गोल गुम्बद का इतिहास Gol Gumbaz History in Hindi

गोल गुम्बद का इतिहास Gol Gumbaz History in Hindi

भारतवर्ष में कई ऐसे मकबरे हैं जो विश्व प्रसिद्ध हैं। उनमें से एक अद्वितीय मकबरा आदिलशाही वंश के सांतवे शासक मुहम्मद आदिल शाह का है जो दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक के विजयपुरा (भूतपूर्व बीजापुर ) शहर में स्थित है।

यही मकबरा गोल गुम्बद, गोल गुम्बज या गोल घुमट के नाम से जाना जाता है। यह विश्व प्रसिद्ध दूसरा सबसे बड़ा गुम्बद है। यह गुम्बद दक्खिन वास्तुकला का विजय स्तम्भ भी माना जाता है। आइये इस गुम्बद के बारे में विस्तार से जानकारी लें।

गोल गुम्बद का इतिहास Gol Gumbaz History in Hindi

गुम्बद की बनावट

इस गुम्बद को बनाने में लगभग बीस साल लगे थे। इस गुम्बद का क्षेत्रफल लगभग 18337 वर्गफुट है। इसकी ऊंचाई लगभग 175 फुट है। यह गुम्बद इतना बड़ा है कि इसके ऊपर से पूरा बीजापुर शहर दिखाई देता है।

यह गुम्बद रोम के पेंथियन सेंट पीटर-गिर्जे के गुम्बद से थोड़ा छोटा है। आदिल शाह के पिता इब्राहिम की मृत्यु के पश्चात मुहम्मद आदिल शाह को विचार आया कि उन्हें एक अद्भुत इमारत का निर्माण करवाना चाहिए।

ऐसी इमारत कि जिसके समान पूरे दक्खिन में कोई अन्य कोई  इमारत न हो। फिर इस कार्य के लिए दाबुल के फ़ारसी वास्तुशास्त्र याकूत को चुना गया। इस गुम्बद का निर्माण कार्य 1626 ई. में प्रारम्भ हुआ था और 1656 में पूरा हुआ था।

गुम्बद का कार्य समाप्त होते ही आदिल शाह की मृत्यु हो गयी और उन्हें इसी स्थान पर दफनाया गया। यह गुम्बद अंदर से खोखला है, इसमें कोई सहारा नहीं है।

विशेषताएं

जो लोगों को आश्चर्यचकित करता है। इमारत के चारों कोनो से जुडी हुईं चार मीनारे हैं। हर मीनार सात मंजिल की है और ऊपर बुर्ज है। इमारतों में बड़ी-बड़ी खिड़कियां बनाई गयीं हैं। इन खिड़किओं से सूर्य की रौशनी दल्लानो तक पहुँच जाती है।  छत से गुम्बद में जाने के लिए आठ दरवाज़े हैं। दरवाज़ों पर सागौन की लकड़ी से कार्य हुआ है।

इसकी संरचना के लिए 156 फ़ीट की भुजाओं वाला घनक्षेत्र है। इसी के ऊपर 44 मी. का बाहर की तरफ व्यास वाला यह विशाल गुम्बद बना हुआ है। इसमें एक गैलरी भी है जो 11 फिट चौड़ी है जिसमें आवाज़ करने पर ध्वनि सात बार गूंजती है और एक तरफ से दूसरी तरफ टकराकर साफ़ सुनाई देती है, इसीलिए इसे बोल-ऐ-गुम्बद भी कहते हैं। मकबरे के अंदर सीढ़ियों से घिरा हुआ एक चौकोर चबूतरा भी है।

इसी चबूतरे के बीच में कब्र बनी हुई है। ये कब्रे बादशाह, उनकी दो बीवीयों, बेटियों और नवासों की हैं। इस इमारत की  सबसे बड़ी बालकनी को हमसा कहा जाता था। इसकी चौड़ाई 3 मीटर है। पहले इस गुम्बद में एक मस्जिद और एक रास्ता भी हुआ करता था जो शाही महल की तरफ जाता था। आज महल तो नहीं रहा लेकिन गोल गुम्बद और मस्जिद बाकि है।

संग्रहालय

यहाँ एक संग्रहालय भी है जहाँ बादशाह के सामान रखे हुए हैं। यह संग्रहालय प्राचीन संग्रहालयों में से एक है। यह गोल गुम्बद के मुख्य द्वार के सामने ही स्थित है। पहले ये गोल गुम्बद का ही हिस्सा माना जाता था लेकिन ब्रिटिश शासकों ने इसे 1892 में संग्रहालय में बदल दिया।

पहले ये इमारत नक्कार खाना थी। जिसमें शाही लोगों के आगमन पर ड्रम बजाकर स्वागत किया जाता था। बाद में अमूल्य वस्तुओं की सुरक्षा के लिए इसे संग्रहालय बना दिया गया। 1912 में संग्रहालय की सुरक्षा का कार्य जिला कलेक्टर को सौंप दिया गया फिर भारत की स्वतंत्रता के बाद 1962 में भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण को यह कार्य मिल गया।

इमारत के आस – पास सुन्दर बाग़ – बगीचे बने हुए हैं और बड़े – बड़े वृक्ष लगे हुए हैं। मानो ऐसा लगता हो कि इमारत की देखभाल कर रहे हों। गुम्बद की इस अदभुत कला को देखकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं। वास्तव में यह गुम्बद वास्तुकला का एक अनोखा नमूना है,जिसे देखने के लिए लोग न केवल देश बल्कि विदेशों से भी आते हैं।  

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