विवाह में सगाई की रस्म Indian Wedding Ritual Ring Ceremony in Hindi

विवाह में सगाई की रस्म Indian Wedding Ritual Ring Ceremony in Hindi

भारतीय संस्कृति में सगाई की रस्म विवाह से पूर्व होने वाला एक महत्वपूर्ण रिवाज़ है। जिसमे होने वाले वर तथा वधू को औपचारिक रूप से आमने- सामने बिठाकर वाग्दान संस्कार किया जाता है। हिन्दू धर्म में ‘वाग्दान’ की परम्परा वैदिक काल से ही चली आ रही है।

इस रस्म के अंतर्गत वर के परिवार वाले वधू के परिवार वालों को यह वचन देते हैं कि वह उनकी पुत्री को स्वीकार करेंगे तथा भविष्य में उसकी सलामती के लिए पूर्णतः उत्तरदायी होंगे। इस रस्म के द्वारा दोनों परिवार एक-दूसरे से सामंजस्य तथा समन्वय निभाने का वचन देते हैं। इस दौरान उन्हें भी एक दूसरे के रीति-रिवाजों से परिचित होने का अवसर मिलता है।

भारत के विभिन्न धर्मों तथा समुदायों में सगाई मनाने का तरीका लगभग समान है। कुछ विवाहों में सगाई की रस्म एक वर्ष पूर्व की जाती है, वहीं कुछ में यह रस्म एक या दो दिन पूर्व संपन्न की जाती है। ऐसा भी ज़रूरी नही है कि हर धर्म के विवाह में वर-वधू द्वारा एक दूसरे को अंगूठी पहनाई जाए, परंतु सगाई के दिन लगभग सभी जगह विवाह की औपचारिक घोषणा कर दी जाती है।

विवाह में सगाई की रस्म Indian Wedding Ritual Ring Ceremony in Hindi

Sagai – Rings of Dulha Dulhan

मुस्लिम सगाई समारोह

भारत में मुस्लिम सामान्यतः सगाई के लिए रस्मों तथा प्रक्रियाओं को अपनाते हैं, जो पवित्र ग्रंथ कुरान में लिखी हुई हैं। विवाह तथा विवाह पूर्व की जाने वाली सभी रस्में प्राचीन काल के सुल्तानों तथा मुग़ल बादशाहों की विरासत के रूप में चली आ रही हैं।

मुस्लिमों के अनुसार, विवाह अल्लाह के प्रति संपूर्ण समर्पण के रिवाजों को अपनाते हुए, अल्लाह की पूजा तथा आज्ञा अनुपालन करने का एक जरिया है। पारंपरिक मुस्लिम विवाह संस्कृति में सगाई को मंगनी कहा गया है, तथा यह विवाह से एक दिन पूर्व इस्तिकार तथा इमाम-ज़मीं रस्मों के बाद की जाती है।

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मंगनी की रस्म के लिए, दूल्हे के परिवार वाले लोग दुल्हन के घर अनेक भेंट जैसे कपडे, मिठाई, फल आदि लेकर आते हैं। मंगनी के दिन दुल्हन वही लिबास पहनती है, जिसे दूल्हे के परिवार द्वारा गहनों के साथ दुल्हन के लिए भेंट में लाया जाता है। उसके बाद निकाह के दौरान दूल्हा-दुल्हन एक दूसरे को अंगूठी पहनाकर एक दूसरे का साथ निभाने की प्रतिज्ञा लेते हैं।

ईसाईं सगाई समारोह

ईसाई विवाह समारोह भारत में अन्य सभी संस्कृतियों से अलग तरीके से मनाए जाते हैं। यह समारोह मुश्किल से एक दिन का होता है, जिसमे एक ही दिन में विवाह तथा प्रीतिभोज दोनों का आयोजन किया जाता है।

ईसाईं विवाह से पूर्व होने वाला एकमात्र रिवाज़ सगाई ही है। यह समारोह सामान्य रूप से वधू के परिवार द्वारा उनके घर पर आयोजित किया जाता है, जिसमे कुछ नज़दीकी मित्र तथा रिश्तेदार आमंत्रित किये जाते हैं।

इसमें वर तथा वधू एक- दूसरे को अंगूठी पहनाकर सगाई करते हैं, तथा इसके बाद पार्टी आयोजित की जाती है। इस समारोह की घोषणा आस- पास के गिरजाघरों में कर दी जाती है। ईसाई लोगों में सगाई को ही विवाह की औपचारिक घोषणा माना जाता है।

हिन्दू सगाई समारोह

हिन्दू धर्म में सगाई समारोह हर राज्य में किसी अलग रस्म तथा प्रक्रिया द्वारा मनाया जाता है। इसके लिए अलग अलग स्थान पर अलग अलग शब्द प्रयुक्त किये जाते हैं जैसे मिसरी, मंगनी, सगाई, आशीर्वाद, निश्चयम् इत्यादि।

इन सबके इतने सारे अलग अलग होने पर भी इनका महत्व हमेशा समान ही रहता है। इसका महत्त्व है कि इसके ज़रिये एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति (जिसे उसने पसंद किया हो), से गठबंधन कर अपना जीवन उसे समर्पित कर देता है, तथा इसके साथ ही उसके प्रति सम्मान, समर्पण, कर्तव्य तथा उत्तरदायित्वों को निभाने का वचन देता है।

सिक्ख सगाई समारोह

विवाह की औपचारिक घोषणा को पंजाबी हिंदुओं तथा सिक्खों द्वारा कुर्माई अथवा शगन कहा जाता है। यह रस्म भी या तो विवाह से कई दिन पूर्व अथवा एक दिन पूर्व निभाई जाती है। यह समारोह या तो वर के घर पर आयोजित किया है अथवा किसी गुरूद्वारे में।

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इसमें दुल्हन के परिवार वाले भेंट के रूप में कपड़े, फल तथा सूखे मेवे लाते हैं। सिख परंपरा के अनुसार वधू का पिता वर को एक कड़ा, एक सोने की अंगूठी तथा एक सोने का सिक्का भेंट स्वरुप प्रदान करता है। इस रस्म के बाद भोज अर्थात लंगर का आयोजन किया जाता है।

विश्व के किसी भी वैवाहिक समारोह से अधिक रस्में, परम्पराएं, रीति-रिवाज भारत के विवाह समारोहों में देखने को मिलते हैं। सगाई समारोह में वर-वधू एक दूसरे को अंगूठी पहनाते हैं। इसी वजह से इसे अंग्रेजी में ‘रिंग- सेरेमनी’ कहते हैं।

भारत में विवाह परंपरा की शुरुआत वैदिक काल में ही हो गई थी। भारतीय संस्कृति में विवाह को दो आत्माओं का मिलन कहा गया है।

भारतीय विवाह समारोह में वर- वधू द्वारा अनेकों रस्में निभाई जाती हैं तथा यह कायर्क्रम कम से कम 5 दिनों तक चलता है। विवाह से पूर्व अनेकों ऐसी रस्में होती हैं, जिन्हें निभाने से उनके वैवाहिक जीवन में संपन्नता एवं समृद्धि आएगी। इनमे से ही एक सगाई की रस्म भी है।

कई मायनों में सगाई का ये रिवाज़ पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित प्रतीत होता है। भारत में पंजाबी, मराठी तथा दक्षिणी भारतीय लोगों के लिए हमेशा से ही वैवाहिक समारोह बड़ी धूम-धाम से मनाए जाते रहे हैं। परंतु, इसमें सगाई रस्म का प्रारंभ ब्रिटिशर्स के भारत में आगमन के बाद ही हुआ।

सगाई के दिन वर- वधू के परिवार वाले एक ही जगह पर एकत्रित होते हैं, तथा वर- वधू को एक सुखी, शांत तथा खुशियों से भरे जीवन का आशीर्वाद देते हैं। इसके साथ ही तिलक अथवा टीका रस्म की सामग्री वधू के परिवार द्वारा वर के घर पर लायी जाती है।

टीका के लिए एक चांदी की थाल में केसर, चावल, 14 छुहारे, तथा नारियल जिस पर सोने या चांदी की परत लगाई गई हो, आदि सामान लाया जाता है। टीका रस्म के लिए वर को उसकी बहन द्वारा एक महीन रेशमी कपड़ा पल्ले के रूप में गर्दन के पास पहनाया जाता है।

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जिसे वह बाद में अपनी गोद में बिछा लेता है, जब वधू के परिवार वाले उसे अनेक मिठाई, भेटें तथा उपहार प्रदान करते हैं। इसके पश्चात वधू के पिता अपने होने वाले दामाद के सर पर टीका यानी कि तिलक लगाते हैं और उसे अपना आशीर्वाद देते हैं तथा वह उसके उस रेशमी कपड़े को फल, मिठाइयों, मेवे तथा अंगूठी, घड़ी या अन्य उपहार से भर देते हैं।

इसके बदले में वर के परिवार वाले वधू के लिए अनेक प्रकार के तोहफे तथा साड़ियां भेजते हैं। इस सब के बाद अंत में वर तथा वधू के दोनों के पिता आपस में एक- दूसरे को मालाएं पहनाते हैं, जिसे मिलनी भी कहा जाता है। समारोह में आये सभी अतिथियों को फल, लड्डू, सूखे मेवे आदि खिलाकर स्वागत किया जाता है।

आज के समय पर जब किसी के पास इतनी अधिक व्यवस्था करने का समय नही होता है, लोग विवाह से जुड़ी तमाम रस्मों के लिए बैंक्वेट हॉल बुक कर लेते हैं, जहाँ पर वर तथा वधू दोनों के परिवार के लोग तथा मित्र आमंत्रित किये जाते हैं। यह बैंक्वेट हाल बहुत अधिक साज-सज्जा से तैयार किये जाते हैं, तथा इनमे सभी अतिथियों के लिए भोजन की व्यवस्था भी होती है।

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