चैतन्य महाप्रभु पर निबंध Essay on Chaitanya Mahaprabhu in Hindi

चैतन्य महाप्रभु पर निबंध Essay on Chaitanya Mahaprabhu in Hindi

भारत विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों तथा सम्प्रदायों को अपने अंदर समाहित किये हुए विविधताओ से भरा देश है। यहाँ पर विभिन्न प्रकार के आंदोलन चलाये गए थे। इन्ही आंदोलनों में सभी धर्मों में भगवान की भक्ति करने के तरीकों के लिए समाज मे एक मौन क्रांति चलाई गई थी जिसे “भक्ति आंदोलन” के नाम से जाना जाता है।

इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कई समाज सुधारकों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन्ही समाज सुधारको में चैतन्य महाप्रभु जी का नाम अग्रणी रूप से लिया जाता है।

चैतन्य महाप्रभु पर निबंध Essay on Chaitanya Mahaprabhu in Hindi

चैतन्य महाप्रभु जी को भक्ति आंदोलन का प्रवर्तक माना जाता है इन्होंने सभी सम्प्रदायों को एकीकृत करके विभिन्न वाद्य यंत्रों की सहायता से संगीतमय तरीके से भगवान की भक्ति करने के एक नवीन रूप को प्रतिपादित किया था।

चैतन्य महाप्रभु जी का जन्म हिन्दू वर्ष के फाल्गुन माह के शुक्ल पूर्णिमा को शाम के समय सिंह लग्न में चंद्र ग्रहण के समय 18 फरवरी सन् 1486 ई0 को पश्चिम बंगाल के नादिया नामक ग्राम में हुआ था।

जिसे अब मायापुर के नाम से जाना जाता है। चैतन्य महाप्रभु जी के पिता जी नाम जगन्नाथ मिश्र तथा इनकी माता जी का नाम शचि देवी था। बाल्यकाल में लोग इन्हें निमाई के नाम से पुकारते थे क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि वे नीम के पेड़ के नीचे मिले थे।

जबकि इनके बचपन का वास्तविक नाम विश्वाम्भर था। ये अपने बाल्यकाल की अवस्था से ही बहुत सुंदर सरल तथा भावुक स्वभाव के बालक होने के साथ ही साथ अनेक विलक्षण प्रतिभाओं से भी सम्पन्न थे। चैतन्य महाप्रभु जी अपने बाल्यकाल की अवस्था मे ही व्याकरण तथा न्याय जैसे विषयों में पारंगत हो गए थे।

जब इन्होंने अपनी पन्द्रह(15) वर्ष की अवस्था को पूर्ण किया तो इनका विवाह लक्ष्मीप्रिया नाम की कन्या के साथ करा दिया गया। परन्तु एक सांप के डंसने के कारण सन् 1505 ई0 को इनकी पत्नी पंचतत्व में विलीन हो गयी। अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए इनके पिता जी ने इनका दूसरा विवाह, नादिया के राजपंडित सनातन की पुत्री के साथ करा दिया। जिसका नाम विष्णुप्रिया था।

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इन्होंने नादिया में एक स्कूल की स्थापना करके उसमें अध्यापन का भी कार्य किया था। अपने पिता जी का श्राद्ध संस्कार करते समय इनकी मुलाकात एक संत से हुई जिनका नाम ईश्वरपुरी था। ईश्वरपुरी जी ने ही इन्हें भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करने के लिए बोला था।

इन्ही सन्त से मिलने के बाद इनके जीवन मे बहुत बड़ा बदलाव आया जिसके बाद ये भगवान श्रीकृष्ण की आराधना में मग्न रहने लगे। भगवान श्रीकृष्ण के लिये इनकी अटूट श्रद्धा, भक्ति और विश्वास को देखकर लोग इनका अनुसरण करने लगे।

सबसे पहले नित्यानंद प्रभु तथा अद्वैताचार्य महाराज ने इनको अपना गुरु मानकर भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करने लगे। इन्होंने अपने जीवन के चौबीस(24) वर्ष की अवस्था मे ही गृहस्थ जीवन को त्याग कर संन्यासी जीवन व्यतीत करना प्रारंभ किया था। संन्यास ग्रहण करने के बाद ही इनका नाम चैतन्य महाप्रभु पड़ा था इससे पहले लोग इन्हें निमाई के नाम से जानते थे।

संन्यास ग्रहण करने के बाद चैतन्य महाप्रभु नीलांचल चले गए थे। इसके बाद ये भारत के दक्षिणी भाग के सेतु बंध तथा श्रीरंग क्षेत्र आदि स्थानों पर भी अपना समय व्यतीत किया था। इन्होंने देश के प्रत्येक हिस्से का भ्रमण करके भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं तथा इनकी भक्ति की महत्ता का प्रचार प्रसार किया था।

ऐसा कहा जाता है कि संन्यास लेने के बाद जब चैतन्य महाप्रभु पहली बार जगन्नाथ मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए गए तो वहाँ पर भगवान की मूर्ति को देखकर इतने भाव विभोर हो गए कि भगवान की भक्ति में लीन होकर नृत्य करने लगे थे।

ये भगवान की भक्ति में इतने मग्न थे कि इन्हें किसी भी चीज़ का ध्यान नही रहा और ये नृत्य करते – करते ही बेहोश हो गए थे। इनकी भगवान के प्रति इतना प्रेम भक्ति को देखकर वहाँ पर उपस्थित प्रकांड पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य जी इनको अपने घर ले गए।

पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य जी के घर पर इन दोनों के बीच शास्त्र पर चर्चा प्रारम्भ हुई। इस चर्चा में पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य जी अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने लगे और तभी चैतन्य महाप्रभु जी ने भगवान की भक्ति के महत्व को ज्ञान से अधिक सिद्ध करके अपने षड्भुज रूप का दर्शन कराया था।

इनके इस रूप को देखने के बाद से ही पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य जी ने चैतन्य महाप्रभु जी को अपना गुरु माना और इनके शिष्य बन गए तथा अपने जीवन के अंतिम समय तक इन्ही के साथ रहे। चैतन्य महाप्रभु जी के साथ रहकर इन्होंने भगवान की भक्ति के महत्व का प्रचार प्रसार किया था।

सन् 1515 ई0 में चैतन्य महाप्रभु जी जंगल के रास्ते वृन्दावन के लिए चले गए। ऐसा कहा जाता है कि जंगल के रास्ते वृन्दावन जाते समय चैतन्य महाप्रभु जी के द्वारा भगवान के नाम का उच्चारण सुनकर जंगल के सभी जानवर मग्न होकर इनके साथ नाचने लगते थे। चैतन्य महाप्रभु जी कार्तिक पूर्णिमा को वृंदावन पहुचे थे और इसी कारण से आज भी वृन्दावन में कार्तिक पूर्णिमा को चैतन्य महाप्रभु जी का आगमन उत्सव मनाया जाता है।

वृन्दावन में इन्होंने इमली तला और अक्रूर घाट पर अपना समय व्यतीत किया था। इन्होंने यहाँ पर रहकर प्राचीन श्रीधाम वृन्दावन की महत्ता को प्रतिपादित करने का काम करने के साथ ही लोगो के मन में समाप्त हो रही भगवान की भक्ति की भावना को पुनः जागृत करने का काम किया था।

इसके बाद चैतन्य महाप्रभु जी यहाँ से प्रयाग चले गये। इन्होंने काशी, हरिद्वार, शृंगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु), द्वारिका, मथुरा आदि विभिन्न स्थानों पर रहकर भगवान के नाम के संकीर्तन का प्रचार-प्रसार करने का काम भी किया था।

चैतन्य महाप्रभु जी ने अपने जीवन के अंतिम समय को जगन्नाथ पुरी में रहकर बिताया था। यहीं पर सन् 1533 ई0 में सैंतालीस(47) वर्ष की अल्पायु में ही जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा के दिन अपने जीवन कि अंतिम सांसो को लेकर पंचतत्व में विलीन हो गये।

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