सम्राट कृष्णदेव राय की जीवनी Life History of Krishnadevaraya in Hindi

सम्राट कृष्णदेव राय की जीवनी Life History of Krishnadevaraya in Hindi

जन्म तथा प्रारंभिक जीवन Early Life

कृष्णदेव राय का जन्म का जन्म 16 फरवरी 1471 में हम्पी (कर्नाटक) में हुआ था। उनको आंध्र्भोज, आंध्र पितामह और अभिनव भोज की उपाधि दी गयी थी। राजा कृष्ण देवराय सोलहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत के एक विजयनगर राज्य के शासक थे।

जिस तरह शिवाजी महराज पृथ्वीराज राज चौहान थे उसी प्रकार महा बलशाली योद्धा कृष्ण देवराय थे  उनकी ख्याति उत्तर के चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त मौर्य, , पुष्यमित्र,स्कंदगुप्त और महाराजा भोज के समान ही थी है। बाबर ने अपनी आत्मकथा में बाबरनामा में महा बलशाली कृष्णदेव राय जी को तत्कालीन भारत का सबसे शक्तिशाली राजा बताया था।रजा कृष्णदेव राय ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया।

कृष्णदेव राय का शासनकाल Reign

1509 से 1529 तक कृष्णदेव राय का शासन काल था। इस समय उनके पूर्वजों ने एक इस महँ साम्राज्य की नीव रखी जिसे विजय नगर का नाम दिया गया। विजय नगर का अर्थ है जीत का शहर ।

इस राज्य की राजधानी का नाम डम्पी और हम्पी था। हम्पी के मंदिरों और महलों की हालत को देखकर उसके भव्य होने का पता लगाया जाता है ऐसे महलों को यूनेस्को ने विश्‍व धरोहर में शामिल कर दिया है।

जैसे आज के समय में न्यूयॉर्क, हांगकाग, और दुबई विश्व व्यापार और आधुनिकता के प्रमाण बताया हैं, वैसे ही उस समय में हम्पी का समय हुआ करता था। भारत के इतिहास में मध्यकाल में दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य को उसी तरह की  प्रतिष्ठा प्राप्त थी जैसे कि प्राचीनकाल में उज्जैनी मगध या थाणेश्वर के राज्यों को प्राप्त हुआ करती थी।

इसे भी पढ़ें -  बिंदुसार का इतिहास व जीवनी Bindusar History in Hindi

कृष्णदेव राय विजयनगर साम्राज्य के महान शासको में से एक थे, संगम वंश के शासक कृष्णदेवराय के शासन काल में विजयनगर साम्राज्य दक्षिण भारत की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति के रूप में उभरा। मुगल के सम्राट अकबर ने भी कृष्ण देवराय के जीवनकाल से बहुत सी नयी सीख ली और उनका अनुसरण भी किया।

राज्याभिषेक Coronation

कृष्णदेव राय से पहले उनके बड़े भाई वहां की राजगद्दी संभाले हुए थे। उनका नाम नरसिंह था 1505-1509 ई. तक उनके बड़े भाई ने वहां की बाग़डोर संभाली कुछ लोगों का मानना हैं कि नरसिंह 1510 ई. तक तो विजयनगर की गद्दी पर ही बैठे थे परन्तु चालीस वर्ष की उम्र में उन्हें किसी अज्ञात बीमारी ने घेर लिया और 1509 ई. में वह मृत्यु को प्राप्त हो गये। वीर नरसिंह का देहांत होने के बाद 8 अगस्त सन 1509 ई. को कृष्ण देवराय का विजयनगर साम्राज्य के सिंहासन पर राजतिलक किया गया।

अष्ट दिग्गज

अवंतिका जनपद के राजा विक्रमादित्य ने योग्य नवरत्न रखने की परंपरा की शुरु की थी उसके बाद कई राजाओं ने इस परंपरा का अनुसरण किया। मुग़ल राजाओं ने कृष्ण देवराय के जीवन से बहुत कुछ सीखा और उनके पद चिन्हों पर चले। कृष्ण देवराय के दरबार में तेलुगु साहित्य में योग्य  8 कवि रहते थे, जिन्हें हम ‘अष्ट दिग्गज’ के नाम से भी जानते है।

साहित्यकार

कृष्ण देवराय का जन्म कर्नाटक में हुआ था इसीलिये उनकी अधिकांश रचनाये तेलुगु भाषा में लिखी गयी है । कृष्ण देवराय तेलुगु साहित्य के महान विद्वान माने जाते  थे, उन्होंने तेलगू में प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अमुक्त माल्यद’ की रचना की थी। उनकी इस रचना का स्थान तेलुगु के पांच महाकाव्यों में सबसे अलग है।

कृष्ण देवराय ने संस्कृत भाषा में भी एक नाटक ‘जाम्बवती कल्याण’ की भी रचना की थी। उसके बाद परिणय’, ‘सकलकथासार– संग्रहम’, ‘मदारसाचरित्र’, ‘सत्यवधु– परिणय’ आदि ग्रंथों की संस्कृत में रचना की ।

इसे भी पढ़ें -  महान गणितज्ञ आर्यभट जीवन परिचय Aryabhatta Biography In Hindi

तेनालीराम Tenali Raman

कृष्ण देवराय के नियमों का अनुसरण करते हुये ही अकबर ने भी अपने दरबार में बीरबल को रखा था। राजा कृष्ण देवराय के दरबार में सबसे  प्रमुख और सबसे बुद्धिमान दरबारी व्यक्ति तेनालीराम था, जो उनकी सारी परेशानियों का हल निकालते थे उनका असली नाम रामलिंगम था।

वे तेनाली गांव के रहने वाले थे इसीलिए उनका नाम  तेनालीराम पड़ गया और लोग उन्हें तेनालीराम कहने लगे । तेनालीराम अत्यधिक बुद्धिमान थे और उनकी बुद्धिमत्‍ता के चर्चे दूर-दूर तक फैले हुये थे और तेनालीराम  राजा कृष्ण देवराय के प्रमुख सलाहकार भी थे। उनकी सलाह और बुद्धिमत्‍ता के कारण ही राजा का राज्य आक्रमणकारियों से सुरक्षित रहता था, इसके अलावा वह अपने राज्य में कला और संस्कृति को भी बढ़ावा दे रहे थे । वह विजय नगर के चाणक्य थे।

कृष्णदेव राय के उल्लेखनीय  कार्य Major Works

कृष्ण देवराय एक महान योध्दा थे, उनके महान कारनामों की उपलब्धि ने उन्हें भारत के महान सम्राटों जैसे अशोक एवं हर्षवर्धन के समान  खड़ा कर दिया है। राजा कृष्ण देव राय जहां भी गये, वहां उन्होंने विध्वंश द्वारा बर्बाद किये गये अर्थात खंडहर में बदले हुये पुराने  मंदिरों का पुनः निर्माण किया।

रामेश्वरम्, राजगोपुरम्, अनन्तपुर, राजमहेन्द्रपुरम जैसे कई अनेक मंदिरों को उन्होंने बनवाए। इस शैली पर कई पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं। जिसमें कृष्ण देव राय की कहानियां पढने को मिलती है ।

राजा कृष्ण देवराय एक महान तथा उदारवादी राजा थे जिनकी  प्रजापालकता के चर्चे भारत में ही नहीं पूरे विश्व विख्‍यात थे। उन्होंने पुर्तगालियों से अच्छे संबंध बनाये और उनसे रक्षाके साथ-साथ  व्यापार में भी पूर्ण सहयोग प्राप्त किया और समय पढने पर उनको सहयोग भी दिया। इस महान राजा ने तुगंभद्रा पर एक बड़ा बांध बनबाया था।

कई नहरों का निर्माण भी करवाया। वे कला प्रिय थे इसीलिये उन्होंने अपने राज्य के कलाकारों और वास्तुविदों के लिए एक विशाल बाजार खड़ा किया। इसतरह वे एक  महान भवन निर्माता के रूप में भी जाने जाते थे। उन्होंने अपने राज्य विजयनगर में एक भव्य राम मंदिर का निर्माण कराया तथा हजार खम्भों वाले मंदिर का निर्माण भी कराया।

इसे भी पढ़ें -  तमिलनाडू का जल्लीकट्टू त्यौहार Tamil Nadu Jallikattu Festival in Hindi

महान राजा ने कृष्ण देवराय ने विजयनगर के पास एक शहर बनवाया और उसी में बहुत बड़ा तालाब भी खुदवाया, जो कि किसानों के लिए  सिंचाई के काम भी आता था। स्थापत्य कला में आगे बढ़ते हुये उन्होंने ‘नागलपुर’ नामक एक नया नगर बनबाया। उन्‍होंने विट्ठलस्वामी नामक मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिरों के अलावा उन्होंने इस नगर में कई विद्यालयों भी बनबाये । 

कृष्णदेव राय की मृत्यु Death

सन 1529 में कृष्णदेव राय  की मृत्यु हो गयी कहा जाता है उनकी मृत्यु जहर दिये जाने के कारण हुयी बाद में वे  बीमार पड़ गये जिसकारण उनकी मृत्यु हो गयी ।

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.