गदर पार्टी का इतिहास History of Gadar Party in Hindi

गदर पार्टी का इतिहास History of Gadar Party in hindi

गदर शब्द का अर्थ है “विद्रोह” इस पार्टी को भारत को अंग्रेजों से आज़ादी दिलाने के लिए बनाया गया था। गदर पार्टी को कनाडा और अमेरिका में रह रहे भारतीयों ने बनाया था। इस पार्टी को “प्रशांत तट का हिंदी संघ” भी कहा जाता है। 

इस पार्टी में हिंदू, मुस्लिम और सिख नेता शामिल थे। जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध अनेक दल सक्रिय हो गए और बगावत छेड़ दी। उसी समय गदर पार्टी के सदस्यों ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।

गदर पार्टी ने नारा दिया –

“सुरा सो पहचानिये, जो लडे दीन के हेत।
पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कभूं न छाडे खेत॥

अर्थात सूरमा की पहचान तभी होती है जब वह दीन दुखियों की मदद के लिए लड़ते हैं और अपने शरीर का एक-एक अंग लड़ते हुए कुर्बान कर देते हैं।

गदर पार्टी की स्थापना

गदर पार्टी की स्थापना 10 मई 1913 को सोहन सिंह भकना ने सैन फ्रांसिस्को के एस्टोरिया में की थी। करतार सिंह सराभा ने अपने पहले संदेश में लिखा कि “आज से विदेशी जमीन पर गदर शुरू होता है, पर हमारी मातृभाषा में यह ब्रिटिश राज के खिलाफ हमारा युद्ध है।

इसका क्या नाम है? गदर! इसका क्या काम है? गदर! यह आंदोलन कहां पर होगा? भारत में! शीघ्र ही भारत में लोगों के हाथों में कलम और स्याही की जगह राइफल और खून होगा”

ग़दर साप्ताहिक पत्र

यह पार्टी “हिंदुस्तान गदर” नाम से एक अखबार भी प्रकाशित करती थी जो उर्दू और पंजाबी में प्रकाशित होता था। इस समाचार पत्र में अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किए जा रहे अत्याचार पर विस्तृत लेख प्रकाशित होते थे। 

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गदर पार्टी ने अपनी शाखाएं कनाडा, चीन, जापान जैसे देशों में खोली थी। लाला हरदयाल इस के महासचिव थे। गदर साप्ताहिक पत्र का उद्देश्य विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीय और दुनिया के दूसरे लोगों को अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर अत्याचार करने की खबरें पहुंचाना था। 

भारतीय प्रवासियों को शिक्षित करके उन्हें “गदर आंदोलन” करने के लिए प्रेरित करना था। धीरे धीरे गदर साप्ताहिक पत्र की लोकप्रियता काफी बढ़ गई थी। साप्ताहिक पत्र में भगवान सिंह ने अनेक क्रांतिकारी कविताएं लिखी और जनमानस को आजादी प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया था।

गदर पार्टी के मुख्य नेता

लाला हरदयाल, भाई परमानंद, तारक नाथ दास, आमिर चौधरी, सुलामन चौधरी, अब्दुल हफीज मोहम्मद बरकतउल्ला करतार, सोहन सिंह भकना, करतार सिंह सराभा गदर पार्टी के प्रमुख सदस्य थे। 

इस पार्टी में शुरू में 32 सदस्य थे। धीरे धीरे अधिक लोग इससे जुड़ गये। इस पार्टी ने देश को अनेक महान क्रांतिकारी दिए। गदर पार्टी से प्रभावित होकर भगत सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया।

गदर पार्टी के नेताओं की सूची

  1. सोहन सिंह भकना (अध्यक्ष)
  2. केसर सिंह (उपाध्यक्ष)
  3. करतार सिंह सराभा (संपादक पंजाबी गदर)
  4. बाबा ज्वाला सिंह (उपाध्यक्ष)
  5. गुलाब कौर
  6. सुलामन चौधरी
  7. लाला हरदयाल,
  8. रसबेहरी बोस
  9. संत बाबा वशाखा सिंह दादेहर
  10. भगवान सिंह ज्ञानी
  11. बलवंत सिंह
  12. पंडित कांशीराम (खजांची)
  13. हरनाम सिंह तुन्दिलत
  14. जीडी वर्मा
  15. लाला ठाकर दास (उपाध्यक्ष)
  16. मुंशीराम (सचिव)
  17. भाई परमानंद
  18. निधान सिंह चुघ
  19. संतोख सिंह
  20. मास्टर उधम सिंह
  21. बाबा छतर सिंह अहलूवालिया
  22. बाबा हरनाम सिंह
  23. मंगू राम मुगोवालिया
  24. करीम बख्श
  25. अमरचंद
  26. रहमत अली
  27. वी जी पिंगले
  28. संत बाबा वशाखा सिंह
  29. मौलवी बरकतुल्लाह
  30. हरनाम सिंह सैनी
  31. तारक नाथ दास
  32. पांडुरंग सदाशिव कनखोजें
  33. गंडा सिंह
  34. भाई रणधीर सिंह
  35. करीम बख्श
  36. बाबा पृथ्वी सिंह आजाद
  37. वधावा सिंह बरवाल और उनके पुत्र (राणा सिंह और भाना सिंह)

गदर आंदोलन

गदर आंदोलन की शुरुआत पंजाब प्रांत से हुई। पंजाब में हर जगह पोस्टर चिपकाया गया जिसमें लिखा था “जंग दा होका”( युद्ध की घोषणा) प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत होने वाली थी। 

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गदर पार्टी ने यह निर्णय लिया कि प्रथम विश्व युद्ध गदर आंदोलन करने के लिए सबसे उपयुक्त समय होगा। गदर पार्टी के सदस्य भारत लौट आए और अगस्त 1914 को बड़ी रैलियां और जनसभाओं का आयोजन किया गया। देश की जनता से गदर आंदोलन में शामिल होने का आग्रह किया गया।

गदर पार्टी के संस्थापक सोहन सिंह भकना भी स्वदेश लौट आए। उन्होंने अंग्रेजों के दुश्मन से मदद लेने के लिए बरकतउल्ला को काबुल भेजा। कपूर सिंह को मदद पाने के लिए चीन भेजा गया। स्वयं सोहन सिंह भकना ने जापान में मदद के लिए लोगों से बात की। तेजा सिंह को मिलिट्री एकेडमी में प्रशिक्षण पाने के लिए तुर्की भेजा गया।

गदर पार्टी के कुल 8000 सदस्य भारत लौटकर अंग्रेजी के विरुद्ध क्रान्ति चाहते थे पर कहीं से इसकी जानकारी अंग्रेजों को मिल गई। उन्होंने राज्य सरकार को अधिकार दे दिया कि किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेकर पूछताछ कर सकें। 

बंगाल और पंजाब राज्य की सरकार को यह अधिकार दे दिए गये। गदर पार्टी के संस्थापक सोहन सिंह भकना को नैमसैंग जहाज से उतरते समय गिरफ्तार कर लिया गया।

गदर पार्टी की मुख्य योजनाएं

  1. भारत के अमृतसर को गदर पार्टी के मुख्य कंट्रोल सेंटर के रूप में प्रयोग किया गया। बाद में लाहौर को मुख्य कंट्रोल सेंटर बना दिया गया।
  2. 12 फरवरी 1915 को यह निर्णय लिया गया कि क्रांति (विद्रोह) 21 फरवरी 1915 को की जाएगी। दीनापुर, बन्नू और कोहाट में भी उसी दिन क्रांति की जाएगी
  3.  करतार सिंह को फिरोजपुर में विद्रोह करना था।
  4.  पिंगले को दिल्ली में विद्रोह करना था।
  5. भाई परमानंद को पेशावर में विद्रोह करना था।
  6. निधान सिंह चुघ को झेलम, गुरमुख सिंह को रावलपिंडी और हरनाम सिंह को मर्दान जाकर विद्रोह करना था।
  7. डॉक्टर मथुरा सिंह को सीमांत क्षेत्रों में जाकर विद्रोह करना था। यह सभी योजनाएं गदर पार्टी ने बनाई थी।
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गदर पार्टी के सदस्यों की गिरफ्तारी

अंग्रेजी सरकार को गदर पार्टी द्वारा 21 फरवरी 1915 को विद्रोह (क्रांति) की बात पता चल गई। उसके बाद गदर पार्टी ने क्रांति की तारीख बदलकर 19 फरवरी 1915 कर दी, लेकिन अँग्रेज़ सरकार सावधान हो गई। 

उसने अपनी सेना के सभी हथियारों को ले लिया। बारूद के गोदामों पर विशेष पहरा लगा दिया गया। अंग्रेजों को डर था कि हथियारों और बारूद को गदर पार्टी के सदस्य लूट सकते हैं। धीरे धीरे गदर पार्टी के बहुत से सदस्य गिरफ्तार कर लिए गए।

गदर पार्टी के सदस्यों को सजा

गदर पार्टी के सदस्यों को सजा देने के लिए गवर्नर माइकल ओ डायर ने ब्रिटिश हुकूमत से विशेष कानूनी प्रावधानों की मांग की, जिसकी मदद से गदर पार्टी के सदस्यों पर झटपट मुकदमा चलाकर सजा दी जा सके। 13 सितंबर 1915 को गदर पार्टी के 24 नेताओं को मृत्युदंड और बाकी को उम्रकैद की सजा दी गई।

30 मार्च 1916 को गदर पार्टी के 7 अन्य सदस्यों को फाँसी, 45 सदस्यों को उम्र कैद और अन्य सदस्यों को 8 से 4 वर्ष का कठोर कारावास की सजा दी गई।

परिणाम

गदर पार्टी में लाला हरदयाल, करतार सिंह सराभा और सोहन सिंह भकना ने सराहनीय कार्य किया, जिससे भारत को सुखदेव, राजगुरु, भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी प्राप्त हुए। गदर पार्टी ने चिंगारी का काम किया और आगे चलकर यह चिंगारी आग में बदल गई और अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। 

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