राधाष्टमी व्रत कथा, पूजा विधि, महत्व Radha Ashtami Vrat Katha in Hindi

राधाष्टमी व्रत कथा, पूजा विधि, महत्व Radha Ashtami Vrat Katha in Hindi

राधा कृष्ण एक हिंदू देवता हैं। कृष्ण को वैष्णव धर्म में स्वयं भगवान के रूप में सन्दर्भित किया गया है और राधा, कृष्ण की सर्वोच्च प्रेयसी हैं। कृष्ण के साथ, राधा को सर्वोच्च देवी स्वीकार किया जाता है और यह कहा जाता है कि वह अपने प्रेम से कृष्ण को नियंत्रित करती हैं। यह माना जाता है कि कृष्ण संसार को मोहित करते हैं, लेकिन राधा उन्हें भी मोहित कर लेती हैं। इसलिए वे सभी की सर्वोच्च देवी हैं।

राधा बिना तो कृष्ण हैं ही नहीं। राधा का उल्टा होता है धारा, धारा का अर्थ है करेंट, यानि जीवन शक्ति। भागवत की जीवन शक्ति राधा है। कृष्ण देह है, तो श्री राधा आत्मा। कृष्ण शब्द है, तो राधा अर्थ। कृष्ण गीत है, तो राधा संगीत। कृष्ण वंशी है, तो राधा स्वर। भगवान ने अपनी समस्त संचार शक्ति राधा में समाहित की है।

राधाष्टमी पर राधा जी की पूजा-अर्चना की जाती है। राधा जी का जन्म एक रहस्य है। राधा जी के जन्म को लेकर विद्वानों की अलग-अलग राय हैं। राधाष्टमी पर राधा जी के साथ- साथ भगवान श्री कृष्ण की भी पूजा अर्चना की जाती है, क्योंकि राधा जी की पूजा श्री कृष्ण के बिना अधूरी मानी जाती है। राधाष्टमी का त्योहार मथुरा और वृंदावन के साथ साथ बरसाना में भी मनाया जाता है।

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राधा के जन्म की कहानी (राधा रानी जन्म कथा)

पुराणों के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की राधाष्टमी तिथि को राधा जी का जन्म हुआ माना जाता है, और इसी दिन को राधाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। राधा का जन्म साधारण नहीं, अपितु चमत्कारी है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, राधा भी श्री कृष्ण की तरह ही अनादि और अजन्मी हैं, अर्थात् उनका जन्म माता के गर्भ से नहीं हुआ।

ब्रह्मवैवर्त पुराण की एक पौराणिक कथा के अनुसार देवी राधा भगवान श्री कृष्ण के साथ गो-लोक में निवास करती थीं। एक बार देवी राधा गो-लोक में नहीं थीं तब श्री कृष्ण अपनी एक अन्य पत्नी विरजा के साथ विहार कर रहे थे। जैसे ही राधा को इस बात की सूचना मिली वह गो-लोक लौट आईं। इन्होंने विरजा को श्री कृष्ण के संग विहार करते हुए देखा तो कृष्ण को भला बुरा कहने लगीं।

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राधा को क्रोधित देखकर विरजा नदी बनकर वहां से चली गईं परंतु राधा का यह क्रोध श्री कृष्ण के सेवक और मित्र श्रीदामा को सहन नही हुआ। उन्होंने राधा से ऊंची आवाज़ में बात की और उन्हें अपमानित किया। इस बात से देवी राधा और क्रोधित हो गईं और क्रोधावस्था में श्रीदामा को यह शाप दिया कि अगले जन्म में वे एक राक्षस कुल में जन्म लें।

इस बात पर श्रीदामा ने कहा तुमने मुझे अपने शाप से नीचे गिरा दिया। मुझे असुरयोनि प्राप्ति का दुःख नहीं है, पर मैं कृष्ण वियोग से परेशान हो रहा हूं। इस वियोग का तुम्हें अनुभव नहीं है अतः एक बार तुम भी इस दुःख का अनुभव करो और उन्होंने भी क्रोध में आकर देवी राधा को पृथ्वी पर मनुष्य रूप में जन्म लेने का शाप दे दिया। इस शाप के कारण भविष्य में श्रीदामा, शंखचूड़ नामक असुर बना और देवी राधा को कीर्ति और वृषभानु जी की पुत्री के रूप में जन्म लेना पड़ा।

कथा के अनुसार जब श्रीदामा और राधा ने एक-दूसरे को शाप दे दिया तो उसके बाद श्री कृष्ण चिंता में ग्रस्त राधा के पास आए और उनसे कहा कि देवी आप पृथ्वी पर जन्म तो लेंगीं लेकिन हमेशा मेरे आसपास ही रहेंगी और कहा आपको गोकुल में देवी कीर्ति और वृषभानु की पुत्री के रूप में जन्म लेना होगा। वहां तुम्हारा विवाह रायाण नामक एक वैश्य से होगा और सांसारिक तौर पर तुम रायाण की पत्नी कहलाओगी वह मेरा ही अंश होगा तथा राधा रूप में तुम मेरी प्रिया बनकर रहोगी और कुछ समय तक आपका मेरा विछोह रहेगा। इस के बाद भगवान श्री कृष्ण ने देवी से कहा कि अब आप वृषभानु के घर में जन्म लेने की तैयारी करें।

संसार की दृष्टि में राधा की माता कीर्ति गर्भवती हुईं धीरे-धीरे श्री राधा के अवतरण का समय आ गया। संपूर्ण व्रज में कीर्तिदा के गर्भ धारण का समाचार सुख स्रोत बन कर फैलने लगा, सभी उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा करने लगे। वह मुहूर्त आया। भाद्रपद की शुक्ला अष्टमी चन्द्रवासर मध्यान्ह के समय आकाश मेघाच्छन्न हो गया।

सहसा एक ज्योति प्रसूति गृह में फैल गई यह इतनी तीव्र ज्योति थी कि सभी के नेत्र बंद हो गए। एक क्षण पश्चात् गोपियों ने देखा कि शत-सहस्त्र शरतचन्द्रों की कांति के साथ एक नन्हीं बालिका कीर्तिदा मैया के समक्ष लेटी हुई है। उसके चारों ओर दिव्य पुष्पों का ढेर है। उसके अवतरण के साथ नदियों की धारा निर्मल हो गई, दिशाएं प्रसन्न हो उठी, शीतल मन्द पवन बहने लगी।

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कहा जाता है राधा ने गर्भ में प्रवेश नहीं किया। कीर्ति ने अपने गर्भ में वायु को धारण कर रखा था और योगमाया के सहयोग से कीर्ति ने वायु को जन्म दिया लेकिन वायु के जन्म के साथ ही वहां राधा कन्या रूप में प्रकट हो गईं। वृषभानु और उनकी पत्नी ने अपनी पुत्री के जन्म पर लगभग दो लाख गाय का दान ब्राह्मणों को किया था।

ऐसा कहा जाता है कि राधा जी ने अपने जन्म के काफी समय तक आँखें नहीं खोली थी, इसी कारण उनके माता पिता अत्यधिक परेशान रहते थे, लेकिन वृषभानु और कीर्तिदा को यह जल्द ही पता चल गया था कि राधा जी अपनी आँखें अपनी मर्ज़ी से नहीं खोल रही है। यह देखकर उन्हें अत्यंत दुख हुआ।

इसके बाद एक दिन जब यशोदा जी श्री कृष्ण के साथ गोकुल से वृषभानु और कीर्तिदा के घर आती हैं तब दोनों ने यशोदा जी का बहुत ही आदर सत्कार किया। यशोदा जी अपने लाल को लेकर राधा जी के पास जाती हैं। श्री कृष्ण के सामने आते ही राधा जी पहली बार अपनी आँखें खोलती हैं। राधा जी भगवान श्री कृष्ण को बिना पलक झपकाए देखती जाती हैं। भगवान श्री कृष्ण भी राधा जी को देखकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

राधा जी के जन्म की सबसे लोकप्रिय कथा यह है कि वृषभानु जी को एक सुंदर शीतल सरोवर में सुनहरे कमल में एक दिव्य कन्या लेटी हुई मिली। वे उसे घर ले आए लेकिन वह बालिका आँखें खोलने को राजी ही नहीं थी। पिता और माता ने समझा कि वे देख नहीं सकतीं लेकिन प्रभु लीला ऐसी थी कि राधा सबसे पहले श्री कृष्ण को ही देखना चाहती थीं। अत: जब बाल रूप में श्री कृष्ण जी से उनका सामना हुआ तो उन्होंने आँखें खोल दीं।

राधा नाम की महिमा अपरंपार है। श्री कृष्ण स्वयं कहते है- जिस समय मैं किसी के मुख से ‘रा’ सुनता हूं, उसे मैं अपना भक्ति प्रेम प्रदान करता हूं और धा शब्द के उच्चारण करने पर तो मैं राधा नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे चल देता हूं। राधा कृष्ण की भक्ति का कालांतर में निरंतर विस्तार हुआ। निम्बार्क, वल्लभ, राधावल्लभ, और सखी समुदाय ने इसे पुष्ट किया। कृष्ण के साथ श्री राधा सर्वोच्च देवी रूप में विराजमान् है। कृष्ण जगत् को मोहते हैं और राधा कृष्ण को। 

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राधा कृष्ण की पूजा विधि

आज दुनिया में अलग अलग समुदायों द्वारा राधाष्टमी पर राधा कृष्ण की पूजा की जाती है –

  1. राधाष्टमी पर राधा कृष्ण की पूजा आज भी हिन्दू धर्म द्वारा की जाती है, कुछ सालों पहले स्वयं राजा गरीब निवाज ने 1709 से 1748 तक शासन किया और उन्होंने चैतन्य परंपरा के वैष्णव शाखा में दीक्षा ली, जिनके अनुसार कृष्ण की पूजा सर्वोच्च ईश्वर के रूप में की जाती है, उन्होंने लगभग बीस वर्षों तक इस धर्म का अभ्यास और प्रचार प्रसार भी किया।
  2. मणिपुर के वैष्णव कृष्ण की अकेले पूजा नहीं करते हैं, बल्कि राधा-कृष्ण की करते हैं, वैष्णव मत के प्रसार के साथ कृष्ण और राधा की पूजा मणिपुर क्षेत्र में प्रभावी पद्धति बन गई। वहां के हर गांव में एक ठाकुर-घाट और एक मंदिर होता है एवं समय समय पर रास लीला का आयोजन भी किया जाता है|  
  3. निम्बार्क सम्प्रदाय बाल कृष्ण की पूजा अकेले या उनकी सहचरी राधा के साथ करता है, निम्बार्क द्वारा स्थापित निम्बार्क सम्प्रदाय, चार वास्तविक वैष्णव परंपराओं में से एक है।
  4. स्वामी नारायण संप्रदाय में राधा कृष्ण देव का स्थान विशेष है, क्योंकि स्वामी नारायण ने राधा कृष्ण को खुद शिक्षापत्री में सन्दर्भित किया जिसे उन्होंने लिखा था। इसके अलावा, उन्होंने खुद मंदिरों के निर्माण का आदेश दिया जिसमें राधा कृष्ण को देवताओं के रूप में स्थापित किया गया है। स्वामी नारायण ने “बताया कि कृष्ण कई रूपों में प्रकट होते हैं। जब वे राधा के साथ होते हैं, तो उन्हें राधा-कृष्ण नाम के अंतर्गत सर्वोच्च ईश्वर माना जाता है; रुक्मणी के साथ लक्ष्मी-नारायण जाना जाता है।”
  5. वृंदावन में, भगवान कृष्ण का “लीला स्थान”, पर यह मंदिर है जहां कृष्ण के उन भक्तों के लिए जाना आवश्यक है जो 84 कोष व्रज परिक्रमा यात्रा को पूरा करते हैं। यह मंदिर सदियों पुराना है और पहला भारतीय मंदिर है जो इस दिव्य युगल और उनकी अष्ट सखियों को समर्पित है – राधा की आठ “सहेलियाँ” जो कृष्ण के साथ उनकी प्रेम लीला में अन्तरंग रूप से शामिल थीं। इन अष्ट सखियों की चर्चा वेद पुराणों और श्रीमद भागवत के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित हैं। इस मंदिर को कहा जाता है – श्री राधा रास बिहारी अष्ट सखी मंदिर और यह भगवान कृष्ण और राधा रानी की दिव्य रास लीला का स्थान है। 

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