मराठा साम्राज्य Maratha Empire Family Tree, Timeline, Map in Hindi

मराठा साम्राज्य Maratha Empire Family Tree, Timeline, Map in Hindi इस आर्टिकल में हम आपको मराठा साम्राज्य के शासक, युद्ध, पतन, विस्तार के बारे में पूरी जानकारी।

मराठा साम्राज्य Maratha Empire Family Tree, Timeline, Map in Hindi

भारत मे मराठा साम्राज्य का उदय एक साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में हुआ था। मराठा साम्राज्य की स्थापना सन् 1627 ई0 में जन्मे छत्रपति शिवाजी महाराज के द्वारा सन् 1674 ई0 में की गई थी। छत्रपति शिवाजी महाराज भारत के महान योद्धाओं तथा रणनीतिकारो में से एक थे।

मराठा साम्राज्य ने अपनी शक्ति और कुशल नेतृत्व के दम पर सन् 1674 ई0 से लेकर 1818 ई0 तक अपने साम्राज्य के अस्तित्व को बनाये रखा था। मराठा साम्राज्य को मराठा महासंघ के नाम से भी जाना जाता है। इस साम्राज्य के शासक छ्त्रपति तथा पेशवा की उपाधि को धारण करते थे।

मराठा साम्राज्य के प्रमुख शासक Rulers of Maratha Empire

छत्रपति शिवाजी Chhatrapati Shivaji

शिवाजी का राज्याभिषेक सन् 1674 ई0 में रायगढ़ में हुआ था। जिसके बाद शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण की थी। शिवाजी ने अपनी सेना को अनुशासित करने के साथ ही साथ अपनी प्रशासनिक इकाईयों को भी संगठित करने का काम किया था।

इन्होंने अपनी अनुशासित सेना और संगठित प्रशासनिक इकाई की सहायता से ही मराठा साम्राज्य को प्रगतिशील बनाया था। शिवाजी ने समरविद्या में कई प्रकार के नवीन प्रयोगों को करके ‘छापामार’ नाम की एक नई प्रकार की युद्ध शैली का विकास किया था।

पुरानी हिंदू राजनैतिक प्रथाओं तथा राजदरबार में होने वाले व्यवहारों को फिर से जीवित करने का श्रेय, मराठा साम्राज्य के शासक छत्रपति शिवाजी महाराज को जाता है। शिवाजी ने राजदरबार में प्रयोग की जाने वाली फ़ारसी भाषा के स्थान पर संस्कृत तथा मराठी भाषा को राजदरबार की भाषा बनाया था। शिवाजी ने अपना सबसे पहला युद्ध मुगल साम्राज्य के विरुद्ध लड़ा था।

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छत्रपति संभाजी Chhatrapati Sambhaji

शिवाजी के बाद मराठा साम्राज्य की बागडोर को उनके पराक्रमी तथा ओजस्वी पुत्र छत्रपति संभाजी राजे भोंसले ने संभाला। मराठा साम्राज्य में शम्भाजी को उनकी शौर्यता एवं पराक्रम के लिये जाना जाता था। मुगल काल का शासक औरंगज़ेब मराठा साम्राज्य का सबसे बड़ा शत्रु था।

बीजापुर और गोलकुंडा से औरंगजेब के आधिपत्य को समाप्त करने में संभाजी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। संभाजी ने सन् 1657 ई0 से लेकर 1689 ई0 तक मराठा साम्राज्य को अपनी शौर्यता और पराक्रम से आगे बढ़ाने का काम किया।

अपने इस छोटे से शासन काल मे संभाजी ने लगभग 120 युद्ध लड़े। संभाजी की सेना इतनी सशक्त एवं पराक्रमी थी कि इतने सारे युद्ध लड़ने के बाद भी इनकी सेना को कभी हार का सामना नही करना पड़ा था। संभाजी ने अपनी 14 वर्ष की छोटी सी आयु में ही संस्कृत भाषा मे बुधाभूषनम, नखशिख, नायिका भेद तथा सातशातक नामक तीन ग्रंथो को लिखा था।

सन् 1689 ई0 में औरंगजेब ने संभाजी के टुकड़े-टुकड़े करके इनकी हत्या कर दी थी क्योंकि वो सोचता था कि संभाजी की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य का अंत हो जाएगा, परन्तु हुआ इसके विपरीत संभाजी की हत्या के बाद सारा मराठा समुदाय एकसाथ मिलकर मुगल बादशाह औरंगजेब से लड़ने लगे थे।

राजाराम Rajaram

शम्भाजी की हत्या के बाद शिवाजी महाराज के छोटे बेटे छत्रपति राजाराम ने मराठा साम्राज्य की बागडोर सम्भाल कर इस साम्राज्य को आगे बढ़ाया। छत्रपति राजाराम एक कम योग्यता वाला साधारण व्यक्तित्व का शासक था।

कम योग्यता का शासक होने के बाद भी अपने कुशल राजनीतिज्ञ, पराक्रमी और मेधावी सेना नायकों हिंदू पद पादशाही का प्रतीक बना और मुगल शासकों से संघर्ष किया। राजाराम ने तीन शादियाँ की थी। मुगल शासकों से सँघर्ष के दौरान राजाराम की मृत्यु हो गयी।

ताराबाई Tarabai

राजाराम की मृत्यु के बाद इसकी विधवा पत्नी जिसका नाम ताराबाई था, ने अपने 4 वर्ष के पुत्र जिसका नाम शिवाजी तृतीय था, का राज्याभिषेक करा कर मराठा साम्राज्य की गद्दी पर बिठाया और स्वयं इसकी बागडोर अपने हाथ मे ले कर मराठा साम्राज्य की वास्तविक संरक्षिका बन गई। इसके बाद ताराबाई ने मुगल शासकों से संघर्ष किया और मुगलों से संघर्ष में सफलता भी प्राप्त की।

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छत्रपति शाहूजी Chhatrapati Shahuji

ताराबाई के बाद मराठा साम्राज्य का उत्तराधिकार शिवाजी के पौत्र और शम्भुजी के पुत्र, शाहूजी को प्राप्त हुआ। शाहूजी को शिवाजी द्वितीय के नाम से भी जाना जाता है। शिवाजी द्वितीय को मुगल बादशाह औरंगजेब ‘साधु’ कहता था जो अपभ्रंश में शाहू था और इसीलिए इसका नाम शाहूजी हो गया था।

पेशवा बालाजी विश्वनाथ की मदद से शाहूजी ने मराठा साम्राज्य को एक नई शक्ति के रूप में संगठित करने का काम किया था। शाहूजी की मृत्यु सन् 1749 ई0 में हो गयी जिसके बाद मराठा साम्राज्य का शासन ‘पेशवा’ के हाथो में आ गया। पेशवा एक पद था जिसकी स्थापना शिवाजी ने अपने अष्टप्रधानों की नियुक्ति के समय किया था।

पेशवा बालाजी विश्वनाथ Peshwa Balaji Vishwanath

पेशवा बालाजी विश्वनाथ का जन्म एक बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। सन् 1708 ई0 में शाहूजी के सेनापति धनाजी जादव ने इसे राजस्व विभाग में एक कर्मचारी का पद दिया, जिसे ‘कारकून’ के नाम से जाना जाता था।

सन् 1712 ई0 में धनाजी के पुत्र चन्द्रसेन जादव को सेना के संघटन का कार्य दिया जिसे उस समय ‘सेनाकर्ते’ कहा जाता था। इस तरह इसने अपनी असैनिक शासक तथा सैनिक संघटनकर्ता दोनों रूपों में अपनी योग्यता को साबित किया।

जिसके बाद इसकी योग्यता और मराठा साम्राज्य में इसके योगदान के लिए बहुत ही जल्दी छत्रपति शाहूजी ने इसे प्रधानमंत्री का पद दिया, जिसे मराठा साम्राज्य में ‘पेशवा’ के नाम से जाना जाता था। सन् 1719 ई0 में सैय्यद बन्धुओं की पहल करने पर इसने शाहूजी के नेतृत्व में मुग़लों से संधि भी की थी। पेशवा बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु सन् 1720 ई0 में हो गयी।

पेशवा बाजीराव प्रथम Peshwa Bajirao I

इसके बाद पेशवा बालाजी विश्वनाथ के पुत्र पेशवा बाजीराव प्रथम ने एक महान सेनानायक के रूप में मराठा साम्राज्य का विस्तार किया। लगभग बीस वर्षों तक छत्रपति शाहूजी महाराज के प्रधानमंत्री रहे।

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इन्होंने अपने कुशल नेतृत्व और युद्ध कला की कौशलता से मराठा साम्राज्य को उत्तर भारत मे फैलाया। इसे लड़ाकू पेशवा के नाम से भी जाना जाता है। नर्मदा नदी के किनारे सन् 1740 ई0 में पेशवा बाजीराव प्रथम के रूप में मराठा साम्राज्य ने एक कुशल रणनीतिकार खो दिया।

बालाजी बाजीराव Balaji Bajirao

बाजीराव प्रथम की मृत्यु के बाद इसके सबसे बड़े पुत्र बालाजी बाजीराव ने लगभग 18 वर्ष की आयु में मराठा साम्राज्य को संभाला। बालाजी बाजीराव ने मराठा साम्राज्य को भारत के उत्तर एवं दक्षिण दोनों तरफ विस्तारित किया।

बालाजी बाजीराव भोग विलासिता का प्रेमी शासक था। अपनी इसी विलासिता के कारण इसे अनेक आसाध्य रोगों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया जिसके कारण 1761 ई0 में इसका निधन हो गया।

बाजीराव द्वितीय Bajirao II

रघुनाथ राव का पुत्र बाजीराव द्वितीय मराठा साम्राज्य का अंतिम पेशवा था। यह अपने नाना जोकि इसके प्रधानमंत्री भी थे, से बहुत नफरत करता था। बाजीराव द्वितीय बहुत ही डरपोक और विश्वासघाती व्यक्ति था। इसने अंग्रेजों की मदद से ही मराठा साम्राज्य के पेशवा पद को प्राप्त किया था।

इसके शासनकाल में ही अंग्रेजों के साथ मराठा साम्राज्य का संघर्ष शुरू हो गया और इसी के साथ ही मराठा साम्राज्य का पतन भी शुरू हो गया। बाजीराव द्वितीय एक विश्वासघाती व्यक्ति होने के कारण इसने अंग्रेजों, जिसकी मदद से इसने सत्ता हासिल की थी, के साथ भी धोखा किया। जिससे नाराज होकर अंग्रेजों ने इसे बिठूर भेज दिया। सन् 1853 ई0 में बिठूर में ही इसका निधन हो गया।

अन्य शासक Other ruler

इसके बाद नाना साहेब, जीजाबाई, रघुजी भोंसले, तथा सदाशिवराव भाऊ जैसे शासकों ने मराठा साम्राज्य को संभाला परन्तु इन सब ने मराठा साम्राज्य को वह शक्ति नही प्रदान कर पाए जिससे की यह साम्राज्य अपना वर्चस्व कायम रख सके।

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