जैन धर्म पर निबंध Essay on Jainism in Hindi – Jain Dharm

जैन धर्म पर निबंध Essay on Jainism in Hindi – Jain Dharm

“परस्परोग्रहो जीवनाम्”

जैन धर्म पर निबंध Essay on Jainism in Hindi – Jain Dharm

जैन धर्म भी प्राचीन धर्मों में से एक है। जैन धर्म से तात्पर्य ‘जिन’ भगवान के धर्म से है और जिन उन्हें कहा जाता है जो अपने मन को जीत लेते हैं और पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं। हिंसा न करना जैन धर्म का मूल सिद्धांत है।

जैन धर्म के प्रतीक चिन्ह में भी आप देखेंगे कि एक हथेली पर अहिंसा लिखा हुआ है। अर्थात यह धर्म सभी के प्रति अहिंसा को दर्शाता है। जैन धर्म का मानना है कि इस सृष्टि को कोई चलाने वाला नहीं है; सभी अपने – अपने कर्मों को भोगते हैं। जैन धर्म में जो भी ‘जिन’ या ‘अरिहंत’ सिद्ध हो जाते हैं, जन्म – मरण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं उन्ही को ईश्वर माना जाता है।

उन्ही का मंदिर बनवा कर पूजा की जाती है। जैन धर्म के अनुसार इस संसार को चलाने वाला कोई नहीं है, जीवों को सुख-दुःख उनकी करनी के हिसाब से मिलता है। जीव का कर्म जैसा होगा फल वैसा ही प्रदान होगा।

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तीर्थंकर

जैन धर्म के कुल 24 तीर्थंकर बताये गए हैं। जो धर्म का प्रवर्तन करते हैं।

1. श्री ऋषभनाथ- श्री ऋषभदेव आदिनाथ जी के द्वारा ही इस धर्म का प्रारम्भ हुआ था। ऋषभदेव के बारे में ऋग्वेद में बताया गया है। अर्थात इससे पता चलता है कि वेदों से पहले जैन धर्म का अस्तित्व था। इनका चिन्ह बैल है।

2. श्री अजितनाथ-  श्री अजितनाथ जी द्वितीय तीर्थंकर  हैं। इनका चिन्ह हाथी है जो ये बताता है कि कठिनाइयों का मुकाबला करके विजय प्राप्त करना चाहिए।

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3. श्री संभवनाथ- दस लाख कोटि सागर काल बीत जाने पर अजितनाथ भगवान जी के बाद श्री सम्भवनाथ जी आये थे। इन्होने इक्ष्वाकु वंश में जन्म लिया था। इन्होने चवालिस लाख वर्ष पूर्व चार    पूर्वांग तक राज्य किया। ये अश्व (घोडा) चिन्ह से जाने जाते हैं।

4. श्री अभिनंदननाथ-  श्री सम्भवनाथ जी के बाद नौ लाख करोड़ सागर के बाद श्री अभिनन्दन नाथ जी हुए। इन्होने साड़े छत्तीस लाख वर्ष पूर्व तथा 8 पूर्वांग वर्ष तक राज्य किया। इनका चिन्ह बंदर है।

5. श्री सुमतिनाथ- इन्होने उन्तीस लाख वर्ष पूर्व तथा बारहपूर्वांग तक राज्य किया और इनकी आयु चालिस लाख वर्ष थी। इनका चिन्ह चकवा है।

6. श्री पद्मप्रभ- श्री सुमतिनाथ भगवान को मोक्ष प्राप्त हो जाने के नब्बे हजार करोड़ सागर बीत जाने के बाद श्री पद्म प्रभु भगवान का जन्म हुआ। इन्होने साढ़े सात लाख वर्ष पूर्व तक राज्य किया। इनका चिन्ह लाल कमल है।

7. श्री सुपार्श्वनाथ- ये सातवें तीर्थंकर हैं और इनका जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। इनका चिन्ह स्वस्तिक है।

8. श्री चन्द्रप्रभ-  जैन धर्म के ये आठवें तीर्थंकर हैं। इनका चिन्ह चन्द्रमा है। इनका मोक्ष स्थान सम्मेद शिखर है।

9. श्री पुष्पदंत- श्री पूषदंत भगवान की आयु दो लाख वर्ष पूर्व थी। इनका चिन्ह मगर है।

10. श्री शीतलनाथ-  इनकी आयु एक लाख पूर्व वर्ष की थी। इनका राज्य काल पचास हजार पूर्व वर्ष का था। इनका चिन्ह कल्पवृक्ष है।

11. श्री श्रेयांसनाथ- इनकी आयु चौरासी लाख वर्ष की थी। इनका चिन्ह गैंडा है।

12. श्री वासुपूज्य- इनकी आयु बहत्तर लाख वर्ष की थी। ये भैंसा चिन्ह से पहचाने जाते हैं।

13. श्री विमलनाथ- इनकी आयु सात लाख वर्ष की थी और इनका राज्य काल तीस लाख वर्ष का था। इनका चिन्ह शूकर है।

14. श्री अनंतनाथ- इनकी आयु तीस लाख वर्ष की थी और इनका राज्य काल एक लाख पचास हजार वर्ष का था। ये सेही चिन्ह के द्वारा पहचाने जाते हैं।  

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15. श्री धर्मनाथ-  धर्मनाथ भगवान जी का जन्म कुरूवंश में हुआ था। इनकी आयु दस लाख वर्ष की थी। इनका राज्य काल पचास हजार वर्ष का था। इनका चिन्ह वज्रदण्ड है।

16. श्री शांतिनाथ- इनकी आयु एक लाख वर्ष की थी। इनका राज्य काल पचास हजार वर्ष तक का था। ये मृग चिन्ह से पहचाने जाते हैं।

17. श्री कुंथुनाथ- इनका जन्म कुरु वंश में हुआ था। इनकी आयु पन्चानवे हजार वर्ष की थी व सैंतालीस हजार पांच सौ वर्षों का राज्य काल था। इनका चिन्ह बकरा है।

18. श्री अरहनाथ-  इनकी आयु चौरासी हजार वर्ष की थी व राज्य काल बयालीस हजार वर्ष तक का था। इनका चिन्ह मछली है।

19. श्री मल्लिनाथ- इनकी आयु पचपन हजार वर्ष की थी और ये कलश चिन्ह से पहचाने जाते हैं।

20. श्री मुनिस्रुव्रतनाथ- इनका राज्य काल पन्द्रह हजार वर्ष तक का था और इनका चिन्ह कछुआ है।

21. श्री नमिनाथ- इनकी आयु दस हजार वर्ष की थी और राज्य काल पांच हजार वर्ष का था। इनका चिन्ह नीलकमल है।

22. श्री नेमिनाथ- इनकी आयु एक हजार वर्ष की थी और शंख चिन्ह के द्वारा पहचाने जाते है। इन्हे अरिष्टनेमि जी भी कहा जाता है।

23. श्री पार्श्वनाथ- इनका जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ और इनका चिन्ह सर्प है।

24. श्री महावीर-  इनका साधना काल 12 साल का था। इनका चिन्ह सिंह है। इनके जन्म – दिवस को महावीर जयंती के रूप में मनाते हैं।

जैन धर्म के सिद्धांत

जैन धर्म के सिंद्धांत में ‘अहिंसा’ और ‘कर्म’ प्रमुख हैं। इनका मानना है कि जीवों पर हिंसा मत करो और जो जैसा कर्म करेगा उसको वैसा ही फल मलेगा। जैन धर्म के छः द्रव्य माने गए हैं जो इस प्रकार हैं – जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। और इनके सात तत्वों को बताया गया है –

जीव – जैन धर्म में जीव से तात्पर्य ‘आत्मा’ से है जो चैतन्य है।  

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अजीव – इसे अचैतन्य माना गया है।

आस्रव – इसका मतलब पुद्गल कर्मों का आस्रव करने से है।

बंध – आत्मा से कर्म बंधन है।

संवर – इसका मतलब कर्म बंध को रोकने से है।

निर्जरा – इससे मतलब कर्मों को क्षय करने से है। जैनियों को अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह इन पांच व्रतों का पालन करना पड़ता है। ये व्रत श्रावक और मुनि दोनों को ही करने पड़ते हैं। जैन धर्म का सबसे पवित्र मन्त्र है –

मोक्ष – जीवन – मरण के चक्र से मुक्ति।

णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं। णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं। णमो लोए सव्वसाहूणं॥

इस मन्त्र का मतलब है अरिहंत को नमस्कार है, सिद्धों को नमस्कार है, आचार्यों को नमस्कार है, साधुओं को नमस्कार है।

जैन धर्म में चार गतियों के बारे में बताया गया है –  देव गति, मनुष्य गति, तिर्यच गति और नर्क गति। मोक्ष को पांचवी गति भी कहा जा सकता है। जैन धर्म के दो संप्रदाय हैं – दिगंबर और श्वेताम्बर। दिगंबर साधू नग्न रहते हैं और इनकी मूर्तियां भी नग्न बनाई जाती है। इसको तीन भागों में बांटा गया है – तारणपंथ, तेरापंथ, बीसपंथ।

दूसरी तरफ श्वेताम्बर जैन में सन्यासी और साध्वियां सफ़ेद वस्त्र धारण करती हैं। इनको दो भागों में बांटा गया है – देरावासी  और स्थानकवासी। स्थानकवासी के भी दो भाग हैं – बाईस पंथी और तेरा पंथी। दिगंबर जैन व श्वेताम्बर जैन दोनों के ही ग्रन्थ हैं। जिनमें तत्वार्थ और कल्पसूत्र प्रसिद्ध हैं।

हमारे देश में विभिन्न तरह के धर्मों के साथ ही साथ जैन धर्म का भी अपना एक अलग स्थान है। जो अहिंसा, कर्म और अनेकांतवाद का सन्देश देता है।

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