17+ तुलसीदास के दोहे हिन्दी अर्थ सहित Tulsidas Ke Dohe in Hindi

17+ तुलसीदास के दोहे हिन्दी अर्थ सहित Tulsidas Ke Dohe in Hindi

रामभक्ति शाखा के कवियों में गोस्वामी तुलसीदास सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं इनका प्रमुख ग्रंथ “रामचरितमानस” भारत में ही नहीं, वरन संपूर्ण विश्व में विख्यात है। यह भारतीय धर्म और संस्कृति को प्रतिबिम्बित करने वाला एक ऐसा निर्मल दर्पण है जो संपूर्ण विश्व में एक अनुपम एवं अतुलनीय ग्रंथ के रूप में स्वीकार किया जाता है।

इसलिए तुलसीदास जी न केवल भारत के, वरन सारी मानवता के, सारे संसार के कवि माने जाते हैं। आईये उनके कुछ प्रसिद्द दोहे को पढ़ते हैं और उनका अर्थ समझते हैं।

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17+ तुलसीदास के दोहे हिन्दी अर्थ सहित Tulsidas Ke Dohe in Hindi

1. पुर तें निकसी रघुबीर-बधू,धरि धीर दये मग में डग द्वै।
झलकीं भरि भाल कनी जल की,पुट सूखि गये मधुराधर वै।।
फिरि बूझति हैं-”चलनो अब केतिक,पर्णकुटी करिहौ कित है?”
तिय की लखि आतुरता पिय की, अँखिया अति चारू चलीं जल च्वै।।


इस पद में सुकोमल अंगों वाली सीताजी वन-पथ पर जा रही है। उनके मन की व्याकुलता का चित्रण करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं कि राम की प्रिया जानकी ने जैसा ही रात्रि-विश्राम के पश्चात श्रृंगरवेरपुर से बाहर निकलकर बड़े धैर्य के साथ मार्ग में दो कदम रखें अर्थात वह थोड़ी दूर तक चली, वैसे ही उनके पूरे माथे पर पसीने की बूँदें छलक आई और उनके कोमल होंठ सूख गए। तब वे राम से पूछने लगीं कि हमें अभी कितना और चलना है और आप झोपड़ी कहाँ बनाएँगे? पत्नी सीताजी की ऐसी अधीरता देखकर प्रियतम राम की अत्यन्त सुंदर आँखों में आँसू भर आए और उनसे अश्रु प्रवाहित होने लगे।

2. “जल को गये लक्खन हैं लरिका,परिखौ,पिय!छाँँह घरीक हैं ठाढे।
पोंछि पसेउ बयारि करौं,अरु पायँ पखरिहौं भूभुरि डाढे”।।
तुलसी रघुबीर प्रिया स्रम जानि कै, बैठि बिलंब लौं कंटक काढे।
जानकी नाह को नेह लाख्यौं, पुलको तनु बारि बिलोचन बाढे।।

                 
श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के साथ वनवास की ओर चल पड़े हैं सीता जी के माथे पर पसीने की बूँदें छलक आई है तुलसीदास जी ने उनकी व्याकुलता और उनके प्रति श्रीराम के प्रेम का सजीव वर्णन इस पद्य में करते हैं। सीता जी कहती हैं कि लक्ष्मण जल लेने के लिए गए हैं अतः कहीं छाँव में खड़े होकर घड़ी भर के लिए उनकी प्रतीक्षा कर ली जाए तब तक मैं आपका पसीना पोछं कर पंखे से हवा किए देती हूँ और बालू से तपे हुए पैर धोए देती हूँ। तुलसीदास जी कहते हैं जब राम ने देखा कि राम जानकी थक गई है तो उन्होंने बहुत देर तक बैठकर उनके पैरों से कांटे निकाले। जानकी सीता ने अपने स्वामी के इतने प्रेम को देखा तो उनका शरीर पुलकित हो उठा और उनकी आँखों में आँसू छल छला आए।

3. रानी मैं जानी अजानी महा,पबि पाहन हूँ ते कठोर हियो है।
राजहु काज अकाज न जान्यो, कह़ो तिय को जिन कान कियो है।।
ऐसी मनोहर मूरति ये, बिछुरे कैसे प्रीतम लोग जियो है?
आँखिन में सखि! राखिबे जोग, इन्हे किमि कै बनबास दियो है?।।

इस पद में तुलसीदास जी ग्रामीण स्त्रियों के माध्यम से राजा दशरथ और कैकेयी की निष्ठुरता का वर्णन करते हैं। गांव की एक महिला कहती है कि रानी कैकेयी बड़ी अज्ञानी है उनका हृदय तो पत्थर और व्रज से भी कठोर है उधर राजा दशरथ ने भी उचित-अनुचित का विचार नहीं किया और केवल स्त्री के कहने पर इन्हें वन में भेज दिया यह तो इतनी लुभावनी मूर्तियाँ है कि इनके बिछुड़ने पर इनके परिवार के लोग किस प्रकार जीवित रहे होंगे। हे सखी! यह तो आँखों में रखने योग्य है, अर्थात सदैव दर्शनीय है तो फिर इन्हें वनवास क्यों दे दिया गया?

4. बैठी सगुन मनावति माता।
कब ऐहैं मेरे बाल कुशल घर ,कहहु ,काग !फुरी बाता।।
दूध भात की दोनों दैहों, सोने चोंच मढ़ैहौं ।
जब सिय- सहित बिलोकि नयन भरि राम –लषण उर लैहौं।।
अवधि समीप जानि जननी जिय अति आतुर अकुलानी।
गनक बोलाइ, पांय परि पुछति प्रेम मगन मृदु बानी।।
तेहि अवसर कोउ भरत निकटते समाचार लै आयो।
प्रभु –आगमन सुनत तुलसि मनो मीन  मरत जल पायो।।

इस पद में उस समय का वर्णन किया गया है जब श्रीराम अपने वनवास की अवधि को पूरा करके सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या में लौटने वाले हैं और माता कौशल्या उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रही हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि माता कौशल्या बैठी हुई श्रीराम की सकुशल लौटने की प्रतीक्षा कर रही हैं और शकुन मना रही है वह कहती है कि, हे काग! तुम स्पष्ट रुप से बताओ कि मेरे बालक कुशलतापूर्वक कब लौट आएँगे? जब मैं सीता सहित राम और लक्ष्मण को देखकर अपने हृदय से लगा लूँगी, तब मैं तुझे दूध और भात से भरा हुआ दोना दूँगी और तेरी चोच को स्वर्ण से मण्डित कराऊँगी।

जैसे-जैसे श्रीराम के आगमन की अवधि समीप आती जा रही है वैसे-वैसे माता कौशल्या के हृदय की आतुरता और आकुलता बढ़ती जा रही है। वह ज्योतिषी को बुलाकर और उनके चरण-स्पर्श करके, प्रेम से भर कर, सुकोमल वाणी से उनके आने की शुभ घड़ी पूछती है। उसी समय कोई व्यक्ति भरत के पास से राम के आगमन का समाचार लेकर आता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि उस समाचार को सुनकर माता कौशल्या उसी प्रकार चैतन्य हो जाती हैं। जिस प्रकार जल के अभाव में तड़पती हुई मछली को जल मिल जाने पर पुनः जीवन प्राप्त हो जाता है।

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5. आपु आपु कहँ सब भलो,अपने कहँ कोई कोई।
तुलसी सब कहँ जो भलो,सुजन सराहिय सोई।।

इस दोहे में तुलसीदास जी ने आज स्पष्ट किया है कि परोपकार करने वाले व्यक्ति की ही इस संसार में सराहना होती है। अपने लिए तो सभी भले होते हैं और सभी अपने लिए भलाई का कार्य करने में लगे रहते हैं। किंतु कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो स्वयं का भला करने के साथ-साथ भी अपने मित्रों एवं सम्बन्धियों के भले के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि इनसे भी श्रेष्ठ वे व्यक्ति होते हैं जो सभी का भला मानकर उनकी भलाई करने में लगे रहते हैं। इस प्रकार के व्यक्तियों की ही सज्जन व्यक्तियों के द्वारा सराहना की जाती है।

6. सीस जटा उर बाहु बिसाल, बिलोचन लाल तिरछी सी भौंहें।
तून सरासन बान धरे, तुलसी बन-मारग में सुठि सोहैं।।
सादर बारहिं बार सुभाय चितै तुम त्यों हमरो मन मोहैं।
पूछति ग्राम बधू सिय सों ‘कहौ साँवरे से, सखि रावरे को हैं?’।।

इस पद में तुलसीदास जी कहते हैं कि ग्रामीण वधुएँ  सीता जी से पूछती हैं कि जिनके सिर पर जटाएँ हैं, जिनकी भुजाएँ और वक्षस्थल विशाल हैं, जिनके नेत्र लाल हैं, जिनकी भौंहें तिरछी हैं, जिन्होंने तरकस, धनुष और बाण सँभाल रखे हैं, जो वन के रास्ते में भली प्रकार सुशोभित हो रहे हैं तथा जो बार-बार आदर और चाव के साथ तुम्हारी ओर देखते हुए हमारे मन को मोहित कर रहे हैं, हे सखी! बताओ तो सही, वे साँवले से तुम्हारे कौन लगते है ?

7. सुनि सुन्दर बैन सुधारस-साने, सयानी हैं जानकी जानी भली।
तिरछे करि नैन दै सैन तिन्हें समुझाई कछू मुसकाइ चली।।
तुलसी तेहि औसर सोहै सबै अवलोकति लोचन-लाहु अली।
अनुराग-तड़ाग में भानु उदै बिगसीं मनो मंजुल कंज-कली।।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं गांव की स्त्रियों की अमृतमयी वाणी सुनकर जानकी जी समझ गई हैं कि यह स्त्रियाँ बहुत चतुर है घुमा फिरा कर प्रभु के साथ मेरा सम्बन्ध जानना चाहती है। अतः इन्होंने मर्यादा का पालन करते हुए संकेतों के द्वारा उन्हें बता दिया। अपने नेत्र तिरक्षे करके, इशारा करके कुछ समझा कर सीताजी मुस्कुराती हुई आगे बढ़ गई। तुलसीदास जी कहते हैं कि उस अवसर पर वे स्त्रियाँ उनके दर्शन को स्वयं का लाभ मानकर राम की ओर टकटकी लगाए हुए देखती हुई ऐसी शोभा पा रही थी मानो सूर्योदय होने पर प्रेम के तालाब में सुंदर कमल की कलियाँ खिल-खिला उठी हो।

8. विंध्य के वासी उदासी तपोव्रत धारी महा बिनु नारि दुखारे।
गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि में वृन्द सुखारे।।
है है शिला सब चंद्र मुररी पखी पद मंजुल कंज तिहारे।
कीन्ही भली रघुनायक जूं कंरूना करि कानन कौ पग धारे।।


   तुलसीदास जी ने इस पद में वनवासी साधुओं के साथ कोमल परिहास करते हुए कहा है कि विंध्याचल पर रहने वाले उदास तपस्वी बिना स्त्री के अत्यधिक दुखी जीवन बिता रहे हैं। जब उन्होंने गौतम की स्त्री अहिल्या के तर जाने की कथा सुनाई तो उन मुनियों को अत्यधिक सुख मिला। वे राम से कहने लगे कि आपने बड़ी कृपा की, जो आप वन में चले आए। हे राम! आपके सुंदर चरण-कमलों की स्पर्श पाकर यहाँ की सारी शिलाएँ चंद्रमुखी स्त्रीयाँ बन जाएँगी और तब हमारा अकेलापन दूर हो जाएगा

9. जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।
काको नाम पतित पावन जग, केहि अति दीन पियारे।
कौनहुँ देव बड़ाइ विरद हित, हठि हठि अधम उधारे।
खग मृग व्याध पषान विटप जड़, यवन कवन सुर तारे।
देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज, सब माया-विवश बिचारे।
तिनके हाथ दास ‘तुलसी’ प्रभु, कहा अपुनपौ हारे।


इस पद में गोस्वामी जी कहते हैं राम के चरणों को छोड़कर कहीं भी जाना उचित नहीं है। तुलसीदास जी कहते हैं कि हे नाथ! आपके चरणों को छोड़कर मैं और कहाँ जाऊँ। इस संसार में आपके जैसा पतित-पावन नाम और किसका है। आपके समान और कोई भी तो नहीं है जो दीनों को इतना प्यार करता हो। आज तक किस देवता ने अपने प्रण की लाज रखने के लिए हठपूर्वक पापियों का उद्धार किया है और किस देवता ने पक्षी(जटायु),पशु(रीछ,वानर) व्याध(वाल्मीकी),पत्थर(अहिल्या),जड़ वृक्ष(यमलार्जुन) और यवनो(राक्षसों) का उध्दार किया है। गोस्वामी जी कहते हैं कि देवता,दैत्य,मुनि,नाग,मनुष्य आदि बेचारे माया के अधीन है फिर मैं स्वयं को उनके हाथों में क्यों सौंपू ? जब वे स्वयं ही माया के बस में है, तब दूसरों का उद्धार कैसे कर सकते हैं।

10. बनिता बनी स्यामल गौर के बीच,बिलोकहु,री सखि! मोहि-सी ह्वै।
मनुजोगु न कोमल, क्यों चलिहै, सकुचाति मही पदपंकज छ्वै।।
तुलसी सुनि ग्रामबधू बिथकीं, पुलकीं तन, औ चले लोचन च्वै।
सब भाँति मनोहर मोहनरूप, अनूप हैं भूपके बालक द्वै।।


वन-मार्ग पर सीता और लक्ष्मण के साथ श्रीराम जा रहे हैं। ग्रामीण स्त्रियाँ सीता की सुकुमारता को देखती हैं और कहती हैं। हे सखी! इन साँवले और गोरे कुमारों के बीच में जो स्त्री बड़ी सुन्दर लग रही है, उसे मेरी आँखों से देखो। वह इतनी कोमल है कि वह वन के मार्ग में चलने योग्य नहीं है। उसके चरण-कमलों का स्पर्श करके पृथ्वी संकुचित हो रही है। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह बातें सुनकर गाँव की सभी स्त्रियाँ विहव्ल हो उठी हैं, उनका शरीर रोमांचित हो उठा है और उनकी आँखों में झर झर आँसू बहने लगे। सब कहने लगी कि ये दोनों राजकुमार बहुत ही सुंदर और सबका मन मोह लेने वाले हैं। यह इस कष्टदायी पथ पर चलकर वन में गमन किस प्रकार करेंगे ?

11. साँवरे-गोरे सलेाने सुभायँ, मनोहरताँ जिति मैनु लियो है।
बान-कमान, निषंग कसें, सिर सोहैं जटा, मुनिबेषु कियेा है।।
संग लिएँ बिधुबैनी बधू, रतिको जेहि रंचक रूप दियो है।
पायन तौ पनहीं न, पयादेहिं क्यों चलिहैं, सकुचात हियो है।


ग्रामीण युवतियाँ कहती हैं कि यह साँवले और गोरे बालक स्वभाव से भी बड़े सुन्दर हैं। मनोहरता में तो इन्होंने कामदेव को भी जीत लिया है। इन्होंने हाथ में धनुष-बाण लिया हुआ है और इनकी कमर में तरकश कसा हुआ हैं। इनके सिर पर जटाएँ सुशोभित हो रही है और यह मुनियों जैसे वेश बनाए हुए हैं। इनके साथ चंद्रमुखी सुन्दरी है, उसे देखकर ऐसा लगता है कि उसी ने मानो रति को थोड़ा-सा रूप दे दिया  हैं। इनके पैरों में चरण पादुका तक नहीं है। इन्हें देखकर हमारा हृदय संकुचित हो रहा है कि ये लोग जंगल में पैदल कैसे चल पाएँगे ?

12. ऐसो को उदार जग माहीं।
बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर राम सरिस कोउ नाहीं।।
जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी।
सो गति देत गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी।।
जो संपति दस सीस अरप रावन सिव पहँ लीन्हीं।
सो संपदा बिभीषन कहँ अति सकुच-सहित हरि दीन्हीं।।
तुलसिदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो।
तौ भजु राम, काम सब पूरन करैं कृपानिधि तेरो।।


गोस्वामी तुलसीदास ने परम उदार श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का वर्णन करते हुए कहा है कि इस संसार में श्रीरामचन्द्रजी के समान उदार और कोई भी नहीं है, जो बिना सेवा के अपने दीन भक्तों पर द्रवित होता हो। बड़े-बड़े मुनि और ज्ञानी, योग और वैराग्य द्वारा भी जिस मुक्ति को प्राप्त नहीं किये जा सकते, वह मुक्ति श्रीरामचन्द्रजी गिद्ध और शबरी तक को दे देते हैं और हृदय में उसे बड़ा कार्य नहीं मानते। अपने 10 सिर अर्पित करके रावण ने जिस सम्पत्ति को शिव से प्राप्त किया था, उसी संपत्ति को श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण को अत्यधिक संकोच के साथ भेंट किया।
तुलसीदास जी अपने मन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे मेरे मन! यदि तुम सब प्रकार से सुख चाहता है तो श्रीरामजी का भजन कर। वे कृपासागर राम तेरी सब कामनाओं को पूर्ण कर देंगे।

13. हरे चरहिं, तापाहं बरे, फरें पसारही हाथ।
तुलसी स्‍वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ।।

गोस्वामी जी ने वृक्षों के माध्यम से संसार में प्राणियों की स्वार्थी प्रवृत्ति का चित्र अंकित किया है। वह कहते हैं कि इस संसार में जब वृक्ष हरे भरे होते हैं, तब पशु-पक्षी उन्हें चर लेते हैं। वे ही वृक्ष जब सूख जाते हैं तो लोग उन्हें जलाकर तापने लगते हैं और उन वृक्षों पर जब फल लगते हैं तो लोग हाथ फैलाकर उनसे फल ले लेते हैं। इस प्रकार प्राणी सब प्रकार से अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि परमार्थ के मित्र तो केवल श्री रघुनाथजी ही हैं, जो हर समय प्रेम करते हैं और दीन-स्थिति में तो विशेष रूप से प्रेम करते हैं।

14. बरषत, हरषत लोग सब, करषत लखै न कोई।
तुलसी प्रजा सुभाग ते, भूप भानु सो होई॥

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदास जी ने सूर्य के माध्यम से अच्छे राजा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि सूर्य जब पृथ्वी से जल को ग्रहण करता है, तो उसे कोई नहीं देखता परन्तु वह सूर्य जब जल बरसाता है, तब लोग प्रसन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार सूर्य के समान न्यायपूर्ण ढंग से कर ग्रहण करने वाला और उस कर के रूप में प्राप्त धन को प्रजा के हित में व्यय करने वाला राजा किसी देश की प्रजा को सौभाग्य से मिलता है। गोस्वामी तुलसीदास जी का मत है कि राजा को प्रजा से उतना ही कर ग्रहण करना चाहिए, जो न्याय पूर्ण हो। साथ ही कर-रूप में प्राप्त धन को उसे ऐसे कार्य में लगाना चाहिए जिससे प्रजा का कल्याण हो।

15. मान राखिबो माँगिबो पिय सों नित नव नेहु।
तुलसी तीनिउ तब फबैं जौं चातक मन लेहु।।


इस दोहे में तुलसीदास जी  चातक-पक्षी को अत्यंत प्रेम और भक्ति का आदर्श बताते हुए कहते हैं कि सम्मान की रक्षा करना, माँगना और प्रिय नित्य नया-नया प्रेम करना–ये तीनों बातें तब शोभा देती हैं, जब जातक का सिद्धान्त स्वीकार किया जाए। तात्पर्य है कि जैसे जातक केवल अपने प्रिय बादल से ही माँगता है और केवल स्वाति नक्षत्र की बूँद ही पीता है उस बूँद की प्राप्ति के लिए वह बादल से नित्य नया-नया प्रेम जोड़ता है। उसी प्रकार व्यक्ति को भी केवल अपने प्रिय से ही माँगना चाहिए। उसकी इच्छाएँ अल्प होनी चाहिए और इच्छापूर्ति के लिए प्रिय से नया-नया प्रेम जोड़ना चाहिए, तब ही उसके जीवन में सफलता और प्रेम की अनन्यता सिद्ध हो सकती हैं।

16. नहिं जाचत नहिं सेग्रही सीस नाइ नहिं लेइ।
ऐसे मानी मागनेहि को बारिद बिन देइ।।

तुलसीदास कहते हैं कि यह चातक अपने मुख से तो माँगता नहीं और यदि कोई देता है तो आवश्यकता से अधिक ग्रहण नहीं करता। यह कभी इकट्ठा करके नहीं रखता और कभी सिर झुकाकर भी नहीं लेता। ऐसे स्वाभिमानी चातक को बादल के बिना कौन दे सकता है? अर्थात अनन्त जल से परिपूर्ण बादल ही उसकी मौन याचना को समझता है और उसे पूर्ण करता है। इसका दूसरा अर्थ यह है कि प्रभु का सच्चा भक्त पहले तो कुछ माँगता ही नहीं, फिर यदि प्रभु की कृपा से उसे सांसारिक सुख-सम्पदा प्राप्त हो भी जाती है तो वह उसे स्वाभिमान के साथ ग्रहण करता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि स्वाभिमानी भक्त को परमात्मा के अतिरिक्त कौन दे सकता है। स्वामीजी चातक-पक्षी के माध्यम से स्वाभिमानी और एकनिष्ठ भक्तों के गुणों पर प्रकाश डालना चाहते हैं।

17. कबहुंक हौं यहि रहनि रहौगो।
श्री रघुनाथ-कृपाल-कृपा तैं, संत सुभाव गहौगो।।
जथा लाभ संतोष सदा, काहू सों कछु न चहौगो।
परहित निरत निरंतर, मन क्रम बचन नेम निबहौगो।।
परुष बचन अति दुसह स्रवन, सुनि तेहि पावक न दहौगो।
बिगत मान सम सीतल मन, पर-गुन, नहिं दोष कहौगो।।
परिहरि देहजनित चिंता दु:ख सुख समबुद्धि सहौगो।
तुलसीदास प्रभु यहि पथ रहि अबिचल हरिभक्ति
लहौगो।।


प्रस्तुत पद में तुलसीदास जी ने अपने भावी जीवन के विषय में अभिलाषा प्रकट की है और पूछा है कि उन्हें सन्तो जैसा स्वभाव कब प्राप्त होगा, तुलसीदास जी कहते हैं कि क्या कभी मुझे इस प्रकार का जीवन प्राप्त होगा? क्या मैं दयालु रघुनाथजी की कृपा से सन्तों जैसा स्वभाव ग्रहण कर सकूँगा? मुझे अपने परिश्रम से जो कुछ भी प्राप्त हो जाएगा मैं उसी में सदैव सन्तोष मानूँगा और किसी से कभी किसी वस्तु की कामना नहीं करूँगा। मैं मन कर्म और वचन से निरन्तर दूसरों का कल्याण करने में संलग्न रहूँगा और इस नियम का सदैव पालन करता रहूँगा। मैं अपने कानों से अत्यंत कठोर और असहाय वचन सुनकर भी क्रोध की अग्नि में कभी नहीं जलूँगा अर्थात अपमानित होने पर भी क्रोध नहीं करूँगा।

मान अपमान की भावना से दूर हो कर अपने मन को सुख-दुख के प्रभाव से मुक्त और शान्त रखूँगा। मैं सदैव दूसरों के गुणों का वर्णन करूँगा, कभी किसी के दोषों का उल्लंघन नहीं करूँगा। तुलसीदास जी कहते हैं कि मुझे ऐसा जीवन कब मिलेगा, जबकि मैं अपने शरीर से सन्बन्धित चिन्ताओं को छोड़कर दुख और सुख को समान भाव से सहन करूँगा; अर्थात सुख के अवसर पर अहंकार नहीं करूँगा और दुख के समय विचलित नहीं होऊँगा। हे प्रभु! मैं सन्तों के इसी मार्ग पर चलता हुआ भगवान् की अविचल भक्ति कब प्राप्त करूँगा।

7 thoughts on “17+ तुलसीदास के दोहे हिन्दी अर्थ सहित Tulsidas Ke Dohe in Hindi”

    • बहुत ही हृदय विदारक प्रस्तुति।

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  1. जय सीता राम❤️मेरे दिल को छुलिया बहुत ही सुंदर चोपाई है धन्यवाद

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