नदी की आत्मकथा निबंध Autobiography of a River in Hindi

इस लेख में आप एक नदी की आत्मकथा निबंध Autobiography of a River in Hindi हिन्दी में पढेंगे। यह स्कूल और कॉलेज के परीक्षाओं में पुछा जाता है। इस आत्मकथा में एक नदी स्वयं के विषय में बखान कर रही है।

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नदी की आत्मकथा निबंध Autobiography of a River in Hindi

मैं नदी हूं। ‘नदी’ : इस शब्द से तो परिचित होंगे आप ? क्या मैं अपना परिचय दूं ! क्या आप जानना चाहेंगे मेरे बारे में, मैं कौन हूं ? कहां से आती हूं ? क्या मेरा अस्तित्व है ? मेरा कोई मूल्य है ? मेरी भावनाएं है, एहसास है या नहीं ?!  तो चलिए, आज मैं आपको अपने बारे में बताती हूँ।

मुझे कई अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, जैसे : नहर, सरिता, प्रवाहिनी, तटिनी, आदि। मैं मुख्यतः स्वभाव से चंचल हूं, पर कभी-कभी मद्धम भी हो जाती हूं।  

कल-कल करके बहती ही रहती हूं, निरंतर – बिना रुके, बिना अटके, बस चलती ही रहती हूं। मेरा जन्म पर्वतों में हुआ और वहां से झरनों के रूप में मैं आगे बढ़ती हूं और फिर बहते बहते बस सागर में जा मिलती हूं।

मेरा बहाव कभी तेज, तो कभी कभी धीमा होता है। मैं स्थान अनुसार कभी संक्री, तो कभी चौड़ी हो जाती हूं। मेरे रास्ते में बहुत अड़चनें, बहुत रुकावट आती है; कभी पत्थर, कभी कंकर, कभी चट्टान – पर मैं कभी ठहरती नहीं हूं – अपना रास्ता बनाते चलती रहती हूं, झर झर बहती रहती हूं।

मनुष्य मुझसे अनेकों प्रकार से जुड़ा हुआ है,  या यूं कहूँ के मैं मनुष्य के लिए अति उपयोगी हूँ। मनुष्य के लिए मेरे क्या क्या उपयोग हैं ? चूंकि मेरे भीतर जीव जंतु पाए जाते हैं इसलिए मैं मनुष्य के लिए भोजन का स्त्रोत हूं, मैं ना जाने कितने ही लोगों का पेट भरती हूं।

मेरे ही कारण सभी के घरों में पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध हो पाती है अथवा उस पानी से मनुष्य अपने अनगिनत कार्यों को निपटाता है।

मैं पर्यावरण में पारितंत्र का संतुलन भी बनाए रखती हूं। मेरे ही पानी द्वारा मनुष्य अपने उपयोग के लिए बिजली उत्पन्न करता है और उस बिजली से मशीनरी के ढेरों काम होते हैं।

मेरे नीर से ही खेतों की सिंचाई भी होती है, जिसके कारण फसलों में जान आती है एवं अनाज लहलहाने लगता है, बागों में लगे पेड़ फलों से लद जाते हैं।

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मैं किसी एक क्षेत्र, एक राज्य या किसी एक देश से बंधी हुई नहीं हूं। मुझे कोई सरहद रोक नहीं सकती है। मैं बस पाई जाती हूं, मैं बस हूं, मौजूद हूं – हर जगह, हर क्षेत्र, राज्य, देश में – अलग-अलग रूपों में, भिन्न-भिन्न प्रकार से, विभिन्न नामों के साथ।

मेरे अस्तित्व को अगर देखा जाए, तो मेरे भीतर भी भावनाएं है, एहसास है; पर मैं कभी कह नहीं पाती, चुप हूं क्योंकि शायद प्रकृति, जो कि मेरी माँ है, का यही नियम है।

प्रकृति बहुत कुछ, बहुत से भी ज्यादा कुछ देती है, परंतु मूक रहती है, उन चीजों का कभी हिसाब नहीं लेती। परंतु मुझे इस संदर्भ में तकलीफ महसूस होती है, मेरे भी एहसास है, मुझे भी दुख-सुख महसूस होता है।

मनुष्य मुझे मुख्यतः प्रलोभी जान पड़ता है, बस अपना स्वार्थ पूरा करने हेतु किसी भी हद तक जा सकता है। मेरे इस मत का क्या कारण है, मैं आपको एक उदाहरण देकर बताती हूँ।

मनुष्य द्वारा मुझे देवी के रूप में पूजा जाता है, मेरी पूजा अर्चना की जाती है, लोग मन्नत मांगते हैं, इच्छा पूरी करने के लिए व्रत रखते हैं, फूल चढ़ाते हैं; फिर वहीं दूसरी ओर मुझ में गंदगी डालते हैं, मुझे प्रदूषित करते हैं।

अब बताइए भला देवी को कोई मैला करता है क्या ! बस यहीं पर मनुष्य के दोहरे मानक सामने आ जाते हैं, अगर मुझे सच्चे मन से देवी मानते, तो मुझ में कभी भी कूड़ा ना डालते।

आज परिस्थितियां यह है कि नदियों का पानी अत्यंत दूषित हो चुका है। फैक्टरियों से निकला हुआ जहरीला पदार्थ, कचरा, मलबा, घरों के कूड़े से निकला हुआ प्लास्टिक, गंदगी, त्योहारों का जमा हुआ कचरा और ना जाने कितनी ही चीजें नदियों के पानी में मिलकर प्रदूषण फैला रही है।

इन सब बिंदुओं के विपरीत कुछ अच्छे पल, कुछ अच्छे लम्हे भी हैं मेरी झोली में। एक सुनसान खूबसूरत जंगल में बहते हुए, जब मैंने एक थके हुए राहगीर की प्यास बुझाई थी, तब बहुत अच्छा महसूस हुआ था।

बाग में खेलते हुए छोटे बच्चे ने जब मिट्टी में सने अपने छोटे-छोटे हाथ मुझमे धोए थे, छप-छप करके मेरे पानी के साथ खेल किया था, तब अत्यंत आनंद आया था।  

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त्योहारों के वक्त में, जब मेरे आसपास भीड़ उमड़ती है, मेले लगते हैं, खूब रौनक होती है, सभी चेहरों पर मुस्कान होती है, तब बहुत अच्छा लगता है।

\त्योहारों में अलग ही खुशी होती है, सभी लोग: बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएं, छोटी बच्चियां, लड़के – एक ही जगह एकत्रित होते हैं, भिन्न भिन्न प्रकार के व्यंजन बनते हैं, हर्ष उल्लास का पर्व सा होता है, यह सभी बहुत खुशनुमा लगता है।

परन्तु बहुत से पल ऐसे भी होते है, जब मन भाव विभोर हो जाता है। जीवन काल पूरा होने पर, जब मनुष्य मृत्यु की गोद में समा जाता है और मिट्टी का शरीर चिता पर जलने के बाद राख में बदल जाता है, बस राख रह जाती है। जीवंत होने पर जो व्यक्ति प्यारा होता है, मृत्यु के बाद उसी को चिता की आग दिखाते हैं और अस्थियां नदी में बहते हैं : यही कटु सत्य है।

ऐसा लगता है मानो उस राख में मनुष्य का सारा जीवन है और मैं यह सब महसूस कर पाती हूँ।  मनुष्य के सपने, उम्मीदें, इच्छाएं; सब कुछ, जीवन पूरा होने पर, बस बहा चला जाता है। मनुष्य ने सारा जीवन, जिन इच्छाओं के पीछे गँवाया, वही इच्छाएं पानी की धार के साथ बही चली जाती है।

और बस यही सबसे बड़ा फर्क है, मनुष्य और मुझ में; मैं कभी मरती नहीं हूँ, मेरी मृत्यु नहीं होती, और न ही मेरी कोई इच्छाएँ है। यह संभव ही नहीं है, चूँकि मेरी कोई जीवन अवधि नहीं होती है।

मैं प्रकृति की देन हूं और प्रकृति तो सदा ही रही है। मैं थी, मैं हूं और मैं रहूंगी। मेरे दम पर भिन्न भिन्न प्रकार के प्राणी जीवित है, मैं जीवन देती हूं। कोई ऐसी वस्तु नहीं, ऐसा हथियार नहीं, जो मेरे प्राण ले ले।

इसके उपरांत, वह एक बात : जो मैं चाहूंगी कि मनुष्य मुझसे सीखें, अपने जीवन में अपनाएं, वह है – बस निरंतर चलते रहना। कहीं रुकना नहीं है, चाहे कितनी भी बाधाएं, कितनी भी कठिनाई आ जाए, कितनी ही परेशानियां हो, कभी हार नहीं माननी, कभी थकना नहीं है।

बस कहीं टूट कर बैठना नहीं है, कहीं ठहरना नहीं है, बस चलते चले जाना है – जीवन की बहती हुई धारा के संग, जैसे जैसे जीवन बहता चला जाए, बस उसी प्रकार अपने अस्तित्व को ढाल लेना है, परिस्थितियों के अनुसार।

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मनुष्य की यही प्रकृति है, जब सुख समृद्धि होती है, तब अत्यंत खुश रहता है और जब कोई तकलीफ होती है, तो हार मान कर, थक कर टूट जाता है, रुक जाता है, परिस्थितियों से घबराकर हौसले पस्त कर लेता है, आत्मविश्वास में कमी आ जाती है; परंतु अगर मनुष्य मेरे प्राकृतिक स्वभाव को अपनाएं तो संभव ही चिंता मुक्त जीवन व्यापन कर पाएगा।

मनुष्य के कार्यकलापों के कारण ही पारितंत्र का संतुलन खो चुका है। वनों की कटाई, बढ़ती हुई आबादी से निरंतर बढ़ता हुआ प्रदूषण : जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, थल प्रदूषण – इन्हीं सब परिस्थितियों के कारण ही आज हालात इतने खराब हैं।

कारणवश ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या आ खड़ी हुई है, ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया भर में प्राकृतिक आपदाओं की भरमार हो गई है। इन्हीं सब वजहों से मनुष्य ने बाढ़ जैसे हालातों में मेरा विकराल रूप भी देखा हैं।

आज दुनिया के हर कोने में, बाढ़ जैसे हालात आसानी से देखे जा सकते हैं। बाढ़ अपने आप में एक अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति हैं। हर ओर बस पानी ही पानी नजर आता है, पर पीने को एक बूंद भी नहीं मिलती। मकान, दुकानें, बाजार, सभी कुछ जलमग्न हो जाता है।

जान माल का काफी नुकसान होता है, कई जिंदगियां खत्म हो जाती हैं।  मनुष्य के स्वार्थी स्वभाव के कारण ही, यह सब हालात उभर कर आते हैं क्योंकि वह परिणाम के बारे में नहीं सोचता, बस केवल अपने आनंद के लिए निरंतर प्रयास करता रहता है।

कारणवश, यह भी हो सकता है कि एक दिन ऐसा भी आए, के मेरा नीर ही सूख जाए और मुझ में जीवन ही ना रहे; इसलिए मनुष्य को मेरी यही सलाह होगी कि वह अपने आप पर काबू रखें, अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखें : वरना वह दिन दूर नहीं जब प्रकृति में हाहाकार मच जाएगा और जन जीवन कुछ भी नहीं बचेगा। 

निष्कर्ष Conclusion

इस लेख में आपने एक नदी की आत्मकथा निबंध Autobiography of a River in Hindi हिन्दी में पढ़ा। आपको यह कैसा लगा कमेंट के माध्यम से ज़रूर बताएं।

21 thoughts on “नदी की आत्मकथा निबंध Autobiography of a River in Hindi”

  1. Great, superb and everything is written in detail but short and satisfying. It helped me in the Essay Competition and helped win first place. Thank you. Love it.

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