अमरनाथ मंदिर का इतिहास Amarnath Temple History Story in Hindi
अमरनाथ मंदिर का इतिहास Amarnath Temple History Story in Hindi
अमरनाथ मंदिर हिंदुओं का प्रमुख धार्मिक तीर्थ स्थल है जो कि जम्मू कश्मीर के श्रीनगर के उत्तर-पूर्व में 134 किलोमीटर दूर स्थित है। इसकी समुन्द्रतल से ऊँचाई 13,600 फुट है। यह मंदिर भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक मंदिरों में से एक है।
कहा जाता है कि इसी मंदिर की गुफा में भगवान शिव और माता पार्वती के अमरत्व का रहस्य बताया गया था इसीलिए अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ भी कहा जाता है।
अमरनाथ मंदिर का इतिहास Amarnath Temple History Story in Hindi
History इतिहास
अमरनाथ मन्दिर के चारों तरफ बर्फ ही बर्फ है। यहाँ पर ज्यादातर इस मंदिर के ऊपर तथा आसपास बर्फ ही बर्फ जमी होती है। इसे वर्ष में एक बार श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है यहाँ पर हजारों श्रद्धालु इस मंदिर में स्थित शिवलिंग को देखने आते हैं और दर्शन करते हैं।
इतिहास में भी अमरनाथ का जिक्र किया गया है कहा जाता है कि महान शासक आर्यराजा कश्मीर में स्थित शिवलिंग की पूजा करते थे जो की बर्फ से बनी हुई थी। तथा राजतरंगिणी के किताब में अमरेश्वर(अमरनाथ) का नाम दिया गया है। अमरनाथ गुफा की यात्रा की शुरुआत प्रजा भट्ट द्वारा की गई थी।
यह भी कहा जाता है कि जब भगवान शंकर अपनी अर्धांगिनी पार्वती जी को अमर कथा सुना रहे थे तभी वहाँ पर दो कबूतरों का जोड़ा भी बैठा हुआ था और वह अमर कथा सुन रहा था। लोग कहते हैं कि वह कबूतरों का जोड़ा आज भी वहाँ दिखाई देता है। ये वही कबूतर है या कोई दूसरे कबूतर इसका कोई पक्का सबूत नहीं है लेकिन लोगों का ऐसा मानना है कि यह वही कबूतर है।
Story कहानी
कहा जाता है कि अमरनाथ मंदिर का सबसे पहले 16वीं शताब्दी में एक मुसलमान गड़रिये को पता चला था, आज भी अमरनाथ मन्दिर पर चढ़ने वाले प्रसाद का एक चौथाई चढ़ावा उस मुसलमान गड़रिये के वंशजों को ही मिलता है जिससे कुछ अनुमान लगाया जाता है। यह कहानी कितनी सही है और कितना गलत, अभी तक यह मतभेद का विषय बना हुआ है।
अमरनाथ यात्रा Amarnath Yatra
अमरनाथ मंदिर तक जाने के लिए दो रास्ते मौजूद हैं एक रास्ता पहलगाम से होकर जाता है और दूसरा सोनमर्ग बलटाल से होकर । यहाँ तक आने के लिए सवारियों की व्यवस्था की गई है जम्मू से पहलगाम की दूरी लगभग 259 किलोमीटर तथा जम्मू से बलटाल की दूरी लगभग 373 किलोमीटर है।
ये दोनों दूरियाँ रेल (ट्रेन) के द्वारा तय की जा सकती है। लेकिन इसके आगे जाने के लिए सिर्फ अपने पैरों का ही इस्तेमाल करना होता है। इन दोनों रास्तों में पहलगाम से अमरनाथ मंदिर जाने के लिए 28.2 किलोमीटर और बलटाल से अमरनाथ मंदिर जाने के लिए सिर्फ 9.4 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है परंतु बलटाल का रास्ता बहुत ही दुर्गम एवं संदिग्ध है जबकि पहलगाम का रास्ता, बलटाल की अपेक्षा कुछ आसान एवं सुविधाजनक है। सरकार भी श्रद्धालुओं को पहलगाम से ही जाने के लिए प्रेरित करती है।
पहलगाम से जाने पर यात्रियों को 4 तीर्थ स्थल मिलते हैं-
- चंदनबाड़ी
- पिस्सू घाटी
- शेषनाग
- पंचतरणी
पहलगाम से यात्रा प्रारंभ होने के बाद सबसे पहला पड़ाव 8 किलोमीटर की दूरी पर चंदनबाड़ी आता है। यहाँ पर कैंप लगाकर यात्री रात्रि विश्राम करते हैं। यहाँ तक का चढ़ाव बहुत ही सरल होता है।इसके बाद अगला पड़ाव 5 किलोमीटर की दूरी पर पिस्सू घाटी आता है, जो की कठिन चढ़ाव होता है। कहा जाता है कि यहाँ पर देवताओं और राक्षसों में युद्ध हुआ था जिसमें देवताओं की विजय हुई थी।
पिस्सू घाटी के बाद अगला पड़ाव 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित और बहुत कठिन चढ़ाई करने के बाद शेषनाग आता है। इस स्थान पर एक झील स्थित है, जिसमें देखने पर यात्रियों को भ्रम हो जाता है कि आसमान कहीं इसमें उतर तो नहीं आया है। और कहा जाता है कि शेषनाग अभी भी इस झील में रहता है और वह 24 घंटे के भीतर एक बार बाहर आता है। शेषनाग के दर्शन बहुत ही खुशनसीब लोगों को ही होते हैं।
यात्री यहाँ रात गुजार कर अगले पड़ाव की तरफ बढ़ते है। रास्ते में बैववैल टॉप तथा महागुणास दर्रे को पार करते हुए यात्री पंचतरणी पहुँचते हैं। यहाँ पर पाँच जल धाराएँ बहती है इसीलिए इसका नाम पंचतरणी पड़ा। यहाँ पहुँचते ही ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगती है। कुछ यात्री यहाँ भी रात्रि विश्राम करते है।
यहाँ से आगे बढ़ने पर ठंड काफी बढ़ जाती है क्योंकि आगे का रास्ता बर्फ से भरा होता है। रास्ते को पार करने पर यात्री अमरनाथ मन्दिर दर्शन हेतु पहुँच जाते है। वैसे ये यात्रा बहुत ही कठिन होती है और यात्री बहुत थके होते है परन्तु अमरनाथ मन्दिर में पहुँचते ही सारी थकावट छूमन्तर हो जाती है तथा बहुत ही अद्भुत आनंद की अनुभूति होती है। यह यात्रा लगभग 5-7 दिन की होती है। जबकि बलटाल से जाने पर सिर्फ 2 तीर्थ स्थल मिलते हैं और इसमें लगभग 2 से 3 दिन का समय लगता है।
इस अमरनाथ मंदिर की विशेषता प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है जो हिमालय से धीरे-धीरे पानी की बूंदों के टपकने से बनता है। ये बर्फ से बनी होने के कारण इसे “स्वयंभू हिमानी शिवलिंग” भी कहते हैं। इस गुफा की परिधि लगभग डेढ़ सौ फुट है। यहाँ पर हमेशा बर्फ ही बर्फ होती है।
यहाँ की अनोखी बात ये भी है कि बर्फ से बना शिवलिंग कठोर बर्फ का होता है जबकि आस पास और गुफा की बर्फ कच्ची होती है जिसे पकड़ते ही भुरभुरी हो जाती है। चंद्रमा के घटने बढ़ने के साथ साथ शिवलिंग का आकार भी घटता बढ़ता है। श्रावण मास में शिवलिंग अपने बड़े आकार में आ जाता है और अमावस्या आने तक छोटा हो जाता है।
Featured Image Source – https://en.m.wikipedia.org/wiki/File:Lord_Amarnath.jpg