दादा-दादी और नाना-नानी के महत्व पर निबंध Essay on Grandparents in Hindi

दादा-दादी हो या नाना-नानी (Essay on Grandparents in Hindi) बच्चे उन्हें बहुत प्यार करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वह अपने बच्चों से लेकर अपने पोता-पोती सबके साथ अच्छा समय बिताते हैं। ज्यादातर दादा-दादी तो अपने पोते-पोतियों को कहानियां भी सुनानाते हैं।

इसलिए तो “दादी माँ की कहानियां” पंक्ति भी बहुत मशहूर है। अगर सच बताऊँ तो मेरे माता-पिता तो मेरे बच्चों को पढ़ाते भी हैं और उनका ख्याल भी रखते हैं। जी हाँ दोस्तों दादा-दादी और नाना-नानी का हमारे जीवन में अपार महत्व है। आईये दादा-दादी के विषय में और जानते हैं और उनके महत्व को समझते हैं।

जीवन में दादा-दादी का महत्व निबंध Essay on Importance of Grandparents in Hindi

दादा-दादी पर निबंध 1



दादा-दादी परिवार के सबसे बड़े सदस्य होते हैं। ये अपने परिवार के सभी सदस्यों के जीवन में सबसे प्रभावशाली और महत्वपूर्ण व्यक्ति होते हैं। ये निस्वार्थ भाव से अपने परिवार की देखभाल करते हैं और उन्हे बेहद प्यार करते हैं।

कहते हैं बच्चे की सबसे पहली पाठशाला उसका घर होता हैं और उसके अध्यापक घर के बड़े बुजुर्ग। खेल-खेल में हम अपने दादा-दादी से इतना कुछ सीख लेते हैं जिसका एहसास हमें बड़े होने पर होता हैं।

जैसे किसी के दादा-दादी ने उन्हें गणित की टेबल याद कराई तो किसी ने घर के बुजुर्गों से अख़बार पढ़ना सीखा। इसके अलावा कई लोग ऐसे भी हैं जिनको किताब पढने की आदत अपने दादा-दादी से तोहफ़े के रुप में मिलती हैं।

बच्चे कई बार अपनी दिल की बातें माता-पिता से साझा ना करें लेकिन अपने दादा-दादी से ज़रूर करते हैं। उसकी एक वजह यह भी होती हैं कि उन्हें भरोसा होता हैं कि वह उनकी बातों को समझ कर उनकी समस्या को हल कर देंगे और डाँट भी नहीं पड़ेगी।

सच में दादा-दादी के साथ रहना अपने आप में एक अनोखा एहसास हैं, वह न केवल ज्ञान के मोतिया बिखेरते हैं बल्कि हमारे जीवन को प्यार और खुशियों से भी भर देते हैं। उनकी आस पास होने की भावना को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। वह लोग बहुत भाग्यशाली होते हैं जिनकी तीन पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहती हैं।

दादा-दादी के पास अनेकों अच्छी-अच्छी कहानियाँ व कविताएँ होती हैं जिनमें बहुत सारा ज्ञान और जीवन को सफलतापूर्वक जीने का संदेश छुपा होता है। ये अपने ज्ञान और अनुभव को कहानियों के माध्यम से इतने रोचक ढंग से बच्चों के सामने प्रस्तुत करते है कि बच्चे भी उन्हें बड़े चाव से सुनते हैं।

लेकिन कभी भी दादा-दादी की कहानियाँ ख़त्म नही होती । इससे बच्चे की सोचने समझने कि शक्ति तो बढ़ती ही है और साथ ही वो खुद से भी नए-नए विचारों को उत्पन्न कर सकते हैं। भले ही आज इंटरनेट पर दादी-दादी की कहानियाँ उपलब्ध हैं लेकिन असली मजा तो उनकी की गोद में बैठकर ही सुनने में आता हैं।

आज के आधुनिक जमाने में बच्चों की सोच और उनका बड़ों के प्रति प्यार कहीं खोता जा रहा हैं लेकिन इसके पीछे के जिम्मेदार हम खुद ही हैं। अगर आप बच्चों के सिर पर संस्कारों व विचारों की गठरी बाँध कर रख देंगे तो जाहिर है बच्चे इस को सहन नहीं कर पाएंगे।

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इसलिए आज के बदलते इस लाइफ स्टाइल में दादा-दादी को भी खुद में बदलाव लाना चाहिए। बच्चों को किसी चीज के बारे में समझाने के लिए उनकी उम्र का बनना होगा तभी वह बातों पर गौर करेंगे।

दादा-दादी और पोता-पोती का अटूट रिश्ता होता है। इस रिश्ते से कई भावनात्मक भावनाएँ जुड़ीं रहती हैं। इनके बीच का प्रेम और बंधन काफी मजबूत होता है। पहले बच्चों को अपने दादा दादी के साथ समय बिताने के लिए काफी समय मिलता था परन्तु आज के जमाने मे बहुत से ऐसे परिवार होते है, जो अपने माँ बाप से अलग रहते हैं, जिस वजह से उनके बच्चों को अपने दादा दादी के साथ समय बिताने को नहीं मिलता है।

जो बच्चे संयुक्त परिवार में रहते हैं, दादा-दादी, नाना-नानी के साथ उनके बचपन की मीठी कहानियाँ और मीठी यादें जुड़ी होती हैं। वहीं जब उनके माता-पिता अपने-अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं।

उस दौरान दादा-दादी ही होते हैं जो माता-पिता से ज्यादा अपने पोता-पोती का ख्याल रखते हैं और उनके बेहतर विकास के लिए उनका पालन-पोषण करते हैं। दादा-दादी के साथ रहने से बच्चों के अंदर अच्छे संस्कार, अनुशासन की भावना, जीवन में आगे बढ़ने का प्रोत्साहन और प्रेम-सम्मान की भावना आदि का विकास होता है।

दरअसल आज ऐसा युग आया है कि बड़े बुजुर्गों की इज़्ज़त नहीं है क्योंकि हम खुद को बहुत ही आधुनिक सोच का और अपने बुजुर्गों को पुरानी सोच रखने वाला समझते है। हम अपनी इसी नासमझी के कारण अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, पुराने दोस्तों को भूलते जा रहे हैं और प्रेम भाव को भी बिल्कुल खत्म ही कर दिया है।

इसका सबसे मुख्य कारण यह है कि आजकल के बच्चे दादा दादी के पास बैठने के बजाय अपने वीडियो गेम या गैजेट से खेलना ज्यादा पसंद करते हैं, इन्हीं सब चीजों में उनका मोह बंध कर रह गया है।

आज के इस डिजिटल युग मे हम यह भूल गए है कि दादा दादी हमारे समाज की एक ऐसी मजबूत कड़ी है जो हमे आपस मे जोड़े हुए है और हमारी संस्कृति को भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने का काम करती है।

चाहे कितना ही वक्त के साथ रिश्तों पर धूल आ जाए, हम बड़े बुजुर्गों के अस्तित्व को कितना ही नकार ले उन्हें नज़रअंदाज़ करे, पर सच बात तो यही है कि दादा दादी फिर भी बच्चों से अत्यंत प्रेम का भाव ही रखते हैं, उनके होंठ हमेशा ही बच्चों के लिए दुआ और प्रार्थना करते रहते हैं और उन प्रार्थनाओं का कोई मोल नहीं होता है।

दादा-दादी और नाना-नानी के महत्व पर निबंध 2

अपने घर के यह बुजुर्ग किसको अच्छे नहीं लगते हैं, इन्हीं से तो हमारे घरों की शोभा बढ़ती है, घरों में रौनक आती है। इन्हीं लोगों के आशीर्वाद से हमारे घर में सुख समृद्धि शांति रहती है। बड़ों की दी हुई दुआ से ही बिगड़े काम सँवर जाते हैं, जीवन जीवंत लगता है।

हम भारत देश में रहते हैं और हम सभी यह जानते हैं कि अपने इस खूबसूरत देश में हम कैसे रिश्तो को संजो कर रखते हैं। रिश्तो का बहुत मान रखते हैं और हमारे देश की संस्कृति यही कहती है।

सिखाती है कि रिश्तो को जोड़ कर रखने में, उनकी इज्जत करने में ही भलाई है। इसी में प्रेम एवं स्नेह झलकता है, रिश्तो के अटूट बंधन से ही हमारी दुनिया बंधी रहती है।

सोचिए अगर मनुष्य बिल्कुल अकेला हो, घर-परिवार ना हो बड़े बुजुर्ग ना हो सगे संबंधी ना हो कोई दुख सुख पूछने वाला ना हो तो, क्या मनुष्य जी पाएगा? जीवन कितना रंगहीन होगा, सोचिए जरा ! बस इसी कारणवश हमारे भारत में मान्यता है प्रथा है रिश्तो को सँवार कर रखने की।

चाहे कोई भी रिश्ता हो, मां बाप बेटे बेटी भाई बहन दादा दादी नाना नानी, सभी के बीच, सभी के साथ प्रेम स्नेह का संबंध रहता है और अगर हम बात करें दादा दादी नाना नानी मतलब बड़े बुजुर्गों की, तो उनसे तो हमें कितना प्रेम मिलता है इसका तो हम मोल भी नहीं लगा सकते हैं, ना ही इनका प्रेम सीमित होता है। बड़े बुजुर्ग हमेशा बिना किसी बंधन में बंध कर प्यार लुटाते हैं, बुजुर्गों की दृष्टि हमेशा आशीर्वाद वाली ही रहती है।

हमेशा अपने नाती पोतो से प्यार ही करते हैं, अटूट प्यार चाहे बच्चे कितने ही बड़े क्यों ना हो जाए। हमारे तो मां-बाप हमसे कितना प्रेम कितनी मोहब्बत करते हैं, तो फिर सोचिए हमारे माता-पिता के भी माता-पिता हमसे कितना प्रेम करेंगे और कितना प्रेमभाव होगा, यह तो कोई पूछने वाली बात ही नहीं है। बड़े बुजुर्गों के होठों पर, जबान पर तो हमेशा बच्चों के लिए प्रार्थना और दुआ ही रहती है।

सदा ही कृपा का भाव रहता है और उनकी दुआओं एवं प्रार्थनाओं से ही हमारे जीवन के सभी काम बनते हैं, हमें शायद इस चीज का एहसास ना हो क्योंकि आज की आधुनिक दौड़ भाग वाली जिंदगी में हम सब यह दिव्य भाव भूल चुके हैं।

परंतु सत्य तो यही है, सच्चाई यही है दुआ ऐसी चीज है जो दिखाई नहीं देती है, पर असर बहुत दिखाती है। हम चाहे इन बातों पर ध्यान दें ना दें पर बहुत बार जीवन में ऐसे पल आते हैं।

जब कोई रास्ता दिखाई नहीं देता है, काम बिगड़ जाते हैं, हम असमंजस में पड़ जाते हैं, बहुत तकलीफ होती है, पर तभी अचानक से उम्मीद की एक किरण सी दिखाई देती है और बिगड़ते हुए काम भी बन जाते हैं।

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आपके भी जीवन में ऐसे लमहे आए होंगे, सभी की जिंदगी में आते हैं। बस तो समझ लीजिए यह सब बुजुर्गों की दी हुई दुआओं का असर ही होता है, प्रार्थना का जादू ही होता है कि मुश्किल से मुश्किल परेशानी भी हल हो जाती है, सबसे ज्यादा तकलीफ के वक्त में भी हिम्मत आ जाती है।

दादा-दादी नाना-नानी इन शब्दों में ही राहत का भाव है। अपने हिंदुस्तान में तो बहुत पुरानी संस्कृति है, जो कि हर भारतीय के दिल में बसी हुई है।

वह क्या ?? यही कि गर्मियों की छुट्टियां मतलब नाना-नानी का घर, अर्थात गर्मियों की छुट्टियों में हम सभी भारतीय एक या एक से अधिक बार दादी नानी के घर जरूर गए होंगे। यह प्रेम की रीत है रिवाज है बहुत खूबसूरत सा।

हमारे बचपन में हम सभी को अवश्य याद ही होगा नानी के घर जाया करते थे, और अगर दादी दूर रहती थी तो दादी के घर भी। वहां जाकर नित नए व्यंजनों का स्वाद सकते थे, खूब मजेदार स्वादिष्ट खाना खाया करते थे और फिर अगली बार जब भी दादी नानी के घर जाया करते थे, तो वह कहा करती थी कि कितने कमजोर, कितने दुबले हो गए हो, कुछ खाते नहीं हो क्या?

फिर इन सबके बाद नाना नानी द्वारा दिए गए अनेकों उपहार, चाहे वह पैसे हो या कपड़े, हमें बहुत भाते थे और फिर इन सब चीजों के ऊपर था दादी नानी का प्यार, उनका वह दुलार जो हमें प्रेम से भर देता था। वह तो अलग ही था, उस भाव की उस एहसास की तो कीमत ही नहीं है, कोई मुकाबला ही नहीं है, किसी और चीज से।

वह बचपन के दिन अभी भी सबको याद आते होंगे, बहुत ही सुंदर था वह वक्त, परंतु दुखद बात यह है कि वह अनमोल समय कभी वापस नहीं आएगा। परंतु आज का जो समय है वह तो और भी अत्यंत दुखदाई है, क्यों है, ऐसा क्यों कहा जा रहा है?

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दरअसल आज ऐसा युग आया है कि बड़े बुजुर्गों की इज्जत नहीं है, हमें उनका एहसास ही नहीं है, हमें उनका और रिश्तो का मोल ही नहीं पता है, हम अपनी संस्कृति भूलते जा रहे हैं, पुराने दोस्तों को भूलते जा रहे हैं और प्रेमभाव तो बिल्कुल खत्म ही हो गया है। आजकल के बच्चे दादी नानी के घर जाने के बजाए अपने वीडियो गेम्स या गैजेट से खेलना ज्यादा पसंद करते हैं, इन्हीं सब चीजों में उनका मोह बंध कर रह गया है।

चाहे कितना ही वक्त के साथ रिश्तो पर धूल आ जाए, हम बड़े बुजुर्गों के अस्तित्व को कितना ही नकार ले उन्हें नजरअंदाज करे, पर सच बात तो यही है कि दादा दादी नाना नानी फिर भी बच्चों से अत्यंत प्रेम का भाव ही रखते हैं, उनके दिलों में हमारी तस्वीर रहती है, उनके होंठ हमेशा ही बच्चों के लिए दुआएं प्रार्थनाएं करते रहते हैं और उन प्रार्थनाओं का कोई मोल नहीं है।

दादा दादी नाना नानी की कोई और जगह नहीं ले सकता है और ना ही उनके प्रेम एवं स्नेह का कोई प्रतिस्थापन है, बस इसलिए बुजुर्गों को यूं ही अनमोल नहीं कहा जाता है क्योंकि हम माने या ना माने

यह हमारे जीवन की विशेष संपदा है, प्यार और विश्वास का जोड़ है और इन्हीं सब रिश्तो के कारण ही हम धनवान कहलाते हैं और अगर हम अपने इन्ही रिश्तो को भूल बैठे, तो बहुत रुपया पैसा होने के बावजूद भी हमसे ज्यादा गरीब कोई और नहीं होगा।

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