माँ पार्वती की कहानी Shiv Mata Parvati Katha in Hindi

माँ पार्वती की कहानी Shiv Mata Parvati Katha in Hindi

दोस्तों आज हम बात करेंगे माता पार्वती की, कि कैसे उन्होंने भगवान शंकर को पाने के लिए घोर तपस्या और कितने ही संघर्ष किए। तब कभी जाकर उन्होंने भगवान शंकर को अपने पति के रूप में प्राप्त किया।

माता पार्वती की कहानी भगवान शंकर से संबंधित है। माता पार्वती शक्ति का अवतार है, साथ ही भगवान कार्तिकेय और भगवान गणेश की माँ और भगवान शंकर की पत्नी भी है। उन्हें देवी माँ भी कहा जाता है। उमा, गौरी भी पार्वती के ही नाम हैं। हम जानेंगे की माता पार्वती की संपूर्ण कहानी, तो शुरू करते है

माता पार्वती पूर्व जन्म में राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं, और उस जन्म में भी वे भगवान शंकर की ही पत्नी थीं। उनका नाम सती था, सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में, अपने पति का अपमान न सह पाने के कारण, स्वयं को योगाग्नि में भस्म कर दिया था। तथा हिमनरेश हिमावन के घर पार्वती बन कर अवतरित हुईं।

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पूर्व जन्म की कथा

राजा दक्ष के अन्य गुण वान पुत्रिया होने के बावजूद वे अपने घर में एक ऐसी पुत्री चाहते थे, जो सर्वगुसंपन्न एवं सब पर विजय प्राप्त करने वाली हो। अत: दक्ष इसी प्रकार की पुत्री की चाहत में तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती आद्या प्रकट हुई और कहा, ‘मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं, और भगवती ने तप करने का कारण पूछा।

दक्ष ने तप करने का कारण बताया तो मां बोली मैं स्वयं पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करूंगी। मेरा नाम सती होगा, और मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी। फलतः कुछ समय पश्चात भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया। सती, दक्ष की सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थीं।

सती ने बाल्यावस्था में ही कई ऐसे अलौकिक आश्चर्य चकित करने वाले कार्य कर दिखाए, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी आश्चर्य होता था। जब सती विवाह योग्य हुई, तो दक्ष को उनके विवाह की चिंता होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, सती आद्या की अवतार हैं। आद्या आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं।

अतः सती के विवाह के लिए भगवान शंकर ही योग्य और उचित वर हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती कैलाश में जाकर भगवान शंकर के साथ रहने लगीं। भगवान शंकर दक्ष के दामाद थे, किंतु किसी वजह से दक्ष के हृदय में भगवान शंकर के प्रति बैर और विरोध भाव पैदा हो गया।

एक बार देव-लोक में ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था। सभी बड़े-बड़े देवता सभा में एकत्र हुए। भगवान शंकर भी इस सभा में बैठे थे। सभा मंडल में दक्ष का आगमन हुआ। दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शंकर खड़े नहीं हुए। उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। राजा दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं, उनके हृदय में भगवान शंकर के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।

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एक बार सती और भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल की ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने उन विमानों को देखकर भगवान शंकर से पूछा, ‘प्रभु, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं? भगवान शंकर ने उत्तर दिया आपके पिता ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया हैं। समस्त देवता और देवियां इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं।’

यह सुनकर सती ने भगवान शंकर से पूछा, क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया?

भगवान शंकर ने उत्तर दिया, आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे?

इस पर सती भगवान शंकर से बोली यज्ञ के इस अवसर पर अवश्य मेरी सभी बहने आएँगी। उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं। यज्ञ में सम्मिलित हो लूंगी और बहनों से भी मिलने का सुअवसर मिलेगा।

भगवान शंकर ने सती से वहां जाने के लिए मना कर दिया और कहा आपके पिता मुझसे बैर रखते हैं हो सकता हैं वे आपका भी अपमान करें। बिना बुलाए किसी के घर जाना उचित नहीं होता हैं।

इस पर सती से भगवान शंकर ने कहा विवाहिता लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि विवाह हो जाने पर लड़की अपने पति की हो जाती हैं। पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता हैं। लेकिन सती पीहर जाने के लिए हठ करती रहीं। अपनी बात बार-बात दोहराती रहीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी साथ में भेज दिया उस गण का नाम वीरभद्र था। सती वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं।

घर में सती से किसी ने भी प्रेम पूर्वक वार्तालाप नहीं किया। राजा दक्ष ने उन्हें देखकर कहा, तुम यहां क्यों आई हो? अपनी बहनों को तो देखो वे किस प्रकार भांति-भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघांबर हैं। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक हैं।

वह तुम्हें बाघांबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता हैं। दक्ष के इस कथन से सती के हृदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीं किया। भगवान शंकर ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता हैं? अब तो आ ही गई हूं।

पिता के कटु और अपमान जनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। वे उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषि-मुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धू-धू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं। यज्ञमंडप में सभी देवताओं के लिए विशेष जगह थी सिवाय भगवान शंकर के।

वे भगवान शंकर का स्थान न देखकर अपने पिता से बोली पिता जी! यज्ञ में तो सबका स्थान दिखाई पड़ रहा हैं किंतु कैलाश पति का नहीं हैं। आपने उनका स्थान क्यों नहीं रखा? दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया मैं तुम्हारे पति शंकर को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला हैं। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन स्थान देगा?

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सती के नेत्र लाल हो उठे। उनका मुख मंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोदिप्त हो उठा। वह बहुत ही क्रोधित हो उठी। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा ओह! मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं मुझे धिक्कार हैं। देवताओं तुम्हें भी धिक्कार हैं! तुम भी उन कैलाश पति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। वे मेरे स्वामी हैं।

नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता हैं। जो नारी अपने पति के लिए अपमान जनक शब्दों को सुनती हैं उसे नरक में जाना पड़ता हैं। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो! मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया हैं। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती। सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा।

तभी यज्ञमंडप में खलबली मच गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए। वीर-भद्र क्रोध से कांप उठे। वे उछ्ल-उछलकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषि-मुनि भाग खड़े हुए। वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक दिया। समाचार भगवान शंकर के कानों में भी पड़ा।

वे प्रचंड आंधी की भांति कनखल जा पहुंचे। सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शंकर अपने आपको भूल गए। सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया। उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त की थी और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते थे। वे सती के प्रेम में खो गए, बेसुध हो गए।

भगवान शंकर ने उन्मत की भांति सती के जले हुए शरीर को कंधे पर रख लिया। वे सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और देवताओं की सांसें भी रुक गई।

सृष्टि व्याकुल हो उठी, सृष्टि के प्राणी त्राहिमाम! त्राहिमाम! पुकारने लगे, भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान विष्णु आगे बढ़े। वे भगवान शंकर की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एक-एक अंग को काट-काट कर गिराने लगे। धरती पर इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे। जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शंकर पुनः अपने आपे में आए। जब वे अपने आपे में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे।

धरती पर जिन इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे थे, वे ही स्थान आज शक्ति पीठ माने जाते हैं। आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती हैं। धन्य है भगवान शंकर और सती का प्रेम। भगवान शंकर और सती के प्रेम ने उन्हें अमर और वंदनीय बना दिया।

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पार्वती के रूप में जन्म :

सती ने भी शरीर का त्याग करते समय संकल्प किया था कि मैं राजा हिमालय के यहां जन्म लेकर भगवान शंकर जी की अर्द्धांगिनी बनूंगी,दूसरे जन्म में माता पार्वती ने हिमनरेश हिमावन (पहाड़ों का स्वामी) तथा मैनावती की पुत्री के रूप में जन्म लिया।

पर्वत राज की पुत्री होने के कारण वे ‘पार्वती’ कहलाईं। पार्वती के जन्म का शुभ समाचार सुनकर देवर्षि नारद हिमनरेश के घर पधारे। हिमनरेश के पूछने पर देवर्षि नारद ने पार्वती के विषय में यह बताया कि तुम्हारी कन्या सर्वगुणसंपन्न है तथा इसका विवाह भगवान शंकर से होगा। किंतु भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिये तुम्हारी पुत्री को घोर तपस्या करनी होगी।

स्वयं हिमनरेश चाहते थे कि उसका विवाह भगवान शंकर के साथ हो। नारद मुनि के मार्गदर्शन के साथ वह तपस्या करने के लिए तैयार हो गयी, ताकि वह भगवान शंकर से शादी कर सके। माता पार्वती भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिये वन में तपस्या करने चली गईं। अनेक वर्षों तक कठोर तपस्या करने के पश्चाय्त अंत में भगवान शंकर पार्वती की भक्ति की परीक्षा लेते है

भगवान शंकर ने पार्वती के अपने प्रति प्रेम की परीक्षा लेने के लिये सप्तऋषियों को माता पार्वती के पास भेजा। उन्होंने माता पार्वती के पास जाकर उन्हें यह समझाने के अनेक प्रयत्न किये कि भगवान शंकर औघड़, अमंगल वेषधारी और जटाधारी हैं और वे तुम्हारे लिये उपयुक्त वर नहीं हैं। उनके साथ विवाह करके तुम्हें सुख की प्राप्ति नहीं होगी। तुम उनका ध्यान छोड़ दो।

किंतु पार्वती अपने विचारों में दृढ़ रहीं। उनकी दृढ़ता को देखकर सप्तऋषि अत्यंत प्रसन्न हुये और उन्हें सफल मनोरथ होने का आशीर्वाद देकर भगवान शंकर के पास वापस आ गये। सप्तऋषियों से पार्वती के अपने प्रति दृढ़ प्रेम की बातें सुन कर भगवान शंकर अत्यंत प्रसन्न हुये।

वे दूसरे रूप में आते है और भगवान शंकर की बुराई करने लगते है पर वह फिर भी माँ पार्वती का फैसला बदल नहीं पाते है। भगवान शंकर माँ पार्वती की भक्ति से खुश होते है और उन्हें अपने जीवन साथी के रूप में स्वीकार करते है ।

निश्चित दिन भगवान शंकर बारात लेकर हिमालय के घर आये। वे बैल पर सवार थे। उनके एक हाथ में त्रिशूल और एक हाथ में डमरू था। उनकी बारात में समस्त देवताओं के साथ उनके गण भूत, प्रेत, पिशाच आदि भी थे। सारे बाराती नाच गा रहे थे।

सारे संसार को प्रसन्न करने वाली भगवान शंकर की बारात अत्यंत मन मोहक थी। इस तरह शुभ घड़ी और शुभ मुहूर्त में शिव जी और पार्वती का विवाह हो गया और पार्वती को साथ ले कर शिव जी अपने धाम कैलाश पर्वत पर सुख पूर्वक रहने लगे। बाद में इनके दो पुत्र कार्तिकेय तथा गणेश हुए। कई पुराणों में इनकी पुत्री अशोक सुंदरी का भी वर्णन है।

दोस्तों यह थी भगवान शंकर एवं माता पार्वती की कहानी, की कैसे माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त किया, और उनके लिए कितने व्रत रखे। आज यदि देखा जाए तो हमारी माताएं बहनों द्वारा रखे जाने वाले व्रत माता पार्वती ने ही शुरू किए थे।

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