वामन अवतार की कथा The Story of Vamana Avatar in Hindi

वामन अवतार की कथा The Story of Vamana Avatar in Hindi

दोस्तों आज हम आपके साथ बात करने वाले है भगवान विष्णु के पांचवें और त्रेता युग के पहले अवतार के बारे में, जी हाँ विष्णु भगवान के वामन अवतार के बारे में बताएँगे। साथ ही हम जानेंगे कि भगवान विष्णु जी ने यह अवतार क्यों लिया और क्या किया? तो शुरू करते है –

वामन अवतार Vamana Avatar

वामन, ॠषि कश्यप और उनकी पत्नी अदिति के पुत्र थे, अदिति के काफी तपस्या के फलस्वरूप उनका जन्म हुआ था। इस जन्म यह इन्द्र के छोटे भाई बने। इनका जन्म भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि, को हुआ था जिसे वामन द्वादशी या वामन जयंती के रूप में मनाया जाता है।

धर्मग्रंथों के अनुसार यह विष्णु के ऐसे अवतार थे, जो मनुष्य रूप में जन्मे थे। इस दिन सभी वैष्णव संप्रदाय मत के लोग व्रत रखते हैं और पूजा पाठ करते हैं। भगवान विष्णु ने असुर राजा बली के भय से मुक्ति दिलाने के लिए वामन अवतार लिया था।

धार्मिक पुराणों तथा मान्यताओं के अनुसार भक्तों को इस दिन व्रत-उपवास करके भगवान वामन की सोने के मूर्ति बनवा कर पूरे विधि विधान से पूजा करनी चाहिए। मान्यता के अनुसार श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक पूजा करने वाले के सभी कष्ट दूर होते हैं।

महत्व एवं पूजा विधि

मान्यता के अनुसार बली धरती पर हर वर्ष अपनी प्रजा की खुशहाली देखने के लिए अवतरित होते हैं, क्योंकि विष्णु ने उन्हें ऐसा वरदान दिया था। इस दिन सुबह उठकर नहाने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इस दिन ब्रह्ममुहूर्त में भगवान वामन की पूजा-अर्चना की जाती है।

पूजा के बाद चावल, दही और चीनी आदि का ब्राह्मण को दान करना चाहिए। शाम को भी भगवान वामन की पूजा अर्चना करना चाहिए साथ ही पूजा के दौरान व्रत कथा सुनना आवश्यक होता है। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करवाकर स्वयं फला हार करना चाहिए। 

भगवान विष्णु के वामन अवतार की पौराणिक कथा

महान शासक बलि

वामन अवतार की कहानी की शुरुआत असुर राजा महाबलि से शुरू होती है। राजा बलि प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। वह एक महान शासक था। उसकी प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी और उससे बहुत प्रेम करती थी, उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था।

समुद्र मंथन के दौरान इंद्रदेव ने बलि को मार दिया था, लेकिन उनके गुरु शुक्राचार्य ने अपने मन्त्रो से उन्हें जीवित कर दिया था। बलि ने भगवान ब्रह्मा को खुश करने के लिए तपस्या की थी, जिससे खुश होकर ब्रह्मा ने वरदान मांगने को कहा।

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बलि ने भगवान ब्रह्मा से कहा, “प्रभु, मुझे इतनी शक्ति प्रदान करें जिससे मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके “। क्योंकि असुरो से लोग भयभीत रहते है और मैं चाहता हूं  कि मेरी प्रजा मुझसे भयभीत ना हो बल्कि प्रेम भाव रखें। भगवान ब्रह्मा ने उसे यह वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीति कार थे और उनकी मदद से बलि ने तीनों लोक पर विजय प्राप्त कर ली। बलि ने इंद्र देव को पराजित कर के इंद्रलोक पर भी विजय प्राप्त की थी। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बलि को सदैव के लिए तीनों लोक के स्वामी रहने के लिए अश्वमेध यज्ञ करने कि सलाह दी। अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए वह यज्ञ की तैयारी में लग गया।

इन्द्र की चिंता

तैयारी देखकर इंद्रदेव उदास हो उठे और भयभीत भी,क्योंकि बलि ने ही उन्हें पराजित किया था। इसलिए इंद्रदेव उससे ईर्ष्या भाव रखने लगे थे। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बलि अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र ही सारे देवता भी बलि की तरफ हो जायेंगे। इस विचार को लेकर वो काफी परेशान थे।

अत: इंद्रदेव ने माता अदिति के पास जाकर सहायता मांगी और उन्हें सारी बात बता दी। आपके पुत्र को परेशानी में देखकर देवमाता अदिति ने भगवान विष्णु की कठोर आराधना की। आराधना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए। देव माता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि “आप मेरे पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बलि का विनाश करे”।

यह सुनकर भगवान विष्णु ने कहा कि “बलि तो बहुत उदार राजा है, फिर क्यों आप उसका विनाश करना चाहती है“। देवमाता ने उत्तर दिया कि “मुझे पता है कि बलि बहुत ही उदार राजा है, परन्तु वो अपने पराक्रम से मेरे पुत्र का सिंहासन सदैव के लिए छीन लेगा और एक माता होने के नाते मैं पुत्र की भलाई चाहती हुं“।

वामन के रूप में जन्म

भगवान विष्णु ने उन्हें आश्वासन देते हुए पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दे दिया। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहां भगवान विष्णु ने बामन के रूप में जन्म लिया। कुछ समय पश्चात उन्हें उनकी शिक्षा के लिए गुरुकुल भेज दिया गया। इस दौरान महाबलि ने अपने 99 अश्वमेध यज्ञ सफलतापूर्वक पूरे कर लिए, सिर्फ एक यज्ञ रह गया था, जिसके पूरा होते ही उसे देवो का मुकुट पहना दिया जाएगा।

अंतिम अश्वमेध यज्ञ चल रहा था, और वो समाप्त होने ही वाला था कि तभी यज्ञ में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। यह बालक सभी गुणों और कलाओं से सम्पन्न था।

महाबलि ने विनम्रता से उस बालक को देखा। गुरु शुक्राचार्य बालक को पहचान गए थे। बालक को देखकर महाबलि ने उससे कहा आप जो चाहें मैं आपको वो दक्षिणा दे सकता हूं। क्योंकि आज का दिन मेरे लिए बहुत ही शानदार है।

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अपने गुरु की बात नहीं मानी

तभी गुरु शुक्राचार्य ने महाबली को बीच में रोका और उसको महल के भीतर ले गये और उससे कहा “यह बालक और कोई नही, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु है, जो इंद्रदेव के कहने पर यहां उपस्थित हुए है। और यदि तुमने इन्हें कुछ मांगने को कहा तो तुम अपना सब कुछ खो दोगे।

लेकिन अपने गुरु की बात का महाबली पर कोई असर नहीं हुआ बल्कि उन्होंने गुरु से कहा मेरे प्रभु मुझसे कुछ मांगने आये है, तो मुझे अवश्य ही देना होगा। और “मुझे प्रभु के सिवाय कोई राज्य नही चाहिए, मैं उनको अपना सर्वस्व दे सकता हूं।

इस बात से क्रोधित होकर गुरु शुक्राचार्य ने कहा “महाबली,तुम मेरी बात न मानकर अपना सब कुछ खो दोगे। लेकिन महाबली अपनी बात पर अडिग रहा।

तीन पग भूमि की मांग

महाबली दोबारा उस बालक के पास गए और स्नेह से कहा “श्री मान,मैं क्षमा चाहता हूं क्योंकि मैं आपकी बात बीच में ही छोड़ कर चला गया था। इसलिए अब आप अपनी इच्छा बताइये” उस बालक ने महाबली की ओर शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए जिसे मैं अपने पैरो से नाप सकूँ”।  महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग भूमि। मैं आपको अवश्य दूँगा” और उसने कहा “आप तीन पग भूमि नाप लीजिये ”

तीन पग भूमि में नापे तीन लोक

जैसे ही महाबलि ने अपने मुंह से हां के शब्द निकाले, वामन का आकार धीरे धीरे इतना बढ़ गया कि बलि अब केवल उसके पैरो को ही देख सकता था। वामन ने अपना आकार इतना बड़ा कर लिया कि धरती को उसने अपने एक पग में ही नाप लिया। दूसरे पग में उसने पूरे विशाल आकाश को ही नाप लिया। भगवान विष्णु के इस विशाल अवतार को त्रिविक्रम अवतार कहा गया है।

महाबलि भगवान के इस चमत्कार को देखकर आश्चर्यचकित रह गया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाकर कहा “महाराज, आपने मुझे तीन पग भूमि देने का वचन दिया था और मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नही बची, अब मैं अपना तीसरा पैर कहा रखूं।

बालक की बात सुनकर बलि ने कहा, मैंने जो आपसे वचन किया है मैं उस वचन को निभाऊंगा, आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये, भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबलि पाताल लोक में चला गया। इस प्रकार महाबलि का तीनों लोक से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया।

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इंद्रदेव और अन्य देवता ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंसा की और अपना सामाज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

विष्णु स्वयं बलि के पहरेदार बने

भगवान विष्णु महाबलि के लिए व्याकुल हो गये, क्योंकि उसने अपने गुरु की बातों से डरे बिना अपने वचन को निभाया। भगवान विष्णु वेश बदलकर उससे मिलने के लिए पाताल लोक पहुंचे। वहां पाताल में महाबलि फिर से अपना साम्राज्य बनाने में लगा हुआ था। उसको वहां आने का बिलकुल भी अफ़सोस नही था।

बलि के पास एक सांवला आदमी पंहुचा और बोला “महाराज क्योंकि मैंने सुना है कि आप अपना सामाज्य फिर से बनाने की कोशिश कर रहे है, तो क्या आप मुझे अपना पहरेदार रखेंगे, मैं दुश्मनों से आपकी रक्षा करूँगा और आपकी सेना के साथ आपके लिए युद्ध भी करूँगा ”

बलि ने उस आदमी को पहरेदार के रूप में रख लिया। इसी दौरान एक महिला उसके पास आयी और बोली “महाराज, मेरे पति धन कमाने के लिए बाहर गये है और अभी तक घर वापस नहीं आए, उनके बिना मुझे अकेलापन महसूस होता है, मेरी रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है। कृपया आप मेरी सहायता करें। क्योंकि मैंने सुना है कि जो भी आपकी शरण में आता है उसे संतान के समान सुख मिलता है।

महाबलि ने कहा आप मेरी बहन के समान हो, और आप जब तक चाहे इस महल में रह सकती हो”। अब महाबलि उस पहरेदार और अपनी बहन का कहा मानता था जिससे पाताल लोक भी समृद्ध स्थान बन गया और लोग खुशी से रहने लगे।

एक दिन महाबलि ने अपनी उस महिला को प्रार्थना करते हुए देखा और उससे पूछा “तुम किसकी आराधना कर रही हो”। उस महिला ने जवाब दिया,  “आप मेरे भाई हो, और मैं आपकी ही प्रार्थना कर रही हूं। ”महाबलि ने पूछा “बहन तुम्हें क्या चाहिए मैं तुम्हें लाकर दूँगा”

उस महिला ने कहा “मुझे मेरा पति चाहिए, और वो आप ही दिला सकते है ”। महाबली ने व्याकुल होकर कहा कि “मैं तुम्हारे पति को कैसे दिलवा सकता हूं ”। इस महिला ने पहरेदार की ओर इशारा करते हुए कहा “वो मेरे पति है।” महाबली के पलक झपकते ही वो दोनों अदृश्य हो गये और वहां  भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी खड़े थे।

महाबलि आश्चर्यचकित रह गया कि भगवान विष्णु स्वयं उसके पहरेदार बने और भाग्य की देवी लक्ष्मी हमेशा उनके साथ रही। भगवान विष्णु बोले “तुम्हारी भक्ति मुझे यहाँ पर खींच लाई “| महाबलि प्रभु के चरणों में गिर गया।

भगवान विष्णु ने कहा “बलि, इंद्र के बाद, तुम अगले इंद्र होंगे, ये मेरा वचन है और इसी तरह अच्छे शासक बने रहो। महाबलि ने माता लक्ष्मी से क्षमा मांगी और कहा से कहा, मेरी वजह से आप अपने पति से दूर रही, अब आप इन्हें ले जा सकती है,माता लक्ष्मी ने मुस्कुराते हुए कहा “मेरे भाई तुम सदैव समृद्ध रहो”। ये कहकर वो दोनों वैकुण्ठ चले गये। 

दोस्तों यह थी, भगवान विष्णु के वामन अवतार की कहानी। यदि ईश्वर अपने वचन के वशीभूत होकर आपके साथ कुछ ग़लत करता है तो, वो बाद में आपका साथ भी देता है। ईश्वर पर भरोसा रखें।

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