शब-ए-मेराज त्यौहार पर निबंध Essay on Shab E-Meraj Festival in Hindi

शब-ए-मेराज त्यौहार पर निबंध Essay on Shab E-Meraj Festival in Hindi

शब-ए-मेराज मुस्लिम समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला एक त्यौहार है जो मुस्लिम कैलेंडर के अनुसार उसके सातवें महीने अर्थात रजब के महीने में मनाया जाता है। वास्तव में शबे मेराज इसरा और मिराज का संयुक्त रुप है।

इसरा जिसका अरबी भाषा में अर्थ होता है रात के समय किया जाने वाला सफर और मेराज का अर्थ होता है ऐसा साधन जिसकी सहायता से ऊपर चला जाए। अर्थात एक ऐसी रात जिसमें सफर करके हजरत मुहम्मद साहब ने अपनी शरीर के साथ जन्नत में जा के अल्लाह से मुलाकात की थी।

शब-ए-मेराज त्यौहार पर निबंध Essay on Shab E-Meraj Festival in Hindi

शब-ए-मेराज का इतिहास

दरअसल शब-ए- मेराज पैगंबर मोहम्मद साहब का एक वाक्या है जो उनकी पत्नी खादीजा और उनके चाचा अबू तालिब जून की जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण दो शख्स जो उनके समर्थक भी थे, इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे, से शुरू होता है।

मोहम्मद साहब की पत्नी और चाचा की मृत्यु के बाद प्रकार की समस्याओं का सामना किया और इसी समय पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब को उनके अपने मुस्लिम समाज ने अपने समाज से बाहर निकाल दिया।

उस समय मक्का में जब किसी को अपने समाज से बाहर किया जाता था तो उसे रेगिस्तान में जाकर अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता था। जब पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब को उनके समाज से निकाल दिया गया तुम्हें भी मक्का यानी सऊदी अरब का एक शहर के रेगिस्तान में जाकर रहने लगे वहां उन्होंने अनेक प्रकार की कठिनाइयों और समस्याओं का सामना किया परंतु उनकी उन कठिनाइयों और समस्याओं ने उनके अपने अल्लाह पर से विश्वास को कभी भी हटा नहीं सके ।

मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार इसके बाद अल्लाह ने मोहम्मद साहब के लिए दैवीय सवारी भेजी जो कि बुर्राक नाम का एक जानवर था जिसका आकार घोड़े से तो छोटा था परंतु गधे से थोड़ा सा बड़ा था और उसका रंग सफेद था।

इसका हर कदम उस स्थान पर पड़ता था जहाँ आंख से दिखाई देने की अंतिम सीमा होती थी। इसी सवारी पर होकर मोहम्मद साहब अल्लाह  से मुलाकात करने के लिए गए इसीलिए इसे रसूल की अल्लाह से मुलाकात की रात भी कहते हैं।

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इस वाकये का जिक्र कुरान पाक की सूर-ए-अशरा की पहली आयत में भी है जिसमें बताया गया है की वह अल्लाह पाक ही है जो अपने बंदे यानी हजरत मोहम्मद को रातों रात मस्जिद-ए-हरम से मस्जिद-ए-अक्सा तक ले गए जहां अल्लाह ने बरकत फ़रमा रखी है, जिससे कि वह अपनी कुदरत की कुछ निशानियों को दिखला सके। मेराज किया घटना मक्का में नबूवत के दसवें साल में हुई थी।

अगली सुबह जब मुहम्मद साहब ने अपने इस सफर की घटना का लोगों से जिक्र किया तो लोगों ने उनका मजाक उड़ाया लेकिन मोहम्मद साहब ने बताया कि किस तरह से रात के समय में जिब्रील ने उनका हाथ पकड़ कर उनको आसमानी दुनिया की सैर कराई थी और वही पर एक खूबसूरत सीढ़ी दिखाई जिससे कि हजरत मोहम्मद ऊपर गए।

आगे हजरत मोहम्मद साहब ने बताया कि किस तरह जिब्रील उनको लेकर सात आसमान की सैर पर गए और जब वह जिब्रील के साथ पहले आसमान पर पहुंचे तो जिब्रील से प्रश्न किया गया कि साथ कौन है और क्या इन्हें लेने के लिए भेजा गया था।

जब जिब्रील ने इसका जवाब दिया तो एक दरवाजा खुला और वहां हजरत मोहम्मद साहब ने एक आदम देखकर जिब्रील से पूछा यह कौन है तो जिब्रील ने बताया कि या आपके दादा आदम है इसी तरह जब हैं दूसरे आसमान पर पहुंचे तो वहां भी यही प्रश्न जिब्रील से पूछा गया और जवाब देने पर एक दरवाजा खुला जहां वे हजरत मूसा से मिले और इसी तरह मोहम्मद साहब ने जिब्रील के साथ सातों आसमानों की सैर की और अलग-अलग आसमानों पर अलग-अलग रूहानी ताकतों के मालिकों से मुलाकात की जिनमे यूसुफ, इदरीश, हारून और इब्राहिम थे।

आगे मोहम्मद साहब ने यह भी बताया कि किस तरह से उनको दिन में 50 नमाज अदा करने का हुक्म हुआ था लेकिन हजरत मूसा के कहने पर अपने रब के दरबार में हाजिर होकर इस की संख्या में कटौती करायी।

यह भी बताते हैं कि मैं वहां से चलने लगा तो एक रुहानी आवाज सुनाई दी जिसने हां कि मैंने अपना आदेश जारी कर दिया है अब दिन और रात मिलाकर केवल 5 नमाज अदा करनी होगी इनकी संख्या तो 5 है लेकिन इसका असर 50 नमाजों के बराबर होगा।

यह सारा वाक्या सिर्फ एक रात का था जो आम लोगों के लिए किसी जादू से कम नही था क्योकि किसी आदमी के लिए एक रात में सातों आसमान की सैर करना नामुमकिन है। इसलिये ही इस रात को मुस्लिम समुदाय शब-ए-मेराज के रूप में मनाते है ।

शब -ए-मेराज के दिन सभी मुसलमान अपनी नमाज अदा करते है और अपने नबी पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब का शुक्रिया अदा करते है। तथा घरों और मस्जिदों को दिया जलाकर और सुंगधित करके खुशियां मनाते है। और इस दिन ये गरीब लोंगों को दान भी करते है।

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