21+ बिहारी के दोहे हिंदी अर्थ सहित Bihari Ke Dohe with Meaning in Hindi

21+ बिहारी के दोहे हिंदी अर्थ सहित Bihari Ke Dohe with Meaning in Hindi

बिहारी लाल कौन थे?

हिंदी साहित्य की महान विभूतियों में से एक, गागर में सागर भरने वाले कवि बिहारी लाल जी का जन्म लगभग 1603 ई0 में, ग्वालियर के निकट बसुआ गोविन्दपुर में हुआ था। वह मुख्य रूप से श्रृंगारी कवी थे। इनके पिता जी का नाम केशव राय चौबे था। ये अपने बाल्यकाल में ही अपने पिता जी के साथ अपने पैतृक आवास को छोड़कर ओरछा नगर आ गए थे।

वहीँ ओरछा नगर में ही बिहारी लाल जी ने आचार्य केशव दास के पास अपने काव्यशास्त्र की शिक्षा ग्रहण की । वह इतने प्रतिभावान थे कि ये कुछ ही समय मे काव्यशास्त्र की कला में पारंगत हो गए। ऐसा कहा जाता है कि बिहारी लाल जी ने अपना बाल्यकाल बुंदेलखंड में तथा अपनी तरुणावस्था मथुरा में व्यतीत की जो कि इनकी ससुराल थी।

इनके सम्बन्ध में निम्न दोहा प्रचलित है-

जन्म ग्वालियर जानिये, खंड बुंदेले बाल।
तरुनाई आये सुघर, मथुरा बसि ससुराल।।

21+ बिहारी के दोहे हिंदी अर्थ सहित Bihari Ke Dohe with Meaning in Hindi

मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोई।
जा तन की झांई परै, श्याम हरित-दुति होय।।

व्याख्या-
इस दोहे के माध्यम से बिहारी लाल जी श्री कृष्ण के साथ विराजमान होने वाली श्रृंगार की अधिष्ठात्री देवी राधिका जी की स्तुति करते हुए उनसे अपने कष्टों को दूर करने का आह्वान करते हैं। वह कहते हैं कि जिनकी शरीर की एक झलक अर्थात राधा रानी के शरीर की परछाई को देख कर मेरे आराध्य श्री कृष्ण परम आनंदित हो जाते हैं। ऐसी चालाक अर्थात अपने भक्तों का कष्ट दूर करने में परम कुशल राधा जी मेरे सारे संसारिक दुखों को दूर कर सभी बाधाओं का निवारण करें।

अधर धरत हरि कै परत, ओठ-डीठि-पट जोति।
हरि बाँस की बाँसुरी, इन्द्रधनुष-रँग होति।।

व्याख्या-
इस दोहे में राधा जी की सखी श्री कृष्ण के बांसुरी के सौंदर्य से प्रभावित होकर उनकी प्रशंसा करते हुए राधा जी से कहती है कि जब श्री कृष्ण हरे बांस की बांसुरी को बजाने के लिए, लालिमा लिए हुए अपने होठों पर रखते है और जब उनके काले नैनो का रंग और श्री कृष्ण जी के द्वारा पहने हुए पीले रंग के वस्त्रों का पीला रंग, उस हरे बांस की बांसुरी पर पड़ता है तो वह हरे रंग के बांस की बांसुरी इंद्रधनुष के समान सात रंगों में चमक उठती हैं या अत्यंत सुंदर एवं आकर्षक प्रतीत होती है।

जप माला छापा तिलक, सरै ना एकौ कामु।
मन-काँचे नाचै वृथा, सांचे रांचे रामु।।

व्याख्या-
बिहारी लाल जी कहते हैं कि ईश्वर की भक्ति करने में बाहरी आडंबरों जैसे कि समाज को दिखाने के लिए पूजा करना, लोगों को दिखाने के लिए गले में अनेक प्रकार की मालाओं को धारण करना, और अपने आप को ईश्वर का बहुत बड़ा भक्त दिखाने के लिए तरह-तरह के तिलक छापे लगाना आदि से कोई भी काम पूरा नहीं होता है।

जब तक कि हमारा मन ईश्वर की भक्ति में नहीं लगेगा तब तक हम बेकार में इधर-उधर घूमते रहेंगे और जब हम अपने सच्चे मन से उस ईश्वर की शरण में जाएंगे और उसकी साधना करेंगे तभी ईश्वर हम पर प्रसन्न होंगे।

तौ लगु या मन-सदन मैं, हरि आवै कीन्हि बाट।
विकट जटे जौं लगु निपट, खुटै न कपट-कपाट।।

व्याख्या-
बिहारी लाल जी कहते हैं कि जिस प्रकार घर का दरवाजा बंद होने पर उसमें कोई तब तक प्रवेश नहीं कर सकता है जब तक कि उसका दरवाजा ना खोला जाए, उसी प्रकार मनुष्य जब तक अपने मन के छल एवं कपट रूपी दरवाजे को हमेशा के लिए नहीं खोल देता है।

तब तक मनुष्य के मन रूपी घर में भगवान प्रवेश नहीं कर सकते हैं। अर्थात यदि ईश्वर की प्राप्ति करनी है तो मनुष्य को अपने मन से छल कपट को दूर कर उसे निर्मल बनाना होगा।

या अनुरागी चित्त की गति समझे न कोय ,
ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग। त्यों त्यों उज्ज्जल होय।

व्याख्या-
इस दोहे के माध्यम से बिहारी लाल जी अपने आराध्य श्री कृष्ण की भक्ति का वर्णन करते हुए कहते हैं कि प्रेम और अनुराग से भरे हुए इस मन की गति को समझना अत्यंत ही कठिन है। इसकी गति बहुत ही विचित्र है क्योंकि यह मन कभी तो श्री कृष्ण की भक्ति में डूबता है, तो कभी यह सांसारिक मोह माया की ओर भागता है।

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जब प्रेम और अनुराग से भरा हुआ यह मन सांवले रंग के श्री कृष्ण की भक्ति में, जितना डूबता जाता है, उतना ही इस मन के अंदर की कलुषता और मलनता दूर हो जाती है और यह मन पवित्र और ज्ञान के प्रकाश से उज्जवलित होकर निष्कलुष हो जाता है।

सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात।
मानो नीलमणि सैल पर आपत परयो प्रभात।।

व्याख्या-
श्री कृष्ण के अलौकिक रूप तथा उनके वस्त्रों को देखकर मंत्रमुग्ध होकर राधा जी उनके शरीर की तुलना नीलमणि पर्वत तथा उनके पीले वस्त्रों की तुलना प्रातः कालीन सूर्य की किरणों से करते हुए अपनी सखी से कहती हैं कि जिस प्रकार नीलमणि पर्वत पर प्रातः काल कि सूर्य की पीली किरणे पड़ने पर नीलमणि पर्वत सुशोभित हो उठता है, और अलौकिक प्रतीत होता है, उसी प्रकार श्री कृष्ण अपने सांवले सुंदर शरीर पर पीले वस्त्रों को धारण किये हुए अत्यंत सुशोभित लग रहे हैं।

मोर-मुकुट की चन्द्रिकनु, यौ राजत नंद नंद।
मनु ससि शेखर की अकस, किय सेखर सत चंद।।

व्याख्या-
श्री कृष्ण की प्रेयसी अर्थात राधा जी श्री कृष्ण के सौंदर्य पर मुग्ध होकर, श्रीकृष्ण के मस्तक पर शोभायमान मयूर पंख की तुलना चंद्रमा से करते हुए अपने मन की स्थिति का वर्णन अपनी सखी से करती है और कहती है कि, भगवान शिव जी के मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित होकर उनकी आभा को बढ़ाता है और वे अत्यंत सुंदर प्रतीत होते हैं इसीलिए भगवान शिव से भी अधिक सुंदर लगने के लिए श्रीकृष्ण ने अपने मस्तक पर मयूर पंख रूपी सैकड़ों चंद्रमाओं को धारण कर लिया है।

जगतु जान्यौ जिहिं सकलु सो हरि जान्यौ नाहिं।
ज्यौं आँखिनु सबु देखियै आँखि न देखी जाहिं॥

व्याख्या-
इस दोहे के माध्यम से बिहारी लाल जी ईश्वर के भक्तों को प्रेरित करते हुए कहते हैं कि, वें अपने आराध्य, जिसने उनको संपूर्ण जगत का ज्ञान कराया है, उसके बारे में जान ले। बिहारी लाल जी कहते हैं कि जिस ईश्वर ने तुम्हें मनुष्य बनाकर इस संसार में भेजा है, तुमने उस ईश्वर को जाना ही नहीं है।

यह बात वैसे ही है जैसे कि हम अपनी आंखों के द्वारा इस संसार के समस्त वस्तुओं को तो देख सकते हैं, परंतु अपनी उन्हीं आंखों के द्वारा अपनी उस आंख को नहीं देख पाते हैं जिसके द्वारा हम इस संसार को देखते हैं।

दुसह दुराज प्रजानु को क्यों न बढ़ै दुख-दंदु।
अधिक अन्धेरो जग करैं मिल मावस रवि चंदु।।

व्याख्या-
बिहारी लाल जी कहते हैं कि यदि किसी राज्य में दो राजा शासन करेंगे तो उस राज्य की जनता का दोहरा दुख क्यों नहीं बढ़ेगा; अर्थात अवश्य ही बढ़ेगा? क्योंकि जब एक ही राज्य में दो राजा होंगे तो उस राज्य की प्रजा को दोनों राजाओं की आज्ञाओं का पालन करना पड़ेगा और दोनों राजाओं के लिए सुख सुविधाओं की व्यवस्था करनी पड़ेगी। यह वैसे ही है जैसे अमावस्या की तिथि को सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में मिलकर संपूर्ण संसार को और अधिक अंधकारमय कर देते हैं।

नर की अरु नल-नीर की गति एकै करि जोइ।
जेतौ नीचौ ह्वै चलै तेतौ ऊँचौ होइ॥

व्याख्या-
इस दोहे के माध्यम से बिहारी लाल जी मनुष्य के लिए विनम्रता के महत्व का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि मनुष्य और नल के जल की स्थिति एक समान होती है। जिस तरह नल का जल जितना नीचे रहता है, और जब नल को चलाया जाता है तो वह जल उतना ही ऊपर चढ़ता है।

ठीक इसी प्रकार जब मनुष्य भी अपने अहंकार और अवगुणों का त्याग कर जितना विनम्र और नम्रता का आचरण करता है वह मनुष्य उतनी ही ऊंचाई को प्राप्त करता है। अर्थात वह मनुष्य उतना ही श्रेष्ठ होता चला जाता है।

बढत-बढत संपत्ति-सलिल मन-सरोज बढि जाय।
घटत-घटत पुनि ना घटे बरु समूल कुमलाय ॥

व्याख्या-
इस दोहे के माध्यम से बिहारी लाल जी ने यह बताने का प्रयास किया है कि मनुष्य द्वारा अर्जित धन का उसके मन पर क्या प्रभाव पड़ता है। बिहारी जी कहते हैं कि जिस तालाब में कमल होता है यदि उस तालाब में पानी बढ़ता है तो पानी के बढ़ने के साथ ही साथ कमल की नाल भी बढ़ती चली जाती है लेकिन जब तालाब का पानी उतरने लगता है तो कमल की बढ़ी हुई नाल छोटी नहीं हो पाती है, इसलिए वह पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है।

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इसी तरह जब मनुष्य अपनी संपत्तियों को बढ़ाता चला जाता है, तो उसके मन रूपी कमल की नाल भी बढ़ती चली जाती है, कहने का आशय यह है कि मनुष्य की इच्छाएं भी बढ़ती चली जाती है। किंतु यदि किसी कारणवश जब उसका संपत्ति रुपी जल घटने लगता है तो उसके मन रूपी कमल की नाल नीचे नहीं आ पाती अर्थात उसकी इच्छाएं नहीं घटती हैं और उस मनुष्य का अस्तित्व पूर्ण रूप से नष्ट हो जाता है।

बसै बुरार्इ जासु तन, ताही कौ सनमानु।
भलौ भलौ कहि छोडिये, खोटै ग्रह जपु दानु।।

व्याख्या-
इस दोहे के माध्यम से बिहारी लाल जी समाज की वास्तविकता का उजागर करते हुए कहते हैं कि जिस मनुष्य के शरीर में बुराई बसती है अर्थात जो मनुष्य लोगों के साथ दुष्टता का व्यवहार करता है और उनका अहित करता है और लोगों से द्वेष भावना रखता है, इस संसार में उसी का सम्मान होता है। क्योंकि जिस तरह इस समाज के लोग अच्छे ग्रह को अच्छा कहकर वैसे ही छोड़ देते हैं, किंतु जो ग्रह उनका अहित कर सकता है, उस ग्रह की शांति के लिए दान-धर्म और जप आदि कराते हैं।

जौ चाहत चटक न घटे, मैलो होइ न मित्त।
रज राजसु न छुवाइ, तौ नेह-चींकनौं ।

व्याख्या-
इस दोहे के माध्यम से बिहारी लाल जी मन को स्वच्छ और शुद्ध करने का ज्ञान देते हैं। वह कहते हैं कि, मनुष्य यदि तुम चाहते हो की तुम्हारे मन की उज्ज्वलता कभी कम ना हो और तुम्हारा मन कभी दुखी ना हो तो प्रेम रूपी तेल से चिकने मन पर क्रोध, अहंकार आदि रजोगुणी धूल का स्पर्श नहीं होने देना।

कहने का आशय यह है कि जिस प्रकार यदि किसी वस्तु पर तेल लगा होता है तो उस पर धूल के कण जमा होकर उस की चमक को नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार चिकने एवं शुद्ध मन को अहंकार, क्रोध आदि रजोगुणी प्रवृतियां मैला कर देती हैं। अतः मन की शुद्धता के लिए इस प्रकार के रजोगुणी तत्वों का परित्याग करना अत्यंत आवश्यक है।

औंधाई सीसी सुलखि, बिरह विथा विलसात ।
बीचहिं सूखि गुलाब गो, छीटों छुयो न गात॥

व्याख्या-
इस दोहे में बिहारी जी ने ऐसी नायिका का चित्रण किया है जो अपने नायक से अलग हो गई है और उसके उसके बिरह ज्वाला में जल रही है। ऐसी स्थिति में उस नायिका के सखियां आपस में बात करते हुए कहते हैं कि वह अपने प्रेमी से अलग होकर उसके बिरह की प्रचंड अग्नि में जल रही है। उसकी यह दशा अत्यंत दुखद एवं करुणादायीं है।

इस तरह की अग्नि से उत्पन्न ताप को कम करने के लिए हमने गुलाब जल से भरी हुई सारी शीशी उसके ऊपर गिरा दी। परंतु बिरह के कारण उसके शरीर का ताप इतना अधिक हो गया है कि उस गुलाब जल की एक भी बूंद उसके शरीर को छू भी नहीं पायी और गुलाब जल बीच में ही सूख गया।

जोग-जुगति सिखए सबै,मनौ महामुनि मैंन ।
चाहत पिय-अद्वैतता कानन सेवत नैन।।

व्याख्या-
बिहारी जी ने नायिका के सुंदर एवं प्रभावशाली आंखों का वर्णन करते हुए कहा है कि नायिका के यौवन के पूरा हो जाने पर कामदेव रूपी महामुनि ने अपनी योग साधना से नायक से मिलने की सभी विधियां अच्छे से सिखा दिया है।

इसलिए कानों तक फैले हुए नायिका के बड़े नेत्र नायक से मिलकर उसमें खो जाना चाहते हैं। जैसे कोई साधक अपने योग साधना की सभी विधियों को सीख कर ईश्वर को प्राप्त करने के लिए वैराग्य धारण  करके जंगल को चला जाता है अर्थात अपने ईश्वर में खो जाना चाहता है, उसी प्रकार नायिका के नेत्र, यौवन के आने पर नायक से मिलने की अनेकों प्रकार विधियों को सीख गए हैं, और अब उस से मिलने के लिए व्याकुल है। इसी इच्छा में नायिका की आंख उसके कानों तक फैल गई है।

आवत जात न जानियतु, तेजही तजि सियरानु ।
घरहं जँवाई लों घट्यो खरौ पूस-दिन मानु ।।

व्याख्या-
दोहे में बिहारी लाल जी ने पूस के महीने के दिन की तुलना घर जमाई के सम्मान से करते हुए कहते हैं की जिस तरह पूस के दिन का समय बहुत घट जाता है, और अपने ओज और तेज को त्याग कर इतना ठंडा हो जाता है, की दिन कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता; कहने का आशय यह है कि पूस महीने में जैसे दिन निष्प्रभावी और निस्तेज हो जाता है और दिन का समय घट जाता है, ठीक उसी तरह ससुराल में जाकर रहने वाले दामाद का मान-सम्मान भी कम हो जाता है। और उसके वहां रहने, आने और जाने का कुछ भी पता ही नहीं चल पाता है।

सुनत पथिक-मुहँ,माह निसि चलति लूवै उहि गाँम ।
बिनु बुझे, बिनु ही कहे,जियति बिचारी बाम।।

व्याख्या-
नायक जो कि अपने घर से दूर, विदेश में है, जब अपने गांव की तरफ से आए हुए किसी व्यक्ति से यह सुनता है कि उसके गांव में माघ महीने की रात में भी लूएँ चल रही है तो वह पथिक से अपनी पत्नी के बारे में बिना कुछ पूछे, और पथिक द्वारा उसकी पत्नी के बारे में बिना कुछ बताए जाने से पहले ही, वह समझ जाता है उसकी पत्नी अभी जीवित है।

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उसकी पत्नी का उसके बिरह की अग्नि में जलने के कारण ही उसकी पत्नी की सांसें गर्म हो गई है। और उसकी पत्नी की इन्हीं गर्म सांसों के कारण ही उसके पूरे गांव की हवा लू के समान गर्म हो गई है। क्योंकि लूएँ जेष्ठ माह के दिन में चलती हैं ना कि माघ महीने की रात्रि में।

कागद पर लिखत न बनत, कहत सँदेसु लजात।
कहिहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात॥

व्याख्या-
इस दोहे में जब नायिका अपने पति, जो कि परदेस में रहता है, उस को पत्र लिखने के लिए बैठती है तो पसीना, आंसू, हाथ का कांपना आदि जैसे सात्विक भावो के कारण कागज पर अपनी बिरह व्यथा नही लिख पाती है।

अपनी इस बिरह व्यथा को, किसी को सुनाकर संदेश भेजने में भी शर्माती है। इसीलिए वह अपने प्रियतम पर अडिग विश्वास करते हुए, यह लिखकर संतोष करती है, की तुम अपने हृदय की व्यथा से मेरे दुख का अनुमान लगा सकते हो

वे न इहाँ नागर भले जिन आदर तौं आब।
फूल्यो अनफूल्यो भलो गँवई गाँव गुलाब।।

व्याख्या-
इस दोहे के माध्यम से बिहारी लाल जी गुणवान व्यक्तियों को सलाह देते हुए कहते हैं कि इस समाज के अज्ञानी व्यक्तियों के बीच तुम्हारे गुण का कोई महत्व नहीं है। क्योंकि तुम गुलाब के फूल की तरह सुंदर और अच्छे गुणों को अपने अंदर समाहित किए हुए हो।

किंतु ये अज्ञानी लोग तुम्हारे गुलाब के फूल की तरह विकसित अच्छे गुणों को कभी नहीं देख पाते हैं और ये तुमको हमेशा गुणहीन ही मानते हैं। ऐसे में तुम्हारे गुणों का होना और ना होना दोनों ही एक समान है।

कर लै सूँघि, सराहि कै सबै रहे धरि मौन।
गंधी गंध गुलाब को गँवई गाहक कौन।।

व्याख्या-
बिहारी लाल जी इत्र बेचने वाली स्त्री से कहते हैं कि हे मूर्ख स्त्री इस छोटे से गांव अर्थात अज्ञानी लोगों में तुम्हारा कोई भी ग्राहक नहीं है जो तुम्हारे इस इत्र को खरीद सके। यह लोग तुम्हारे इत्र को हाथ में लेकर, सूंघकर, और इसकी प्रशंसा करके तुमको वापस कर देंगे अर्थात इनमें से कोई भी इसका मूल्य देने का इच्छुक नहीं है।

बिहारी लाल जी इत्र की तुलना गुणी व्यक्तियों से करके यह कहते हैं कि गुणवान व्यक्ति को मूर्खों के बीच में अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए क्योंकि मूर्ख व्यक्ति उस ज्ञान से आनंदित तो होता है परंतु उसके उपयोग को नहीं जानता हैं, इसीलिए उस ज्ञान को महत्व नहीं देता है।

चटक न छांडतु घटतु हूँ. सज्जन-नेहु गंभीरू ।
फोके परे न, बरू फटे, रंग्यो चोल रंग चीरू ।।

व्याख्या-
बिहारी जी कहते हैं कि जिस प्रकार मजीठ की लकड़ी को घिस कर उससे लाल रंग निकाला जाता है, और उसमें तेल मिलाकर उसके रंग को पक्का कर दिया जाता है। जिससे वह कभी भी अपना रंग नहीं छोड़ता है और ना हीं फीका पड़ता है चाहे इस रंग से रंगा हुआ कपड़ा फट ही क्यों ना जाए; इसी प्रकार सज्जन व्यक्तियों का प्रेम भी अपनी उत्कृष्टता को नहीं त्यागता है। भले ही इनका मित्र कितना भी निर्धन और निर्बल हो जाएं। ये अपने मित्र का साथ कभी नहीं छोड़ते हैं।

Featured Image – Allinhindi.com

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