पृथ्वी की पांच परतें Article On Five Layers Of Earth in Hindi

आईये जानते हैं पृथ्वी की पांच परतें कौन-कौन सी हैं और पृथ्वी कैसे बना है? Article On Five Layers Of Earth in Hindi

पृथ्वी का परिचय Introduction to Structure of Earth in Hindi

पृथ्वी समस्त ब्रह्माण्ड का इकलौता ऐसा ग्रह है, जिस पर जीवन संभव है। सूर्य से दूरी के आधार पर यह ग्रह तीसरे स्थान पर उपस्थित है। रेडियोमेट्रिक डेटिंग प्रक्रिया तथा अन्य कुछ साक्ष्यों के आधार पर, पृथ्वी की उम्र लगभग 45 करोड़ वर्ष बताई जाती है।

पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चन्द्रमा है। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा पूरा करने में करीब 365.26 दिनों का समय लेती है। पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी हुई है, जिस कारण पृथ्वी पर ऋतुओं में परिवर्तन होते हैं।

पृथ्वी तथा चन्द्रमा के बीच गुरुत्वाकर्षण बल के कारण समुद्र में ज्वार-भाटा आते हैं, इस कारण पृथ्वी की उसके अक्ष पर स्थिरता बनी रहती है, तथा इसकी परिभ्रमण की गति भी धीमी बनी रहती है। पृथ्वी सौर्य- मण्डल का सबसे अधिक घनत्व वाला गृह है।

पृथ्वी पर लगभग 71% क्षेत्र में महासागर तथा समुद्र एवं नदियां हैं। बाकि बचे 29% क्षेत्र में महाद्वीप तथा द्वीप उपस्थित हैं। पृथ्वी के ध्रुव अंटार्कटिक तथा आर्कटिक सदैव बर्फ की चादरों से सदैव ढके रहते हैं। पृथ्वी पर करीब 7.6 अरब लोग निवास करते हैं तथा अपने जीवन के लिए पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों तथा जैव-विविधता पर निर्भर करते हैं।

पृथ्वी की पांच परतें Five Layers Of Earth in Hindi

विस्तृत रूप में, पृथ्वी की आतंरिक संरचना में मुख्यतः तीन परतें हैं, जो निम्नलिखित हैं: क्रस्ट, मेंटल, कोर।

1)क्रस्ट Crust 

क्रस्ट धरती की सबसे पतली परत होती है। धरती पर हमें जो कुछ भी दिखता है, वह सब क्रस्ट के अंतर्गत आता है। यह धरती के अंदर करीब 70 किमी तक होती है। परंतु अगर हम पृथ्वी को एक सेब के आकार का मानें, तो यह क्रस्ट परत, उस सेब के छिलके से भी पतली प्रतीत होगी।

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क्रस्ट परत दो प्रकार की होती है: महाद्वीपीय परत तथा महासागरीय परत। महासागरीय परत महासागरों तथा समुद्रों की तली पर पाई जाती है। सामान्य तौर पर यह अधिक मजबूत, ठोस तथा गहरी होती है। इसमें अधिक घनत्व वाली चट्टानें जैसे कि बैसाल्ट आदि पाई जाती हैं।

वहीं दूसरी महाद्वीपीय चट्टानों में अपेक्षाकृत कम घनत्व वाली चट्टानें जैसे कि ग्रेनाइट तथा अवसादी चट्टानें पाई जाती हैं। महासागरीय परत की अपेक्षा महाद्वीपीय क्रस्ट अधिक चौड़ाई तक पाई जाती है। क्रस्ट अपने आप में बहुत अधिक मजबूत नही होती, बल्कि यह अनेक टेक्टोनिक प्लेटों में बंधी हुई होती है। यह टेक्टोनिक प्लेटें भी एक जगह स्थिर नही रहती, बल्कि एक दूसरे के सापेक्ष में खिसकती रहती हैं।

भौगोलिक स्थिति तथा संबंधों के आधार पर तीन प्रकार की टेक्टॉनिक प्लेटें पाई जाती हैं, जो कि निम्नलिखित हैं:- अभिसारी प्लेटें( जो प्लेटें एक दूसरी प्लेट की तरफ खिसकती हैं अथवा आकर्षित होती हैं), अपसारी प्लेटें( जो प्लेटें एक दूसरे की विपरीत दिशा में खिसकती हैं अर्थात अलग अलग होती हैं), रूपांतरण प्लेटें( जो प्लेटें आड़ी-तिरछी दिशाओं में खिसकती हैं)। क्रस्ट परत नरम मेन्टल प्लेट के ऊपर तैरती रहती हैं।

2) मेंटल Mantle 

 मेंटल परत धरती के अंदर करीब 2,890 किमी तक स्थित होती है। यह परत बाकी सभी परतों से अधिक चौड़ी होती है। पृथ्वी के आयतन का करीब 84% हिस्सा मेंटल परत होता है। इस परत के बारे में हम जो कुछ भी जानते हैं, वह सिर्फ शोध तथा सिद्धांतों पर आधारित है, क्योंकि कोई भी मनुष्य आज तक उस परत तक नही जा सका है। मेंटल परत के बारे में हमे जितनी भी जानकारी प्राप्त है, वह भूगर्भीय विज्ञान के अंतर्गत आती है।

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अपनी भूगर्भीय विशेषताओं के आधार पर, मेंटल को भी कई भागों में विभाजित किया गया है। ऊपरी मेंटल परत 670 किमी तक में स्थित होती है। अलबत्ता यह परत दलदली होती है, यह परत एक चट्टान से निर्मित है, जिसे पेरीडोटाइट कहा जाता है। उसके नीचे 670 किमी से करीब 2900 किमी तक निचली मेंटल परत पाई जाती है।

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अब तक की गई शोधों के आधार पर यह मान लिया गया है कि मेंटल परत स्थिर नही है तथा यह निरंतर गति तथा दिशा में धीमी गति से चलायमान रहती है। इस गतिशीलता के तहत गर्म लावा सतह(ऊपर) की तरफ आता है तथा ठंडा लावा नीचे यानि गहराई की तरफ जाता है। ऐसा कहा गया है, क्रस्ट परत में स्थित टेक्टोनिक प्लेट्स की दिशा इसी गतिविधि के आधार पर निर्धारित होती हैं। 

3) कोर Core 

 सामान्य तौर पर हम कोर को एक परत के रूप में जानते हैं। परंतु पृथ्वी की कोर परत दो भागों में स्पष्ट रूप से विभाजित है, तथा उनका संरचनात्मक आधार भी एक दूसरे से भिन्न है। यह परतें हैं: आतंरिक कोर तथा बाह्य कोर । आतंरिक कोर ठोस होती है तथा करीब 1,220 किमी की त्रिज्या में फैली हुई है। जबकि बाह्य कोर तरल रूप में है तथा यह 3,400 किमी की त्रिज्या तक उपस्थित है। कोर परत के बारे में भी हमे समस्त जानकारी भूगर्भीय तरंगों के आधार पर प्राप्त हुई है।

 आतंरिक कोर Inner Core 

आतंरिक कोर में तापमान तथा दाब चरम पर अर्थात बहुत ज्यादा अधिक होते हैं। ऐसा माना जाता है कि आतंरिक कोर का भाग धीरे धीरे बढ़ रहा है। जैसे जैसे कोर परत ठंडी होती है, वैसे वैसे बाह्य कोर परत ठोस होकर आतंरिक कोर में सम्मिलित होती जाती है। यह तापमान गिरने की दर बहुत धीमी है जो कि 100℃ प्रति 10 करोड़ वर्ष है। अलबत्ता यह गति अत्यधिक कम है, परंतु फिर भी यह पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को अत्यधिक प्रभावित करती है।

बाह्य कोर Outer Core 

बाह्य कोर आतंरिक कोर की अपेक्षाकृत कम दलदली(तरल) है। यहाँ पर तरलता कम होने के कारण, यह आसानी से अपना रूप खो सकते हैं तथा अधिक लचीले होते हैं। इसी कारण से यहाँ संवहन बहुत अधिक मात्रा में होते हैं। इस परत में संवहन धाराओं का प्रकोप बहुत अधिक रहता है।

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बाह्य परत की गति तथा आलोड़न से ही पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र का निर्माण हुआ है। बाह्य कोर परत के सर्वाधिक गर्म हिस्से का तापमान, आतंरिक कोर से अधिक होता है, जो कि करीब 6000℃ तक पहुंच जाता है। यह इतनी ही गर्म होती है, जितनी कि सूर्य की सतह।

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