बाघ संरक्षण पर निबंध Essay on Save Tiger in Hindi

बाघ संरक्षण पर निबंध Essay on Save Tiger in Hindi

प्रस्तावना

बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है। इसकी असीम शक्तियों के कारण इसे राष्ट्रीय पशु की उपाधि दी गई है। बाघ बिल्ली की प्रजाति का जीव होता है। यह एक मांसाहारी जानवर है जो अपने भोजन के लिए अन्य वनजीवों के शिकार पर निर्भर होता है।

हर बाघ के शरीर पर अलग-अलग प्रकार की धारियां होती हैं। इन धारियों का रंग सामान्य रूप से तो काला और हल्का भूरा होता है लेकिन इसकी कुछ अन्य प्रजातियों में नीला व सफेद रंग देखने को भी मिलता है। भारत में पाई जाने वाली प्रजाती का नाम पेंथेरा टाइग्रिस  है।

वहीं देश कुछ चिडि़या घरों में जैसे कि नंदनकानन(ओडिशा) में भिन्न-भिन्न देशों के बाघों को रखा गया है। आम तौर पर सफेद रंग के बाघ भारत में कही देखने को नहीं मिलते लेकिन भारत के ओडिशा राज्य में कुछ सफेद बाघ देखने को मिलते हैं। बाघ अनेकों खूबियों से निपुण हैं जिसकी वजह से वह जानवर ही नहीं, इंसानों के लिए भी खतरा बन सकता है।

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विशेषता

बाघ अपनी काली और पीली धारियों के अलावा अपने वजन और ताकत के लिए भी मशहूर है। एक बाघ का औसतन 100 किलो तक हो सकता है। कई वैज्ञानिकों व शोधकर्ताओं के अनुसार मादा और नर बाघ के वजन व आकार में काफी अंतर होता है।

कुछ आंकडो़ं कहते हैं कि नर बाघ का वजन मादा बाघ की तुलना में औसतन 1.7 गुना ज़्यादा पाया गया है। यूं तो बाघों के दौड़ने की गति बहूत तीव्र होती है, लेकिन अपने वजन के कारण वह थक भी जल्दी जाता है।

इसलिए बाघ हमेशा धीरे-धीरे छुप कर अपने शिकार के करीब जाता है और थो़डी़ दूरी शेष रहने पर शिकार को दबोचने के लिए झपट पड़ता है। बाघ अक्सर अकेले और अपने ही निश्चित क्षेत्र में रहना पसंद करते हैं।

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लेकिन प्रजनन के वक्त नर बाघ और मादा बाघ को एक साथ देखा जा सकता है। मादा बाघ साढे़ तीन माह तक गर्भ में धारण करने के बाद 2-3 बच्चों को जन्म देती है। बचपन के दौर में ही ये बच्चे अपनी मां से शिकार करना सीख लेते हैं और लगभग 3 साल की उम्र में ही स्वतंत्र हो जाते हैं। इनकी आयु लगभग 19-20 वर्ष ही होती है।

निवास स्थान

बाघों की जनसंख्या की श्रेणी में भारत सबसे उच्च स्थान पर है। दुनिया में बाघों की जनसंख्या का कुल दो तिहाई हिस्सा केवल भारत में ही है। इतिहासकारों के अनुसार बाघ के पूर्वजों की निशानी चीन में पाई गई थी। माना यह भी जाता है कि मध्य चीन से ही बाघों का भारत में प्रवेश हुआ था। फिलहाल भारत में रहने वाले बाघों की जनसंख्या सरकारी आंकडो़ं के अनुसार 2,226 है।

जनसंख्या की श्रेणी में दूसरा स्थान रशिया का है। यहां रहने वाले बाघों की जनसंख्या 433 है जो कि 2010 में केवल 360 ही थी।तीसरे स्थान पर इंडोनेशिया है जहां 371 बाघ निवास करते हैं। इसके बाद आते हैं मलेशिया-250 बाघ, नेपाल-198, थाईलैंड-189, बंगलादेश-106, भूटान-103, चाईना -7, वियतनाम -5 और लाओस में केवल 2।

हाल ही में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2018 की गणना में विभिन्न प्रदेशों में बाघों की जनसंख्या कुछ इस प्रकार से है- बिहार : 31,उत्तराखंड: 442, उत्तर प्रदेश: 173,आंध्रप्रदेश: 48,तेलंगाना: 26,छत्तीसगढ़ : 19,झारखंड: 5,मध्यप्रदेश: 526, महाराष्ट्र: 312, ओडिशा: 28, राजस्थान: 69, गोवा : 3, कर्नाटक: 524, केरल: 190, तमिलनाडु: 264, अरुणाचल प्रदेश: 29, आसाम: 190।

बाघों की घटती जनसंख्या के कारण

पिछले कई दशकों से विश्व में बाघों की जनसंख्या घटती ही जा रही है। तीन उपप्रजातियां तो पूरी तरह विलुप्त भी हो चुकी हैं और अन्य कुछ घोर सँकट में हैं। बाघ संरक्षण या अन्य किसी भी वनजीव की जनसंख्या कम होते जाने या पूरी तरह ही विलुप्त हो जाने का मुख्य कारण होता है उन्हें अनिकूल वातावरण न मिल पाना।

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जब से शहरीकरण व वैज्ञानिक युग आरंभ हुआ है, तब से वन्य जीवों पर तभी से निरंतर दबाव बढ़ता चला गया है। जंगल काट दिए जाने के कारण जानवरों को उनका भोजन व वातावरण नहीं मिल पाता। या तो वो वहां से पलायन कर जाते हैं या भोजन खोजते-खोजते ही मर जाते हैं। जब जंगल ही नहीं बचता और वन्यजीव भी घटते जाते हैं, ऐसे में बाघों के लिए भी अपना शिकार ढूंढने में मुश्किलें आतीं हैं।

जन्संख्या कम होने का अन्य मुख्य कारण इनका शिकार भी है। बहुत से लोग बाघों का शिकार करतें हैं और फिर उनके चमडे़ का व्यापार करते हैं। बाघ के चमडे़ की कीमत बहुत अधिक होने के कारण सरकार द्वारा इस पर रोक लगाए जाने पर भी लोग चोरी छुपे शिकार करते हैं।

बाघ बचाव अभियान

बाघ संरक्षण समस्या को मध्यनज़र रखते हुए विभिन्न दैशों की सरकारों ने अपने अनुसार अनेकों कदम उठाए। भारत सरकार द्वारा सबसे पहले 1973 में बाघ परियोजना प्रारंभ की गई थी। इसके अंतर्गत भारत में बाघों के निवास के मुख्य राज्यों के केंद्र सरकार द्वारा सहायता दी गई।

उसके बाद भी सरकार ने इस विषय में काफी कठोर कदम उठाए जैसे इनके शिकार पर प्रतिबंध और ऐसा करने वाले को कानून द्वारा सजा का प्रावधान भी बनाया गया। इसके लिए वन्यजीव सरंक्षण अधिनियम, 1972 में संशोधन किया गया था।

हाल ही में 28-29 जनवरी, 2019 को नई दिल्ली में बाघ संरक्षण पर अंतर्राष्ट्रीय समीक्षा सम्मेलन का आयोजन किया गया था। मृत बाघों के पोस्ट-मार्टम से प्राप्त नमूनों तथा जीवित बाघों से प्राप्त नमूनों पर आधारित एक नया अध्ययन प्रकाशित किया गया था जिसमें भारत के वन्यजीव संस्थान, सेल्यूलर और आणविक जीवविज्ञान केंद्र, केरल पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय तथा आरण्यक (Aaranyak ) द्वारा भी सहयोग प्रदान किया गया था।

इस अध्ययन के अनुसार, भारत में तीन अलग और आनुवंशिक रूप से बाघ से जुड़े क्षेत्र अवस्थित हैं। ये क्षेत्र हैं- दक्षिण भारत एवं मध्य भारत, तराई एवं उत्तर-पूर्व भारत, तथा रणथंभौर। रणथंभौर सरकार द्वारा बाघ अरक्षित क्षेत्रों प्रथम श्रेणीं में आता है।

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निष्कर्ष

विज्ञान ने आज चाहे कितनी भी तरक्की कर ली हो, लेकिन कोई भी योजना या परियोजना वनजीवों की घटती जनसंख्या और प्रतिकूल वातावरण के बढ़ते स्तर को पूरी तरह रोक नहीं पाया है। भारत की ही बात की जाए तो यहां सरंक्षित क्षेत्र के बाहर बाघ संरक्षण सही से नहीं हैं।

अपने निजी लोभ के कारण लोग पर्यावरण के बारे में नहीं सोचते हैं। वन विभाग भी केवल एक सीमित दायरे तक ही सरंक्षण कर सकता है। भारत सरकार के सहयोग व सरंक्षण करने वाले समूहों और संस्थाओं के अथक प्रयासों के कारण इस वर्ष (2019) में बाघों की जनसंख्या में बहुत वृद्धि पाई गई है।

जुलाई 2019 में प्रधानमंत्री जी ने दिल्ली में अखिल भारतीय बाघ आंकलन 2018 के नतीजे जारी किए थे। जिनके अनुसार केवल उत्तराखंण में ही बाघों की संख्या 2014 में 340 से बढ़ कर 2018 में 442 हो गई है यानी कि तकरीबन 100 से अधिक बाघों की वृद्धि।

बाघों की संख्या में अब मध्य प्रदेश- 526 बाघ व कर्नाटक – 524 बाघ सबसे उच्च स्थान पर हैं। पूरे देश भर के आंकडो़ं की बात करें तो 2014 वर्ष की अपेक्षा 2018 की गणना में 33 फीसदी इजाफा हुआ है। यह संख्या 2014 में 2,226 से बढ़कर 2018 में 2967 हो गई है जिसे हम अच्छे संकेत के रूप में देख सकते हैं।

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