छत्रपति शिवाजी महाराज की जीवनी Biography of Chhatrapati Shivaji Maharaj in Hindi

छत्रपति शिवाजी महाराज की जीवनी Biography of Chhatrapati Shivaji Maharaj in Hindi  वीर शिवाजी की कहानी

शिवाजी , जिन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज Chhatrapati Shivaji Maharaj, शिवाजी राजे भोसले के नाम से भी जाना जाता है उन्होंने भारत में मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी।

छत्रपति शिवाजी महाराज की जीवनी Biography of Chhatrapati Shivaji Maharaj in Hindi

छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती 2018 Chhatrapati Shivaji Maharaj Jayanti

19 फरवरी 2018

जन्म और प्रारंभिक जीवन Birth and Early Life

शिवाजी महाराज का जन्म वर्ष 1630 में शिवनेरी, पूना के पास एक पहाड़ी किले पर, पिता शाहजी राजे भोसले के घर में हुआ था। शिवाजी के पिता, बीजापुर सुल्तान की सेना के एक अफसर थे। शिवाजी अपनी माता जिजाबाई और अभिभावक दादोजी कोंडदेव की देख रेख में पीला बढे।

शिवाजी की माँ और उनके गुरु रामदास ने उन्हें अच्छी सिख जिसके कारण उनके मन में नेकी और देशभक्ति की भावना उत्पन्न हुई और सभी धर्मों के लिए भी उनके मन में प्रेम और मातृत्व की भावना। शिवाजी ने सैन्य प्रशिक्षण और सरकार की कला सीखी भी कोंडदेव से सिखा।

उन्होंने कई मराठी पहाड़ी लोगों की एक सेना भी बनाई और पास के प्रदेशों में उन्होंने आक्रमण भी किया। 16 मई, 1640 में शिवाजी का विवाह साईं बाई से हुआ।

वीर शिवाजी की जित / विजय की शुरुवात कैसे हुई?

सबसे पहले 19 साल की आयु में शिवाजी ने तोरना का किला (Fort of Torna) पर जित हासिल की थी। जिसे आज प्रचंदागढ़ भी कहा जाता है और पूना से करीब 20 मिल दूर स्थित है।  इसके बाद उन्होंने कई जगहों जैसे चाकन, सिंघागढ़, और पुरंदर पर भी कब्ज़ा किया।

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शिवाजी पर ज़ोर डालने के लिए बीजापुर के सुल्तान ने उनके पिता शाहजी राजे भोसले को कैद कर लिया गया था। जिसकी वजह से शिवाजी कुछ साल के लिए शांत हो गए।

इसके बाद बीजापुर के सुल्तान ने उनके पिता को छोड़ दिया। पर उसके बाद शिवाजी ने अपना काम दोबारा शुरू कर दिया और साल 1655 में शिवाजी ने उत्तरी कोंकोन और जवाली के किले पर भी कब्ज़ा कर लिया था।

इसके कारण बीजापुर के सुल्तान ने साल 1659 में शिवाजी को जिन्दा या मुर्दा लाने का आदेश दिया और अपनी एक बड़ी सेना को शिवाजी के पास भेजा। उस सेना के प्रमुख थे अफज़ल खान जिन्हें किसी भी हालत में शिवाजी को लाने का कार्य दिया गया था परन्तु युद्ध में शिवाजी ने अफज़ल को मार डाला।

शिवाजी की सेना ने 10 नवम्बर, 1659 प्रतापगढ़ की लड़ाई में बीजापुर सल्तनत को हराया। वहां उन्हें भारी मात्र में हथियार और युद्ध सामग्री मिले और उनके इक्कठा होने के कारण मराठा सेना बहुत ही ताकतवर बन गयी।इस सफलता को देख कर सभी मराठा लोगों के लिए शिवाजी नायक और वीर बन गए।

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बीजापुर के सुल्तान ने दोबारा अपनी एक बड़ी सेना, रुस्तम ज़मान के नतृत्व में शिवाजी से युद्ध के लिए भेजा परन्तु वह भी शिवाजी से हर गया। यह युद्ध 28 दिसम्बर, 1659 को कोल्हापुर में हुआ था जिसमें बहुत सारे घोड़े, हाथी और युद्ध की सामग्री मराठों ने जमा कर लिया और अपनी ताकत को दुगना बाधा दिया।

शिवाजी और मुग़ल

इस जित के बाद छत्रपति शिवाजी ने सन 1657 के बाद से मुग़ल प्रदेशों पर आक्रमण करना शुरू किया। एक दिन शिवाजी ने अचानक से रात्रि को पूना पर आक्रमण कर दिया जिसमें  कई मुग़ल सैनिक मारे गए और शिवाजी ने पूना पर कब्ज़ा किया।

उसके बाद 1661 में कर्तलब खान को शिवाजी से युद्ध के लिए भेजा गया। उम्बरखिंड के युद्ध में, मुग़लों की बड़ी बड़ी सेनाओं को मराठों की छोटी सेना ने अपनी वीरता के बल पर हरा दिया।

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इसके बाद सन 1664 में शिवाजी ने सूरत पर आक्रमण किया और वहां से बहुत ज्यादा धन दौलत उन्हें मिला।

 पुरंदर की संधि

उसके बाद औरंगजेब ने अम्बर के राजा जय सिंह और दिलीर खान को शिवाजी को फासने और वश में करने के लिए भेजा। उसके बाद जय सिंह ने शिवाजी के कई किलों पर कब्ज़ा कर लिया। सन 1665 में, शिवाजी को पुरंदर की संधि को बंद करने को मजबूर कर दिया।

संधि की शर्तो के अनुसार शिवाजी को अपने अधीन रखे हुए 23 किलों को मुग़लों को सौंपना पड़ा और शिवाजी ने यह भी कहा की वो बीजापुर के खिलाफ लड़ाई में मुग़लों की मदद करेंगे। इसके बाद जय सिंह ने शिवाजी को आगरा के किले में आमंत्रित किया।

पर औरंगजेब ने शिवाजी और उसके बेटे शम्भाजी के साथ बहुत ही बुरा वर्ताव किया और साथ ही उन्हें कैद भी कर लिया। पर बहुत जल्द शिवाजी अपने पुत्र के साथ वह से भाग निकले और मुग़लों के खिलाफ उसने युद्ध छेड़ दिया। इसके बाद ही औरंगजेब को शिवाजी एक राजा के रूम में एहसास हुआ।

साल 1674 शिवाजी ने अपने आपको महाराष्ट्र का पूर्ण शासक के रूप में घोषित किया और शिवाजी का राज्य्विशेक किया गया। उन्होंने छत्रपति का पदवी धारण किया। उसके बाद उन्होंने जीन्जा, वल्लोर, और तेंजौर के बड़े हिस्से पर अपना कब्ज़ा किया।

कला और संस्कृति

शिवाजी कला और संस्कृति, धर्मपरायणता और पत्रों के संरक्षक थे। उनके दिल में कोई भी भेदभाव कोई जातिवाद, और सांप्रदायिकता नहीं थी। बहुत सारे संतों जैसे मुनि बाबा, बाबा युकुब, तुकाराम और राम दास ने भी वीर शिवाजी की प्रसंशा की। बहुत सारे संस्कृत कवियों जैसे जैराम, परमानंदा और गागा भट्ट को भी उन्होंने संरक्षण दिया।

छत्रपति शिवाजी की मित्यु कब हुई?

छत्रपति शिवाजी की मित्यु 3, अप्रैल 1680 को हुआ। उनकी मृत्यु के बाद 1680 – 1689 में उनके पुत्र संभाजी महाराज ने उनका पद ग्रहण किया।

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