सरोजिनी नायडू जी जीवनी Biography of Sarojini Naidu in Hindi

इस लेख में आप सरोजिनी नायडू जी जीवनी Biography of Sarojini Naidu in Hindi पढ़ेंगे। इसमें उनके जन्म व प्रारम्भिक जीवन, शिक्षा, साहित्यिक जीवन, स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान, महिला सशक्तिकरण में योगदान, और मृत्यु से जुड़ी जानकारियाँ दी गई है।

सरोजिनी नायडू जी जीवनी Biography of Sarojini Naidu in Hindi

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देने वाली कुछ शक्तिशाली महिलाओं में से एक थीं, सरोजिनी नायडू। देश सेवा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देने वाली सरोजनी नायडू भारतीयों के लिए एक आदर्श चेहरा मानी जाती हैं। 

इतिहास की महान कवित्री और स्वतंत्रता संग्राम की नायिका सरोजिनी नायडू ने महिलाओं के लिए अपनी आवाज बुलंद की थी, जिसके कारण सरोजिनी नायडू के जन्मदिन के अवसर पर पूरे भारत में राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है।

कई इतिहासकार सरोजिनी नायडू को भारत की सबसे कुशल और जीवित कवित्री कहते हैं। वे एक सामाजिक कार्यकर्ता के साथ एक साहित्यकार भी थी। उन्हें Nightingale of India के नाम से भी जाना जाता है

अंग्रेजों से संघर्ष करने के अलावा उन्होंने देश में फैले रूढ़ीवादी विचारधाराओं को बहुत हद तक कम किया था। काफी छोटी उम्र में सरोजिनी नायडू ने कई कविताओं का संग्रह किया था, जिसके पश्चात उन्हें पूरे हिंदुस्तान में एक अलग पहचान मिली।

सरोजिनी नायडू का जन्म और प्रारंभिक जीवन Birth and early life of Sarojini Naidu in Hindi

सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी सन 1879 में हैदराबाद में हुआ था। वह एक बंगाली ब्राम्हण परिवार से ताल्लुक रखती थी।

उनके पिता का नाम अघोरनाथ चट्टोपाध्याय था, जो एक नामी शिक्षाशास्त्री थे। तथा हैदराबाद कॉलेज के प्रिंसिपल भी थे, जो कुछ समय बाद निजाम कॉलेज के नाम से जाना जाने लगा। 

सरोजिनी नायडू के पिता ने एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से विज्ञान विषय में डॉक्टरेट का सम्मान प्राप्त किया था। उनकी माता का नाम वारद सुंदरी देवी था, जो पेशे से एक कवित्री थी और बंगाली भाषा में अपनी कविताएं लिखती थी। 

उनके परिवार में कुल 8 भाई-बहन थे, जिनमें सरोजनी नायडू सबसे बड़ी थी। उनके भाई वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय क्रांतिकारी थे और अन्य एक भाई हरिंद्रनाथ एक प्रख्यात अभिनेता और कवि थे।

पूरे हैदराबाद में सरोजिनी नायडू का परिवार साहित्य के लिए प्रसिद्ध था, जिसके कारण हैदराबाद के निजाम विशेषकर कोई भी कार्यक्रम होने पर उनके परिवार को जरूर आमंत्रित करते थे। 

हालांकि ब्रिटिश हुकूमत के समय भारतीयों का साहित्य कला में कैरियर बनाना एक बड़ा ही जोखिम भरा पेशा माना जाता था। लेकिन फिर भी सरोजिनी नायडू और उनके परिवार वाले अपने पेशे को कभी भी नहीं भूले।

सरोजिनी नायडू को कविताएं लिखने में बेहद रूचि थी, जो कला उन्हें अपनी माता से विरासत में प्राप्त हुई थी। 

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सरोजिनी नायडू की शिक्षा Sarojini Naidu’s Education in Hindi

सरोजिनी नायडू बचपन से ही एक बेहद होनहार और जिज्ञासु विद्यार्थी थी। उन्होंने बेहद छोटी उम्र में ही इंग्लिश, बंगाली, तेलुगू, गुजराती और उर्दू जैसे कुछ अन्य भाषाओं पर अपनी पकड़ बना ली थी। 

अपनी मात्र भाषा बंगाली और हिंदी में वे बेहद अच्छी थी। 12 वर्ष की छोटी उम्र में सरोजिनी नायडू ने मैट्रिक्स की परीक्षा मद्रास विश्वविद्यालय से पूरी की। इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी कक्षा की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के पश्चात वे पूरे देश में प्रसिद्ध हो गई थी।

बचपन से ही सरोजनी नायडू कवित्री बनना चाहती थी, जिसके लिए उन्होंने कई कविताएं लिखी थी, लेकिन उनके पिता एक वैज्ञानिक अथवा गणितज्ञ के रूप में सरोजनी नायडू को देखना चाहते थे। 

किन्तु सरोजिनी नायडू के पिता तब आश्चर्यचकित रह गए, जब छोटी उम्र में सरोजिनी ने 1300 लाइन ‘The Lady of the Lake’ कविता लिख डाली। 

उन्होंने इसे हैदराबाद के निजाम को भी दिखाया जिसके पश्चात निजाम बहुत खुश हुए और सरोजिनी नायडू को स्कॉलरशिप देकर विदेश में पढ़ाई करने का अवसर दिया। इसके पश्चात लंदन में स्थित किंग कॉलेज और बाद में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के रिटर्न कॉलेज से अपनी पढ़ाई की। 

सरोजिनी नायडू का साहित्यिक जीवन Literary Life of Sarojini Naidu

सरोजिनी नायडू ने कविताएं लिखने की शुरुआत मात्र 12 वर्ष में ही कर दिया था। उनके द्वारा फारसी भाषा में लिखे गए एक नाटक माहेर मुनीर ने हैदराबाद के निजाम को बहुत खुश किया। 

इसके पश्चात उन्हें स्कॉलरशिप पर विदेश में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ। उनकी कविताओं में राष्ट्रवादी विचारधारा, नारी शक्ति, प्रेम और वीर रस का विवरण मिलता है।  

भारतीय साहित्यकारों के जीवंत रचनाओं में से एक सरोजिनी नायडू की कविताएं भी होती हैं। सरोजिनी नायडू अंग्रेजी भाषा में भी कई ब्रिटिश स्वच्छंदतावाद में कविताएं लिखती थी। 

देश-विदेश में सरोजनी नायडू अपने अनोखे रचनाओं के लिए जानी जाती हैं, जिन्हें पहले एक कवि के रूप में इंडियन येट्स बुलाया जाता था।

1905 में लंदन में ‘द गोल्डन थ्रेसोल्ड’ नामक सरोजिनी नायडू की कविताओं की पहली पुस्तक प्रकाशित हुई। 1912 में ‘द बर्ड ऑफ टाइम’ नामक कविता संग्रह में उनकी राष्ट्रवादी विचारधारा देखने को मिलती है। 

इस पुस्तक में ‘इन द बाजार ऑफ हैदराबाद‘ नामक रचना भी शामिल थी, जो न्यूयॉर्क और लंदन में बहुत प्रसिद्ध हुई थी।

ब्रिटिश काल में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार का विरोध करने के लिए सरोजिनी नायडू ने कई कविताएं लिखी थी। 1917 में मोहम्मद अली जिन्ना से संबंधित ‘द ब्रोकन विंग’ नामक कविताओं की पुस्तक को  लिखा। 

यह सरोजिनी नायडू के जीवन काल की अंतिम नवीन प्रकाशित की गई रचना मानी जाती है। सरोजिनी नायडू की कविताओं में बेहद गहरे अर्थ छुपे होते हैं, जिन्हें पढ़कर हर कोई उत्साह से भर जाता है। 

उस समय जब भारतीयों को साहित्य में कुछ अनोखा करने की इजाजत नहीं थी, तब भी सरोजिनी नायडू ने अपनी रचनाओं से पूरी दुनिया में धूम मचा दी थी। 

यह तो कुछ सर्वाधिक प्रसिद्ध सरोजिनी नायडू द्वारा रचित साहित्य थे, लेकिन इनके अलावा उन्होंने अपने जीवन काल में हजारों कविताएं लिखी थी, जो देश विदेश में बेहद प्रसिद्ध हुए थे।

सरोजिनी नायडू का विवाह व निजी जीवन Sarojini Naidu marriage and personal life in Hindi

सरोजिनी जी 19 वर्ष की उम्र में जब 1898 में अपनी शिक्षा पूरी कर हैदराबाद वापस लौटी, तब उन्होंने अपने इच्छा से गोविंदराजुलू नायडू, जो कि पेशे से एक सामान्य चिकित्सक थे उनसे विवाह कर लिया। पहले के समय में दूसरे जाति में विवाह करने को समाज वाले बहुत बुरा मानते थे। 

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समाज ने सरोजिनी नायडू के विवाह की भी निंदा की, लेकिन उनके पिता ने अपनी पुत्री की इच्छाओं का मान रखते हुए राजी खुशी से उनका विवाह गोविंदराजुलू नायडू से कर दिया। 

शादी के कुछ सालों बाद उनके 4 बच्चे हुए जो आगे चलकर भारत की स्वतंत्रता में भागीदार बने और बड़े-बड़े सरकारी पदों पर अपनी सेवाएं भी प्रदान किए।

सरोजिनी नायडू का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान Contribution of Sarojini Naidu in Freedom Movement in Hindi

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से सरोजिनी नायडू की पहली मुलाकात 1914 में इंग्लैंड में हुई थी। गांधी जी से मिलने के पश्चात सरोजिनी नायडू उनके विचारधारा से बेहद प्रभावित हुई इसके बाद उन्होंने अपना आगे का जीवन स्वतंत्रता की लड़ाई में लगाने का निश्चय कर लिया। 

उन्होंने देश की लड़ाई में अग्रिम सेनापति के रूप में अपना दायित्व भली-भांति निभाया। अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह में सरोजिनी नायडू को कई बार जेल भी जाना पड़ा।

गुलामी के समय भारतीयों की सोई हुई चेतना को जगाने के लिए सरोजनी नायडू ने घर घर जाकर उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में जुड़ने के लिए प्रेरित किया। अंग्रेजों की चमचागिरी करने वाले भारतीयों की चेतना को झकझोर कर उन्होंने देश के लिए उनके कर्तव्यों को याद  दिलाया।

कहा जाता है कि जब सरोजनी नायडू हजारों की भीड़ में अपना भाषण देती थी, तो हर कोई उनके वक्तव्य से आश्चर्यचकित रह जाता था। बहुभाषाविद और निडर होकर सरोजिनी नायडू एक वीरांगना की भांति स्वतन्त्रता संग्राम में संघर्ष कर रही थी।

1904 का समय आते आते सरोजिनी नायडू भारतीय स्वतंत्रता और नारी शक्ति के लिए संघर्ष करने वाली सबसे लोकप्रिय वक्ता के रूप में उभरी। 

1919 में हुए जलियाँवाला बाग हत्याकांड के कारण सरोजनी नायडू ने 1911 में मिले ‘कैसर ए हिंद‘ पदक को वापस कर दिया। क्रांतिकारियों के कदम से कदम मिलाने वाली यह वीरांगना ने अपना जीवन देश को समर्पित कर दिया। 

कहा जाता है कि महात्मा गांधी खुद सरोजिनी नायडू से इतने प्रभावित हुए थे, कि उन्होंने श्रीमती सरोजिनी जी को ‘भारत कोकिला‘ की उपाधि दिए थे। 

धीरे धीरे सरोजिनी नायडू को पूरे देश में एक अलग पहचान मिली जिसके पश्चात उनके निष्ठा और कर्तव्य पालन को देखते हुए उन्हें आगे चलकर कांग्रेस की तरफ से कई राजनीतिक पद भी प्राप्त हुए। 

भारत के स्वतंत्रता में साथ देने वाली विदेशी महिला एनी बेसेंट, सरोजिनी नायडू की बेहद खास मित्र थी। दिन-ब-दिन लोकप्रियता बढ़ने के कारण कानपुर में कांग्रेस अधिवेशन में वे अध्यक्ष बनाई गई। 

इसके पश्चात भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने विदेशी दौरा भी किया। गांधी जी की सबसे प्रिय शिष्या और देश की बेटी सरोजनी नायडू उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल नियुक्त की गई। 

सरोजिनी नायडू का महिला सशक्तिकरण में योगदान Sarojini Naidu’s Contribution to Women Empowerment in Hindi

भारत में महिलाओं की शिक्षा और कई मूलभूत अधिकारों को बढ़ावा देने में सरोजिनी नायडू की भूमिका सबसे अहम है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजो के खिलाफ किए जा रहे आंदोलनों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की भागीदारी बेहद कम थी। 

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लेकिन सरोजिनी नायडू ने महिलाओं को उनके अधिकारों से परिचित करवाया और 1917 में कुछ सहयोगियों की मदद से ‘महिला भारतीय संघ‘ की स्थापना की। इतिहास की सबसे प्रभावशाली भारतीय महिला सरोजिनी नायडू हर एक भारतीय के  ह्रदय में निवास करती हैं।

महिलाओं के समान अधिकार के लिए सरोजनी नायडू ने कई अभियान चलाए थे। अपने एक भाषण में सरोजनी नायडू ने देशवासियों को संबोधित करते हुए महिलाओं के विषय में कहा था, कि-

जब आपको अपने मातृभूमि का तिरंगा उठाने में किसी की सहायता चाहिए होगी और जब अपने मात्र वतन के लिए आपको मरना भी पड़े, तो जरा भी चिंता मत करिएगा क्योंकि हिंदुस्तान की नारियों में चित्तौड़ की पद्मिनी के समान ही वह शक्ति समाहित है, जो राष्ट्र के लिए अपने प्राण निछावर कर दें।

सरोजिनी नायडू द्वारा लिखी गई कई कविताओं में महिलाओं के अधिकारों और उन पर किए जाने वाले अत्याचारों को प्रदर्शित किया है। वास्तव में महान है वह अमर वीरांगना जिन्होंने देश को महिलाओं के अहमियत को समझाया और समाज में नारी शक्ति के लिए कड़े प्रयास किए हैं।

स्वतंत्र भारत की पहली महिला राज्यपाल First Woman Governor of Independent India in Hindi

लंबे समय तक चले आजादी की लड़ाई में अनेकों क्रांतिकारियों ने अपने राष्ट्रप्रेम को प्रदर्शित किया। जब भारत अंग्रेजों से आजाद हुआ तब जाकर देश में भारतीय सरकार का गठन किया गया, जिनमें ऐसे कई महान लोगों को विभिन्न पद दिए गए, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया था। 

सरोजनी नायडू जी भी उन्हीं बलिदानों में से एक थीं, जिन्होंने देश को स्वतंत्र कराने में श्रेष्ठ योगदान दिया था। गांधी जी सहित पूरा भारत जिनके कविताओं का कायल था, उनके ज्ञान और नेतृत्व को देखते हुए श्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा सरोजनी नायडू को उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल का पद प्रदान किया गया। 

उत्तर प्रदेश जैसी बड़ी आबादी और विस्तृत राज्य का राज्यपाल बनाए जाने के लिए उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था, कि यह कार्यभार मिलने से मैं स्वयं को जंगल के उस पक्षी जैसा महसूस कर रही हूं, जिसे पिंजरे में कैद कर दिया गया हो। 

सरोजिनी नायडू राजनीति में नहीं आना चाहती थी, लेकिन जवाहरलाल नेहरू के लिए वह बहुत सम्मान की भावना रखती थी जिसके कारण वे उनकी बातों को टाल ना सकी और उन्होंने राज्यपाल का पद स्वीकार किया।

सरोजिनी नायडू की मृत्यु Sarojini Naidu Death in Hindi

सरोजिनी नायडू जब अपने नई दिल्ली के दौरे से 15 फरवरी के दिन वापस लौटी थी, तभी से उनका स्वास्थ्य बहुत खराब चलने लगा। कई दिनों तक सिर में गंभीर दर्द के कारण डॉक्टर ने उन्हें आराम करने की सलाह दी जिसके पश्चात कुछ समय के लिए उनके सभी अधिकारी कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया। 

लखनऊ में सरोजिनी नायडू के सरकारी भवन में 2 मार्च 1949 के दिन हृदय की गति थमने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। 

भारत के लिए अपना पूरा जीवन बलिदान कर देने वाली सरोजिनी नायडू के आकस्मिक निधन से पूरा भारत निराश था। सरोजिनी नायडू के सम्मान में उनकी जयंती के दिन पूरे भारत में 13 फरवरी को राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है।

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