पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जीवनी Pandit Deendayal Upadhyay Biography in Hindi

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जीवनी Pandit Deendayal Upadhyay Biography in Hindi

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी भारत राष्ट्र के सच्चे और प्रहरी राष्ट्रभक्त थे और ये अपनी बातों से भारतियों को प्रेरणा देते थे। राष्ट्र की सेवा के लिए उपाध्याय जी हमेशा तत्पर रहते थे। उनका केवल एक ही उद्देश्य था कि वो अपने वतन की समाजिक, राजनितिक, आर्थिक और शिक्षा के क्षेत्र को ऊचाईयों तक ले जा सके अपने देश का नाम रोशन कर सके।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जीवनी Pandit Deendayal Upadhyay Biography in Hindi

प्राम्भिक जीवन (EARLY LIFE)

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी  चिन्तक और संगठनवादी थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म माध्यम परिवार में 24 सितम्बर 1916 ई०  में उत्तर प्रदेश के पवित्र ब्रजभूमि मथुरा के नगला चंद्रभान नमक गावं में हुआ था।

इनके पिता का नाम भगवती प्रसाद और इनकी माता का नाम रामप्यारी था। इनके पिता रेलवे में में सहायक स्टेशन मास्टर थे। इनकी माता बहुत ही धार्मिक थी। रेलवे की नौकरी के कारण इनके पिता घर से दूर ही रहते थे।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का एक छोटा भाई भी था उसका नाम शिवदयाल था। इनकी ढाई साल की उम्र में ही इनके पिता भगवती प्रसाद का देहांत हो गया। और जिसके कारण इनकी माँ भी बीमार रहने लगी। धीरे-धीरे समय बीता और 8 अगस्त 1924 सात साल की उम्र में इनकी माता का भी निधन हो गया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी  माता और पिता के प्यार से 7 साल की उम्र में ही वंचित हो गये।

इसके बाद इनका पालन पोषण इनकी नाना के यहाँ होने लगा। इनके नाना भी राजस्थान के रेलवे मास्टर थे। जब इनकी उम्र 10 साल की हुई तो इनके नाना का भी देहांत हो गया।  इसके बाद ये अपने मामा के घर चले गये।

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छोटी सी ही उम्र में खुद के साथ साथ इनके छोटे भाई की जिम्मेदारी इनके कंधो पर आ गया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी बहुत ही बहादुर और सहनशील थे क्योकि अगर इनकी जगह पर कोई और होता तो, वो अपने घुटने टेक देता लेकिन इन्होने ऐसा नही किया और कभी हार नही मानी और आगे बढ़ते रहे।

शिक्षा- दीक्षा (Education)

उपाध्याय जी  बचपन से ही बुद्धिमान और मेहनती थे। हाई स्कूल की शिक्षा प्राप्त करने के लिए इन्होने राजस्थान के सीकर नामक स्कूल में दाखिला लिया। वहां हाई स्कूल में टॉप किया। हाई स्कूल में टॉप करने के लिए उपाध्याय जी को महाराजा कल्याण सिंह के द्वारा गोल्ड मेंडल से सम्मानित किया गया। और उसके साथ 10 रुपये प्रति महीने की छात्रवृति और 250 रुपये किताबो के लिए मिला था।

इन्होने अपनी इंटर की शिक्षा बिरला कॉलेज पिलानी और ग्रेजुएशन की पढाई कानपुर में किया। उपाध्याय जी और पढना चाहते थे इसीलिए उन्होंने आगरा के सेंट जॉन्स कॉलेज में M.A दाखिला लिया। वहां इन्होने अंग्रेजी साहित्य की पढाई शुरू की।  हमेशा की तरह इन्होने पहले वर्ष की परीक्षा में प्रथम श्रेणी से पास हुए लेकिन अचानक इनकी ममेरी बहन की तबियत ख़राब होने के कारण इनकी पढाई पूरी न हो सकी।

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इसके बाद अपने मामा के कहने से इन्होने प्रशासनिक को पास कर लिया, लेकिन उसमे अभिरुचि न होने के कारण इन्होने अपनी नौकरी छोड़ दी एल. टी. की पढाई करने के लिए ये इलाहाबाद चले आये।

सन 1942 में इन्होने अपनी एल. टी. की पढ़ी पूरी की और अपना जीवन बिधार्थियों को सौप दिया। पंडित जी स्वाध्याय पर बहुत जोर डालते थे उनका मानना था की पठन- पाठन और चिंतन- मनन से मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

समाज सेवा (Social service)

कानपूर में बी. ए. की पढाई के साथ साथ इन्होने अपने दोस्त सुन्दर सिंह और बालूजी महाशब्दे के साथ मिलकर समाज सेवा का काम शुरू किया। उसी समाय ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RRS) के संस्थापक डा।

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हेडगेवार और संघ कार्यकर्ता भाऊराव के साथ समाज सेवा का शुरू किया। कुछ दिनों तक इनके साथ काम करने से संघ के द्वारा इनको RSS के 40 दिवसीय नागपुर के सिविर का हिस्सा बन गये।

पत्रकारिता और लेखन (Journalism & Writing)

श्री भाऊराव देवरस से प्रभावित होकर इन्होने लखनऊ में राष्ट्रधर्म प्रकाशन स्थापित की जिसके अंतर्गत मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म प्रकाशित होने लगी। और इसके बाद पांचजन्य और स्वदेश दैनिक समाचार भी यहीं से प्रकाशित हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य हिन्दू विचारधारा को बढ़ावा देना था।

पंडित दीनदयाल जी एक अच्छे साहित्यकार एवं लेखक भी थे। अपनी विचारधारा को युवाओं तक पहुचने के लिए सन 1946 में इन्होने एक पूरी रात जग कर “सम्राट चन्द्रगुप्त’’ नाम से एक उपन्यास लिख डाला। इस उपन्यास को लोगो ने बहुत पसंद किया और इसके चलते इन्होने “गुरु शंकराचार्य” के नाम से दूसरा उपन्यास लिखा।

इसके बाद इन्होने उपन्यास लिखने छोड़ दिया और अपने विचारों को कई लेखो के द्वारा सबके सामने रखते थे उनमे से प्रमुख  – अखंड भारत क्यों? , राष्ट्र जीवन की दशा, राष्ट्र चिंतन जैसे लेख लिखे।

राजनितिक जीवन (Political life)

अपने जीवन में अभूत से सफलता पाने के बाद इन्होने अपने आप को देश की सेवा में लगा दिया और राजनीति में आ गये। अखिल भारतीय जनसंघ के निर्माण होने पर इनको सन 1951 में संगठन मंत्री बनाये गए और 2 सालो के बाद इनको अखिल भारतीय जनसंघ का महामंत्री बना दिया गया।  उपाध्याय जी ने इसी पद पर लगभग 15 वर्षो तक कार्य करते रहे, और देश की सेवा करते रहे।

उपाध्याय जी के विचार (Thought of Upadhayay)

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी एक महान विचारक और चिंतक थे। पंडित जी ने भारत की सल्तनत की विचारधारा को युगानुकूल रूप में देश को एकात्म मानव दर्शन जैसे प्रगतिशील विचारधारा दी है।

इन्होने अपनी पुस्तक एकात्म मानववाद में साम्यवाद और पूंजीवाद की समालोचना की है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का मनना है की हिन्दू कोई धर्म या साम्प्रदा नही बल्कि भारत की संस्कृति है।

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देहांत ( Death)

11 फ़रवरी 1968 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की रेल यात्रा के दौरन रहस्यमयी तरीके से मुगलसराय  के पास इनकी हत्या कर दी गई। मुगलसराय के रेलवे यार्ड में इनकी लाश मिलने पर पुरे देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी।

अपने प्रिये नेता को खोने के बाद  अखिल भारतीय जनसंघ के कार्यकर्त्ता और नेता अनाथ हो गये। लेकिन आज भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी जैसे लोग हमारे समाज में हमेशा अमर रहेंगे।

Featured Image Source – www.bjp.org

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