कोणार्क सूर्य मंदिर का इतिहास Konark Sun Temple History Architecture in Hindi

इस लेख में हिन्दी में कोणार्क सूर्य मंदिर का इतिहास (Konark Sun Temple History Architecture in Hindi) लिखा गया है। इसमें इसकी जानकारी, इतिहास, वास्तुकला, कहानी, टिकट और वहाँ पहुँचने की सुविधाओं की जानकारी दी गई है।

कोणार्क सूर्य मंदिर का इतिहास Konark Sun Temple History in Hindi

भारतीय स्थापत्य कला और अध्यात्मिकता का जीता जागता साक्ष्य कोणार्क सूर्य मंदिर एक बेहद प्राचीन ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है। ओड़िशा के पवित्र शहर पुरी के नजदीक कोणार्क सूर्य मंदिर आया हुआ है। इस पवित्र मंदिर को ‘काला पैगोडा’ के नाम से भी जाना जाता है। 

भारतीय संस्कृती को उजागर करने वाले इस मंदिर को भारत में 10 रूपए के नोट पर अंकित किया गया है। कोणार्क का सूर्य मंदिर भारत की सबसे प्राचीन एवं पवित्र मंदिरों में से एक है, जहां हर रोज सैकड़ों श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। यह मंदिर सूर्य देव को समर्पित है। 

बेहतरीन मूर्तिकला और स्थापत्य की भव्यता के लिए कोणार्क सूर्य मंदिर को वर्ष 1984 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। यह मंदिर भारत के कई अन्य मंदिरों से थोड़ा हटके हैं, क्योंकि इस मंदिर में अंतरिक्ष विज्ञान से संबंधित कई महत्वपूर्ण चीजों को शामिल किया गया। 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा विश्व धरोहर में शामिल कोणार्क के सूर्य मंदिर का संरक्षण किया जाता है। चंद्रभागा नदी के किनारे बसाए गए इस खूबसूरत मंदिर की खूबसूरती संध्या के समय और भी बढ़ जाती है।

कोनार्क मंदिर व्यापक रूप से इसकी वास्तुशिल्प भव्यता के लिए नहीं बल्कि मूर्तिकला काम की जटिलता और प्रफेशन के लिए भी जाना जाता है। यह कलिंग वास्तुकला की उपलब्धि का सर्वोच्च बिंदु है, जिसमें अनुग्रह, आनंद और जीवन की लय को दर्शाया गया है, जिसमें सभी अद्भुत चमत्कार शामिल हैं।

konark sun temple repairing work

साथ ही कोणार्क मंदिर को यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल के रूप में भी घोषणा किया गया है। इसका निर्माण 1250 एडी के दौरान पूर्वी गंगा के राजा नरसिम्हा देव प्रथम द्वारा करवाया गया था। कोनार्क सूर्य मंदिर के प्रत्येक तरफ 12 पहियों की दो पंक्तियां हैं।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि मंदिर में स्थित चक्र दिन के 24 घंटों को दर्शाता है और कुछ लोगों का मानना है कि यह चक्र वर्ष के 12 महीनों को दर्शाता है। लोगों का यह भी मानना है कि मंदिर के सात घोड़े सप्ताह के 7 दिन को दर्शाते हैं।

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समुद्र तट के नाविकों ने इसका नाम काला पगोडा दिया था क्योंकि उनका मानना है यह मंदिर समुद्री लहरों को कुछ इस प्रकार आकर्षित करता है कि इसके कारण ज्यादातर दुर्घटनाग्रस्त जहाज़ो का मलवा मंदिर के पास जमा हो जाता है।

मोहम्मद गौरी के समय से ही ओडिशा पर कई मुस्लिम शहंशाओं ने आक्रमण किया परंतु हिंदू राजाओं ने हमेशा उन्हें पछाड़ा। हिंदू राजा जानते थे कि मुस्लिम राजाओं को ज्यादा दिन तक पीछे धकेलना आसान नहीं है तब भी उन्होंने दो शताब्दियों तक मुस्लिम शहंशाओं को पीछे धकेल कर रखा था।

13वीं शताब्दी के मध्य तक जब मुस्लिम शहंशाओं ने उत्तरी भारत पर कब्ज़ा किया और साथ ही बंगाल के कुछ प्रांतों को भी तभी नरसिम्हा देव प्रथम ने उनके खिलाफ आक्रमण किया। 1236एडी सुल्तान इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद दिल्ली की सल्तनत थोड़ी कमजोर पड़ गई।

1243 एड़ी, नरसिंह देव प्रथम और तूगान खान के बीचएक बहुत बड़ा युद्ध हुआ और उसमें नरसिंह देव की जीत हुई। इसी जीत की खुशी में वह एक मंदिर बनवाने मैं इच्छुक थे।

कोणार्क सूर्य मंदिर पर पौराणिक कथा Konark Sun Temple Mythological Story in Hindi

पूरे विश्व में प्रसिद्ध कोणार्क का सूर्य मंदिर इतिहास और कई महत्वपूर्ण रहस्यों को अपने अंदर समेटे हुए हैं। कहा जाता है, कि इस मंदिर के समृद्धि और भव्यता को देखकर कई मुस्लिम आक्रमणकारियों ने इसे ध्वस्त कर दिया था।

यदि आज भी मंदिर पर बारीकियों से नजर डाला जाए, तो इसके कई महत्वपूर्ण अंग नष्ट हो चुके हैं। लेकिन वही दूसरे कई इतिहासकारों का यह भी मानना है, कि कोणार्क सूर्य मंदिर को क्षति पहुंचने के पीछे प्राकृतिक कारण थे।

कोणार्क सूर्य मंदिर की स्थापना के विषय में अध्यात्मिक और गैर अध्यात्मिक दोनों ही वजह बताए जाते हैं। कहा जाता है कि गंग वंश के युद्ध में जीतने के पश्चात राजा नरसिंह देव प्रथम द्वारा 13वीं शताब्दी में इसका निर्माण करवाया गया था।

उड़ीसा के कलिंग स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना कोणार्क का सूर्य मंदिर ब्रह्मांड वाद और कई हिंदू परंपराओं के अनुसार स्थापित किया गया था।

यह मंदिर बहुत विशाल है, जिसकी स्थापना के विषय में केवल विचार कर पाना भी आज के समय में मुश्किल प्रतीत होता है। कोणार्क सूर्य मंदिर की चर्चा अकबर के नवरत्न में से एक अबुल फजल द्वारा आईने अकबरी में भी की गई है।

हिंदू धर्म के कुछ पवित्र कथाओं एवं ग्रंथों जैसे कि ब्रह्म पुराण, सांब पुराण, कपिल संहिता, भविष्य पुराण और वराह पुराण में इस पवित्र स्थल का उल्लेख मिलता है। कोणार्क सूर्य मंदिर के विषय में एक प्रचलित पौराणिक कथा भी है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है, की इस मंदिर के स्थापना के पीछे श्री कृष्ण के पुत्र सांब थे। किसी कारणवश भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें कोढ़ रोग का श्राप दे दिया था, जिसके बाद उन्होंने श्री कृष्ण से माफी की याचना की।

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 इसके पश्चात भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें चंद्रभागा नदी के संगम पर सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने को कहा। इसके पश्चात सांब ने सूर्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए करीब 12 वर्षों तक कड़ी तपस्या की। इसके बाद उन्हें रोग से मुक्ति पाने के लिए सूर्य देव द्वारा चंद्रभागा नदी में स्नान करने के लिए कहा गया।

स्नान करते समय सांब को सूर्य देव की एक प्रतिमा मिली। यह मूर्ति स्वयं विश्वकर्मा देव ने बनाई थी। सूर्य देव की इस प्रतिमा को सांब ने उस स्थल पर स्थापित किया, जहां वे तपस्या करते थे। कहा जाता है कि तभी से उस पवित्र तपोस्थल को सूर्य मंदिर का रुप दिया गया।

कोणार्क सूर्य मंदिर की वास्तुकला Konark Sun Temple Architecture in Hindi

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दीवारों की वास्तुकला

कोणार्क के सूर्य मंदिर की एक खास विशेषता यह है कि इसकी सभी मूर्तियां वास्तविक प्रतीत होती हैं। मंदिर को कुछ इस तरह बनाया गया है, कि सूर्य की पहली किरण सबसे पहले मंदिर के गर्भ में पडकर पूरे सूर्य मंदिर को प्रज्वलित कर देती है। यह संपूर्ण मंदिर रथ के आकार का बनाया गया है।

वास्तुकला के हिसाब से इस मंदिर का मुख पूर्व दिशा में स्थित है। मंदिर के पास ऊंचे ऊंचे प्रवेश द्वार स्थापित किए गए। एक ही अक्ष पर स्थित तीन प्रमुख अंग नाटमंडप, देउल (गर्भगृह), जगमोहन (मंडप) स्थित है।

श्रद्धालु सबसे पहले नाटमंडप में प्रवेश करते थे, जहां दीवारों पर सुंदर नक्काशी काम किए गए थे और साथ ही अलंकरण से सजी हुई कई घटनाओं को प्रदर्शित करती हुई प्रतिमाएं बनाए गए हैं।

कई कारणों से अब कोणार्क सूर्य मंदिर के नाटमंडप  के शिखर वाला भाग ध्वस्त हो गया है। मंदिर में सोपान मार्ग के दोनों तरफ गजशार्दुलों की विशाल और प्रभावी प्रतिमाएं बनी है। 

कोणार्क के इस विशाल सूर्य मंदिर में देवी, देवता, गंधर्व, किन्नर, अप्सराएं इत्यादि की प्रतिमाएं अलंकृत है। इसके अलावा हाथी, सिंह और अन्य कई जानवरों को भी मंदिर में अलंकृत किया गया है। 

सूर्य मंदिर कोणार्क के दोनों तरफ 12 पहियों की कुल 2 पंक्तियां स्थित है। लोगों का मानना है, कि यह कुल 24 पहिए दिन के 24 घंटों का संकेत देते हैं। वहीं कई लोग इसे 12- 12 अश्व के दो कतारों के रूप में देखते हैं, जो वर्ष के 12 महीने का संकेत है। साथ ही यह पहिये सूर्य की रोशनी से सटीक समय बताते हैं।

सूर्य मंदिर कोणार्क से जुड़े कुछ रहस्य व तथ्य Some secrets and facts related to Konark Sun Temple in Hindi

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रथ का पहिया

कोणार्क सूर्य मंदिर कई रहस्यमई तथ्यों से भरपूर है। इतिहासकार एक यह आश्चर्यचकित करने वाली बात मानते हैं, की इतने विशाल मंदिर का निर्माण ऐसी परिस्थिति में किया गया, जहां आसपास बड़े पत्थरों या पहाड़ों का नामोनिशान नहीं था।

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इतने भारी पत्थरों को इतनी सटीकता से स्थापित करके एक भव्य और विशाल मंदिर का निर्माण करना बहुत बड़ी बात है।

लगभग एक सदी पहले अंग्रेजों द्वारा कोणार्क सूर्य मंदिर को सुरक्षित करने के लिए जगमोहन से मंदिर में रेत भर दिया गया था। कुछ समय पहले ही भारतीय पुरातत्व संरक्षण विभाग द्वारा जगमोहन परिसर से इस मिट्टी को निकालने का निर्णय लिया गया है।

ऐसा कहा जाता है, की 15वी शताब्दी के आसपास मुस्लिम आक्रमणकारियों ने कोणार्क सूर्य मंदिर पर हमला कर दिया था। जिसके बाद यहां के पुजारियों ने सूर्य देव की प्रतिमा को जगन्नाथपुरी में सुरक्षित छुपा दिया था।

मंदिर के सबसे ऊपर चुंबकीय प्रभाव वाले पत्थरों को रखा गया है, जिसके कारण यहां के विशाल स्तंभ मंदिर को मजबूत रूप से संतुलित रखते हैं। एक समय में समुद्री यात्री कोणार्क सूर्य मंदिर को ब्लैक पगोड़ा कहते थे, क्योंकि इस मंदिर के आसपास चुंबकीय प्रभाव के कारण यह स्थल नावों को अपनी तरफ आकर्षित करके उसे नष्ट कर देता था।

1984 में यूनेस्को द्वारा कोणार्क सूर्य मंदिर को विश्व धरोहर की सूची में शामिल करने के पश्चात यहां आने वाले यात्रियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती हैं। सांस्कृतिक और पर्यटन के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ योगदान कोणार्क सूर्य मंदिर का भी है।

कोणार्क सूर्य मंदिर में टिकट Tickets at Konark Sun Temple in Hindi

कोणार्क सूर्य मंदिर दुनियां भर में एक प्रख्यात पर्यटन स्थल है, जिसके कारण यहां आने वाले यात्रियों की सहूलियत के लिए विषेश पयर्टन व्यवस्थाएं की जाती हैं। 

मंहगाई के हिसाब से हर वर्ष सभी महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थलों की टिकटों का भाव निर्धारित किया जाता है। भारतीयों के लिए ये प्रवेश शुल्क 50-100 रूपए हैं। वहीं विदेशी यात्रियों के लिए टिकटों का दाम 500-700 निर्धारित किया गया है।  

कोणार्क सूर्य मदिर पहुँचने का मार्ग Way and Transportation To Konark Sun Temple

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कोणार्क मंदिर का मुख्य द्वार

ओडिशा के पुरी जिले के कोणार्क शहर में यह सूर्य मंदिर स्थित है। यह मंदिर पुरी से लगभग 35 किमी तथा ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से लगभग 60 किमी की दूरी पर स्थित है।

कोणार्क सूर्य मंदिर से सबसे नजदीकी स्टेशन पुरी रेलवे स्टेशन है। भुवनेश्वर हवाई अड्डा अथवा बीजू पटनायक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा सूर्य मंदिर से सबसे समीप हवाई अड्डा है। इसके सहायता से यात्री बेहद सरलता से मंदिर तक पहूंच सकते हैं।

कोरोना महामारी के कारण दुनियां भर में पर्यटन स्थलों को बंद कर दिया गया था। स्थिति सुधरने के बाद सूर्य मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए पुनः खोला गया है। लोगों को प्रवेश करने के लिए कोई तकलीफ न हो इसके लिए भारत सरकार द्वारा ऑनलाइन टिकट की नई व्यवस्था की गई है।

इसके साथ ही मंदिर में प्रवेश करने के लिए विशेष गाइडलाइन निर्धारीत किए गए हैं, जहां लोग केवल मंदिर में लगे बार कोड को अपने मोबाइल में स्कैन करके टिकट प्राप्त कर सकते हैं। 

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