भारत मे सम्प्रदायिकता पर निबंध Essay on Communalism in India Hindi

भारत मे सम्प्रदायिकता पर निबंध Essay on Communalism in India Hindi (Sectarianism इन हिंदी)

भारत पूरे विश्व का एक मात्र एक ऐसा देश है जहाँ विभिन्न धर्म, जाति, एवं समुदाय के लोग रहते है। यहाँ पर निवास करने वाले लोग अलग-अलग धर्मों एवं सम्प्रदायों में अपनी आस्था रखते है। भारत देश की नजर में यहाँ के सभी धर्म एक समान है तथा इन धर्मो को मानने वालों के बीच मे भी कोई भेदभाव नही करता है।

भारत मे सम्प्रदायिकता पर निबंध Essay on Communalism in India Hindi (Sectarianism in Hindi)

भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन की एक प्रमुख विशेषता ही विविधता में एकता है। वास्तविक रूप में सभी धर्मों एवं सम्प्रदायों का एक ही मूल मत मानवता है। सभी धर्म हमे यही सिखाता है कि हमे जाती धर्म से उर उठकर मानवता के धर्म का पालन करना चाहिए।

मानवता का धर्म हमे एक दूसरे से भावनात्मक रूप से जोड़ कर एक दूसरे की मदद करने के कार्य को बढ़ावा देता है। परन्तु आजकल कुछ लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए मानवता धर्म का पालन न करके हमे धर्मो और जातियों में बॉटने का काम कर रहे है।

ऐसा करके वह समाज मे सम्प्रदायिकता को जन्म दे रहे है जो कि आज के समाज के लिए बहुत ही घातक सिद्ध हो रहा है। अगर सम्प्रदायिकता को भारत देश के परिपेक्ष्य में देखा जाए तो इसे हिंदू और मुस्लिम धर्म से जोड़कर देखा जाता है।

क्योंकि हिन्दू धर्म का उदय भारत देश मे हुआ है और इसके विपरीत मुस्लिम धर्म भारत के बाहर से यहाँ आये है। परन्तु भारत के इतिहास में एक समय ऐसा भी था जब भारत देश मे सम्प्रदायिकता नाम का शब्द था ही नही या यूं कहें कि इस शब्द की जरूरत ही नही थी।

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सम्प्रदायिकता नाम के शब्द का भारत देश मे न होने का सबसे  बड़ा कारण था हिन्दू और मुस्लिम की एकता एवं भाईचारा। जबकि इस समय भी हिन्दू और मुस्लिम की संस्कृतिया अलग अलग थी इसके बावजूद इनकी एकता मिसाल देने लायक थी।

लेकिन कहते है ना कि जब बुरा वक्त आता है तो सारी मिसालें धुँधली पड़ जाती है। 19वीं शताब्दी में उदय हुए सम्प्रदायिकता शब्द ऐसे ही कुछ कारनामे करने में सफलता हासिल की और भारत के इतिहास पर सम्प्रदायिकता के रंग को चढ़ाने की शुरुआत की जिसकी रंगत आजतक नही उतर सकी है।

मुस्लिम धर्म के भारत से बाहर आने के कारण ही हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदाय के रीति रिवाजों तथा मान्यताओं में बहुत ही अधिक भिन्नता पायी जाती है। इन्ही भिन्नताओं का फायदा उठाकर कुछ उग्रपंथी लोग दोनों सम्प्रदायों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके इनको आपस मे लड़ाते है तथा अपने स्वार्थ सिद्ध करते है।

सम्प्रदायिकता शब्द पढ़ने और सुनने में जितना सामान्य लगता है इसके परिणाम उतने ही भयावह है। इसके बावजूद भारत जैसे देश मे इसकी महत्ता अपने चरम पर होती है। सम्प्रदायिकता के संदर्भ में हिंदी साहित्य के महान साहित्यकार दिनकर जी ने कहा था कि ‘ सम्प्रदायिकता एक ऐसे संक्रमण रोग की तरह है जो धीरे धीरे भारतीयों के दिलो में अपना स्थान सुरक्षित कर रहा है।’

इस सब के बावजूद 1860 के दशक में कुछ ऐसे भी व्यक्ति आये जिनका मानना था कि हम सब भारतीय है और इसके अलावा हमारा कोई सम्प्रदाय नही है। इस सूची में सबसे अग्रणी नाम सर सैय्यद अहमद खां का आता है।

इन्होंने हिन्दू और मुस्लिम की एकता को पुरजोर देते हुए एक संस्था खोली जो दोनों के हितों की बात करती थी। इनके आने के बाद ऐसा लगा की शायद अब सम्प्रदायिकता शब्द समाप्त हो जाएगा लेकिन कहा जाता है ना कि जख्म ठीक हो सकता है लेकिन नासूर नही।

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जब लोगों का कोई एक समूह किसी धर्म पर विश्वास करने लगता है तो लोगों के इसी समूह को ही सम्प्रदाय का नाम दिया जाता है।

सम्प्रदायिकता की परिभाषा देश के अनुसार बदलती रहती है। भारत मे सम्प्रदायिकता को परिभाषित करने के लिए धर्म को आधार माना जाता है। सम्प्रदायिकता का अर्थ होता है कि जब एक समुदाय अपने से अलग किसी दूसरे समुदाय के लोगो के प्रति उदासीन हो जाये तथा उनके प्रति हिंसा का भाव उत्पन्न करना शुरू कर दे।

सम्प्रदायिकता को दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी परिभाषित किया जा सकता है कि, धर्म के आधार पर एक समुदाय का अन्य किसी दूसरे समुदाय की भावनाओं को बिना समझे ही उनका हिंसात्मक विरोध करना ही सम्प्रदायिकता है।

भारत मे सम्प्रदायिकता के कारण

अगर संप्रदायिकता के कारणों का अध्ययन किया जाए तो प्रमुख रुप से ऐतिहासिक कारण, संस्कृतियों में भिन्नता तथा राजनीतिक स्वार्थ  उभर कर सामने आते हैं। अगर संस्कृति में भिन्नता की बात की जाए तो इसका प्रमुख कारण हिंदू और मुसलमान के बीच का खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाज तथा इनकी विचारधाराओं में बहुत अधिक भिन्नता है क्योंकि मुसलमान संप्रदाय या धर्म के लोग भारत के बाहर से आए थे।

इन दोनों संप्रदायों के बीच की यही भिन्नता ही दोनों संप्रदायों में अलगाव की स्थिति को उत्पन्न करती है। विभिन्न धर्मों की बातो की गलत व्याख्या करके लोगों में धार्मिक संकीर्णता की भावना को उत्पन्न करना भी सम्प्रदायिकता को जन्म देने का एक प्रमिख कारण है।

इसके अतिरिक्त यदि संप्रदायिकता के अन्य कारणों की बात की जाए तो लोगों की उग्रवादी विचारधारा भी काफी हद तक जिम्मेदार होती है क्योंकि उग्रवादी विचारधारा के लोग बिना कुछ सोचे समझे ही किसी किसी भी बात पर अपनी प्रतिक्रिया देने लगते हैं कभी-कभी उनकी यह प्रतिक्रिया बहुत ही भयावह स्थिति का रूप ले लेती है। इसके कारण लोंगो को जान एवं माल की काफी अधिक हानि का सामना करना पड़ता है।

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भारत मे सम्प्रदायिकता के उपाय

क्योकि सम्प्रदायिकता का जन्म किसी एक कारण से नही हुआ है इसीलिये इसे रोकने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास करना बहुत ही आवश्यक है। सबसे पहले तो सम्प्रदायिकता को रोकने के लिए प्रशासनिक स्तर पर ऐसे असामाजिक तत्वो की पहचान करके इनके मनसूबों को सामने लाकर आम जनमानस को सचेत करना चाहिये।

इसके साथ ही साथ विभिन्न धर्मों के धर्म गुरुओं को चाहिए कि अपने अपने धर्म की सही व्याख्या करके लोगो को धार्मिक संकीर्णता से बचायें। लोगो को इस बात से भी रूबरू कराने की आवश्यकता है कि वे बिना सोचे समझे किसी के बहकावे में न आये। इस तरह के छोटे छोटे उपायों से ही सम्प्रदायिकता से बचा जा सकता है।

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