भेड़ पालन की जानकारी व फायदे Advantages of Sheep Farming in Hindi

भेड़ पालन की जानकारी व फायदे Advantages of Sheep Farming in Hindi

प्राचीन काल से ही मानव का सम्बन्ध भेड़ो के साथ है। ऐसा माना जाता है कि कांस्य युग के समय मे एशिया में भेड़ को सबसे पहले पालतू पशु बनाया गया था।
भेड़ एक ऐसा पालतू जानवर है जो बहुत ही तेजी से विकास करता है तथा इनकी देखभाल करने में भी बहुत अधिक मेहनत करने की जरूरत नही होती है।

यह एक ऐसा जानवर है जिसका पालन किसी भी प्रकार की जलवायु में किया जा सकता है। परन्तु भेड़ सामान्यतः कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रो में पाई जाती है। भेड़ पालन के लिए बहुत कम पूँजी और न ही बहुत ज्यादा देखरेख की ही आवश्यकता होती है इसीलिए प्राचीन काल से ही भेड़ों का पालन करना मानव का एक प्रमुख व्यवसाय रहा है।

भेड़ पालन की जानकारी व फायदे Advantages of Sheep Farming in Hindi

भेड़ से सम्बंधित जानकारियां

भेड़ झुंड में रहना ज्यादा पसंद करती है। इनकी सुनने की तथा किसी भी चीज़ को याद रखने की क्षमता बहुत अधिक होती है। भेड़ एक शाकाहारी जानवर है जो घास तथा पेड़ पौधों की हरी पत्तियों को अपने भोजन के रूप में प्रयोग करती है। सामान्यता  भेड़ो के सींग नही होती है परंतु इनकी कुछ प्रजातियों में सींघ पायी जाती है। विश्व मे सबसे अधिक भेड़ो की संख्या चीन में पाई जाती है।

भेड़ पालन के मामले में भारत विश्व मे तीसरे स्थान पर है। सन् 1996 में स्कॉटलैंड में भेड़ का एक क्लोन बनाया गया था जिसका नाम ‘डाली’ रखा गया था। भेड़ एक स्तनपायी जानवर है। भेड़ो की 12-18 महीनों की आयु प्रजनन के लिए सबसे उचित होती है। सामान्यतः भेड़ एक समय मे एक या दो बच्चो को जन्म देती है।

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भेड़ो का प्रजनन मौसम के अनुसार ही करना चाहिए क्योंकि अधिक गर्मी और बरसात के मौसम में प्रजनन होने से इनकी मृत्यु दर बहुत अधिक बढ़ जाती है। इनके बच्चे को मेमना कहते है। नर भेड़ो को रामस तथा मादा भेड़ो को एवेस कहा जाता है। भेड़ की औसतन आयु लगभग 7 से 8 वर्ष होती है। परन्तु कुछ अच्छी प्रजाति की भेड़ो का जीवन काल इससे भी अधिक होता है।

भेड़ पालन से लाभ

भेड़ हमारे लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण जानवर है। भेड़ पालन ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की आय का एक प्रमुख साधन भी है। भेड़ का पालन करके तथा इनकी अच्छी तरह देखभाल तथा पोषण करके इनसे ऊन, मांस तथा दूध प्राप्त किया जा सकता है। भेड़ का गोबर बहुत अच्छे प्रकार का उर्वरक होता है जिससे खेतों की उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है। भेड़ के दूध में प्रोटीन तथा वसा की अधिक मात्रा पायी जाती है।

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इसके कारण भेड़ का दूध बहुत ही पौष्टिक तथा लाभदायक होता है। भेड़ के शरीर पर बहुत नरम और लंबे रोयें पाये जाते है जिनसे ऊन का निर्माण किया जाता है। इनके द्वारा प्राप्त किये गए ऊन से विभिन्न प्रकार के वस्त्रों को बनाया जाता है जिनका उपयोग मानव द्वारा किया जाता है।

भेड़ के ऊन में ‘लेनोलिन’ नामक प्राकृतिक तैलीय पदार्थ पाया जाता है जिसका उपयोग प्रसाधन समाग्री तथा मोमबत्ती के निर्माण में किया जाता है। अच्छी प्रजाति की भेड़ ऊन का अधिक उत्पादन करती है। जो भेड़े ऊन का कम उत्पादन करती है उनका उपयोग दूध के लिए तथा मांस के उत्पादन में किया जाता है।

भेड़ की प्रजातियां

विश्व मे पायी जाने वाली भेड़ की कुल संख्या का लगभग 4 प्रतिशत भेड़ भारत मे पायी जाती है। भारत मे ज्यादातर भेड़े अत्यधिक शुष्क, पथरीली या फिर पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाती है। भारत मे सबसे अधिक ऊन देने वाली भेड़े उत्तरी मैदानों के शुष्क क्षेत्रो में तथा गुजरात के जोरिया प्रदेश में पायी जाती है। भेड़ की प्रमुख प्रजातियों में मैरिनो, सफोल्क, डोरसेट हॉर्न, हैम्पशायर शीप, तथा जैसलमेरी भेड़ आदि प्रसिद्ध प्रजातियां है। भेड़ो की प्रजातियों का चुनाव तथा इनका पालन अपनी आवश्यकताओं के अनुसार करना चाहिए।

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जैसे कि – मालपुरा, जैसलमेरी, मंडिया, मारवाड़ी, बीकानेरी , मैरिनो, कोरिडायल रामबुतु जैसी भेड़ की प्रजातियों को मांस के उत्पादन के लिए उपयुक्त माना जाता है। तथा इसके अलावा दरी को बनाने में उपयोग किये जाने वाले ऊन के उत्पादन के लिए मुख्य रूप से मालापुरा, मारवाड़ी, छोटा नागपुरी शहाबाबाद आदि प्रजातियों का पालन करना चाहिए।

रूस की प्रजाति मेरिनो तथा न्यूजीलैंड की कोरिडेल प्रजाति की भेड़ से सबसे अधिक गुणवत्ता का ऊन प्राप्त किया जाता है। भारत के वैज्ञानिकों ने भेड़ की तीन प्रजातियों को मिलाकर ‘हरनाली’ नाम की एक नई प्रजाति की भेड़ का विकास किया है। इस प्रजाति की भेड़ में रोगों की प्रतिरोधक क्षमता अधिक है तथा इससे सबसे उच्च गुणवत्ता के ऊन का उत्पादन किया जा सकता है।

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