बंधुआ मजदूर का इतिहास व निबंध Essay on Bandhua Majdoor in Hindi

आईये आपको बताते हैं बंधुआ मजदूर कौन थे? उनका इतिहास क्या है? Essay on Bandhua Majdoor in Hindi और हमारे देश भारत में इसके लिए कोई कानून है या नहीं?

बंधुआ मजदूर का इतिहास व निबंध Essay on Bandhua Majdoor in Hindi

बंधुआ मजदूर से तात्पर्य किसी मजदूर से अत्यधिक कार्य करवाने के बाद भी उन्हें मजदूरी न देना और जीवन भर उसको मजदूर बनाकर शोषण करने से है। यदि कोई मजदूर ऋण न चुका पाए तो उसके बदले उसे जीवन भर कार्य करना पड़ता था।

वास्तव में इस अमानवीय प्रथा का उपयोग शोषक जमींदारों या साहूकारों द्वारा अवैतनिक श्रम प्राप्त करने के लिए एक चाल के रूप में किया गया है। इस प्रणाली को समाज के कुछ सामाजिक और आर्थिक रूप से शक्तिशाली वर्गों को समाज के कमजोर वर्गों का शोषण करने में सक्षम बनाने के लिए डिजाइन किया गया था।

यह प्रणाली मूल रूप से इस तरह काम करती है –  गरीब दलित या समाज के कमजोर तबके के व्यक्ति हमेशा अपने भरण-पोषण के लिए मुंह ताकते रहते हैं और इस उद्देश्य से वे मकान मालिक या साहूकार से कर्ज लेते हैं और कर्ज के भुगतान के रूप में अपना श्रम बल प्रदान करने के लिए बाध्य हो जाते हैं।

ब्याज दर ज्यादा होने पर ऋणी पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऋणी रहता है और उसका कर्ज कभी नहीं मिट पाता है। इस प्रकार बंधुआ मजदूरी का दुष्चक्र चलता रहता है। हालाँकि यह प्रथा भारत के लिए नई नहीं है, यह दुनिया के कई हिस्सों में विभिन्न रूपों में प्रचलित थी।

यह उपनिवेशवादी के क्रूर परिणामों में से एक था। औपनिवेशिक दुनिया भर में बंधुआ श्रमिकों के सबसे बुरे रूपों में से एक गुलाम व्यापार की प्रणाली थी। उपनिवेशवादियों की सबसे क्रूर प्रणालियों में से एक प्रणाली यह थी जिसमें वे दलितों को गुलाम बना लेते थे। ब्रिटिश शासन के समय पर ब्रिटिशर्स ने भारतियों को गुलाम बना रखा था जिसमें वे बस भारतियों का शोषण करते थे और दिन – रात बंधुआ मजदूरों के जैसे काम करवाते थे।

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भारत में प्रचलित विभिन्न अन्य सामाजिक बुराइयों की तरह, बंधुआ मजदूरी भी हमारी जाति-व्यवस्था से जुडी हुई है। मुख्य रूप से, यह उच्च जातियों से संबंधित व्यक्ति हैं, जो शोषक हैं और निम्न जाति के लोग शोषित हैं।

गरीब व्यक्ति समाज में अपनी कमजोर आर्थिक और सामाजिक स्थितियों के कारण मजदूर बनने को तैयार हो जाते हैं। यह प्रणाली प्राचीन काल से चली आ रही है और देश के कुछ हिस्सों में जारी भी है।

इसके अलावा, आजीविका विकल्पों की कमी होना, परिवार में सदस्यों की संख्या ज्यादा होना, शिक्षा का ज्ञान न होना और दलितों में जागरूकता की कमी से उनकी हालत और भी ज्यादा ख़राब होती जा रही थी। कभी-कभी अनुबंधों को बनाने के लिए शक्तिशाली जमींदारों द्वारा बल पूर्वक या जबरदस्ती भी अनुबंध बना दिया जाता था।

जिससे मजबूर लोग बंधुआ मजदूर बन जाते थे। इस प्रकार, मूल रूप से यह एक शोषणकारी प्रथा है, जिसमें भारत की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं में व्यापक असमानताएं देखने को मिलती हैं। इस क्रूर प्रणाली से मजदूर निकल कर जाएँ भी तो कहाँ क्योंकि दूसरे लोग भी शोषण करते हैं। इसी सोच के कारण बेचारे मजदूर दिन-रात चुप-चाप काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

भारत में बंधुआ मजदूरी का प्रारूप

ज्यादातर शोषण खेती या कृषि क्षेत्र में होता है क्योंकि इसमें अक्सर दलित वर्ग के लोग मजदूरी करते हैं। परंपरागत रूप से भूमि उन्ही लोगों के पास होती है जो जाति से उच्च हैं और जो लोग निम्न वर्ग के हैं उनके पास भूमि का कुछ ही अंश होता है या भूमि होती ही नहीं है।

इसीलिए जीवकोपार्जन के लिए वे मजदूरी करने को विवश हो जाते हैं। बंधुआ मजदूरी एक प्रकार से मजबूर श्रम का एक विशिष्ट रूप है, जिसमें एक व्यक्ति को अपने कर्ज का भुगतान करने के लिए श्रम बेचने के लिए मजबूर किया जाता है। हालांकि, सभी बंधुआ मजदूरों को मजबूर नहीं किया जाता है, लेकिन अधिकांश मजबूर श्रम प्रथाओं को बंधुआ प्रकृति या तो जबरदस्ती या मजबूरी से जोड़ा जाता है।

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इसके अलावा, बंधुआ मजदूरी न केवल कृषि क्षेत्र में प्रचलित है, शहरी क्षेत्रों में भी कई क्षेत्रों जैसे खनन और ईंट भट्ठा उद्योग आदि में भी इसका प्रचलन है। शहरी क्षेत्रों में प्रवासी मजदूरों को बिना किसी नाममात्र के पारिश्रमिक के लिए अपना श्रम बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

इस अमानवीय प्रणाली के तहत बच्चों का भी व्यापक रूप से शोषण किया जाता है, विशेष रूप से छोटे उद्योगों में जैसे पटाखे बनाने की कंपनी में, माचिस बनाने वाली इकाइयाँ, कपड़ा, चमड़े का सामान निर्माण आदि; वे चाय-दुकानों, रेस्तरां और ढाबों आदि में भी कार्यरत हैं और सुबह से रात तक काम करने के लिए मजबूर हैं।

बंधुआ मजदूर अधिनियम 1976

बंधुआ मजदूरी प्रणाली के अंतर्गत अधिनियम 1976 लागू हुआ। इसका उद्देश्य – इस प्रणाली का अंत हो, जो व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर हैं उनका शोषण न हो, बंधुआ मजदूरी को समाप्त किया जाये और मजदूरों को बाध्य न किया जाये आदि था।

जब आप डॉ. मुल्क राज आनंद द्वारा लिखित उपन्यास “टू लीव्स एन्ड अ बर्ड” पड़ेंगे तब आपको आज़ादी से पहले की मजदूरों की स्थिति पता चलेगी। उसमें असम के चाय के बाघनों में कैसे ब्रिटिशर्स ने भारतीय लोगों को गुलाम बनाया और शोषण किया।

अच्छे रहने की व्यवस्था, अच्छा भोजन आदि का लालच देकर जीवन भर के लिए बंधुआ मजदूर बना दिया था। एक बार अगर कोई उस स्थान पर पहुँच जाये तो वहां से निकलना मुश्किल था और स्त्रियों का शोषण होता था। उस समय पर कुछ इस तरह का शोषण किया जाता था।

लेकिन अब पहले की स्थिति से कहीं ज्यादा सुधार है। पूंजीपतियों और आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को सोचना चाहिए कि सभी आखिरकार मानव हैं। सबको समानता का अधिकार है। जो व्यक्ति जितना कार्य करे उसे उसके बदले उतना पैसा मिलना चाहिए। जिससे उनका मनोवल बड़े। जब तक लोगों में मानवता नहीं आएगी तब तक उन्हें लोगों के कार्य की कद्र नहीं होगी।

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हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि स्व. श्री सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने अपनी कविता “वह तोड़ती पत्थर” में उस समय का वर्णन किया है जब पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा लोगों का शोषण हो रहा था। इस तरह के शोषण को देखकर निराला जी से नहीं रहा गया और वे बेचैन हो गए और उनकी लेखनी से जो शब्द निकले वे इस प्रकार हैं –

वह तोड़ती पत्थर;

देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-

वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार

पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;

श्याम तन, भर बंधा यौवन,

नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,

गुरु हथौड़ा हाथ,

करती बार-बार प्रहार

सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।

वह तोड़ती पत्थर।

ऐसी न जाने कितनी घटनाएं हमारे साहित्य में संग्रहित हैं और कई सारी मूवीज भी हैं जिनके द्वारा हम इस प्रथा से अवगत हो सकते हैं। वास्तव में अब  जरुरत है कि लोगों को लोगों के कार्य की कद्र हो व एक – दूसरे के कार्य को उनकी कुशलता समझे और मनोबल बढ़ाएं। तभी हमारे देश का विकास हो सकेगा, हम अपने ही देश के लोगों का शोषण करके कभी विकसित नहीं हो पाएंगे।

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