शरद पूर्णिमा व्रत कथा, पूजा विधि, महत्व Sharad Purnima celebration, history, story in Hindi

शरद पूर्णिमा व्रत कथा, पूजा विधि, महत्व Sharad Purnima celebration, history, story in Hindi

भारत देश त्योहारों का देश माना जाता है, और यहाँ त्यौहार बड़ी ही धूमधाम से मनाये जाते है, सितम्बर महीने से शुरू होने वाले त्यौहार साल के अंत तक चलते है, त्योहारों का शुभारम्भ गणेश चतुर्थी से होता है, और अक्टूबर आते- आते यह अपनी पराकाष्ठा पर होता है, इन महीनों में जैसे नवरात्रि, दुर्गापूजन, दशहरा और दीवाली मनाई जाती है एवं इसी बीच में शरद पूर्णिमा का त्यौहार मनाया जाता है। 

शरद पूर्णिमा हिंदू कैलेंडर के हिसाब से आश्विन महीने में मनाई जाती है। यह मानसून के अंत का एक प्रतीक होता है। हर साल अलग-अलग तिथियों पर यह त्यौहार मनाया जाता है, अलग अलग राज्यों में इसको कुमार पूर्णिमा, कोजागिरी पूर्णिमा और कौमुदी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।

शरद पूर्णिमा का महत्व

चंद्रमा विज्ञान के लिए धरती का एकमात्र उपग्रह और मान्यताओं में अमृत वर्षा करने वाला देवता कहा जाता है । ग्रंथों के मुताबिक, शरद पूर्णिमा की रात में आकाश से अमृत बरसता है।

विश्वास के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ बाहर आता है, और इसकी किरणों में विभिन्न प्रकार का पोषक तत्व ही नहीं बल्कि रोगों को ठीक करने की विशेषता भी पाई जाती हैं, हिंदू धर्म के अनुसार मनुष्य की कुछ कलाएं अलग-अलग योग्यता को उजागर करती है, और कहा जाता है कि 16 कलाएं ही मिलकर एक परफेक्ट इंसान को बनाती हैं।

भगवान कृष्ण जिनको भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, ऐसा विश्वास है कि यह सोलह कलाओं के साथ ही पैदा हुए थे। इस दिन मां लक्ष्मी “जो धन की देवी है” उनका जन्म दिवस भी मनाया जाता है। इसी वजह से देश के कई हिस्सों में इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है, जिसे कोजागिरी लक्ष्मी पूजा के नाम से जाना जाता है।

ऐसा मानते हैं कि इस दिन देवी लक्ष्मी अपनी सवारी उल्लू पर बैठकर भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी का भ्रमण करने आती हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं, इस दिन वह अपने भक्तों के घरों से निर्धनता को हमेशा हमेशा के लिए दूर कर देती हैं।

शरद पूर्णिमा की चांदनी रात में जो भगवान विष्णु सहित देवी लक्ष्मी और उनके वाहन की पूजा करते हैं, उनकी मनोकामना अवश्य ही पूरी होती है। शरद पूर्णिमा की रात्रि में जागने की परंपरा भी है। यह पूर्णिमा जागृति पूर्णिमा के नाम से भी जानी जाती है।

रात्रि जागरण की कथा 

इस दिन रात्रि जागरण भी किया जाता है, इसके पीछे एक कहानी भी है “एक बार एक राजा भारी वित्तीय समस्या से घिर गया, काफी परेशान हो जाने पर, उसकी रानी ने उसकी मदद करने के उद्देश्य से शरद पूर्णिमा के व्रत की विधि और नियमों को जाना और व्रत रखा साथ ही महालक्ष्मी का रात भर जागरण करके पूजा भी की भी। फलस्वरूप इससे प्रसन्न होकर माँ लक्ष्मी ने इन पर कृपा की और यह राजा फिर से संपन्न हो गया।

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कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा पर देवी लक्ष्मी सवाहन घूमती हैं और ये देखती है कि कौन जग रहा है और जो जग रहा होता है उसे धन-वैभव का आशीर्वाद मिलता है। कुबेर की पूजा इसलिए की जाती है कि क्योंकि ये धन के देवता माने गए हैं।

भारत के कुछ हिस्सों में शरद पूर्णिमा को कुमार पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन कुंवारी लड़कियाँ सुयोग्य वर के लिए भगवान कार्तिकेय की पूजा करती हैं। इस दिन लड़कियाँ सुबह उठकर स्नान करने के बाद सूर्य को भोग लगाती हैं और दिन भर व्रत रखती हैं। शाम के समय चंद्रमा की पूजा करने के बाद अपना व्रत खोलती हैं। कुछ स्थानों पर लोग सीधे चंद्रमा को ना देखकर, बर्तन में गर्म दूध को रखकर उसके चंद्रमा का प्रतिबिम्ब बर्तन से देखते है।

रोगियों के लिए वरदान हैं शरद पूर्णिमा की रात

इस दिन चंद्रमा परिक्रमा करते हुए पृथ्वी के समीप आ जाता है, मान्यता है कि इस दिन आसमान से अमृत बरसता है, चांद की रोशनी में औषधीय गुण होते हैं, जिसमें कई असाध्य रोगों को दूर करने की क्षमता होती है।

शरद पूर्णिमा की रात दमा रोगियों के लिए वरदान साबित होती है। इस रात्रि में दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर उसे चांदनी रात में रखकर प्रात: सेवन किया जाता है। खीर को चाँदी के पात्र में रखना चाहिए क्योंकि चांदी में प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। कहा जाता है लंकाधिपति रावण शरद पूर्णिमा की किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि में ग्रहण करता था। इस प्रक्रिया से उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी। और वह दिन प्रतिदिन बलशाली प्रतापी होता जाता था।

अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान बताया है । यह परंपरा विज्ञान पर आधारित है।

मान्यता के अनुसार इस दिन चंद्रमा अमृत के रूप में अपनी किरण पृथ्वी पर भेजता है, इसलिए मनुष्य इस दिन चावल की खीर बनाकर रात भर छोड़ देता है, कहा जाता है कि यह सुबह तक अमृतमय हो जाता है और इसे सुबह प्रसाद के रूप में बांट दी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। इसके लिए रात्रि 10 से 12 बजे तक का समय उपयुक्त रहता है।

इस दिन चांद की रोशनी का महत्व क्यों?

विशेषज्ञों के अनुसार शरद पूर्णिमा की शुरुआत ही वर्षा ऋतु के अंत में होती है। इस दिन चाँद धरती के सबसे करीब होता है, रोशनी सबसे ज्यादा होने के कारण इनका असर भी अधिक होता है। इस दौरान चाँद की किरणें जब खीर पर पड़ती हैं तो उस पर भी इसका असर होता है। इसे चलनी से ढँकना चाहिए एवं खीर में जैसे दाल चीनी, काली मिर्च, घिसा हुआ नारियल, किशमिश, छुहारा आदि होना जरूरी है। रात भर इसे चांदनी में रखने से इसकी तासीर बदलती है और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।

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रात भर चांदनी में रखी हुई खीर शरीर और मन को ठंडा रखती है। ग्रीष्म ऋतु की गर्मी को शांत करती और शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाती है। श्वास के रोगियों को इससे फायदा होता है साथ ही आंखों रोशनी भी बेहतर होती है।

चाँद की रोशनी में कई रोगों का इलाज करने की ख़ासियत होती है। चंद्रमा की रोशनी इंसान के पित्त दोष को कम करती है। एक्जिमा, गुस्सा, हाई बीपी, सूजन और शरीर से दुर्गंध जैसी समस्या होने पर चाँद की रोशनी का सकारात्मक असर होता है। सुबह की सूरज की किरणें और चाँद की रोशनी शरीर पर सकारात्मक असर छोड़ती हैं।

शरद पूर्णिमा की कथा

एक बार मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा को प्राप्त करने के लिए एक साहूकार की दोनों पुत्रियों ने शरद पूर्णिमा को व्रत रखना आरंभ किया। इन दोनों पुत्रियों में बड़ी पुत्री पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि-विधान से और पूरा व्रत करती थी।

वहीं छोटी बेटी व्रत तो करती थी लेकिन नियमों को आडंबर मानकर उनकी अनदेखी करती थी। विवाह योग्य होने पर साहूकार ने अपनी दोनों पुत्रियों का विवाह कर दिया। बड़ी पुत्री के घर समय पर स्वस्थ संतान का जन्म हुआ। संतान का जन्म छोटी पुत्री के घर भी हुआ, लेकिन उसकी संतान पैदा होते ही दम तोड़ देती थी।

कई बार ऐसा होने पर उसने एक ब्राह्मण को बुलाकर अपनी व्यथा सुनाई और धार्मिक उपाय पूछा। उसकी सारी बात सुनकर और कुछ प्रश्न पूछने के बाद ब्राह्मण ने उससे कहा कि तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती हो, इस कारण तुम्हारा व्रत फलित नहीं होता और तुम्हें अधूरे व्रत का दोष लगता है।

ब्राह्मण की बात सुनकर छोटी पुत्री ने पूर्णिमा व्रत पूरे विधि-विधान से करने का निर्णय लिया। लेकिन पूर्णिमा आने से पहले ही उसने एक बेटे को जन्म दिया। जन्म लेते ही बेटे की मृत्यु हो गई। इस पर उसने अपने बेटे के शव को एक पीढ़े पर रख दिया और ऊपर से एक कपड़ा इस तरह ढक दिया कि किसी को पता न चले।

फिर उसने अपनी बड़ी बहन को बुलाया और बैठने के लिए उसे वही पीढ़ा दे दिया। जैसे ही बड़ी बहन उस पीढ़े पर बैठने लगी, उसके लहंगे की किनारी बच्चे को छू गई और वह जीवित होकर तुरंत रोने लगा। इस पर बड़ी बहन पहले तो डर गई और फिर छोटी बहन पर क्रोधित होकर उसे डांटने लगी कि क्या तुम मुझ पर बच्चे की हत्या का दोष और कलंक लगाना चाहती हो! मेरे बैठने से यह बच्चा मर जाता तो?

इस पर छोटी बहन ने उत्तर दिया, यह बच्चा मरा हुआ तो पहले से ही था। दीदी, तुम्हारे तप और स्पर्श के कारण तो यह जीवित हो गया है। पूर्णिमा के दिन जो तुम व्रत और तप करती हो, उसके कारण तुम दिव्य तेज से परिपूर्ण और पवित्र हो गई हो। अब मैं भी तुम्हारी ही तरह व्रत और पूजन करूंगी। इसके बाद उसने पूर्णिमा व्रत विधि पूर्वक किया और इस व्रत के महत्व और फल का पूरे नगर में प्रचार किया। जिस प्रकार मां लक्ष्मी और श्री हरि ने साहूकार की बड़ी पुत्री की कामना पूर्ण कर सौभाग्य प्रदान किया, वैसे ही हम पर भी कृपा करें।

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शरद पूर्णिमा व्रत विधि

  1. सुबह जल्दी उठकर विधि विधान से अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना करना चाहिए।
  2. ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए।
  3. धन प्राप्ति के लिए इस व्रत को विशेष रुप से किया जाता है। इस दिन जागरण करने वालों की धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।
  4. भगवन विष्णु और महालक्ष्मी जी का पूजन करके घी के दीपक जला कर उसकी गंध पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए।
  5. रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करना चाहिए।
  6. मंदिर में खीर आदि दान करने का विधि-विधान है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चाँद की चांदनी से अमृत बरसता है।
  7. शरद पूर्णिमा के मौके पर श्रद्धलुओ को गंगा व अन्य पवित्र नदियों में आस्था से डुबकी लगानी चाहिए। स्नान-ध्यान के बाद गंगा घाटों पर ही दान-पुण्य किया जाना चाहिए।
  8. व्रत में तरल पदार्थ का ही सेवन करना चाहिए जैसी दूध जूस आदि।

अलग शहरों की अलग मान्यताये

ओडिशा राज्य में इस दिन कुंवारी कन्याये अपना मनचाहा पति प्राप्त करने के उद्देश्य से व्रत रखती है, इस व्रत का आरंभ सूर्योदय के समय नारियल- की पत्ती से बने बर्तन में ‘कुला’ नामक नारियल के साथ 7 फलो से भरा हुआ नारियल, केला, ककड़ी, सुपारी, गन्ना, अमरूद के साथ सूर्य देव का स्वागत करते हुए शुरू होता है। शाम को वे ‘तुलसी’ के पौधे से पहले चंद्रमा भगवान को अर्पित करने के लिए फल, दही और गुड़ के साथ सुबह के तले हुए धान से युक्त पकवान तैयार करके अपना व्रत तोड़ते हैं। इसके बाद युवतियां गेम खेलती हैं और पूर्णिमा के प्रकाश में गाने गाती हैं।

ब्रिज स्थानों पर (जो उत्तर प्रदेश के मथुरा और वृंदावन में है) शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, कहा जाता है कि भगवान कृष्ण इस दिन गोपियों के साथ वृंदावन में नृत्य करते हैं इसलिए इसको महारास कहा जाता है, अधिकतर देशों में विशेष कर पश्चिम बंगाल में मां लक्ष्मी की पूजा की जाती हैं, और इसको कोजागरी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है, इस दिन भक्त मां लक्ष्मी से अपने घर के लिए सुख समृद्धि मांगते हैं।

इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के समीप होता है

मिथिला क्षेत्र में लोग अपने घर के बाहर मसालेदार पकवान बनाकर रखते है, ऐसा विश्वास किया जाता है की अलक्ष्मी को मसालेदार पकवान पसंद होते है और वो घर में दाखिल हुए बिना ही बाहर से ही उस मसालेदार पकवान का सेवन करके चली जाती है और मा लक्ष्मी जिसको मिठाई पसंद है वो घर के भीतर आ कर खीर का सेवन करती है। इस दिन कुछ लोग 108 दिए भी जलाते है और मंत्रों का उच्चारण करते है 

सूरज की झुलसानेवाली गर्मी के बाद पूर्णिमा की रात में पूर्ण चंद्र की किरणें शीतलता बरसाती हैं, जो तन-मन की उष्णता कम हो जाती है।

जब पहली पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के पर्व के रूप में मनाया जाता ही तो बारिश का दौर खत्म होने के कारण हवा साफ होती है, जिसके कारण इसके बाद से मौसम में ठंडक आती है और ओस के साथ कोहरा पड़ना शुरू हो जाता है। और शीत ऋतू की शुरुआत हो जाती है।

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