कमल मंदिर (बहाई उपासना मंदिर) दिल्ली Lotus Temple History in Hindi

कमल मंदिर (बहाई उपासना मंदिर) दिल्ली Lotus Temple History in Hindi

भारत के लोगों के लिए कमल का फूल पवित्रता तथा शांति का प्रतीक होने के साथ-साथ ईश्वर के अवतार का संकेत चिन्ह भी है। जिस प्रकार फूल कीचड़ में खिलने के बावजूद पवित्र तथा स्वच्छ रहना सिखाता है, उसी प्रकार भारत की राजधानी दिल्ली के नेहरू प्लेस में स्थित कमल मंदिर (बहाई उपासना मंदिर) भी शांति, प्रेम और एकता का प्रतीक है।

इस मंदिर को बहाई उपासना मंदिर भी कहते है। इसे कमल के फूल की तरह ही बनाया गया है। यह मंदिर के नाम से प्रसिद्ध तो है परन्तु यहाँ पर किसी भी भगवान की पूजा नही की जाती है और न ही कोई धार्मिक कर्म-काण्ड किया जाता है।

कमल मंदिर एशिया का एक मात्र बहाई मंदिर है। इसमें सभी धर्मों और संप्रदायों के लोगो को ध्यान लगाने या उपासना करने के लिए एक बड़ा सा प्रार्थना कक्ष बना है।

कमल मंदिर (बहाई उपासना मंदिर) दिल्ली Lotus Temple History in Hindi (Bahá’í House of Worship – New Delhi)

वास्तुकला Architecture

कमल मंदिर का उद्घाटन 24 दिसम्बर  सन् 1986 हुआ था लेकिन आम जनता के लिए यह मंदिर 1 जनवरी  सन् 1987 को खोला गया। इस मंदिर को वास्तुकार फ़रीबर्ज़ सहबा ने तैयार किया था। फ़रीबर्ज़ सहबा (फ़ारसी: فريبرز صهبا, जन्म 1948), एक ईरानी बहाई वास्तुकार हैं जो अब कनाडा में रहते है।

इस मंदिर को बनाने में एक दशक से भी ज्यादा का समय लगा है। कमल मंदिर को तक़रीबन 700 इंजीनियर, तकनीशियन (Technician), कामगार और कलाकारों ने मिलकर बनाया। मंदिर में एक समय में एक साथ 2400 लोग सकते है।

यह मंदिर तक़रीबन 40 मीटर लंबा और 9 तालाब से घिरा हुआ है। इस मंदिर को बनाने में जिस पत्थर का उपयोग किया गया है, उसे ग्रीस से मंगवाया गया था। इस मंदिर में 27 खड़ी पत्थर की पंखुड़ियाँ है, जिसे 3 और 9 के आकार में बनाया गया है।

इसके प्रवेश हॉल में 9 दरवाज़े भी बनाये गये है जो लगभग 40 मीटर के है। इस मंदिर का आकार कमल के फूल की तरह है क्योंकि कमल को शांति, प्रेम और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।

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प्रवेश हॉल में 9 दरवाज़े भी बनाये गये है जो लगभग 40 मीटर के है। इस मंदिर का आकार कमल के फूल की तरह है क्योंकि कमल को शांति, प्रेम और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।

इस मंदिर को “बहाई उपासना” का मंदिर भी कहा जाता है क्योंकि यह मंदिर गौरव, शांति एवं उत्कृष्ठ वातावरण को ज्योतिर्मय करता है, जो किसी भी श्रद्धालु को आध्यात्मिक रूप से प्रोत्साहित करने के लिए अति आवश्यक है।

इस मंदिर में पर्यटकों को आर्किषत करने के लिए विस्तृत घास के मैदान, सफेद विशाल भवन, ऊँचे गुम्बद वाला प्रार्थनागार और बिना प्रतिमाओं के मंदिर से आकर्षित होकर हजारों लोग यहाँ मात्र दर्शक की भांति नहीं बल्कि प्रार्थना एवं ध्यान करने तथा निर्धारित समय पर होने वाली प्रार्थना सभा में भाग लेने भी आते हैं।

इतना ही नहीं लोग कमल मंदिर के पुस्तकालय में बैठ कर धर्म की किताबें भी पढ़ते हैं और उन पर शोध भी करने आते हैं। कमल मंदिर चारों ओर से नौ बड़े जलाशयों से घिरा है, जो न सिर्फ इसकी सुंदरता को बढाता है बल्कि  इसके प्रार्थनागार को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने में भी महत्वपूर्ण योगदान करते है।

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यह मंदिर मीडिया प्रचार प्रसार और श्रव्य माध्यमों में आगंतुकों को सूचनाएँ प्रदान करता है। सुबह और शाम की लालिमा में सफेद रंग की यह संगमरमरी इमारत अद्भुत लगती है। कमल की पंखुड़ियों की तरह खड़ी इमारत के चारों तरफ लगी घास और हरियाली इस कोलाहल भरे इलाके को शांति और ताज़गी देने वाला बनाती हैं।

इतिहास History

बहाई धर्म उन्नीसवीं सदी के सन् 1844 में स्थापित एक नया धर्म है। जिसकी स्थापना बहाउल्लाह नामक संत ने की थी। बहाउल्लाह का जन्म आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व तेहरान(ईरान) में हुआ था। बहाउल्लाह का शाब्दिक अर्थ है- ‘ईश्वरीय प्रकाश’ या ‘परमात्मा का प्रताप’।

बहाउल्लाह को प्रभु का कार्य करने के कारण तत्कालिक शासक के आदेश से 40 वर्षों तक जेल में असहनीय कष्ट सहने पड़े। जेल में उनके गले में लोहे की मोटी जंजीर डाली गई तथा उन्हें अनेक प्रकार की कठोर यातनायें दी गई थीं। जेल में ही बहाउल्लाह की आत्मा में प्रभु का ज्ञान प्राप्त हुआ, और प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया।

बहाउल्लाह को ज्ञात हुआ कि हम सबके हृदय एक हो जाये, तो सारा संसार स्वर्ग समान बन जायेगा। परिवार में पति-पत्नी, पिता-पुत्र, माता-पिता, भाई-बहन सभी परिवारजनों के हृदय मिलकर एक हो जाये तो परिवार में स्वर्ग उतर आयेगा। इसी प्रकार सारे संसार में सभी के हृदय एक हो जाँये तो सारा संसार स्वर्ग समान बन जायेगा।

बहाउल्लाह ने कहा है कि सब धर्मों का सार मानव मात्र की एकता स्थापित करना है। इसलिए उन्होंने बहाई धर्म की स्थापना की। यह धर्म एकेश्वरवाद और विश्वभर के विभिन्न धर्मों और पंथों की एकमात्र आधारशिला पर ज़ोर देता है। इस धर्म के मुताबिक दुनिया के सभी मानव धर्मों का एक ही मूल है।

इस धर्म के अनुयायी बहाउल्लाह को पूर्व के अवतारों कृष्ण, ईसा मसीह, मुहम्मद, बुद्ध, मूसा आदि की वापसी मानते हैं। बहाउल्लाह को कलिक अवतार के रूप में माना जाता है, जो सम्पूर्ण विश्व को एक करने हेतु आएं है और जिनका सन्देश है ” समस्त पृथ्वी एक देश है और मानवजाति इसकी नागरिक।

बहाई धर्म का सिद्धांत The principle of the Baha’i Faith

बहाई धर्म एक ऐसा धर्म है जिसमे हर व्यक्ति स्वतंत्र है। इस धर्म के अनुयायी जाति, धर्म, भाषा, रंग, वर्ग आदि किसी भी पूर्वाग्रहों को नहीं मानते हैं। बहाई धर्म के अनुयायी सम्पूर्ण विश्व के लगभग 180 देशों में समाज-नवनिर्माण के कार्यों में जुटे हुए हैं।

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बहाई धर्म में धर्मगुरु, पुजारी, मौलवी या पादरी वर्ग नहीं होता है। बहाउल्लाह द्वारा लिखी गई पुस्तक “किताब-ए-अकदस” में इसके सिद्धांतों का विवरण मिलता है।

इस धर्म के प्रमुख सिद्धांत हैं –

● ईश्वर एक है।
● सभी धर्मों का स्रोत एक है।
● विश्व शान्ति एवं विश्व एकता।
● सभी के लिए न्याय।
● स्त्री–पुरुष की समानता।
● सभी के लिये अनिवार्य शिक्षा।
● विज्ञान और धर्म का सामंजस्य।
● गरीबी और धन की अति का समाधान।
● भौतिक समस्याओं का आध्यात्मिक समाधान।

       कमल मंदिर के नाम से विख्यात मंदिर में बहाई धर्म की उपासना की जाती है। कमल मंदिर में हर साल तक़रीबन 4 मिलियन से भी ज्यादा पर्यटक आते हैं और लगभग 10000 लोग रोज़ आते है।

2001 की CNN रिपोर्ट के अनुसार यहाँ दुनिया में सबसे ज्यादा लोग इसे देखने आते है। इस मंदिर के नाम पर यह रिकॉर्ड है कि दुनिया में स्थिति सभी बहाई उपासना मंदिरों में से सबसे ज्यादा पर्यटक इसे देखने आये हैं।

विश्व भर के बहाई उपासना मंदिर Bahá’í Worship Temples around the world

बहाई धर्म जगत में कुल सात जगहों पर बहाई उपासना मंदिर बनाये गये हैं।

  • नई दिल्ली-भारत
  • वेस्टर्न समोआ
  • सिडनी-ऑस्ट्रेलिया
  • कम्पाला-युगान्डा
  • पनामा सिटी-पनामा
  • फ्रेन्क्फर्ट्-जर्मनी
  • विलमेट-अमेरिका
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