शीतला माता की कथा, आरती Sheetla Mata Vrat katha and Aarti in Hindi

शीतला माता की कथा, आरती Sheetla Mata Vrat katha and Aarti in Hindi

दोस्तों वैसे तो सभी कहते है, इंसान को ठंडा ही खाना चाहिए जिससे उसे शारीरिक रूप से लाभ मिल सके। लेकिन ऐसा बहुत ही कम हो पाता है, क्योंकि हम स्वाद के कारण वश गर्म ही खाना पसंद करते है। परन्तु पुराण भी हमे ठंडा खाने की प्रेरणा प्रदान करते है। हम बात करेंगे एक ऐसी कथा के बारे में जिसमे भगवान स्वयं भी ठंडे खाने का पक्ष लेते है। 

वो है बसौड़ा पर्व यानी शीतलाष्टमी बसौड़ा की पूजा, इस दिन शीतला माता का पूजन तथा कथा का वाचन किया जाता है। पुराणों के अनुसार बसौड़ा की पूजा माता शीतला को प्रसन्न करने के लिए की जाती है।  इस दिन मां शीतला की पूजा एवं कथा करने से माता अपने भक्तों को धन-धान्य से परिपूर्ण कर, उनकी संतानों को लंबी आयु देती है, तथा सभी को प्राकृतिक विपदाओं से दूर रखती हैं। शीतला माता की कई पोराणिक कथाएं प्रचलित है, कथा इस प्रकार है-

शीतला माता की कथाएं Sheetla Mata Vrat Katha (Stories in Hindi)

शीतला माता की कथा-1 (Sheetla Mata Story 1)

किसी गांव में एक वृद्ध महिला रहती थी। उसके एक बेटा था, वह बहुत गरीब थी, उसके घर में कई बार खाने को भी कुछ नहीं रहता था, उसकी झोपड़ी भी गांव से दूर अलग बनी हुई थी, वह शीतला माता की भक्त थी, तथा शीतला माता का व्रत करती थी। उसके गांव में और कोई भी शीतला माता की पूजा नहीं करता था, लेकिन उस गाँव में शीतला माता का मंदिर था। एक दिन उस गांव में किसी कारण से आग लग गई। 

पूरे गांव में आग लगने के कारण, सभी लोग आग से झुलस जाते है, आग लगने से शीतला माता भी जल जाती है, वह जलन और गर्मी से वह परेशान होकर सब के घर जाती है, पर उनको कहीं भी ठंडक नही मिलती। क्योंकि सारा गांव जल रहा होता था, तो माता जी कुम्हार के बाडे में जाती है, जिससे उन्हें वहां ठंडी मिट्टी मिल सके लेकिन कुम्हार ने बर्तन पकाने के लिए मिट्टी को आग पर चढ़ा दिया था, तो उन्हें वहां पर भी खूब जलन होती है। 

इस तरह जा सब जगह घूमने के बाद उन्हें कही राहत नही मिलती तो वो गाँव से दूर वृद्ध महिला के यहाँ पहुँचती है। वहां पर मिट्टी में लोटकर अपने शरीर की जलन को शांत करती है। उसके बाद थोड़ी देर आराम करने के बाद जब थोड़ी जलन कम हो जाती है, तो वह उस महिला से खाने के लिए खाना मांगती है, और महिला कहती है कि मैं बहुत गरीब हूँ, मैंने कुछ भी ताज़ा खाने को नही बनाया। 

इस पर वह बोली कि कुछ भी ठंडा, बासी खाना हो तो मुझे दे दो। इस पर महिला को लगता है, कि माता जी उसकी हंसी उड़ा रही है, तो महिला बोलती कि माता जी मुझ गरीब के पास कुछ भी नहीं है। कल की बांसी ज्वार की रोटी रखी हुई है। इस पर माता जी बोली कि जो हो वही दे दो। 

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खाने के बाद माता ने दही माँगा तो इस पर महिला बोली मेरे पास छाछ है, आप कहो तो मैं ले आऊ। छाछ को पीकर उनको आराम मिला। शीतला माता ने जाते हुए उसको आशीष दिया की जिस तरह से तूने मुझे शांति और आराम दिया वैसे ही तुझे भी शांति प्राप्त हो। ऐसा कहकर उन्होंने एक लात मार कर उस झोपड़ी को आलीशान महल में बदल दिया। 

किसी गांव वाले ने राजा से शिकायत कर दी, की पूरा गाँव जल गया, लेकिन महिला की झोपड़ी सुंदर महल में बदल गई, उसको लगा कि ज़रूर महिला ने कोई जादूटोना करके ऐसा किया है। ऐसा सुनकर राजा ने महिला को अपने दरबार में बुलाया और पूछा कि जब सारा गांव जल गया तो तेरी झोपड़ी कैसे बच गई, और महल कैसे बन गई बता तूने क्या किया, तो वो बृद्ध महिला हाथ जोड़कर बोलती कि महाराज मैंने तो कुछ नहीं किया। 

कल जब सारे गांव में आग लग गई, तो शीतला माता भी जल गई थी, और मेरी झोपड़ी गांव के बाहर होने के कारण जल नही पाई तो ठंडा स्थान ढूंढते ढूंढते शीतला माता मेरी झोपड़ी में आराम करने आई। फिर उन्होंने खाना माँगा लेकिन मेरे घर तो कुछ भी नहीं था, मेरे पास तो बासी ज्वार की रोटी और मीठा पड़ा हुआ था, वो मैंने उन्हें परोस दिया। 

जिससे उनकी भूख शांत हो गयी तो उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया कि जैसा सुख और शांति तूने मुझे दिया। वैसे ही सुख शांति तुझे भी मिले और अंत में जाते-जाते उन्होंने मेरी झोपड़ी को महल में बदल दिया। इसलिए यह सब चीजें शीतला माता की कृपा से मुझे मिली हुई है।

उसी दिन से राजा ने पूरे गांव में मुनादी करवा दी कि होली के बाद आने वाली सप्तमी को शीतलाष्टमी बासोड़ा के नाम से जाना जाएगा और 1 दिन पहले का बना हुआ ठंडा बासी खाना खाएंगे और उस दिन से सब शीतला माता की पूजा करते और बासी खाते हैं। इस कथा को पढ़ने से घर कि दरिद्रता का नाश होने के साथ सभी मनोकामना पुरी होती है।

 शीतला माता की कथा -2 (Sheetla Mata Story 2)

यह कथा बहुत पुरानी है। एक बार शीतला माता ने सोचा कि क्यों ना देखा जाये कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आई और देखा कि इस गाँव में मेरा मंदिर भी नही है, ना मेरी पूजा होती है।

माता शीतला गाँव कि गलियों में घूम रही थी, तभी एक घर के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) नीचे फैंक दिया और वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में (छाले) फफोले पड गये। शीतला माता के पूरे शरीर में जलन होने लगी।

शीतला माता जलन के कारण गाँव में इधर उधर भाग रही थी, वह मदद के लिए भी चिल्ला रही थी, लेकिन उस गाँव में किसी ने शीतला माता कि मदद नही की। वही अपने घर के बाहर एक कुम्हारन (महिला) बैठी थी। उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बूढ़ी माई तो बहुत जल गई है। इसके पूरे शरीर में जलन हो रही है और इसके पूरे शरीर में (छाले) फफोले पड़ गये है। यह तपन सहन नही कर पा रही है। 

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तब उस कुम्हारन ने कहा, माँ तू यहाँ आकार बैठ जा, मैं तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हूँ। कुम्हारन ने उस बूढ़ी माई पर खुब ठंडा पानी डाला तब शीतला माता की जलन कम हुई। महिला बोली माँ मेरे घर में रात कि बनी हुई राबड़ी रखी है और थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढी माई ने ठंडी (ज्वार) के आटे कि राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली।

तब उस कुम्हारन ने कहा आ माँ बैठ मैं तेरे सिर के बाल काढ देती हूँ और कुम्हारन माई के बाल काढने लगी। अचानक कुम्हारन कि नजर उस बूढ़ी माई के सिर के पीछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख बालों के अंदर छुपी हैं। यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उस बूढ़ी माई ने कहा रुक जा बेटी तू डर मत। 

मैं कोई भूत प्रेत नही हूँ। मैं शीतला देवी हूँ। मैं तो इस धरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है। कौन मेरी पूजा करता है। इतना कहकर माता चारभुजा वाली, हीरे जवाहरात के आभूषण पहने, सिर पर स्वर्ण मुकुट धारण किये, अपने असली रुप में प्रकट हो गई।

माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब मैं गरीब, इस माता को कहा बैठाऊ, तब माता बोली है बेटी तूकिस सोच मे पड गई। तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आसु बहाते हुए कहा- माँ मेरे घर में तो चारों तरफ दरिद्रता है बिखरी हुई है मैं आपको कहा बैठाऊ। मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन। 

तब शीतला माता ने प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठ कर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर कि दरिद्रता को झाड़ कर डलिया में भरकर फेंक दिया और उस कुम्हारन से कहा कि बेटी मैं तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हूँ, अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग ले। 

तब कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा है, माता मेरी इच्छा है अब आप इसी (डुंगरी) गाँव मे स्थापित होकर यही रहो और जिस प्रकार आपने आपने मेरे घर कि दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ़ कर दूर किया ऐसे ही आपको जो भी होली के बाद कि सप्तमी को भक्ति भाव से पूजा कर आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाये उसके घर कि दरिद्रता को साफ़ करना और आपकी पूजा करने वाली नारी जाति (महिला) का अखंड सुहाग बनाये रखना। 

उसकी गोद हमेशा भरी रखना। साथ ही जो पुरुष शीतलाष्टमी को नाई के यहां बाल ना कटवाये, धोबी को कपड़े धुलने ना दे और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़ा कर, नारियल फूल चढ़ा कर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आये।

तब माता बोली तथास्तु ! बेटी जो तुने वरदान माँगे में सब तुझे देती हूँ। तभी उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया शील की डुंगरी। शील की डुंगरी में शीतला माता का मुख्य मंदिर है। शीतलाष्टमी बासोड़ा पर वहाँ बहुत विशाल मेला लगता है। इस कथा को पढ़ने से घर कि दरिद्रता का नाश होने के साथ सभी मनोकामना पुरी होती है।

इस कथा का मर्म भी बहुत गहरा है। भारत की जलवायु और खासतौर से राजस्थान की जलवायु गर्म है। गर्मी कई रोग पैदा करती है। शीतला माई शीतलता की देवी हैं।

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लोगो की माने तो कथा यह संदेश देती है कि शीतला माई का पूजन करने से तन, मन और जीवन में शीतलता आती है, मनुष्य गर्मी, द्वेष, विकार और तनावों से मुक्त हो जाता है। शीतला माता के हाथ में झाड़ू भी स्वच्छता और सफाई का संदेश देती है। गर्म मौसम के अनुसार स्वयं की दिनचर्या व खान पान में बदलाव करने से ही जीवन स्वस्थ रह सकता है। इस प्रकार शीतला माई ठंडे पकवानों के जरिए सद्बुद्धि, स्वास्थ्य, सजगता, स्वच्छता और पर्यावरण का संदेश देने वाली देवी भी हैं।

शीतला माता की पूजा-अर्चन के उद्देश्य से भक्त फाल्गुन मास की पूर्णिमा एवं फाल्गुन मास की संक्रांति से ही नियम से प्रात: माता शीतला पर लस्सी चढ़ाना शुरू कर देते हैं तथा पूरा महीने माता शीतला की पूजा करते हैं। परन्तु कई जगह होली के बाद  आने वाली अष्टमी को एक दिन पहले भोजन बनाकर दूसरे दिन माता शीतला की पूजा (शीतलाष्टमी) बांसे खाने से की जाती है और दिन भर वही खाना खाया जाता है।

मान्यताएं

स्कंद पुराण में शीतला देवी का वाहन गधा बताया गया है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाड़ू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। शीतला माता को संक्रामक रोगों से बचाने वाली देवी भी कहा जाता है। देहात के इलाकों में तो स्मालपोक्स (चेचक) को माता, शीतला माता आदि नामों से जाना जाता है। मान्यता है कि शीतला माता के कोप से ही यह रोग पनपता है इसलिये इस रोग से मुक्ति के लिये आटा, चावल, नारियल, गुड़, घी इत्यादि माता के नाम पर रोगी श्रद्धालुओं से रखवाया जाता है।

इन्हें चेचक आदि कई रोगों की देवी बताया गया है। चेचक का रोगी गर्मी से वस्त्र उतार देता है। सूप से रोगी को हवा की जाती है, झाडू से चेचक के फोड़े फट जाते हैं। नीम के पत्ते फोडों को सड़ने नहीं देते। रोगी को ठंडा जल प्रिय होता है गधे की लीद लगाने से चेचक के दाग मिट जाते हैं। ऐसा करने से रोगी को आराम पहुँचता है।

शीतला माता की आरती Sheetla Mata Aarti

जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता,
आदि ज्योति महारानी सब फल की दाता। जय शीतला माता…  

रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भ्राता,
ऋद्धि-सिद्धि चंवर ढुलावें, जगमग छवि छाता। जय शीतला माता…

विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता,
वेद पुराण बरणत पार नहीं पाता । जय शीतला माता…

इन्द्र मृदंग बजावत चन्द्र वीणा हाथा,
सूरज ताल बजाते नारद मुनि गाता। जय शीतला माता…

घंटा शंख शहनाई बाजै मन भाता,
करै भक्त जन आरति लखि लखि हरहाता। जय शीतला माता…

ब्रह्म रूप वरदानी तुही तीन काल ज्ञाता,
भक्तन को सुख देनौ मातु पिता भ्राता। जय शीतला माता…

जो भी ध्यान लगावें प्रेम भक्ति लाता,
सकल मनोरथ पावे भवनिधि तर जाता। जय शीतला माता…

रोगन से जो पीड़ित कोई शरण तेरी आता,
कोढ़ी पावे निर्मल काया अन्ध नेत्र पाता। जय शीतला माता…

बांझ पुत्र को पावे दारिद कट जाता,
ताको भजै जो नाहीं सिर धुनि पछिताता। जय शीतला माता…

शीतल करती जननी तू ही है जग त्राता,
उत्पत्ति व्याधि विनाशत तू सब की घाता। जय शीतला माता…

दास विचित्र कर जोड़े सुन मेरी माता,
भक्ति आपनी दीजे और न कुछ भाता।

जय शीतला माता…।  

Featured Image – Vedicfolks

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