किसान आत्महत्या पर निबंध Essay on Farmers Suicides in Hindi

इस लेख में हिन्दी में किसान आत्महत्या पर निबंध (Essay on Farmers Suicides in Hindi) को बेहतरीन ढंग से समझाया गया है।

किसान आत्महत्या पर निबंध Essay on Farmers Suicides in Hindi

Contents

इस लेख में किसान आत्महत्या का अर्थ, प्रभाव, कारण, रोकने के उपाय किसान आत्महत्या के आंकड़े इत्यादि की जानकारी दी गई है। 

किसान आत्महत्या क्या है? Farmer Suicide Meaning in Hindi

प्राचीन समय से भारत एक ऋषि राष्ट्र रहा है। किसान प्रधान देश होने के कारण हमारे देश में किसानों की जय जयकार करने वाले कई कविताएं और देशभक्ति की शायरियां प्रस्तुत की जाती है। 

लेकिन वर्तमान में दुनिया में सबसे ज्यादा आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या भी भारत में ही दर्ज की जाती है। यह बड़े खेद की बात है कि एक कृषि राष्ट्र होने के बावजूद भी आज तक हम इस समस्या के निवारण छोर पर नहीं पहुंच पाए हैं।

कृषि क्षेत्र में होने वाले आत्महत्या के आंकड़े हर किसी को चौका सकते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा हर वर्ष कृषि क्षेत्र में होने वाले आत्महत्याओं से संबंधित आंकड़ों को भी पब्लिश किया जाता है। 

पूरे देश में सबसे ज्यादा किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याएं महाराष्ट्र में होते हैं। इसके बाद कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों में यह अपराध दर्ज किए जाते हैं। 

किसान आत्महत्या क्यों करते हैं? – मुख्य कारण Why Farmer Do Suicide in Hindi?

हमारे किसान भाई बहनों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या को कई सारे कारक बढ़ावा देते हैं, जिनमें से कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

अनिश्चित जलवायु

यह तो सभी जानते हैं कि कृषि यह प्रकृति से जुड़ा हुआ काम है। यह एक ऐसा रोजगार का माध्यम है, जो पूरी तरह से जलवायु पर निर्भर करता है। 

ऐसी स्थिति में कई बार बाढ़, अकाल इत्यादि प्राकृतिक आपदाओं के चलते किसानों की फसल बर्बाद हो जाती है और वे पूरी तरह लाचार हो जाते है। 

जिन फसल को उगाने में किसान पूरे साल भर मेहनत करता है, वह केवल कुछ क्षण के अंदर ही ख़राब जलवायु के कारण नष्ट हो जाती है। ऐसे में तनाव में आकर किसान आत्महत्या का रास्ता अपनाते हैं।

अत्यधिक ऋण

कृषिकों के आत्महत्या के पीछे यह बहुत बड़ा कारण है। सामान्य तौर पर खेती करने के लिए किसानों को आर्थिक सहायता की जरूरत होती है। 

ऐसे में वह साहूकारों से कर्ज ले लेते हैं, लेकिन जब किसानों की फसल अच्छी नहीं होती और कोई लाभ नहीं होता, तो साहूकारों द्वारा किसानों के ऐसे परिस्थिति का लाभ उठाया जाता है। ज्यादातर किसान कर्ज में डूब जाने के कारण ही आत्महत्या करते हैं।

कृषि संबंधी योजनाओं से वंचित

भारत सरकार किसानों की समस्याओं को लेकर जागृत है, इसलिए वह उनकी समस्याओं का निवारण करने का हर संभव प्रयास करते रहते हैं। 

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कई नई योजनाओं के तहत किसानों के लिए नए अवसर भी प्रदान किए जाते हैं, लेकिन यदि कृषिको को ही इन योजनाओं के विषय में नहीं पता रहेगा तो कैसे चलेगा। 

इस प्रकार कृषि संबंधी योजनाओं से वंचित रह जाने के कारण वे केंद्र की नीतियों का पूरा पूरा लाभ नहीं उठा पाते और परेशान रहते हैं।

सरकारी आर्थिक नीतियां

यदि किसानों पर सबसे ज्यादा कोई प्रभाव डालता है, तो वह सरकार द्वारा बनाई जाने वाली अनिश्चित नीतियां होती है। 

सरकार तो किसानों के विकास के उद्देश्य से भले ही योजनाएं बनाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों के हित में कई बार यह योजनाएं नहीं होती अथवा किसान योजना को अच्छी तरह नहीं समझ पाते, जिससे उन्हें हानी होती है। परिणाम स्वरूप वे आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं।

स्वस्थ्य संबंधी सुविधाओं की कमी

स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी यह केवल किसी एक या दो राज्य में नहीं बल्कि पूरे भारत में ही जीवंत परेशानी है। किसानों के पास इतनी संपत्ति नहीं होती, कि वह अपना इलाज किसी बड़े अस्पताल में करवा सके। 

कई बार किसान भाई बहन अपने बीमारी का इलाज स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में नहीं करवा पाते। यहां तक कि सरकारी अस्पताल भी हर जगह उतनी अच्छी सुविधाएं प्रदान नहीं करती है और दूसरी और जो दूसरे निजी स्वास्थ्य केंद्र होते हैं, वह मोटी रकम वसूलते हैं। 

इस कारण बीमारी से जूझते या फिर आत्महत्या करना किसानों को महंगी दवाइयां खरीदने से ज्यादा बेहतर मार्ग लगता है।

पारिवारिक चिंता व समस्याएं

कृषि यह सबसे मुश्किल कार्यों में से एक होता है। इसमें मेहनत कहीं ज्यादा होती है, लेकिन फल की गुंजाइश न्यूनतम रहती है। ऐसे में परिवार का गुजारा करना बेहद कठिन हो जाता है। 

पारिवारिक चिंताओं के कारण वह मानसिक तनाव और समस्याओं के बोझ तले दब जाता है, अंत में किसान आत्महत्या की तरफ अग्रसर हो जाते हैं।

केवल एक रोज़गार पर निर्भरता

अगर किसी व्यक्ति के पास जीविका चलाने के लिए दो या उससे अधिक रोजगार के माध्यम मौजूद होते हैं, तो यदि किसी एक रोजगार में वह पूरी तरह कंकाल भी हो जाए, तो कोई अधिक फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि रिकवरी करने के लिए दूसरे रोजगार मौजूद होते हैं। 

लेकिन किसान अपनी आजीविका चलाने के लिए केवल एक रोजगार पर निर्भर रहते हैं। ऐसी परिस्थिति में वे एक बड़ा जोखिम मोल ले रहे होते हैं। यदि यह आजीविका उनसे छिन गया तो उनके पास और कोई भी दूसरा विकल्प नहीं बचेगा।

तकनीकी सुविधाओं का अभाव

यह समस्या पूरे भारत में ही फैली है। दूसरे देशों में भले ही इतनी बड़ी तादाद में खेती ना हो, लेकिन वहां के किसानों के पास तकनीकी सुविधाएं और जरूरी सामान मौजूद होते हैं। 

आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, लेकिन फिर भी भारत में करोड़ों ऐसे किसान हैं, जो तकनीकी सुविधाओं से वंचित है। 

वह समय के साथ अपने आप में सुधार नहीं कर पाते और वही पुरानी घिसी पिटी पद्धतियों से खेती करते हैं, जिससे बाजार में अन्य प्रतिस्पर्धीयों का मुकाबला नहीं कर पाने के कारण उन्हें मुनाफा नहीं हो पाता।

पर्याप्त जल सुविधाओं की कमी

खेती करने के लिए सबसे जरूरी चीज पानी होती है। अर्थात सिंचाई कृषि के लिए रीढ़ की हड्डी का काम करती है। जल संकट के प्रभाव से तो सभी वाकिफ हैं। 

आवश्यक मात्रा में सिंचाई के लिए पानी ना मिलने के कारण फसलें विकसित नहीं हो पाती है। अंततः किसान खुद को हानि की स्थिति में पाते हैं।

बाज़ार में फसलों की काला बाजारी

हमारे देश में कालाबाजारी यह बहुत बड़ी समस्या है। भ्रष्टाचार फैलाने में भारत के घूसखोर और बिचौलिए सबसे पहले नंबर पर आते हैं। 

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वे किसानों की नासमझी का फायदा उठाते हैं तथा जब किसी निश्चित फसलों का भाव बाजार में गिर जाता है, तो वह बड़ी मात्रा में उसे खरीद कर इकट्ठा कर लेते हैं। 

किसान तो इससे बहुत खुश होता है, लेकिन उसे नुकसान तब होता है, जब यही बिचोलीए फसलों का दाम आसमान छूने पर इसे बाजार में बेचकर बड़ा मुनाफा कमाते हैं।

निरक्षरता

भारत में ज्यादातर किसान किसी कारणवश पर्याप्त शिक्षा नहीं प्राप्त कर पाते हैं। उनके निरक्षरता का लाभ कांट्रेक्टर व बिचौलिए उठाते हैं। 

इसके अलावा वे कृषि क्षेत्र में नए और आवश्यक बदलाव करने में भी असफल रहते हैं। और हमेशा एक जैसा ही जीवन जीते रहते हैं और अंत में तंग आकर आत्महत्या कर लेते हैं।

किसान आत्महत्या का प्रभाव Effects of Farmer Suicide in Hindi

जब कोई किसान आत्महत्या करता है, तब उसके पीछे कई नेता और मंत्री घड़ियाली आंसू बहा देते हैं और अपने वोट बैंक के लिए किसान के परिवार को कुछ मुआवजा भी देते हैं। 

इसके अलावा मीडिया में कुछ खबरें छाप दी जाती हैं। लेकिन इसका प्रभाव तो वास्तव में उस मृतक के गरीब परिवार पर पड़ता है। 

मुआवजा में प्राप्त धनराशि खत्म हो जाने पर वापस लोग नारकीय जीवन जीने पर मजबूर हो जाते हैं। सरकार को इन लघु कालीन राहतों के अलावा दीर्घकालीन सहायता और रोजगार भी इन पीड़ित परिवारों को प्रदान करना चाहिए।

1. विश्व स्तर पर देश की बदनामी

भारत एक कृषि प्रधान देश होने के साथ ही सबसे ज्यादा किसानों की आत्महत्या करने वाला देश की कतार में भी खड़ा है। यह हमारे प्रशासन व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है। 

ऐसी परिस्थिति ना केवल देश के प्रशासन व्यवस्था के संचालन पर उंगली उठाती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीयों के विकास को कटघरे में भी खड़ा करती है।

2. समाज पर विपरीत प्रभाव

अपराध चाहे कोई भी हो, वह समाज पर हमेशा नकारात्मक प्रभाव ही छोड़ता है। यह दुख की बात है कि जो अन्नदाता अपने पूरे जीवन भर लोगों का पेट भरता है, वही हमेशा निराश और विपत्ति में पड़ा रहता है। 

यह भी एक कारण है कि आज के युवा बड़े बड़े कॉर्पोरेट सेक्टर या निजी व्यवसाय इत्यादि को अपना रोजगार बनाना चाहते हैं। बेहद कम ऐसे लोग होंगे, जो कृषि क्षेत्र में जाकर काम करना चाहते हैं। लोगों के मन में यह मिथ्या बैठ गई है, जिसे किसानों द्वारा की जाने वाली एक के बाद एक आत्महत्याए प्रेरणा दे रही है।

3. अन्य किसानों का गिरता प्रोत्साहन

कृषि क्षेत्र में संघर्ष करने वाले किसान भाई बहनों की संख्या करोड़ों में है। जिनमें अधिकतर लोग गरीबी और दूसरी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। 

जब एक किसान अपनी जिंदगी से तंग आकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है, तब इसका प्रभाव चारों तरफ पड़ता है। बहुत सारे किसानों की परिस्थिति उस मृतक किसान से मेल खाती हैं, जिस कारण दिन-ब-दिन बढ़ने वाले किसानों द्वारा आत्महत्या के आंकड़े दूसरे किसानों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

4. केंद्र सरकार की अप्रभाव कारीता का प्रदर्शन

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कृषि क्षेत्र में बढ़ने वाले आत्महत्या के मामले हमारे केंद्र सरकार की एक विफलता का उदाहरण पेश करती है। हमें यह स्वीकार करना होगा की प्रभावी नीतियों के अभाव में आज भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

किसान आत्महत्या के आंकड़े (2015-2021)

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) हर साल भारत में कृषि क्षेत्र से संबंधित आत्महत्या के मामले प्रकाशित करती है। वैसे देश में 2013 के बाद किसानों की आत्महत्याओं में थोड़ा गिरावट देखा गया है। 

साल 2017 में लगभग 8.2% आत्महत्या केवल कृषि क्षेत्र से संबंधित है। हालांकि यह पिछले सालों के आंकड़ों से थोड़ा कम है। 

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महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या एक बड़ी चुनौती है। साल 2016 में किसानों की कुल आत्महत्या के मामलों में 32.2% केवल महाराष्ट्र में दर्ज की गई थी। इसके अलावा कर्नाटक में 18.3%, मध्य प्रदेश 11.6% और आंध्र प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ भी इस कतार में खड़े हैं।

हालांकि भारत के कई केंद्र प्रशासित राज्य और अन्य राज्यों जिनमें दिल्ली, लक्ष्यदीप, पुदुचेरी, दादरा एवं नगर हवेली, मिजोरम, उड़ीसा, मणिपुर, नागालैंड, चंडीगढ़, उत्तराखंड, और पश्चिम बंगाल में किसानों के आत्महत्या के लगभग नगण्य मामले दर्ज किए जाते हैं।

किसान आत्महत्या को रोकने के उपाय How to Stop Farmer Suicide in Hindi?

  • सर्वप्रथम कृषि क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार पर तंज कसने की आवश्यकता है। अनाजों की कालाबाजारी व घूसखोरी के लिए केंद्र सरकार को कड़े नियम कानून लाने चाहिए।
  • किसानों के लिए अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रबंध होना चाहिए। इसके अलावा बहुत कम कीमत पर किसानों को बीमा भी प्रदान किया जाना चाहिए।
  • भारत सरकार को कृषि क्षेत्र में अधिक निवेश करना चाहिए, जिससे इस क्षेत्र में विकास हो सके।
  • ऐसे रिसर्च सेंटर देश के हर कोने में स्थापित किया जाना चाहिए, जहां किसानों को तकनीकी और विपणन व प्रबंधन से संबंधित हर मुमकिन सहायता दिया जाए।
  • नए बदलावों को लेकर किसानों को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से किसान प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता है, जहां फसल, मिट्टी, उर्वरक, दवाइयां और जलवायु के अनुसार परिवर्तन आदि से संबंधित शिक्षा दी जाए।
  • किसानों की समस्याओं का जल्द से जल्द निवारण करने के लिए राज्य स्तर पर एक किसान आयोग का गठन करने की आवश्यकता है।

किसान आत्महत्या वाले प्रमुख राज्य Major Farmer Suicide States

कुछ मुख्य भारतीय राज्य जहाँ सबसे ज्यादा किसानों ने आत्महत्या किया –

  • महाराष्ट्र
  • छत्तीसगढ़
  • मध्यप्रदेश
  • आंध्रप्रदेश
  • तेलंगाना
  • तमिलनाडु
  • पंजाब

किसान आत्महत्या को रोकने के लिए सरकारी योजना Govt. Projects on Farmers in Hindi

  • महाराष्ट्र राहत पैकेज 2010: महाराष्ट्र में कृषक आत्महत्या की समस्या सबसे ज्यादा है, जिसके निवारण में महाराष्ट्र सरकार ने 2010 में एक कानून पारित किया था, जिसके तहत कोई भी लेन या देनदार जिनके पास लाइसेंस नहीं है, वे ऋण वसूली के हकदार नहीं रहेंगे और यह काम गैरकानूनी माना जाएगा। इसके अलावा महाराष्ट्र विधेयक 2008 भी राज्य सरकार की ही एक राहत योजना है।
  • कृषि ऋण राहत योजना: वर्ष 2008 में राज्य सरकार द्वारा ऋण राहत योजना लाई गई थी, जिसके तहत किसानों को बड़ी मात्रा में कर्ज से राहत मिली है। इसमें ब्याज का भाग तथा ऋण मूलधन को समाप्त करने के लिए सरकार ने कई अरबों रुपए खर्च किए थे। अब तक इस योजना का लाभ लगभग 3.5 करोड़ से भी अधिक किसानों को पहुंचा है।
  • आय स्त्रोत पैकेज विविधता 2013: केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के राज्य सरकारों ने साल 2013 में किसान आत्महत्या को रोकने के लिए कई राहत पैकेज पेश किए थे।
  • कृषि क्षेत्र में राज्य सरकारों द्वारा पहल: ऐसी गंभीर समस्या के निवारण के लिए राज्य सरकारें भी आगे आईं हैं और किसानों के नई नीति व योजनाएं को प्रस्तुत करके एक पहल की गई है।
  • केंद्र सरकार भी किसानों के हित में कई महत्वपूर्ण नीतियां लाते रहती है। प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना, किसान क्रेडिट कार्ड योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और स्वायल हेल्थ कार्ड योजना इत्यादि जैसी कई योजनाएं किसानों द्वारा आत्महत्या के रोकथाम के लिए बेहद प्रभावी साबित हुई हैं, जिससे 2017 के बाद किसानों की आत्महत्या के मामले घट रहे हैं।

निष्कर्ष Conclusion

इस लेख में आपने किसान आत्महत्या पर निबंध (Essay on Farmers Suicides in Hindi) पढ़ा। आशा है यह लेख आपको जानकारी से भरपूर लगा होगा। अगर यह लेख आपको अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें।

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