चैतन्य महाप्रभु की जीवनी Chaitanya Mahaprabhu Biography in Hindi

इस लेख में आप हिंदी में चैतन्य महाप्रभु की जीवनी (Chaitanya Mahaprabhu Biography in Hindi) पढ़ेंगे। इसमें चैतन्य महाप्रभु का परिचय, जन्म व प्रारंभिक जीवन, चैतन्य महाप्रभु का भारत यात्रा, शिक्षाएं व उपदेश और मृत्यु इत्यादि के बारे में संक्षिप्त में जानकारी दी गई है।

चैतन्य महाप्रभु की जीवनी Chaitanya Mahaprabhu Biography in Hindi

15वीं शताब्दी के भक्ति काल में सबसे प्रमुख बंगाली संत चैतन्य महाप्रभु को वैष्णव गौड़ संप्रदाय की स्थापना के लिए जाना जाता है। श्चैतन्य महाप्रभु जी को श्री कृष्ण का अंश भी माना जाता है। 

वे भक्ति काल के उन संतों में शामिल है, जो ऊंच- नीच, जाति- पाती और भेदभाव के कड़े आलोचक रहे हैं। वे ऐसे समय काल में जन्मे थे, जब विदेशी शासक साधारण प्रजा पर अत्याचार के कहर ढा रहे थे। 

उन्होंने हिंदू मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने की दिशा में जोर दिया। चैतन्य महाप्रभु के विषय में वृंदावनदास द्वारा निर्मित “चैतन्य भागवत” ग्रंथ में उनके जीवन के विषय में ढेर सारी जानकारियां उपलब्ध है।

हरे-कृष्ण, हरे-कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण, हरे-हरे। हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे। यह कृष्ण कीर्तन तो प्रत्येक कृष्ण भक्तों के मुख पर रटी रटाई हुई है। 

इस 16 शब्दों के पवित्र महामंत्र की रचना चैतन्य महाप्रभु की देन है। महाप्रभु भगवान श्री कृष्ण के सबसे बड़े भक्तों में से एक माने जाते हैं। 

वैष्णव संप्रदाय में इन्हें गौर सुंदर, गौर हरी, गौरांग, विश्वंभर मिश्र, निमाई तथा चैतन्य चंद्र इत्यादि कई नामों से जाना जाता है। चैतन्य महाप्रभु भगवान के अनंत गुणों से परिपूर्ण सगुण स्वरूप में विश्वास करते थे।

चैतन्य महाप्रभु का जन्म व प्रारंभिक जीवन (Birth and Early Life of Chaitanya Mahaprabhu)

पश्चिम बंगाल के नादिया नामक गांव में 18 फरवरी सन 1486 में फाल्गुन में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को चैतन्य  महाप्रभु का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र तथा मां का नाम शचि देवी था। 

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बचपन से ही निमाई विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। निमाई के जन्म काल के कुछ समय पहले गौड़ के शासक सुबुद्धि राय थे। 

राजा के दरबार में हुसैनशाह नामक एक पठान सेवक था, जिसने बाद में राजा का तख्तापलट कर के खुद सारा राज्य हथिया लिया। इसके बाद हर जगह वह गैर मुस्लिमों पर अत्याचार करके उनका खात्मा करता था।

उसी दरमियान पूर्ण चंद्रमा के दिन सयोग से चैतन्य का जन्म हुआ था। चैतन्य महाप्रभु बाल्यकाल में बेहद सुंदर, सरल और भावुक प्रकृति के बच्चे थे। 

उनके मुख पर चंद्र जैसी ललाट रहती थी, जिसे देखकर हर कोई हतप्रभ रह जाता था। करीब 15 वर्ष की आयु में निमाई का विवाह लक्ष्मी देवी से हुआ। दुर्भाग्यवश 1505 में लक्ष्मी देवी की मृत्यु सर्पदंश के कारण हो गई। 

जिसके बाद वंश प्रगति के विवशता के कारण नवद्वीप के राजपंडित सनातन की बेटी ‘विष्णुप्रिया’ के साथ निभाई का दुसरा विवाह हुआ।

किशोरावस्था में ही चैतन्य महाप्रभु के पिता का निधन हो गया। पहले ही उनके बड़े भाई विश्वरूप ने बाल्यकाल में ही सन्यास ग्रहण कर लिया था, जिसके कारण चैतन्य को अपनी माता की सुरक्षा के लिए ना चाहते हुए भी गृहस्थ जीवन अपनाना पड़ा। 

24 वर्ष की उम्र में लोक कल्याण और ईश्वर की खोज में चैतन्य  महाप्रभु ने सन्यास ले लिया।

चैतन्य महाप्रभु का भारत यात्रा 

सन्यास धारण करने के बाद चैतन्य महाप्रभु ने चारों तरफ भय और अपमान में जीवन व्यतीत करते लोगों को देखा जहां आताताइयों ने अपने बल के दुरुपयोग पर सर्वत्र हाहाकार मचा रखा था। 

उन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों के भय से स्वेच्छा से धर्म का परित्याग करने वाले लोगों को हरि चरणों के दर्शन करवाएं। सर्वप्रथम दक्षिण भारत से शुरूआत करके जगह-जगह घूम घूम कर हरि संकीर्तन का प्रसाद देश में चारों तरफ बिखेरते गए, जिससे हरि भक्तों में क्रांति आई।

चैतन्य महाप्रभु किसके उपासक थे? 

कवि कर्णपुर के रचना “चैतन्य चंद्रोदय” के मुताबिक निमाई ने सर्वप्रथम केशव भारती नामक एक सन्यासी से दीक्षा ग्रहण की थी। इसके पश्चात चैतन्य अद्वैतआचार्य महाराज और नित्यानंद प्रभु के शिष्य बन गए। 

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चैतन्य महाप्रभु जब अपने पिता को श्रद्धांजलि अर्पित करने पवित्र ‘गया’ की भूमि गए थे, तब वहां उनकी मुलाकात एक संत से हुई, जिसने बालक चैतन्य को भगवान श्री कृष्ण का मंत्र रटने को कहा। 

इसके पश्चात चैतन्य महाप्रभु का जीवन पूरी तरह से बदल गया और वह भगवान कृष्ण के भक्ति में रंग गए। तब से लेकर अपने अंतिम समय तक निमाई ने केवल श्रीकृष्ण की ही उपासना की।

चैतन्य महाप्रभु का भगवान दर्शन (कहानी) Chaitanya Mahaprabhu and God Story

चैतन्य महाप्रभु के पिता जगन्नाथ मिश्र की मृत्यु के पश्चात जब वे पवित्र नगरी गया में अपने पिता की आत्मा को शांति प्रदान करने के लिए उन्होंने एक धार्मिक समारोह किया, तब उनकी मुलाकात एक बड़े ही तेजस्वी संत से हुई, जिन्होंने चैतन्य को श्री कृष्ण नाम जपने के लिए कहा। 

चैतन्य एक बंगाली स्थानीय वैष्णव संप्रदाय को मानने वाले थे। जब वे पुनः अपने निवास बंगाल लौटे, तब उन्होंने अपने गृह का परित्याग कर बंगाल छोड़ने का निर्णय लिया। 

निमाई के अनुसार ईश्वर प्राप्ति का एकमात्र उपाय भक्ति योग है। मोक्ष की कुंजी ही भक्ति है। सत्य की तलाश में चैतन्य महाप्रभु हर तरफ ईश्वर को तलाशते हुए भक्ति योग का आभास करने लगे। 

अपने तप के बल पर और भगवान श्री कृष्ण का नाम जप कर चैतन्य ने भगवान का दर्शन किया। इसके पश्चात उन्होंने अपने शिष्यों को भी भक्ति योग को सीख कर उसे सदा के लिए जीवंत रखने का मार्ग भी बताया था।

चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाएं व उपदेश Teachings of Chaitanya Mahaprabhu in Hindi

  • महाप्रभु ने अपने तपोबल से लोगों को ईश्वर के वास्तविक स्वरूप का पूर्ण बोध करवाया। उनके अनुसार जीव यह ब्रह्मा से पृथक है। चैतन्य महाप्रभु के अनुसार यह जगत ना ही पूर्ण रूप से मिथ्या है, और ना ही शाश्वत।
  • संसार की मिथ्या में खोए हुए जीव हमेशा माया के अधीन जीवन जीते हैं, लेकिन नित्य मुक्त जीव संसार में रहते हुए भी माया से मुक्त रहते है, यही भक्त की परिभाषा है। चैतन्य महाप्रभु के अनुसार माया में उलझे जीव लाखो योनियों में भटकते रहते हैं, जैसे ही वह माया के बंधन से मुक्त होते है, उन पर भगवान की दृष्टि पड़ती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • वैष्णव संप्रदाय में मुक्ति के कई प्रकार बताए गए हैं, इनमें- सालोक्य, सार्ष्टि, सारूप्य, सामीप्य, सायुज्य का समावेश होता है। लेकिन वैष्णव संप्रदाय के अनुसार इन सभी मुक्ति के प्रकारों में सबसे महत्वपूर्ण सायुज्य मोक्ष होता है।
  • “अचिंत्य भेदाभेदवाद” चैतन्य महाप्रभु की मत को कहा जाता है, जिसका अर्थ विभिन्न विद्वानों के अनुसार अलग-अलग बताए गए हैं। 
  • चैतन्य महाप्रभु सगुण भक्ति में विश्वास करते थे। उन्होंने श्री कृष्ण को भगवान का कोई रूप नहीं बल्कि स्वयं भगवान माना है। निमाई को उनके विद्वान अनुयायियों कविराज, कृष्णदास, लोचनदास तथा वृंदावन द्वारा कृष्ण का एक अवतार बताया गया। इसी कारण चैतन्य महाप्रभु को ‘श्री कृष्ण चैतन्य’ भी कहते हैं।
  • कहते हैं कि जब चैतन्य महाप्रभु उड़ीसा के पुरी में रहते थे, तब वह पथ प्रवास में रथ यात्रा के समय कुल 7 टोली बनाकर हरि नाम कीर्तन अपने सभी शिष्यों के साथ मिलकर करते थे। कीर्तन में ढोल, नगाड़े, मृदंग की ताल पर हरि के मधुर नाम का जाप जगन्नाथ रथ यात्रा उत्सव को देखते हुए सभी शिष्यों को ऐसा आभास होता था, कि जैसे टोली का नेतृत्व खुद चैतन्य महाप्रभु कर रहे हैं।
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चैतन्य महाप्रभु की मृत्यु Death of Chaitanya Mahaprabhu in Hindi

14 जून 1534 के दिन उड़ीसा के पुरी के तोता गोपीनाथ मंदिर में मिर्गी के दौरे के कारण चैतन्य महाप्रभु की मृत्यु हो गई। उनके असामयिक मृत्यु के पीछे चैतन्य महाप्रभु के अनुयाई इसे किसी हत्या की साजिश बताते हैं।

लेकिन पर्याप्त सबूत ना होने के कारण इतिहासकार और कई विद्वान निमाई के मृत्यु के पीछे मिर्गी की वजह ही मानते हैं। 

5 thoughts on “चैतन्य महाप्रभु की जीवनी Chaitanya Mahaprabhu Biography in Hindi”

  1. चैतन्य महाप्रभु के जीवन चरित्र को पढ़कर अच्छा लगा।

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