कुचिपुड़ी नृत्य का इतिहास, महत्व Kuchipudi Dance History in Hindi

कुचिपुड़ी नृत्य का इतिहास, महत्व Kuchipudi Dance History in Hindi

भारत के मुख्य 11 शास्त्रीय नृत्यों में से कुचिपुड़ी नृत्य एक है। लगभग 20 वीं शताब्दी के बाद से इस नृत्य का प्रचलन चला आ रहा है। इस नृत्य का नाम आंध्र प्रदेश के एक जिले कृष्णा के गाँव कुचेलापुरी या कुचेलापुरम के आधार पर रखा गया।

कुचिपुड़ी नृत्य का इतिहास, महत्व Kuchipudi Dance History in Hindi

यह दक्षिण भारत की सबसे प्रसिद्ध नृत्य शैली है। विजयवाड़ा और गोलकुंडा के शासकों के द्वारा इस नृत्य को संरक्षित किया गया है। प्रारम्भ में कुचलवा नामक लोगों के द्वारा इसे प्रदर्शित किया जाने लगा था।

इस नृत्य को रात के समय मंदिरों में प्रस्तुत किया जाता था, जब ग्रामीण अपने खेतों के दिन भर के कार्य से फ्री होकर वापस लौटते थे। जिसे अरंडी के तेल से जलते हुए दिए के प्रकाश में प्रस्तुत किया जाता था और केवल ब्राह्मण ही इस नृत्य का मंचन करते थे।

पढ़ें : ओडिसी नृत्य का इतिहास

पहले ये नृत्य पुरुषों के द्वारा किया जाता था लेकिन 20 वीं शताब्दी के बाद बालासरस्वती और रागिनी देवी ने इस नृत्य को पुनर्जीवित किया और तब से यह नृत्य महिलाओं के बीच में भी लोकप्रिय हो गया।

वेदांतम लक्ष्मी नारायण, चिंता कृष्ण मूर्ति और तादेपल्ली पेराया ने महिलाओं को भी इसमें शामिल किया। ऐसा भी कहा जाता है कि इस नृत्य को पुनर्परिभाषित सिद्धेन्द्र योगी जी ने किया। जो एक कृष्ण – भक्त संत थे और नाट्यशास्त्र में पारंगत थे।

सिद्धेन्द्र योगी ने पारिजातहरणम नाट्यावली की रचना की। इस नृत्य में बीच – बीच में कई बदलाव भी आये। जैसे डॉ. वेमापति चिन्ना सत्यम ने इसमें बदलाव किये और नृत्य संरचना तैयार की। श्री सिद्धेन्द्र योगी जी ने भामा कलापम नृत्य नाटिका की भी रचना की है।

जिसमें सत्यभामा (श्री कृष्ण जी की 8 पत्नियों में से एक ) के कृष्ण जी में विलीन होने के बारे में बताया है। यह नृत्य शैली भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित है। इस नृत्य शैली के अंतर्गत नर्तक गाते हैं और दर्शकों से संवाद करते हैं। यह नृत्य कथानक पर आधारित है।

पढ़ें : कथकली नृत्य का इतिहास व महत्व

जिसमें कुछ भाग संवाद रूप में,  कुछ भाग नाटक रूप में व कुछ मुख मुद्राओं से अभिव्यक्त किये जाते है। इसके कथानक तेलुगु भाषा में लिखे जाते हैं। जिसका मंचन कलाकार मंच पर करता है। इस नृत्य की वर्तमान शैली नंदकेश्वर द्वारा रचित अभिनय दर्पण और भरतारनव पर आधारित है।

कुचिपुड़ी  नृत्य के कुछ तत्व भी हैं जो निम्नलिखित हैं –

1. मंडूक शब्दम – इसमें मेंढक की कहानी के विषय में बताया गया है।

2. तरंगम –  इसमें पीतल की थाली के किनारों पर पैर को संतुलित किया जाता है। सर पर पानी से भरा घड़ा संतुलित करके नृत्य किया जाता है। यह शैली सबसे अधिक लोकप्रिय है। थाली के बीच में दो दीपक भी जलाये जाते हैं।

3. जल चित्र नृत्यं – इसमें नृत्य करने के साथ – साथ पैर के अंगूठे से जमीन पर आकृति बनाई जाती है। यह शैली भी आकर्षक है।

कुचपुड़ी नृत्य के अंग – इस नृत्य के चार मुख्य अंग हैं जो इस प्रकार  हैं – 1. वाचिका, 2. आहार्या, 3. अंगिका, 4. सात्विका

पढ़ें : भरतनाट्यम नृत्य की जानकारी 

विशेषताएं

  1. नृत्य की शुरुआत करने से पहले परंपरागत तरीके से पूजन किया जाता है। पूजन के पश्चात नर्तक मंच पर आते हैं और धारवु के द्वारा परिचय देते हैं।
  2. इस नृत्य के माध्यम से भागवत पुराण की कहानियों को नृत्य के माध्यम से दर्शाया जाता है।
  3. नर्तकों को  भागवतथालु कहा जाता है। जो कुचिपुड़ी गांव के हैं। इनका पहला समूह सन 1502 में बना।
  4. नृत्य और गायन दोनों एक ही कलाकार के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।
  5. इस नृत्य के माध्यम से मानव शरीर में पृथ्वी में व्याप्त तत्वों को बताया जाता है।
  6. इस नृत्य में लास्य और तांडव दोनों महत्पूर्ण है।
  7. नृत्य के लिए वायलिन, बांसुरी, तम्बूरा, मंजीरे और मृदंग आदि वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है।
  8. एक नृत्य नाटिका में लगभग 80 नृत्य क्रम होते हैं जिसे ‘दारू’ कहते हैं। नृत्य के प्रारम्भ में प्रत्येक चरित्र ‘दारू’ के मंचन के साथ अपना परिचय देता है। अपने चरित्र को प्रदर्शित करने के लिए प्रत्येक पात्र को एक-एक गीत दिया जाता है। दारू एक लघु रचना होती है जो चरित्र के रहस्योद्घाटन के लिए होती है।
  9. इस नृत्य शैली में श्रृंगार रस को दर्शाया जाता है।

वेश – भूषा

इस नृत्य में पहने जाने वाले वस्त्र और आभूषण परंपरागत होते हैं जो की बहुत आकर्षक होते हैं। आभूषणों का निर्माण बोरुगु नामक एक लकड़ी से किया जाता है। जो कि बहुत हलकी होती है। इसका प्रचलन लगभग 17  वीं सदी से चला आ रहा है। अधिकतर नर्तक और उनके परिवारजन स्वयं आभूषणों को बनाते हैं।

इसके प्रसिद्ध कलाकार राधा रेड्डी, राजा रेड्डी, यामिनी कृष्णमूर्ति, यामिनी रेड्डी, भावना रेड्डी और इन्द्राणी रहमान हैं। राजा और राधा रेड्डी पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित हैं। मुंगरा यामिनी रेड्डी भी पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री से सम्मानित हैं।

विजयवाड़ा जिले में विश्व के 6117 नर्तकों ने साथ में नृत्य किया था तब इस नृत्य ने गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना स्थान बनाया। ऐसा कहा जाता है कि कुचिपुड़ी गांव के लगभग सभी लोगों को इस नृत्य का अच्छा ज्ञान है। यह नृत्य पितृ प्रधान है।

नर्तकों को इस नृत्य का ज्ञान अपने पिता से मिला है। परंपरा के अनुसार नृत्य को पुरुष ही करते हैं या वे स्वयं  स्त्री की वेश – भूषा धारण करते हैं।

वास्तव में यह नृत्य सभी के मन को लुभावने वाला है। लेकिन इस नृत्य के विषय में लोग कम जानते हैं। आशा है कि इस लेख के माध्यम से आपको इस नृत्य की सम्पूर्ण जानकारी मिल सके।

Image Credit – Yamini Reddy kuchipudi

1 thought on “कुचिपुड़ी नृत्य का इतिहास, महत्व Kuchipudi Dance History in Hindi”

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.