कुंभकरण की कहानी Story of Kumbhakarna in Hindi -Kahani

कुंभकरण की कहानी Story of Kumbhakarna in Hindi -Kahani

जैसा की आप सभी जानते है कुंभकरण दशानन रावण में छोटे भाई थे। ये राक्षस वंश के थे इनकी माता कैकसी थी और पिता विशर्वा ब्राहमण कुल के थे। इनकी माता राक्षस थी और पिता ब्राम्हण थे जिसकी वजह से कुंभकरण और इनके सभी भाइयों में राक्षस के गुण के साथ कुछ इनके पिता का गुण भी आ गया था

लेकिन इनकी माता अपने पुत्रो को पृथ्वी के राजा के रूप में देखना चाहती थी इसीलिए माता कैकसी ने अपने पुत्र रावण, विभीषण और कुंभकरण सभी को अपने संस्कार दिए जिससे रावण और कुंभकरण के अन्दर तो राक्षस वाले गुण तो आ गए लेकिन विभीषण अपने पिता की तरह थे। वह श्री राम के भक्त थे।

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कुंभकरण की कहानी Story of Kumbhakarna in Hindi – Kumbhakaran Ki Kahani

कुंभकरण की जीवनी Life Story of Kumbhakarna

रावण अपने पिता के जैसे ही चारो वेदों का ज्ञाता रहा लेकिन उसको अपनी शक्तियों पर बहुत ही घमंड था। कुंभकरण के पास भी अपार शक्तियां थी वो अपनी शरीर को जितना बड़ा चाहे बना कर एक विशाल काय रूप ले लेता था।

इतनी अपार शक्ति होने के कारण भी उसने कभी भी अपने भाई का विरोध नही किया क्योकि उसे अपने भाई रावण से बहुत प्रेम था। रावण और कुंभकरण के पास बहुत सी शक्तियाँ थी लेकिन विभीषण के पास शक्ति नही थी क्योकि ये अपने पिता के संगत में थे और ये भगवान के सच्चे भक्त बन गये थे।

कुंभकरण को बचपन से ही खाने का बहुत शौक था उसका कद इतना बड़ा था कि उससे बात करने के लिए सीढियाँ लगनी पड़ती थी। उसके अंदर कई हाथियों की ताकत थी और वो एक बार में कई गावं का भोजन अकेले ही खा सकता था।

वरदान बना अभिश्राप Kumbhakarna Story in Hindi

कुंभकरण की अंदर से इच्छा थी कि वो स्वर्ग पर राज करे क्योकि वहां जीवन भर पेट भर कर खाना मिलता। उसने अपनी तपस्या शुरू की, उसकी तपस्या से पूरे देव लोक में चिंता का विषय खड़ा हो गया।

सारे देवता घबरा गए और उसके उपाय के लिए भगवन ब्रम्हा के पास गए। तब सरस्वती जी ने इस समस्या का उपाय ढूंढा। उन्होंने कहा – जब वो वरदान मांगेगा तो मैं उसकी जिव्हा पर बैठ जाउंगी और वो वरदान नही मांग पायेगा।

जब कुंभकरण ने अपनी तपस्या पूरी कर ली और भगवन ब्रम्हा दर्शन दिया और कहा मांगो जो वरदान मांगना है। कुंभकरण खुश होकर इन्द्रासन मांगने वाला था, उसने जैसे ही अपना मुह खोला सरस्वती जी उसकी जिव्हा पर बैठ गई और कुंभकरण के मुह से इन्द्र्सन की जगह निन्द्रसन निकल गया। ब्रह्मा तुरंत ही तथास्तु कह दिया, उसके बाद कुंभकरण ने ब्रम्हा के सामने बहुत विलाप किया।

ब्रम्हा जी ने कहा – मैं दिया हुआ वरदान वापस तो नही ले सकता लेकिन तुम्हारे भक्ति से बहुत ही खुश हूँ इसीलिए मैं तुम्हारे लिए एक काम कर सकता हूँ तुम 6 महीने सो कर आराम करो और 6 महीने जागोगे।  

इतना कह कर ब्रम्हा जी वहां से गायब हो गये। न चाहते हुए भी कुंभकरण को ये बात माननी पड़ी। इसके बाद कुंभकरण का जीवन बदल गया। छः महीने तक वो सोता रहता और छः महीने जग कर खूब खता था।

कई वर्षो के बाद रावण ने माता सीता का अपहरण कर लिया और श्री राम ने अपनी वानर सेना के साथ लंका पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में जब रावण के महान महान योद्धा मारे गए, तब रावण से कुंभकरण को जगाने का आदेश दिया। बहुत सरे सैनिक कुंभकरण को जगाने में लगे हुए थे और वो अपनी गहरी नीद में सो रहा था बहुत प्रयत्न करने के बाद सैनिको ने कुंभकरण को जगाया।

अपने बड़े भाई के आदेश पर कुंभकरण भगवन राम से युद्ध करने के लिए तैयार हो गया। अगले दिन कुंभकरण युद्ध में मैदान में उतरा उसने अपने विशाल शरीर से वानर सेना को कुचलने लगा। सारे वानर सेना उससे डर कर भागने लगे।

जैसे जैसे वो आगे बढ़ रहा था सेना उसके पैरों के निचे दबती जा रही थी। शायद कुंभकरण को पता था, आज उसकी मौत भगवन राम के द्वारा हो जायेगी, लेकिन ये उसके लिए एक सौभाग्य की बात थी क्योकि भगवान के हाथो किसी की मृत्यु से उसका उद्धार हो जायेगा।

भगवन राम अपना धनुष और बाण लेकर युद्ध मैदान में आये और अपने बाण से कुंभकरण पर वार करना शुरू किया। बहुत समय तक लड़ने के बाद भगवान राम जी ने अपने बाण से कुंभकरण के एक हाथ को काट दिया और वो जाकर रावण के महल में गिया।

राम जी अपने बाण से कुंभकरण के दोनों हाथ काट दिया उसका वध कर दिया।उसके वध के बाद राम जी ने विभीषण की मदत से रावण का भी वध कर दिया और विभीषण को राजा बनाकर माता सीता को लेकर अयोध्या वापस आ गए।

कुंभकरण की कुछ प्रमुख तथ्य Facts about Kumbhakarna in Hindi

  1. कुंभकरण बहुत ही बड़े और विशाल काय थे, जो अकेले ही कई गावं का भोजन खा सकता था।
  1. कुंभकरण छह महीने सोते थे और छह महोने जागते थे। जब वो जागते थे तो सैनिक उनको खाना खिलते हुए थक जाते थे लेकिन कुंभकरण खाते हुए नही थकता था।
  1. कुंभकरण अत्यंत बलवान और प्रकर्मी था, उसके अन्दर कई हाथिओं की ताकत थी।             

  By ca. 1810-1820; Mughal period [Public domain], via Wikimedia Commons

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