69+ तुलसीदास के दोहे हिन्दी अर्थ सहित Tulsidas Ke Dohe in Hindi (सर्वश्रेष्ट चौपाई व्याख्या सहित)

इस लेख में 69+ तुलसीदास के दोहे हिन्दी अर्थ सहित Tulsidas Ke Dohe in Hindi दिया गया है। इसमें तुलसीदास के सर्वश्रेष्ट कवितावली, व दोहों (चौपाई) को व्याख्या के साथ सम्मिलित किया गया है।

रामभक्ति शाखा के कवियों में गोस्वामी तुलसीदास सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं इनका प्रमुख ग्रंथ “रामचरितमानस” भारत में ही नहीं, वरन संपूर्ण विश्व में विख्यात है। यह भारतीय धर्म और संस्कृति को प्रतिबिम्बित करने वाला एक ऐसा निर्मल दर्पण है जो संपूर्ण विश्व में एक अनुपम एवं अतुलनीय ग्रंथ के रूप में स्वीकार किया जाता है।

इसलिए तुलसीदास जी न केवल भारत के, वरन सारी मानवता के, सारे संसार के कवि माने जाते हैं। आईये उनके कुछ प्रसिद्द दोहे को पढ़ते हैं और उनका अर्थ समझते हैं।

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69+ तुलसीदास के दोहे हिन्दी अर्थ सहित Tulsidas Ke Dohe in Hindi

कवितवाली 1. पुर तें निकसी रघुबीर-बधू,धरि धीर दये मग में डग द्वै।
झलकीं भरि भाल कनी जल की,पुट सूखि गये मधुराधर वै।।
फिरि बूझति हैं-”चलनो अब केतिक,पर्णकुटी करिहौ कित है?”
तिय की लखि आतुरता पिय की, अँखिया अति चारू चलीं जल च्वै।।

व्याख्या – इस पद में सुकोमल अंगों वाली सीताजी वन-पथ पर जा रही है। उनके मन की व्याकुलता का चित्रण करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं कि राम की प्रिया जानकी ने जैसा ही रात्रि-विश्राम के पश्चात श्रृंगरवेरपुर से बाहर निकलकर बड़े धैर्य के साथ मार्ग में दो कदम रखें अर्थात वह थोड़ी दूर तक चली, वैसे ही उनके पूरे माथे पर पसीने की बूँदें छलक आई और उनके कोमल होंठ सूख गए। तब वे राम से पूछने लगीं कि हमें अभी कितना और चलना है और आप झोपड़ी कहाँ बनाएँगे? पत्नी सीताजी की ऐसी अधीरता देखकर प्रियतम राम की अत्यन्त सुंदर आँखों में आँसू भर आए और उनसे अश्रु प्रवाहित होने लगे।

कवितवाली 2. “जल को गये लक्खन हैं लरिका,परिखौ,पिय!छाँँह घरीक हैं ठाढे।
पोंछि पसेउ बयारि करौं,अरु पायँ पखरिहौं भूभुरि डाढे”।।
तुलसी रघुबीर प्रिया स्रम जानि कै, बैठि बिलंब लौं कंटक काढे।
जानकी नाह को नेह लाख्यौं, पुलको तनु बारि बिलोचन बाढे।।

व्याख्या – श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के साथ वनवास की ओर चल पड़े हैं सीता जी के माथे पर पसीने की बूँदें छलक आई है तुलसीदास जी ने उनकी व्याकुलता और उनके प्रति श्रीराम के प्रेम का सजीव वर्णन इस पद्य में करते हैं। सीता जी कहती हैं कि लक्ष्मण जल लेने के लिए गए हैं अतः कहीं छाँव में खड़े होकर घड़ी भर के लिए उनकी प्रतीक्षा कर ली जाए तब तक मैं आपका पसीना पोछं कर पंखे से हवा किए देती हूँ और बालू से तपे हुए पैर धोए देती हूँ। तुलसीदास जी कहते हैं जब राम ने देखा कि राम जानकी थक गई है तो उन्होंने बहुत देर तक बैठकर उनके पैरों से कांटे निकाले। जानकी सीता ने अपने स्वामी के इतने प्रेम को देखा तो उनका शरीर पुलकित हो उठा और उनकी आँखों में आँसू छल छला आए।

कवितवाली 3. रानी मैं जानी अजानी महा,पबि पाहन हूँ ते कठोर हियो है।
राजहु काज अकाज न जान्यो, कह़ो तिय को जिन कान कियो है।।
ऐसी मनोहर मूरति ये, बिछुरे कैसे प्रीतम लोग जियो है?
आँखिन में सखि! राखिबे जोग, इन्हे किमि कै बनबास दियो है?।।

व्याख्या – इस पद में तुलसीदास जी ग्रामीण स्त्रियों के माध्यम से राजा दशरथ और कैकेयी की निष्ठुरता का वर्णन करते हैं। गांव की एक महिला कहती है कि रानी कैकेयी बड़ी अज्ञानी है उनका हृदय तो पत्थर और व्रज से भी कठोर है उधर राजा दशरथ ने भी उचित-अनुचित का विचार नहीं किया और केवल स्त्री के कहने पर इन्हें वन में भेज दिया यह तो इतनी लुभावनी मूर्तियाँ है कि इनके बिछुड़ने पर इनके परिवार के लोग किस प्रकार जीवित रहे होंगे। हे सखी! यह तो आँखों में रखने योग्य है, अर्थात सदैव दर्शनीय है तो फिर इन्हें वनवास क्यों दे दिया गया?

कवितवाली 4. बैठी सगुन मनावति माता।
कब ऐहैं मेरे बाल कुशल घर ,कहहु ,काग !फुरी बाता।।
दूध भात की दोनों दैहों, सोने चोंच मढ़ैहौं ।
जब सिय- सहित बिलोकि नयन भरि राम –लषण उर लैहौं।।
अवधि समीप जानि जननी जिय अति आतुर अकुलानी।
गनक बोलाइ, पांय परि पुछति प्रेम मगन मृदु बानी।।
तेहि अवसर कोउ भरत निकटते समाचार लै आयो।
प्रभु –आगमन सुनत तुलसि मनो मीन  मरत जल पायो।।

व्याख्या – इस पद में उस समय का वर्णन किया गया है जब श्रीराम अपने वनवास की अवधि को पूरा करके सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या में लौटने वाले हैं और माता कौशल्या उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रही हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि माता कौशल्या बैठी हुई श्रीराम की सकुशल लौटने की प्रतीक्षा कर रही हैं और शकुन मना रही है वह कहती है कि, हे काग! तुम स्पष्ट रुप से बताओ कि मेरे बालक कुशलतापूर्वक कब लौट आएँगे? जब मैं सीता सहित राम और लक्ष्मण को देखकर अपने हृदय से लगा लूँगी, तब मैं तुझे दूध और भात से भरा हुआ दोना दूँगी और तेरी चोच को स्वर्ण से मण्डित कराऊँगी।

जैसे-जैसे श्रीराम के आगमन की अवधि समीप आती जा रही है वैसे-वैसे माता कौशल्या के हृदय की आतुरता और आकुलता बढ़ती जा रही है। वह ज्योतिषी को बुलाकर और उनके चरण-स्पर्श करके, प्रेम से भर कर, सुकोमल वाणी से उनके आने की शुभ घड़ी पूछती है। उसी समय कोई व्यक्ति भरत के पास से राम के आगमन का समाचार लेकर आता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि उस समाचार को सुनकर माता कौशल्या उसी प्रकार चैतन्य हो जाती हैं। जिस प्रकार जल के अभाव में तड़पती हुई मछली को जल मिल जाने पर पुनः जीवन प्राप्त हो जाता है।

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कवितवाली 5. आपु आपु कहँ सब भलो,अपने कहँ कोई कोई।
तुलसी सब कहँ जो भलो,सुजन सराहिय सोई।।

व्याख्या – इस दोहे में तुलसीदास जी ने आज स्पष्ट किया है कि परोपकार करने वाले व्यक्ति की ही इस संसार में सराहना होती है। अपने लिए तो सभी भले होते हैं और सभी अपने लिए भलाई का कार्य करने में लगे रहते हैं। किंतु कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो स्वयं का भला करने के साथ-साथ भी अपने मित्रों एवं सम्बन्धियों के भले के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि इनसे भी श्रेष्ठ वे व्यक्ति होते हैं जो सभी का भला मानकर उनकी भलाई करने में लगे रहते हैं। इस प्रकार के व्यक्तियों की ही सज्जन व्यक्तियों के द्वारा सराहना की जाती है।

कवितवाली 6. सीस जटा उर बाहु बिसाल, बिलोचन लाल तिरछी सी भौंहें।
तून सरासन बान धरे, तुलसी बन-मारग में सुठि सोहैं।।
सादर बारहिं बार सुभाय चितै तुम त्यों हमरो मन मोहैं।
पूछति ग्राम बधू सिय सों ‘कहौ साँवरे से, सखि रावरे को हैं?’।।

व्याख्या – इस पद में तुलसीदास जी कहते हैं कि ग्रामीण वधुएँ सीता जी से पूछती हैं कि जिनके सिर पर जटाएँ हैं, जिनकी भुजाएँ और वक्षस्थल विशाल हैं, जिनके नेत्र लाल हैं, जिनकी भौंहें तिरछी हैं, जिन्होंने तरकस, धनुष और बाण सँभाल रखे हैं, जो वन के रास्ते में भली प्रकार सुशोभित हो रहे हैं तथा जो बार-बार आदर और चाव के साथ तुम्हारी ओर देखते हुए हमारे मन को मोहित कर रहे हैं, हे सखी! बताओ तो सही, वे साँवले से तुम्हारे कौन लगते है ?

कवितवाली 7. सुनि सुन्दर बैन सुधारस-साने, सयानी हैं जानकी जानी भली।
तिरछे करि नैन दै सैन तिन्हें समुझाई कछू मुसकाइ चली।।
तुलसी तेहि औसर सोहै सबै अवलोकति लोचन-लाहु अली।
अनुराग-तड़ाग में भानु उदै बिगसीं मनो मंजुल कंज-कली।।

व्याख्या – गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं गांव की स्त्रियों की अमृतमयी वाणी सुनकर जानकी जी समझ गई हैं कि यह स्त्रियाँ बहुत चतुर है घुमा फिरा कर प्रभु के साथ मेरा सम्बन्ध जानना चाहती है। अतः इन्होंने मर्यादा का पालन करते हुए संकेतों के द्वारा उन्हें बता दिया। अपने नेत्र तिरक्षे करके, इशारा करके कुछ समझा कर सीताजी मुस्कुराती हुई आगे बढ़ गई। तुलसीदास जी कहते हैं कि उस अवसर पर वे स्त्रियाँ उनके दर्शन को स्वयं का लाभ मानकर राम की ओर टकटकी लगाए हुए देखती हुई ऐसी शोभा पा रही थी मानो सूर्योदय होने पर प्रेम के तालाब में सुंदर कमल की कलियाँ खिल-खिला उठी हो।

कवितवाली 8. विंध्य के वासी उदासी तपोव्रत धारी महा बिनु नारि दुखारे।
गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि में वृन्द सुखारे।।
है है शिला सब चंद्र मुररी पखी पद मंजुल कंज तिहारे।
कीन्ही भली रघुनायक जूं कंरूना करि कानन कौ पग धारे।।

व्याख्या – तुलसीदास जी ने इस पद में वनवासी साधुओं के साथ कोमल परिहास करते हुए कहा है कि विंध्याचल पर रहने वाले उदास तपस्वी बिना स्त्री के अत्यधिक दुखी जीवन बिता रहे हैं। जब उन्होंने गौतम की स्त्री अहिल्या के तर जाने की कथा सुनाई तो उन मुनियों को अत्यधिक सुख मिला। वे राम से कहने लगे कि आपने बड़ी कृपा की, जो आप वन में चले आए। हे राम! आपके सुंदर चरण-कमलों की स्पर्श पाकर यहाँ की सारी शिलाएँ चंद्रमुखी स्त्रीयाँ बन जाएँगी और तब हमारा अकेलापन दूर हो जाएगा

कवितवाली 9. जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।
काको नाम पतित पावन जग, केहि अति दीन पियारे।
कौनहुँ देव बड़ाइ विरद हित, हठि हठि अधम उधारे।
खग मृग व्याध पषान विटप जड़, यवन कवन सुर तारे।
देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज, सब माया-विवश बिचारे।
तिनके हाथ दास ‘तुलसी’ प्रभु, कहा अपुनपौ हारे।

व्याख्या – इस पद में गोस्वामी जी कहते हैं राम के चरणों को छोड़कर कहीं भी जाना उचित नहीं है। तुलसीदास जी कहते हैं कि हे नाथ! आपके चरणों को छोड़कर मैं और कहाँ जाऊँ। इस संसार में आपके जैसा पतित-पावन नाम और किसका है। आपके समान और कोई भी तो नहीं है जो दीनों को इतना प्यार करता हो। आज तक किस देवता ने अपने प्रण की लाज रखने के लिए हठपूर्वक पापियों का उद्धार किया है और किस देवता ने पक्षी(जटायु),पशु(रीछ,वानर) व्याध(वाल्मीकी),पत्थर(अहिल्या),जड़ वृक्ष(यमलार्जुन) और यवनो(राक्षसों) का उध्दार किया है। गोस्वामी जी कहते हैं कि देवता,दैत्य,मुनि,नाग,मनुष्य आदि बेचारे माया के अधीन है फिर मैं स्वयं को उनके हाथों में क्यों सौंपू ? जब वे स्वयं ही माया के बस में है, तब दूसरों का उद्धार कैसे कर सकते हैं।

कवितवाली 10. बनिता बनी स्यामल गौर के बीच,कवितवाली,री सखि! मोहि-सी ह्वै।
मनुजोगु न कोमल, क्यों चलिहै, सकुचाति मही पदपंकज छ्वै।।
तुलसी सुनि ग्रामबधू बिथकीं, पुलकीं तन, औ चले लोचन च्वै।
सब भाँति मनोहर मोहनरूप, अनूप हैं भूपके बालक द्वै।।

व्याख्या – वन-मार्ग पर सीता और लक्ष्मण के साथ श्रीराम जा रहे हैं। ग्रामीण स्त्रियाँ सीता की सुकुमारता को देखती हैं और कहती हैं। हे सखी! इन साँवले और गोरे कुमारों के बीच में जो स्त्री बड़ी सुन्दर लग रही है, उसे मेरी आँखों से देखो। वह इतनी कोमल है कि वह वन के मार्ग में चलने योग्य नहीं है। उसके चरण-कमलों का स्पर्श करके पृथ्वी संकुचित हो रही है। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह बातें सुनकर गाँव की सभी स्त्रियाँ विहव्ल हो उठी हैं, उनका शरीर रोमांचित हो उठा है और उनकी आँखों में झर झर आँसू बहने लगे। सब कहने लगी कि ये दोनों राजकुमार बहुत ही सुंदर और सबका मन मोह लेने वाले हैं। यह इस कष्टदायी पथ पर चलकर वन में गमन किस प्रकार करेंगे

कवितवाली 11. साँवरे-गोरे सलेाने सुभायँ, मनोहरताँ जिति मैनु लियो है।
बान-कमान, निषंग कसें, सिर सोहैं जटा, मुनिबेषु कियेा है।।
संग लिएँ बिधुबैनी बधू, रतिको जेहि रंचक रूप दियो है।
पायन तौ पनहीं न, पयादेहिं क्यों चलिहैं, सकुचात हियो है।

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व्याख्या – ग्रामीण युवतियाँ कहती हैं कि यह साँवले और गोरे बालक स्वभाव से भी बड़े सुन्दर हैं। मनोहरता में तो इन्होंने कामदेव को भी जीत लिया है। इन्होंने हाथ में धनुष-बाण लिया हुआ है और इनकी कमर में तरकश कसा हुआ हैं। इनके सिर पर जटाएँ सुशोभित हो रही है और यह मुनियों जैसे वेश बनाए हुए हैं। इनके साथ चंद्रमुखी सुन्दरी है, उसे देखकर ऐसा लगता है कि उसी ने मानो रति को थोड़ा-सा रूप दे दिया  हैं। इनके पैरों में चरण पादुका तक नहीं है। इन्हें देखकर हमारा हृदय संकुचित हो रहा है कि ये लोग जंगल में पैदल कैसे चल पाएँगे ?

कवितवाली 12. ऐसो को उदार जग माहीं।
बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर राम सरिस कोउ नाहीं।।
जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी।
सो गति देत गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी।।
जो संपति दस सीस अरप रावन सिव पहँ लीन्हीं।
सो संपदा बिभीषन कहँ अति सकुच-सहित हरि दीन्हीं।।
तुलसिदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो।
तौ भजु राम, काम सब पूरन करैं कृपानिधि तेरो।।

व्याख्या – गोस्वामी तुलसीदास ने परम उदार श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का वर्णन करते हुए कहा है कि इस संसार में श्रीरामचन्द्रजी के समान उदार और कोई भी नहीं है, जो बिना सेवा के अपने दीन भक्तों पर द्रवित होता हो। बड़े-बड़े मुनि और ज्ञानी, योग और वैराग्य द्वारा भी जिस मुक्ति को प्राप्त नहीं किये जा सकते, वह मुक्ति श्रीरामचन्द्रजी गिद्ध और शबरी तक को दे देते हैं और हृदय में उसे बड़ा कार्य नहीं मानते। अपने 10 सिर अर्पित करके रावण ने जिस सम्पत्ति को शिव से प्राप्त किया था, उसी संपत्ति को श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण को अत्यधिक संकोच के साथ भेंट किया। तुलसीदास जी अपने मन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे मेरे मन! यदि तुम सब प्रकार से सुख चाहता है तो श्रीरामजी का भजन कर। वे कृपासागर राम तेरी सब कामनाओं को पूर्ण कर देंगे।

दोहा 13. हरे चरहिं, तापाहं बरे, फरें पसारही हाथ।
तुलसी स्‍वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ।।

व्याख्या – गोस्वामी जी ने वृक्षों के माध्यम से संसार में प्राणियों की स्वार्थी प्रवृत्ति का चित्र अंकित किया है। वह कहते हैं कि इस संसार में जब वृक्ष हरे भरे होते हैं, तब पशु-पक्षी उन्हें चर लेते हैं। वे ही वृक्ष जब सूख जाते हैं तो लोग उन्हें जलाकर तापने लगते हैं और उन वृक्षों पर जब फल लगते हैं तो लोग हाथ फैलाकर उनसे फल ले लेते हैं। इस प्रकार प्राणी सब प्रकार से अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि परमार्थ के मित्र तो केवल श्री रघुनाथजी ही हैं, जो हर समय प्रेम करते हैं और दीन-स्थिति में तो विशेष रूप से प्रेम करते हैं।

दोहा 14. बरषत, हरषत लोग सब, करषत लखै न कोई।
तुलसी प्रजा सुभाग ते, भूप भानु सो होई
।।

व्याख्या – प्रस्तुत दोहे में तुलसीदास जी ने सूर्य के माध्यम से अच्छे राजा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि सूर्य जब पृथ्वी से जल को ग्रहण करता है, तो उसे कोई नहीं देखता परन्तु वह सूर्य जब जल बरसाता है, तब लोग प्रसन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार सूर्य के समान न्यायपूर्ण ढंग से कर ग्रहण करने वाला और उस कर के रूप में प्राप्त धन को प्रजा के हित में व्यय करने वाला राजा किसी देश की प्रजा को सौभाग्य से मिलता है। गोस्वामी तुलसीदास जी का मत है कि राजा को प्रजा से उतना ही कर ग्रहण करना चाहिए, जो न्याय पूर्ण हो। साथ ही कर-रूप में प्राप्त धन को उसे ऐसे कार्य में लगाना चाहिए जिससे प्रजा का कल्याण हो।

दोहा 15. मान राखिबो माँगिबो पिय सों नित नव नेहु।
तुलसी तीनिउ तब फबैं जौं चातक मन लेहु।।

व्याख्या – इस दोहे में तुलसीदास जी  चातक-पक्षी को अत्यंत प्रेम और भक्ति का आदर्श बताते हुए कहते हैं कि सम्मान की रक्षा करना, माँगना और प्रिय नित्य नया-नया प्रेम करना–ये तीनों बातें तब शोभा देती हैं, जब जातक का सिद्धान्त स्वीकार किया जाए। तात्पर्य है कि जैसे जातक केवल अपने प्रिय बादल से ही माँगता है और केवल स्वाति नक्षत्र की बूँद ही पीता है उस बूँद की प्राप्ति के लिए वह बादल से नित्य नया-नया प्रेम जोड़ता है। उसी प्रकार व्यक्ति को भी केवल अपने प्रिय से ही माँगना चाहिए। उसकी इच्छाएँ अल्प होनी चाहिए और इच्छापूर्ति के लिए प्रिय से नया-नया प्रेम जोड़ना चाहिए, तब ही उसके जीवन में सफलता और प्रेम की अनन्यता सिद्ध हो सकती हैं।

16. नहिं जाचत नहिं सेग्रही सीस नाइ नहिं लेइ।
ऐसे मानी मागनेहि को बारिद बिन देइ।।

व्याख्या – तुलसीदास कहते हैं कि यह चातक अपने मुख से तो माँगता नहीं और यदि कोई देता है तो आवश्यकता से अधिक ग्रहण नहीं करता। यह कभी इकट्ठा करके नहीं रखता और कभी सिर झुकाकर भी नहीं लेता। ऐसे स्वाभिमानी चातक को बादल के बिना कौन दे सकता है? अर्थात अनन्त जल से परिपूर्ण बादल ही उसकी मौन याचना को समझता है और उसे पूर्ण करता है। इसका दूसरा अर्थ यह है कि प्रभु का सच्चा भक्त पहले तो कुछ माँगता ही नहीं, फिर यदि प्रभु की कृपा से उसे सांसारिक सुख-सम्पदा प्राप्त हो भी जाती है तो वह उसे स्वाभिमान के साथ ग्रहण करता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि स्वाभिमानी भक्त को परमात्मा के अतिरिक्त कौन दे सकता है। स्वामीजी चातक-पक्षी के माध्यम से स्वाभिमानी और एकनिष्ठ भक्तों के गुणों पर प्रकाश डालना चाहते हैं।

कवितवाल 17. कबहुंक हौं यहि रहनि रहौगो।
श्री रघुनाथ-कृपाल-कृपा तैं, संत सुभाव गहौगो।।
जथा लाभ संतोष सदा, काहू सों कछु न चहौगो।
परहित निरत निरंतर, मन क्रम बचन नेम निबहौगो।।
परुष बचन अति दुसह स्रवन, सुनि तेहि पावक न दहौगो।
बिगत मान सम सीतल मन, पर-गुन, नहिं दोष कहौगो।।
परिहरि देहजनित चिंता दु:ख सुख समबुद्धि सहौगो।
तुलसीदास प्रभु यहि पथ रहि अबिचल हरिभक्ति
लहौगो।

व्याख्या – प्रस्तुत पद में तुलसीदास जी ने अपने भावी जीवन के विषय में अभिलाषा प्रकट की है और पूछा है कि उन्हें सन्तो जैसा स्वभाव कब प्राप्त होगा, तुलसीदास जी कहते हैं कि क्या कभी मुझे इस प्रकार का जीवन प्राप्त होगा? क्या मैं दयालु रघुनाथजी की कृपा से सन्तों जैसा स्वभाव ग्रहण कर सकूँगा? मुझे अपने परिश्रम से जो कुछ भी प्राप्त हो जाएगा मैं उसी में सदैव सन्तोष मानूँगा और किसी से कभी किसी वस्तु की कामना नहीं करूँगा। मैं मन कर्म और वचन से निरन्तर दूसरों का कल्याण करने में संलग्न रहूँगा और इस नियम का सदैव पालन करता रहूँगा। मैं अपने कानों से अत्यंत कठोर और असहाय वचन सुनकर भी क्रोध की अग्नि में कभी नहीं जलूँगा अर्थात अपमानित होने पर भी क्रोध नहीं करूँगा।

मान अपमान की भावना से दूर हो कर अपने मन को सुख-दुख के प्रभाव से मुक्त और शान्त रखूँगा। मैं सदैव दूसरों के गुणों का वर्णन करूँगा, कभी किसी के दोषों का उल्लंघन नहीं करूँगा। तुलसीदास जी कहते हैं कि मुझे ऐसा जीवन कब मिलेगा, जबकि मैं अपने शरीर से सन्बन्धित चिन्ताओं को छोड़कर दुख और सुख को समान भाव से सहन करूँगा; अर्थात सुख के अवसर पर अहंकार नहीं करूँगा और दुख के समय विचलित नहीं होऊँगा। हे प्रभु! मैं सन्तों के इसी मार्ग पर चलता हुआ भगवान् की अविचल भक्ति कब प्राप्त करूँगा।

दोहा 18. बिना तेज के पुरुष की,… अवशि अवज्ञा होय।
आगि बुझे ज्यों राख की,… आप छुवै सब कोय।
अर्थ –  उपरोक्त पंक्ति में तुलसीदास जी कहते हैं, कि  किसी व्यक्ति को तभी तक सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होता है जब तक उसके पास ज्ञान रूपी तेज स्वरूप कोई अनमोल गुण हो। यदि एक बार मनुष्य के भीतर से वह उज्जवल तेज नष्ट हो जाता है, तो कोई भी उसका आदर सम्मान नहीं करता और ना ही उसकी आज्ञा का पालन होता है। ऐसे लोगों को समाज में केवल दुत्कारा जाता है। ठीक उसी प्रकार जब तक आग जलने तक उसे छूने का दुस्साहस कोई नहीं करता, लेकिन जैसे ही आग बुझ जाती है सभी राख को छूने लगते हैं।

दोहा 19. काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान ।
तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान ।।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं, कि जिस मनुष्य के भीतर क्रोध, अहंकार और लालच की भावना होती है, चाहे वह ज्ञानी पंडित ही क्यों ना हो उसकी तुलना हमेशा मूर्खों से ही की जा सकती है, क्योंकि इतना ज्ञान का भंडार पाकर भी लोग काम क्रोध और लोभ के मुंह में जकड़े हो तो वे मूर्ख ही कहलाएंगे।

दोहा 20. तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक ।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक ।।

अर्थ – मनुष्य के कठिन परिस्थितियों में सहाय करने वाली कुछ आवश्यक चीजों पर तुलसीदास जी लोगों को एक संदेश दे रहे हैं कि जीवन में चाहे कितनी भी विकट परिस्थिति क्यों ना आ जाए कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जो मनुष्य को मुश्किल वक्त में भी सहायता करती हैं। ज्ञान, विनम्र स्वभाव, सत्कर्म, विवेक, सत्य और भगवान श्री रामचंद्र का नाम यह सभी मनुष्य को संकट से उबारने का अतुल्य कार्य करती हैं।

दोहा 21. सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत ।
श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत ।।

अर्थ – वह कुल जिसमें स्वयं भगवान रामचंद्र जी ने जन्म लिया, हे उमा वह धरती पूरे संसार में सबसे पवित्र और पूजनीय है। इस पावन धरती पर निस्वार्थ और विनम्र आत्माएं जन्म लेती हैं

दोहा 22. मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन ।
अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥

अर्थ – भगवान श्री रामचंद्र की प्रशंसा करते हुए भक्त सूरदास जी कहते हैं, कि सच्चा भक्त कभी भी अपने आराध्य पर किसी प्रकार का संदेह नहीं करता वह केवल निस्वार्थ होकर राम नाम जपता है। श्री रामचंद्र बड़े ही मायावी हैं, जो एक छोटे से मच्छर को ब्रह्मा का रूप दे सकते हैं और स्वयं परम ब्रह्मा को एक मच्छर में बदल सकते हैं। विवेकवान भक्त बिना अपने प्रभु पर शंका किए, संसार में सब कुछ त्याग कर केवल उन्हीं की स्तुति करते हैं।

दोहा 23. सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥
काँच किरिच बदलें ते लेहीं । कर ते डारि परस मनि देहीं ॥

अर्थ – मानव जन्म बड़े ही सौभाग्य से प्राप्त होता है, जिसे उचित कार्य में लगाने का विवेक ही जीवन की नैया पार करता है। सूरदास जी मानव शरीर पाने के अनमोल लाभ को प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि जो लोग मनुष्य शरीर पाकर भी भगवान राम का भजन कीर्तन नहीं करते उनकी, आराधना नहीं करते और सदा ही सांसारिक मोह माया में झूलते रहते हैं वे उन्हीं बेवकूफो जैसा व्यवहार करते हैं, जो अनमोल पारस मणि रत्न मिलने पर उसे फेंक देते है और कांच के टुकड़ों को मूल्यवान समझ कर अपने साथ रख लेते है।

दोहा 24. बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि।
सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि।।

अर्थ – किसी के भी भौतिक रूपरेखाओं को देख कर  उसके विषय में एक निश्चित धारणा नहीं बनानी चाहिए क्योंकि स्वच्छ और सुंदर वस्त्र धारण करने वाले नर नारी के मन की भावना कैसी है यह उनके दिखावे से स्पष्ट नहीं किया जा सकता। क्योंकि मन में तमाम प्रकार के दुर्गुण भरे हुए रावण, पूतना, मारीच और सूर्पनखा के वस्त्र बेहद शाही और स्वच्छ थे, लेकिन उनके मन में बुरी भावनाएं थी।

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दोहा 25. मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ।।

अर्थ – उपरोक्त दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि एक कुटुंब के मुखिया के गुण मुख के जैसा होना चाहिए, जो भोजन को ग्रहण करके अपने सभी इंद्रियों तथा बुद्धि का पालन पोषण करता है। क्योंकि मुंह के जरिए ही भोजन पूरे शरीर में जाता है, जिससे मानव का विकास होता है ठीक उसी प्रकार मुखिया को भी अपने परिवार के सभी सदस्य का पालन पोषण इसी भांति करना चाहिए।

दोहा 26. तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि
।।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं कि लोग अक्सर दूसरों के पहनावे और रूप रंग को देखकर उसके विषय में एक निश्चित धारणा तैयार कर लेते हैं, जो वास्तविकता के बिल्कुल विपरीत होता है। किसी मनुष्य के साथ सुंदर वस्त्र देखकर केवल मूर्ख ही नहीं बल्कि बुद्धिमान भी एक बार धोखा खा जाते हैं। पक्षियों में सबसे सुंदर पक्षी मोर को माना जाता है जो कि उसके सुंदर रंग बिरंगे पंखों तथा मधुर वाणी के कारण होता है। लेकिन उसकी सुंदरता को देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि मोर भोजन में सांप खाता है।

दोहा 27. तुलसी जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।

अर्थ – उपरोक्त पंक्ति में तुलसीदास जी कहते हैं कि ऐसे कुटिल और दुराचारी लोग जो दूसरों को अपमानित करके उसकी निंदा करते हैं, लेकिन बदले में खुद सम्मान और प्रतिष्ठा पाने की भावना रखते हैं ऐसे लोगों के मुंह पर कलंक लग जाता है, जिसे लाखों बार धोने के पश्चात भी नहीं हटाया जा सकता।

दोहा 28. सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास
।।

अर्थ – तुलसीदास जी साहित्य के साथ-साथ राजनीति का भी ज्ञान रखते हैं जिन्होंने अपनी इस पंक्ति में शत प्रतिशत सत्य बात कही है। तुलसीदास कहते हैं कि ज्ञान देने वाला शिक्षक, रोगों का इलाज करने वाला चिकित्सक और सलाह देने वाले सलाहकार यदि यह तीनों ही लालच और झूठ फरेब से परिपूर्ण हो, तो ऐसी परिस्थिति में धर्म, शरीर और राज्य तीनों का नाश होना निश्चित है।

दोहा 29. सो केवल भगतन हित लागी । परम कृपाल प्रनत अनुरागी ।
जेहि जन पर ममता अति छोहू । जेहि करूना करि कीन्ह न कोहू ।

अर्थ – ईश्वर वास्तव में परम कृपालु हैं, जो समय समय पर अपने भक्तों को ज्ञान का संदेश देने के लिए लीलाएं रचते हैं। भक्तों पर भगवान सदा ही दया और करुणा की भावना रखते हैं। कभी भी वे अपने भक्तों से रूठते नहीं और ना ही उन पर क्रोध करते हैं वास्तव में ईश्वर बड़े दयालु हैं।

दोहा 30. जपहिं नामु जन आरत भारी । मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ।
राम भगत जग चारि प्रकारा । सुकृति चारिउ अनघ उदारा ।

अर्थ – इस संसार में जो कोई भी ईश्वर का नाम सच्चे ह्रदय से लेता है, उसे सुख की प्राप्ति होती है और हर संकट का नाश होता है। समस्त संसार में चार प्रकार के रामभक्त पाए जाते हैं पहले अर्थार्थी अर्थात वे लोग जो धन आदि के लोभ के कारण राम भक्ति करते हैं, दूसरे आर्त अर्थात ऐसे लोग जो विपत्तियों से बचने के लिए भक्ति करते हैं, तीसरे जिज्ञासु भक्त होते हैं जो ईश्वर की तलाश करते हैं और चौथे वे जो ज्ञान के लिए भक्ति करते हैं

दोहा 31. एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानन्द पर धामा।
ब्यापक विश्वरूप भगवाना । तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ।

अर्थ –  उपरोक्त दोहे में तुलसीदास जी परम ब्रह्मा को वर्णित करते हुए कहते हैं कि ईश्वर केवल एक हैं जिनका कोई रूप नहीं है अर्थात वे निर्विकार है। उनका ना कोई नाम है और ना ही कोई आकांक्षा। परमानंद तथा अजन्मा के वे परमधाम है। भगवान केवल एक स्थान पर नहीं अपितु सर्वव्यापी है। धरती लोक का कल्याण करने के लिए उन्होंने कई रूप लिए हैं, सैकड़ों शरीर धारण किए हैं और लीलाओं के जरिए मनुष्य का उद्धार किया है।

दोहा 32. कुलिस कठोर निठुर सोई छाती । सुनि हरि चरित न जो हरसाती

अर्थ – ऐसे लोग जो भगवान के चरित्र से प्रभावित होकर भी प्रसन्न नहीं होते, उनका ह्रदय ब्रज के समान बड़ा ही कठोर तथा भावना हीन प्रकृति का होता है।

दोहा 33. हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहु बिधि सब संता।
रामचंन्द्र के चरित सुहाए।कलप कोटि लगि जाहि न गाए।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं, कि ईश्वर की कथा तथा वे अनंत है। साधु संत जिनकी चर्चा और प्रशंसा करते हैं, वे भगवान के अनेकों प्रकार मानते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जैसे देवीय चरित्र तथा गुणों की प्रशंसा करोड़ों युगो तक किया जाए तभी भी पूरी नहीं हो सकेगी।

दोहा 34. प्रभु जानत सब बिनहि जनाएँ ।कहहुॅ कवनि सिधि लोक रिझाए।

अर्थ – अर्थात भगवान तो बिना बताए ही सब कुछ समझ जाते है। अतः वास्तविकता से परे होकर केवल दिखावट के लिए संसार को प्रसन्न करने से ईश्वर की प्राप्ति और सिद्धि नहीं मिलती है।

दोहा 35. सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।

अर्थ – उपरोक्त पंक्ति में तुलसीदास जी कहते हैं कि इस जगत में सभी मित्र तथा शत्रु, दुख सुख और मोह माया झूठ फरेब है, जिनका वास्तविकता से कोई मेल नहीं है।

दोहा 36. सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।

अर्थ – मुनि, मनुष्य तथा देवता चाहे जो भी हो सभी केवल अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए ही स्नेहा करते हैं।।

दोहा 37. जिन्ह हरि भगति हृदय नहि आनी । जीवत सब समान तेइ प्राणी ।
जो नहि करई राम गुण गाना । जीह सो दादुर जीह समाना ।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं, कि जिस इंसान ने प्रभु की भक्ति को अपने दिल में जगह नहीं दिया वह जीवित होते हुए भी एक मुर्दे के समान ही होता है। ऐसे मनुष्य जिनके जिह्वा पर प्रभु का नाम ना हो उनकी जीभ मेढक की भांति होती हैं।

दोहा 38. सगुनहि अगुनहि नहि कछु भेदा । गाबहि मुनि पुराण बुध भेदा।
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बश सगुन सो होई।

अर्थ – उपरोक्त दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि  मुनि पुराण पंडित वेद के मुताबिक सगुण तथा निर्गुण यह दोनों एक ही चीजें होती हैं। वह शक्ति जो निराकार निर्गुण है, जिसका न कोई जन्म और ना ही कोई अंत है वह भक्ति प्रेम के परिणाम स्वरूप सगुण में परिवर्तित हो जाता है।

दोहा 39. तपबल तें जग सुजई बिधाता। तपबल बिश्णु भए परित्राता।
तपबल शंभु करहि संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा।

अर्थ – तपोबल अर्थात तपस्या में इतनी शक्ति होती है कि उससे कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। तुलसीदास जी तपस्या के प्रभाव को बताते हुए कहते हैं कि परम पिता परम ब्रह्मा ने भी बल के सहायता से ही सृष्टि की रचना की, तपस्या के कारण ही महाकाल जगत का संहार करते हैं तथा तपबल के कारण ही नारायण भी इस संसार का उद्धार करते हैं।

दोहा 40. करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी।
व्यापकु ब्रह्मु अलखु अविनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी।

अर्थ – क्रोध, मोह माया तथा घमंड को त्याग कर योगी पुरुष जिस परम ब्रह्म की उपासना करते हैं, वह शक्ति सर्वव्यापी ब्रह्मा अविनाशी चिदानंद निर्गुण तथा गुणों के भंडार हैं।

दोहा 41. हरि ब्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रगट होहिं मै जाना।
देस काल दिशि बिदि सिहु मांही। कहहुॅ सो कहाॅ जहाॅ प्रभु नाहीं।

अर्थ – संसार में ऐसा कोई भी कोना नहीं है, जहां भगवान विराजमान ना हो। ईश्वर सर्वव्यापी है और वे समान रूप से सभी जगह उपस्थित हैं। सच्चे हृदय से पुकारने पर वे प्रकट होते हैं। देश-विदेश तथा सभी दिशाओं में भगवान का ही वास है।

दोहा 42. मन समेत जेहि जान न वानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुॅ काल एकरस रहई।

अर्थ – ईश्वर वह शक्ति हैं, जिन्हें परिभाषित करने के लिए सच्चे मन से व्यक्त किए गए शब्द भी कम पड़ जाते हैं। परम ब्रह्मा के विषय में कोई भी अनुमान लगाया नहीं जा सकता है। वेदों में नेति शब्द से परम ब्रह्मा के महिमा को व्यक्त किया जाता है, जो सदा ही एकरस निर्विकार रूप में है।

दोहा 43. जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि विलोकत पातक भारी।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरू समाना।

अर्थ – कोई मित्रता में अपने मित्र के दुखों को देखकर निराश ना हो उसे केवल देखना मात्र पाप है। यह बहुत ही पवित्र बंधन होता है इसीलिए अपने संकटों के सामने अपने मित्र के दुखों को अधिक महत्व देना चाहिए। अपनी दिक्कतों को केवल भूल मात्र समझकर अपने सखा के संकटो को विशाल सुमेरु पर्वत के समान देखना चाहिए।

दोहा 44. देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।
विपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।

अर्थ – उपरोक्त दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि सच्चे मित्र से लेन-देन में कभी शंका नहीं करनी चाहिए। जितना हो सके अपने क्षमता के अनुसार हमेशा अपने मित्र की मदद करनी चाहिए। वेदों में ऐसा वर्णित है कि एक सच्चे मित्र की पहचान यही है कि संकट के समय में सौ गुना मित्र को स्नेह और सहायता करनी चाहिए।

दोहा 45. आगें कह मृदु वचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई।
जाकर चित अहिगत सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।

अर्थ – जो व्यक्ति अपने मित्र के सामने बहुत ही बनावटी और मिठास बोली बोलता है, लेकिन पीठ पीछे केवल बुराई करता है, ऐसे लोगों का सांप की भांति वक्र चाल होता है। ऐसे विषैले मित्रों को त्याग देने में ही समझदारी होती है।

दोहा 46. सुभ अरू असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।
समरथ कहुॅ नहि दोश् गोसाईं। रवि पावक सुरसरि की नाई।

अर्थ – गंगा में अपवित्र और पवित्र यह दोनों प्रकार के ही जल मिश्रित होकर बहते हैं, लेकिन गंगा को कोई भी विषैला अथवा अपवित्र नहीं मानता। जिस तरह सूर्य, अग्नि और गंगा के गुणों पर कोई उंगली नहीं उठाता उसी तरह एक समर्थ व्यक्ति को कोई दोष नहीं देता है।

दोहा 47. बडे सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं।
जलधि अगाध मौलि बह फेन। संतत धरनि धरत सिर रेनू।

अर्थ – उपरोक्त दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि छोटो के प्रति बड़ों के मन में केवल कृपा और स्नेह की भावना रहती है, जिस तरह पहाड़ की चोटी पर सदा घास, विशाल समुद्र में झाग तथा धरती के उपर हमेशा रज कण जमा रहता है।

दोहा 48. बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चाहै नाग अरि भागू।
जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै शिव द्रोही।

लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई।

अर्थ – अगर पक्षीराज गरुड़ का निवाला कौवा तथा शेर का निवाला खरगोश खाने की इच्छा करें, व्यर्थ बातों पर हमेशा गुस्सा करने वाला कुशलता की कामना करें, महाकाल से रुष्ट होकर कोई धन की कामना करें तथा लालची कृति और कामी व्यक्ति कलंक और बदनामी की कामना ना करें तो भी इन सभी की इच्छाएं केवल इच्छा रह जाती हैं, जो कभी पूर्ण नहीं होती हैं।

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दोहा 49. मातु पिता गुर विप्र न मानहिं। आपु गए अरू घालहिं आनहि।
करहिं मोहवस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।

अर्थ – तुलसीदास जी दुष्ट लोगों के प्रति कटाक्ष करते हुए कहते हैं, कि ऐसे दुर्जन लोग माता पिता, गुरु और ब्राह्मण को कुछ नहीं समझते। ऐसे लोगों की मति तो भ्रष्ट रहती ही है और दूसरों को भी अपनी संगति से दूषित करते हैं। ऐसे बुरे विचारों वाले लोगों को साधु संत की संगति तथा ईश्वर की कथाएं पसंद नहीं होती।

दोहा 50. अवगुन सिधुं मंदमति कामी। वेद विदूसक परधन स्वामी।
विप्र द्रोह पर द्रोह बिसेसा। दंभ कपट जिए धरें सुवेसा।

अर्थ – इस दुनिया में ऐसे कुछ लोग होते हैं, जिनका लिबास दिखने में तो अत्यंत सुंदर होता है लेकिन उनके ह्रदय में छल कपट और ईश्या कूट-कूट कर भरी रहती है। ऐसे लोग दुर्गुणों के भंडार होते हैं। विवेक हीनता, कामवासना के जाल में फंसे हुए सदा ही वेदों की निंदा करते हैं, बल प्रयोग दूसरों की संपत्ति हथियाते हैं। ऐसे दुर्जन खासकर ब्राह्मणों के दुश्मन होते हैं। ऐसे पापी लोग जल्दी पहचान में नहीं आते क्योंकि वे अंदर से कुछ अलग लेकिन बाहर से कुछ अलग होते हैं

दोहा 51. भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सत संगति संसृति कर अंता।

अर्थ – उपरोक्त पंक्ति में कविवर कहते हैं, कि अमृत रूपी भक्ति समस्त सुखों का भंडार है। किंतु इन सभी को बिना संतों के मार्गदर्शन के प्राप्त कर पाना बहुत मुश्किल होता है। पुण्य कार्य किए बिना संतो की दुर्लभ संगति नहीं मिलती। इस संसार में केवल साधु संत ही होते हैं जो जन्म मरण के चक्रव्यू से दूसरों को मुक्त कर सकते हैं।

दोहा 52. काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।
वयरू अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों।

अर्थ – दुष्ट व्यक्ति काम, क्रोध, अहंकार तथा लालच के गुलाम होते हैं, जिनके ह्रदय में दूसरों के प्रति छल- कपट और क्रूरता तथा पाप का खदान होता है।

दोहा 53. तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान की भक्ति करने में जितना सुख और आनंद प्राप्त होता है यदि स्वर्ग के तमाम प्रकार के सुखों को एक तराजू में रखकर सत्संग के खुशी से तुलना की जाए तो सदा ही भक्ति भाव का पलड़ा भारी होता है।

दोहा 54. झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चवेना।
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा।

अर्थ – दृष्ट मनुष्य का लेने देन दोनों ही मिथ्या अथवा झूठ है। उसके भोजन से लेकर उसकी कही गई बातें सब झूठ होती हैं। क्योंकि जिस तरह मनमोहक दिखने वाला मोर अपनी मीठी बोली के अलावा बड़ा ही कठोर हृदय का होता है, जो जहरीले सांपों को अपना खाना बनाता है। इस प्रकार जो अत्यंत मधुर और अच्छी-अच्छी बातें करते हैं वह हृदय से बड़े ही क्रूर और झूठे होते हैं।

दोहा 55. सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।
कवि कोविद गावहिं असि नीति। खल सन कलह न भल नहि प्रीती।

अर्थ – तुलसीदास जी के अनुसार कवि और पंडित नीति के मुताबिक दुष्ट व्यक्ति से ना ही दुश्मनी अच्छा होता है और नहीं मित्रता। एक विवेकवान व्यक्ति की यही पहचान है, कि वह दुष्टों की संगति ना करें।

दोहा 56. आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह ।
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह ।।

अर्थ – अर्थात जिस घर में जाने पर सम्मान न प्राप्त हो और वहां के लोगों के मुख पर प्रसन्नता ना हो तथा वहां के लोगों के नेत्र में आपके प्रति स्नेह ना हो ऐसी जगह पर भूल कर भी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहां कंचन की वर्षा ही क्यों ना हो रही हो।

दोहा 57. जेहि ते नीच बड़ाई पावा।सो प्रथमहिं हति ताहि नसाबा।
धूम अनल संभव सुनु भाई।तेहि बुझाव घन पदवी पाई।

अर्थ – अर्थात दुष्ट व्यक्ति की सहायता जो कोई भी करता है और उसके प्रति बड़प्पन दिखाता है सबसे पहले वह दुष्ट उसे ही नुकसान पहुंचा कर उसे नष्ट कर देता है। उसी प्रकार जैसे अग्नि से प्रकट होने वाला धुआं बादल बनकर सबसे पहले अग्नि को ही बुझाता है।

दोहा 58. पर द्रोही पर दार पर धन पर अपवाद
तें नर पाॅवर पापमय देह धरें मनुजाद।

अर्थ – नीच प्रकृति का मनुष्य सदा पराई नारी, दूसरों की निंदा तथा पराई संपत्ति में ही खोया रहता है। ऐसा व्यक्ति मनुष्य के शरीर में दैत्य रूप होता है।

दोहा 59. रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई।
मरूत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।

अर्थ – मार्ग पर बेकार पड़ी हुई धूल केवल पथिक के पैरों से कुचलकर घाव सहती है, किंतु हवा के साथ बहने वाली धूल कण सर्वप्रथम उस हवा को धूल मिट्टी से भरकर अपने रंग में रंग देती हैं जिसके पश्चात वह राजाओं के नेत्रों तथा मुकुट पर जाकर गिरती है।

दोहा 60. न दीनमो सम दीन हित तुम्ह समान रघुबीर
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥

अर्थ – तुलसीदास जी भगवान श्री रामचंद्र से याचना करते हैं, कि हे प्रभु मेरे जैसा इस संसार में कोई दुखिया नहीं है और आप जैसा कोई दुख हरने वाला नहीं है। हे रघुवंश मणि मेरे जन्म मरण के इन कष्टों का नाश करें।

दोहा 61. कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥

अर्थ – जिस प्रकार अधीन मनुष्य के मन को एक स्त्री अच्छी लगती है तथा एक लोभी को संपत्ति प्यारा लगता है, उसी प्रकार हे प्रभु श्री रामचंद्र मेरे हृदय को केवल आप ही आप पसंद आइए। 

दोहा 62. सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन
नाम सुप्रेम पियुश हृद तिन्हहुॅ किए मन मीन।

अर्थ – एक सच्चे भक्त की परिभाषा यही होती है, कि वह अपने सभी इच्छाएं और कामनाओं को दूर रखे और भक्ति में राम नाम के विशाल सागर में स्वयं को मछली रूप में समझकर एक पल भी राम भक्ति के रस से अलग ना हो वास्तव में वहीं एक सच्चा राम भक्त है।

दोहा 63. झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें । जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचाने ।
जेहि जाने जग जाई हेराई । जागें जथा सपन भ्रम जाई ।

अर्थ – भगवान को बिना जाने झूठ भी सच जैसा लगता है। बिना पहचान किए एक रस्सी भी सांप के जैसे भ्रमित करती है, किंतु भगवान के गुणों की पहचान करने पर वास्तविकता साफ दिखाई देती है। जिस प्रकार नींद खुलने पर स्वप्न का भ्रम टूट जाता है, उसी प्रकार ईश्वर की भक्ति करने पर असलियत का ज्ञान होता है।

दोहा 64. तुलसी किएं कुंसग थिति, होहिं दाहिने बाम ।
कहि सुनि सुकुचिअ सूम खल, रत हरि संकंर नाम ।।
बसि कुसंग चाह सुजनता, ताकी आस निरास ।
तीरथहू को नाम भो, गया मगह के पास ।।

अर्थ – उपरोक्त दोहे में तुलसीदास जी संगति पर संदेश देते हुए कहते हैं, कि जो व्यक्ति चाहे वह कितना भी बुद्धिमान और सज्जन क्यों ना हो लेकिन बुरे लोगों के साथ रहने के कारण उसके नाम की भी बदनामी होती है। दुर्जनों की संगति के कारण चारों ओर लोगों को अपमान सहन करना पड़ता है। जिस प्रकार भले किसी मनुष्य का नाम किसी पवित्र देवी देवताओं के नाम पर रखा गया हो, लेकिन यदि उसके अंदर गलत संगति के कारण बुरी आदतें होती हैं, तो उसे सम्मान नहीं बल्कि अपमान प्राप्त होता है। यदि बुरी संगति करके कोई सफलता तथा समाज से प्रतिष्ठा प्राप्त करने की इच्छा रखता है तो उसे आजीवन कुछ भी हाथ नहीं लगेगा और उसकी इच्छा केवल इच्छा मात्र रह जाएगी। जिस प्रकार मगध के नजदीक बसने के वजह से विष्णुपद तीर्थ का नाम गया रखा गया।

दोहा 65. जिन्ह हरि कथा सुनी नहि काना । श्रवण रंध्र अहि भवन समाना ।

अर्थ – उपरोक्त पंक्ति से तुलसीदास जी का आशय यह है, कि यदि मनुष्य शरीर प्राप्त करने के बावजूद भी ईश्वर की भक्ति न की गई तो वह जीवन व्यर्थ है। भगवान की कथा से भी जिन कानों में कोई फर्क नहीं पड़ता, ऐसे कानों के छेद सांप के बिल के बराबर होते हैं।

दोहा 66. उदासीन नित रहिअ गोसांई। खल परिहरिअ स्वान की नाई।

अर्थ – दृष्ट व्यक्तियों के साथ हमेशा उदासीन व्यवहार करना चाहिए। दुर्जनों से ना हीं मित्रता और ना हीं बैर रखना चाहिए। जिस तरह जंगली कुत्ते को दूर से देखते ही उससे दूर चले जाना चाहिए, ठीक उसी प्रकार दृष्ट व्यक्तियों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए।

दोहा 67. कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के वचन बाघ हरि ब्याला।

गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल विसाला।

अर्थ – दूर्जनों की संगति बेहद बुरा मार्ग होता है, जहां दुष्ट संगति वाले बाघ, शेर तथा सर्प के जैसे होते हैं। जिस प्रकार गृह के कार्य में तमाम प्रकार के जंजाल ही बड़े दुर्गम विशाल पर्वत की भांति होते हैं।

दोहा 68. लोभन ओढ़न लोभइ डासन। सिस्नोदर नर जमपुर त्रास ना।
काहू की जौं सुनहि बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई।

अर्थ – कलयुग का एक झलक प्रस्तुत करते हुए सूरदास जी ऐसे दुष्टों के प्रती कटाक्ष करते हुए कहते हैं, कि क्रोध, इश्या और लोभ का लालच ओढ़े हुए धूर्त लोग भले ही समाज में मनुष्य के साथ रहते तो हैं, लेकिन वे अंदर से वास्तव में जानवर हैं। जो जंगलों में रहने वाले पशु के भांति भोजन ग्रहण करते हैं और अपने इन्द्रियों को संतुष्ट करने के लिए उन्ही की भांति मैथुन करते हैं। ऐसे पापी लोगों को यमराज का भी डर नहीं सताता। किसी की प्रशंसा सुनकर उन्हें बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता और दूसरों को खुश देखकर ऐसे पापियों को बुखार चढ़ने लगता है।

दोहा 69. जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुॅ जग नृपति।
स्वारथ रत परिवार विरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी।

अर्थ – संसार में ऐसे कुछ दुष्ट लोग भी हैं, जो दूसरों को कष्ट में देख कर खुश होते हैं। ऐसे लोगों के विरुद्ध तुलसीदास जी कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहते हैं, कि दूसरों को संकट की घड़ी में देखकर इन लोगों को सुकून मिलता है और वे दूसरों की विपत्तियों पर हंसते हैं और खुद को इस दुनिया का राजा समझते हैं। अपने घमंड में इस प्रकार चूर होते हैं, कि उन्हें अपने सगे संबंधियों का भी विरोध करने में झिझक नहीं होती। अपने पूरे जीवन में समय का दुरुपयोग कर कामवासना और लोभ के जाल में फस कर रह जाते हैं। ऐसे दुर्जन के वाणी पर कभी भी मिठास नहीं होती वह सदा ही लंपट और क्रोधी होते हैं।

आशा करते हैं 69 तुलसीदास के दोहे हिन्दी अर्थ सहित Tulsidas Ke Dohe in Hindi से आपको अपने स्कूल और कॉलेज के class के परीक्षाओं में मदद मिली होगी। यह सभी सर्वश्रेष्ट कवितावली, व दोहों (चौपाई) में अगर कोई महत्वपूर्ण दोहा रह गया है तो कमेन्ट के माध्यम से हमें बताएं।

11 thoughts on “69+ तुलसीदास के दोहे हिन्दी अर्थ सहित Tulsidas Ke Dohe in Hindi (सर्वश्रेष्ट चौपाई व्याख्या सहित)”

    • बहुत ही हृदय विदारक प्रस्तुति।

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  1. जय सीता राम❤️मेरे दिल को छुलिया बहुत ही सुंदर चोपाई है धन्यवाद

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  2. इसे पढ़ कर ऐसा लगा मानो भगवान श्री राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ हमारे ही नजरों के सामने से गुजर रहें हैं और मैं अपनी आंसू बहाने के सिवाय कुछ नहीं कर पा रहा हूं।
    बहुत बहुत धन्यवाद

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  3. बहुत आभार!अनुवाद से दोहों का अर्थ भी समझ आया और उनकी सुंदरता भी दुगुनी हो गयी .. भविष्य में और दोहे भी include करें जैसे कबीर / सूरदास / रसख़ान/मीरा

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  4. अत्यंत ही सामयिक .आज भी इन आदर्शों को समाज में अपनाने की सख्त जरूरत है .

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