सादा जीवन उच्च विचार Essay on Sada Jeevan Uchch Vichaar

सादा जीवन उच्च विचार Essay on Sada Jeevan Uchch Vichar

एक समय था जब लोग बिना किसी दिखावे के ही एक – दूसरे की मदद करने के लिए हमेशा आगे रहते थे। लेकिन आज के युग की बात करें तो पूरी दुनिया ही दिखावे पर कायम है।

लेकिन आप जहाँ भी नजर घुमाएंगे और देखेंगे कि जितने भी सफल व्यक्तित्व हैं वे सभी बहुत सरल और सहज स्वभाव के हैं। पहले तो इस सूक्ति – “सादा जीवन उच्च विचार ” को स्पष्ट कर दिया जाए। इस सूक्ति से तात्पर्य यह है कि व्यक्ति अपने रहन-सहन से सादा रहे और उसके विचार उच्च कोटि के होने चाहिए।

सादा जीवन उच्च विचार Essay on Sada Jeevan Uchch Vichar

आज के समय में आप देखेंगे कि लोग बहुत कृत्रिम हो गए हैं। जरा से ही सजावटी वस्त्रों को धारण करके उनके अंदर घमंड आ जाता है। जबकि उनके विचार निम्न कोटि के होते हैं। दिखावे के कारण वे न जाने कितना खर्चा करते जाते हैं जिसका बाद में उन्हें खामियाज़ा भुगतना पड़ता है। ऐसा करते – करते वे तनाव ग्रस्त हो जाते हैं।

क्योंकि वे अपने जीवन को दूसरों के जीवन से तुलना करने लगते हैं। जैसा कि अक्सर देखा गया है कि उस व्यक्ति के पास इतनी महंगी कार है, इतने सारे फ्लैट हैं, प्रॉपर्टी है, इस तरह के ब्रांडेड कपडे हैं तो मेरे पास भी इस तरह कीें चीज़ें होनी चाहिए, ऐसी मानव की सोच बन जाती है।

एक के बाद एक चीज़ों को खरीदने में और इक्षाओं की पूर्ति करने में मानव अपना पूरा जीवन लगा देता है और शांति की तलाश में लग जाता है। लेकिन शांति मिले भी तो कैसे क्योंकि इक्छाएं तो अनंत हैं, जैसे ही एक इक्छा पूरी होती है दूसरी इक्छा जाग्रत हो जाती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कहा गया है कि – “जीवन जितना सादा रहेगा, तनाव उतना ही आधा रहेगा।”

सादा जीवन उच्च विचार

यही है जीवन का मूल आधार।।

जिसने इस मन्त्र को अपनाया

भविष्य अपना उज्जवल बनाया।।

मनुष्य जिस क्षण अपनी दैनिक जरूरतों को ज्यादा बढ़ाता है वह सादा जीवन उच्च विचार के आदर्श पालन के प्रयास में नीचे गिर जाता है। मनुष्य की ख़ुशी वास्तव में संतोष में निहित है।

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एक वाक़या है जो हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री लालबहादुर शास्त्री जी के जीवन पर आधारित है –

एक बार की बात है लाल बहादुर शास्त्री जी को किसी जरुरी काम से विदेश जाना था और उस समय उनकी पत्नी और बेटे ने सोचा कि क्यों न पिता जी के लिए एक नया कोट बनवा दिया जाए क्योंकि उनका कोट काफी पुराना हो गया था। तब बाज़ार से सुन्दर सा धारीदार कपडा कोट बनवाने के लिए मंगवाया गया और दर्जी को नाप लेने के लिए घर बुलवाया। तब दर्जी ने शास्त्री जी का नाप लिया और डायरी में नोट कर लिया। जब वह जाने लगा तब शास्त्री जी ने धीरे से उससे कुछ कहा। कुछ दिनों के बाद जब वह दर्जी आया और उस कोट के थैले को खोला गया तो ये क्या था उसमें वही पुराना कोट निकला। उनकी पत्नी और बेटे को कुछ समझ नहीं आया और शास्त्री जी से पूछा कि कोट तो नया होना चाहिए तो फिर इस थैले में वही पुराना  कोट क्यों ? तब शास्त्री जी ने कहा कि इस पुराने कोट को अभी भी पहना जा सकता है और मैंने उस नए कपडे को वापस करवा दिया, उससे जो पैसे वापस मिले उन्हें  जरूरतमंद विद्यार्थियों को बाँट दिए।

शास्त्री जी के इस तरह के विचारों से हमे पता चलता है कि वास्तव में वे सादा जीवन उच्च विचार वाले व्यक्ति थे। यहाँ एक बात तो सिद्ध होती है कि महान लोगों का व्यक्तित्व सादा होता है लेकिन उनके विचार उच्च होते हैं।

अगर हम इस बात पर ध्यान दें कि मानव की वास्तव में आवश्यकताएं क्या हैं ? और इससे भी पहले हम ये जान लें कि आवश्यकताओं और इक्षाओं में क्या अंतर है तो सारी समस्या हल हो जाएगी। आवशकताएँ सीमित होती हैं।

मानव की मूल आवश्यकताएं पर्याप्त भोजन, पर्याप्त आवास और पर्याप्त वस्त्र हैं। और अगर हम इक्षाओं की बात करें तो ये असीमित होती हैं, हर साल हमे नया मोबाइल फ़ोन चाइये होता है, नई कार चाहिए होती है, घर का इंटीरियर बार-बार बदलवाते हैं, ब्रांडेड कपडे चाहिए होते हैं, ऐसी अनेकों वस्तुएं हैं जो सिर्फ हम लालचवश खरीदते हैं और फ़िज़ूलखर्च करते हैं और अपने आप को अमीर मानने लगते हैं। लेकिन कोई भी व्यक्ति अपने उच्च दृष्टिकोण से अमीर होता है नाकि दिखावे से जो कि क्षणिक मात्र है।

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एक अच्छा जीवन जीने के लिए बेहतर होगा कि हम सरलता और सहजता को आत्मसात करें और दूसरों को भी सहज बनाने की कोशिश करें। ऐसा करने से एक सकारात्मक वातावरण बनेगा जिसकी बाकई आज के समय में बहुत आवश्यकता है।

डॉ राजेंद्र प्रसाद जी के जीवन का एक किस्सा यहाँ प्रस्तुत है –

कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रेसिडेंट कॉलेज में डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी का पहला दिन था। वे कक्षा में जाकर बैठे। तब वहां उपस्थित अन्य छात्रों को देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि छात्रों ने अंग्रेजी वेश – भूषा धारण कर रखी थी। उन्होंने कोट और पतलून पहन रखी थी और और कुछ मुस्लिम छात्र थे जो मदरसे के थे, उनकी वेश – भूषा सादा थी – सर पर टोपी और पायजामा कुर्ता पहन रखा था। राजेंद्र प्रसाद जी भी साधारण वेश – भूषा में पहुंचे हुए थे। अंग्रेजी वेश – भूषा वाले छात्र मदरसे वाले छात्रों का मजाक उड़ा रहे थे। उसी समय कक्षा में प्रोफेसर ने प्रवेश किया। उनके पास 2 तरह का अटेंडेंस रजिस्टर रहता था। पहले उन्होंने सभी उपस्थित छात्रों की अटेंडेंस लगाई। लेकिन जब राजेंद्र प्रसाद जी का नाम नहीं बोला गया तब वे खड़े हुए और प्रोफेसर को प्रणाम किया और बोले कि मैं नया छात्र हूँ, अभी – अभी आया हूँ, मुझे अपना रोल नंबर नहीं पता। तब प्रोफेसर ने उनकी वेश – भूषा देखी और कहा कि मैंने अभी मदरसे के छात्रों की अटेंडेंस नहीं लगाई है। तब राजेंद्र प्रसाद जी ने कहा कि मैं मदरसे का छात्र नहीं हूँ, मैं बिहार से आया हूँ। तब प्रोफेसर ने उनसे उनका नाम पूछा तब वे राजेंद्र प्रसाद नाम सुनकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने बोला “अरे ! आप हैं डॉ राजेंद्र प्रसाद ?”जिसने इस विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान पाया है। राजेंद्र प्रसाद जी का सर तो नम्रता से झुका हुआ था लेकिन जो अंग्रेजी वेश – भूषा वाले छात्र थे वे अत्यंत शर्मिंदा थे। फिर शर्म से उन सबका सर नीचे झुक गया।

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कहने का तात्पर्य यह है कि हम किसी के पहनावे से उसको नहीं माप सकते हैं। जिन व्यक्तियों में सरलता, सहजता, सादगी आदि के गुण हैं तो उनमें दैवीय गुण विद्यमान हैं। अर्थात मानव अपने अच्छे विचारों से महान बनता है नाकि आजकल के दिखावे से। इसीलिए हम सभी को “सादा जीवन, उच्च विचार” सूक्ति को आत्मसात कर लेना चाहिए।

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