शीत युद्ध का इतिहास Cold War History in Hindi

इस लेख में आप शीत युद्ध का इतिहास Cold War History in Hindi पढ़ेंगे। इसमे शीत युद्ध का अर्थ, कारण, अंत प्रभाव, के विषय में पुरी जानकारी दी है।

शीत युद्ध का इतिहास Cold War History in Hindi

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विश्व में अपना वर्चस्व साबित करने के लिए इतिहास में विभिन्न देशों के बीच कई सारे युद्ध हुए हैं। सामान्यतः युद्ध प्रत्यक्ष रूप से गोली बारूद और अन्य हथियारों से लड़ी जाती है। 

लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से इतिहास में एक बेहद प्रसिद्ध युद्ध हुआ है, जिसमें किसी भी हथियार का सहारा नहीं लिया गया। शीत युद्ध जिसने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और यूएसएसआर (Soviet Union) के वैचारिक मतभेदों के कारण दुनिया को दो गुटों में बांट दिया था।

वर्तमान में रूस भौगोलिक तौर पर दुनिया का सबसे बड़ा देश है। आपको जानकर हैरानी होगी कि रूस पहले 15 देशों का समूह हुआ करता था, जिसे यूएसएसआर के नाम से जाना जाता था। 

लेकिन शीतयुद्ध के बाद यूएसएसआर का विभाजन हो गया और तब से आज तक दुनिया के सभी बड़े महासत्ता वाले देश अपनी शक्ति को दुनिया में प्रदर्शित करने में लगे रहते हैं।

जर्मनी में हिटलर की नाज़ीवाद सरकार गिरने के पश्चात धुरी राष्ट्रों और मित्र राष्ट्रों के बीच वैचारिक मतभेदों के लक्षण उभरने लगे थे। उस दौर में दुनिया साम्यवादी और पूंजीवादी इन दो गुटों में बट गया था। 

शीत युद्ध में महासत्ता संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की जीत हुई थी। राजनीतिक तनाव और अन्य वजह से द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत होने के पश्चात 1945 से लेकर 1991 तक शीत युद्ध चला था। 

शीतयुद्ध का अर्थ Meaning of Cold War in Hindi

शीत युद्ध का इस्तेमाल सबसे पहली बार एक अंग्रेजी लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने अपने एक लेख में 1945 में किया था। इस युद्ध के लिए ‘शीत’ शब्द का उपयोग इस लिए किया गया था, क्योंकि दोनों विरोधी पक्षों के बीच कोई भी प्रत्यक्ष रूप से बड़े स्तर पर युद्ध नहीं किया गया था।

यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक जोकि सोवियत संघ का एक अधिकारिक नाम था। सोवियत संघ की स्थापना 1922 में की गई थी, जो कि दुनिया का पहला साम्यवादी राज्य था। 

जर्मनी, जापान और अन्य सभी धुरी राष्ट्रों के खिलाफ द्वितीय विश्वयुद्ध में रूस ने संयुक्त राज्य अमेरिका और सभी मित्र राष्ट्रों के साथ मिलकर युद्ध किया था।

लेकिन बहुत सारे कारणों के वजह से सोवियत संघ और मित्र राष्ट्रों के बीच मतभेद उत्पन्न होने लगा, जिसके परिणाम स्वरूप वैचारिक तौर पर दोनों ही महाशक्तियां एक दूसरे के विपरीत चली गई। 

शीत युद्ध वास्तव में एक ऐसी स्थिति बन गई थी, जहां बिना हथियारों के कूटनीतिक, आर्थिक और विपरीत विचारधारा को हथियार बनाकर युद्ध लड़ा गया था। 

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शीतयुद्ध के प्रमुख कारण Main Causes of Cold War in Hindi

याल्टा समझौता का उल्लंघन Violation of the Yalta Agreement

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पोलैंड में नए शासन व्यवस्था का निर्माण करने के लिए याल्टा सम्मेलन मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और रूस के बीच हुआ था। लेकिन इस समझौते में सोवियत संघ ने अपने वादे से मुकर कर पोलैंड में अपनी निर्मित लुबनीन सरकार को सैन्य सहायता देना शुरू कर दिया।

इसी बीच सोवियत संघ के प्रभाव में पोलैंड में दूसरे मित्र राष्ट्र और पोलैंड के शासकीय अधिकारियों को गिरफ्तार किया जाने लगा। पोलैंड के अलावा सोवियत संघ चाइना, हंगरी, रोमानिया, इत्यादि कई अन्य देशों में साम्यवादी दलों को बड़े स्तर पर सहायता प्रदान करने लगा। 

इस कारण याल्टा समझौता के उल्लंघन के बाद पश्चिमी देशों में रसिया के खिलाफ जहर भरने लगा, जो आगे चलकर  शीत युद्ध का कारण बना। 

वीटो पावर का दुरुपयोग Abuse of Veto Power

द्वितीय विश्वयुद्ध के खत्म होने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी, जिसमें रूस, चाइना, फ्रांस, अमेरिका और इंग्लैंड को स्थाई सदस्यता मिली थी। सोवियत संघ ने कई बार पश्चिमी देशों के महत्वपूर्ण सुझावों और नियमों को पास होने से रोक दिया था।

संयुक्त राष्ट्र में लाए गए कई प्रस्तावों को रूस द्वारा जड़ से खारिज कर दिया गया, जिसके पश्चात रसिया के विरुद्ध सभी देशों में आलोचना होने लगी जो आगे चलकर शीत युद्ध का एक महत्वपूर्ण कारण बनी।

बर्लिन दीवार का विवाद Berlin Wall Controversy

पोलैंड द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दो भागों में बंट गया था। पश्चिमी बर्लिन जिस पर ब्रिटेन और अमेरिका का दबदबा हो गया और पूर्वी बर्लिन पर रसिया का वर्चस्व हो गया था। दोनों ही दलों ने अपनी-अपनी तरह से पोलैंड में नए नियम और कानून लाना चाहा।

1948 में पश्चिमी देशों द्वारा पोलैंड में अर्थव्यवस्था के विकास के लिए नई मुद्रा का निर्माण किया गया था, जिसके विरोध में रसिया ने उसी साल बर्लिन की नाकाबंदी कर दी। इस तरह प्रोटोकॉल तोड़ने के कारण रसिया को दोषी ठहराया गया।

विरोधी विचारधारा Opposing Ideology

शीत युद्ध होने का एक प्रमुख कारण रसिया और पश्चिमी देशों के बीच वैचारिक मतभेद था। अमेरिका के प्रभाव में अधिकतर पश्चिमी देश पूंजीवादी को प्रबल समर्थन देते थे, जबकि सोवियत संघ के प्रभाव में अन्य  सहयोगी देश साम्यवाद को बढ़ावा देते। 

दोनों देशों के इस विचारधाराओं में जरा भी तालमेल नहीं बैठा, जिसके परिणाम स्वरूप अंततः शीत युद्ध का उद्भव हुआ। 

परमाणु कार्यक्रम Nuclear Program

जिस तरह अमेरिका ने गुप्त तरीके से परमाणु हथियार विकसित करके जापान के 2 शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराया था, इसके कारण सोवियत संघ जोकि जापान का एक पड़ोसी देश है उसके और सभी पश्चिमी राष्ट्रों के सुरक्षा समझौता पर एक शंका उभरने लगी। 

बिना सोवियत संघ को जानकारी दिए ही अमेरिका ने जिस तरह खतरनाक परमाणु बम जापान पर गिराए थे, इससे दोनों ही देशों में सुरक्षा को लेकर अन्य मामलों में भी घृणा की भावना उत्पन्न हो गई।

बाल्कन समझौता विवाद Balkan Settlement Dispute

सोवियत संघ और ब्रिटेन के बीच सहमति के बाद 1944 में बाल्कन समझौते के नियमानुसार पूर्वी यूरोप का विभाजन किया गया था। इस समझौते में यूनान पर ब्रिटेन का अधिकार और रोमानिया तथा बुलगारिया पर सोवियत संघ के अधिपत्य को स्वीकार किया गया था। 

इसके अलावा हंगरी और युगोस्लाविया में सामान प्रभाव की सहमति जताई गई थी। लेकिन सोवियत संघ ने युद्ध खत्म होने के बाद अपनी साम्यवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार करके ब्रिटेन की उपेक्षा की थी। इस कारण दोनों देशों के बीच वैचारिक मतभेद की खाड़ी और भी बड़ी हो गई थी।

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ईरान में सोवियत संघ का बढ़ता प्रभाव Growing Influence of The Soviet Union in Iran

ब्रिटेन ने दुनिया के कई देशों पर अपना कब्जा जमा रखा था, जिसमें ईरान भी शामिल था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन ने ईरान से अपनी सेनाओं को वापस बुलाने पर सहमति जताई थी। 

लेकिन ईरान में सोवियत संघ ने अपनी सेनाओं को वापस नहीं बुलाया और ईरान पर दबाव बनाकर लंबे समय तक तेल का समझौता कर लिया। इस प्रकार धोखे के कारण पश्चिमी देशों और रूस के बीच दूरियां और बढ़ गई।

टर्की में  सोवियत संघ का बढ़ता प्रभाव Growing Influence of The Soviet Union in Turkey

सोवियत संघ द्वारा जर्मनी के समर्पण के बाद द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में टर्की के कई प्रदेशों में अपना सैन्य बल मजबूत किया जाने लगा। 

इसके जवाब में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने ट्रुमेन सिद्धांत की सहायता से टर्की को हर संभव मदद दिया। सोवियत संघ के इस बर्ताव से सभी पश्चिमी देश रूस के खिलाफ हो गए, जिसके परिणाम स्वरूप शीत युद्ध का आरंभ हुआ।

अब तक रूस ने कई बार पश्चिमी देशों के साथ नियम और कानूनों को तोड़ा, लेकिन युद्ध के समय जब हिटलर ने अपनी सेना को सोवियत संघ में हमला करने के लिए भेजा था, तब सोवियत संघ ने पश्चिमी देशों से मदद की गुहार लगाई थी। 

कई समझौता का उल्लंघन करके पश्चिमी देशों ने बहुत विलंब के बाद थोड़ी बहुत मदद का पेशकश किया। तब तक जर्मन सेनाओं द्वारा सोवियत संघ में भारी तबाही मचाई गई थी, जिससे वहा बहुत नुकसान पहुंचा था। मदद ना भेजने के कारण सोवियत संघ और पश्चिमी देशों के बीच तनातनी होने लगी।

पॉट्सडैम सम्मेलन Potsdam Conference

सोवियत संघ, अमेरिका ब्रिटेन और बर्लिन द्वारा 1945 में पॉट्सडैम सम्मेलन का आयोजन हुआ था, जिसमें हारे हुए जर्मनी में तत्काल सरकार की स्थापना, पोलैंड की सीमाओं पर विचार, ऑस्ट्रिया के अधिपत्य और पूर्वी यूरोप की तरफ सोवियत संघ के अहम भूमिका पर  विचार किया गया।

इस सम्मेलन में सोवियत संघ के सीमाओं से लगने वाले सभी पूर्वी यूरोपियन देशों को सोवियत संघ ने बफर जॉन बनाने की पेशकश की थी, लेकिन इससे ब्रिटेन तथा अमेरिका सहमत नहीं हुए। 

इसके कारण यह समझौता सोवियत संघ को प्रभावी नहीं लगा और पक्षपात का अनुभव हुआ। फल स्वरूप कई सारे समझौतों के अप्रभाव से शीत युद्ध का उदय हुआ।

ट्रूमैन सिद्धांत The Truman Doctrine

12 मार्च 1947 को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन द्वारा सोवियत संघ के विस्तार वाद नीति और साम्यवादी विचारधारा पर लगाम लगाने के लिए ट्रूमैन सिद्धांत का निर्माण किया गया, जिसमें दूसरे देशों को पश्चिमी देशों की तरफ से हर संभव मदद प्रदान करना था। 

इसकी सहायता से संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने तुर्की और ग्रीस को आर्थिक एवं सैन्य सहायता प्रदान की थी। ट्रूमैन सिद्धांत शीत युद्ध होने के प्रमुख कारणों में से एक गिना जाता है। 

आयरन कर्टेन Iron Curtain

आयरन कर्टेन शब्द का प्रयोग सबसे पहली बार ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल द्वारा किया गया था। सोवियत संघ ने दूसरे विश्व युद्ध के समाप्ति के बाद अपने मित्र देशों में पश्चिमी देशों मुख्य रूप से अमेरिका और ब्रिटेन के प्रभाव को रोकने के लिए एक राजनीतिक अवरोध खड़ा कर दिया था, जिसे आमतौर पर आयरन कर्टेन के नाम से जाना जाता है। 

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पूर्वी यूरोप  और मध्य यूरोप के कुछ देशों को मिलाकर जिस प्रकार सोवियत संघ ने यूरोपियन देशों के बीच वैचारिक मतभेद खड़ा कर दिया था, इससे शीत युद्ध के उत्पत्ति को और भी बल मिला। 

अंतराष्ट्रीय स्तर पर शीतयुद्ध का अंत प्रभाव End Impact of Cold War on International Level in Hindi

  • बर्लिन की दीवार जिसे सोवियत संघ द्वारा 1948 में आश्रित देशों की सहायता से अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के प्रभाव को रोकने के लिए बनाया गया था, यह शीत युद्ध का एक मुख्य वजह था। वर्ष 1989 में जब शीत युद्ध बस अपने अंत के चरम पर था, तब जाकर बर्लिन की दीवार गिराई गई थी। उस समय में प्रवासियों को बिना अनुमति के अपने निवास स्थल को छोड़ने की अनुमति नहीं थी। पोलैंड में दीवार के दोनों तरफ मजबूत सैन्य शक्तियां स्थापित कर दी गई थी।
  • शीत युद्ध के दौर में अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों को सोवियत संघ के प्रभाव से बचाए रखने के लिए मार्शल योजना का निर्माण किया था, जो यूरोप के पुनर्निर्माण कार्यक्रम का एक हिस्सा था। मार्शल योजना यह ट्रूमैन सिद्धांत का ही एक विस्तृत भाग था, जिसके अंतर्गत अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा सोवियत संघ के विरुद्ध सैनिक सहायता और आर्थिक सहायता प्रदान किया जाना था।
  • अमेरिका के मार्शल योजना के विरोध में वर्ष 1947 में सोवियत संघ ने कमिनफॉर्म योजना की नींव रखी थी, इसके अंतर्गत सोवियत संघ ने अपने सभी मित्र देशों मुख्य रूप से मध्य यूरोपीय और पूर्वी यूरोपीय देशों को अमेरिका के प्रभाव से दूर रखना था।
  • शीत युद्ध में सोवियत संघ पश्चिमी देशों के खिलाफ जमकर जवाब दे रहा था। सोवियत संघ द्वारा जब बर्लिन की घेराबंदी की गई, तब यह पश्चिमी देशों के एक हार की तरह उभर कर सामने आया। पश्चिमी देशों ने एक मजबूत सैन्य संगठन की जगह महसूस की और उसके परिणाम स्वरूप 1949 नाटो का गठन हुआ, जिसमें अमेरिका, इटली, नॉर्वे, पुर्तगाल, कनाडा और डेनमार्क इत्यादि देश शामिल हुए। नाटो एक प्रकार का रक्षा समझौता था, जो देशों के मजबूत समूह को दर्शाता था।
  • नाटो के जवाब में सोवियत संघ ने वारसा संधि निर्मित किया, जिसमें सोवियत संघ के सभी आश्रित देशों को हस्ताक्षर करने के पश्चात शामिल किया गया। पश्चिमी देशों के खिलाफ वारसा संधि में बहुत सारे देशों ने हिस्सा लिया था।
  • शीत युद्ध में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों तथा सोवियत संघ और उसके सहयोगी राष्ट्रों के बीच जैसे हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा नाटकीय रूप से होने लगे। 1957 में सोवियत संघ द्वारा दुनिया का पहला पहला कृत्रिम उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया।  जिससे ‘स्पूतनिक 1’ के प्रक्षेपण द्वारा किया गया था।
  •  इस प्रतिस्पर्धा में अमेरिका भला कैसे पीछे रहता अंततः 1958 में अमेरिका द्वारा ‘एक्सप्लोरर 1‘ नामक  पहला उपग्रह का प्रक्षेपण किया गया। इस प्रतिस्पर्धा में अमेरिका की जीत हुई जब ‘नील आर्मस्ट्रांग’ ने सफलतापूर्वक पहली बार इतिहास में चंद्रमा की सतह पर 1969 में कदम रखा।
  • हथियारों से लेकर आर्थिक विकास के लिए अमेरिका सहित पश्चिमी देशों और सोवियत संघ के बीच बड़ी-बड़ी स्पर्धाए हुई। शीत युद्ध का अंत तब जाकर हुआ, जब 1991 में सोवियत संघ का कुल 15 देशों में विघटन हुआ। आज तक इतिहास में किसी भी देश को इतने ज्यादा टुकड़ों में विभाजित नहीं किया गया था। शीत युद्ध का प्रभाव आज भी सोवियत संघ सहित पूरी दुनिया में दिखाई पड़ती है। 

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