! 🙂 🙂

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  2. Bahut hi accha dohe kavi Rahim ji ke dwara likhe gaye hai aur uska post is webside par kiye hai. Very good

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