जीपीएस क्या है? ये काम कैसे करता है? What is GPS? How does it work? हिन्दी

जीपीएस क्या है? ये काम कैसे करता है? (What is GPS? How does it work?) 

जी पी एस 30 से भी ज्यादा नेविगेशन सेटेलाइट, जो धरती से 30000 किलोमीटर ऊंचाई पर मौजूद हैं और पृथ्वी को हर तरफ से घेरे हुए है। हमे उनकी लोकेशन पता चलती रहती है, क्योंकि वो हर वक़्त लगातार धरती पर सिग्नल भेजते रहते हैं।

आपके फोन मे लगी जीपीएस डिवाइस इन सिग्नल को कैच करती है। जब ये रिसीवर चार ये ज्यादा सेटेलाइट से आपकी डिस्टेंस कैलकुलेट कर लेता है, तब ये आपकी एक्ज़ैक्ट लोकेशन पता कर सकता है। जीपीएस का इज़ाद अमेरिकी एयर फोर्स द्वारा किया गया था और इसके प्रयोग भी सैन्य कार्यों के लिए किया जाता था। लेकिन 1980 के दशक में जीपीएस को आम जनता के प्रयोग के लिए भी अवेलेबल कर दिया गया। 

जीपीएस यानी कि ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम, कुछ सेटेलाइट, ग्राउंड स्टेशन और रिसीवर से मिलकर बनता है। सेटेलाइट भी किसी तारामंडल मे तारे के जैसे ही होते हैं, और उनकी तरह ही आप ये भी पता कर सकते हैं कि किसी सेटेलाइट को किसी खास वक़्त पर स्पेस में किस जगह पर होना चाहिए। धरती पर मौजूद ग्राउंड स्टेशन रडार के जरिये ये सुनिश्चित करते हैं कि सेटेलाइट तय वक़्त पर अपनी तय पोजीशन पर मौजूद हैं या नहीं।

आपके फोन या आपकी कार मे मौजूद रिसीवर इन सेटेलाइट से आने वाले सिग्नल को कैच कर सेटेलाइट से रिसीवर तक की डिस्टेंस कैलकुलेट करती है। जीपीएस हर तरह के मौसम मे, 24 घंटे काम कर सकता है, बशर्ते उन 4 या उससे ज्यादा सेटेलाइट के बीच मे एक बिना किसी अवरोध की साईट कम्यूनिकेशन लाइन मौजूद हो।

इसके अलावा जीपीएस के प्रयोग के लिए किसी भी तरह की सब्सक्रिप्शन फीस या सेट अप चार्ज भी नहीं लिया जाता है। किसी यूजर के इन्टरनेट कनेक्शन या टेलीफोन सिग्नल का जीपीएस सिस्टम से कोई खास लेना-देना नहीं है। लेकिन इनके होने से जीपीएस की पोजिशनिंग ज्यादा इफेक्टिव हो जाती है। 

जीपीएस काम कैसे करता है? How GPS tracking system works

किसी भी एक टाइम पर, Earth पर किसी रिसीवर की लाइन ऑफ साईट पर कम से कम 4 सेटेलाइट जरूर मौजूद होती हैं। इनमे से हर एक जीपीएस सेटेलाइट थोड़े थोड़े तय समय मे जीपीएस रिसीवर तक अपनी पोजीशन और टाइम के बारे में जानकारी भेजती रहती हैं। ये जानकारी रिसीवर के पास सिग्नल के रूप में आती है, जिन्हें रिसीवर डिवाइस की मदद से इंटरसेप्ट किया जाता है।

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ये सिग्नल असल मे रेडियो सिग्नल होते हैं, जो लाइट की स्पीड से चलते हैं। किसी जीपीएस सेटेलाइट और रिसीवर के बीच की दूरी का पता उस टाइम जिसमें सेटेलाइट द्वारा सिग्नल भेजा गया और उस टाइम जिसमें रिसीवर द्वारा वो सिग्नल रिसीव किया जाता है, के बीच का डिफरेंस निकाल कर लगाया जाता है। 

एक बार जब रिसीवर को कम से कम तीन सेटेलाइट से भेजा गया सिग्नल मिल जाता है, तब रिसीवर ट्राईलेटरेशन प्रोसेस का यूज करके अपनी लोकेशन पॉइंट करता है। ट्राईलेटरेशन एक मैथेमेटिकल प्रोसेस है, जो किसी जगह की डिस्टेंस और एरिया कैलकुलेट करने के लिए सर्कल और ट्रायंगल का यूज करते हैं।

किसी चीज की 2-डायमेंशनल पोजीशन (यानी कि किसी नक्शे पर लैटिट्यूड और लोंगिट्यूड की स्थितियां) जानने के लिए कम से कम तीन सेटेलाइट से सिग्नल रिसीव करना जरूरी होता है। वहीं अगर, रिसीवर की 3-डायमेंशनल पोजीशन जाननी हो, तो कम से कम 4 सेटेलाइट के सिग्नल रिसीव करना जरूरी हो जाता है। 

आप चाहे इस प्लेनेट मे कहीं पर भी हों, हमेशा कम से कम चार सेटेलाइट आपकी पोजीशन से विजिबल होती हैं। जितनी ज्यादा सेटेलाइट आपकी पोजीशन से विजिबल होंगी, उतनी ही एक्युरेसी से आपकी जीपीएस यूनिट आपकी लोकेशन का पता लगा पाएगी। 

जीपीएस के काम मे आने वाले चैलेंजेस Challenges in GPS technology

  • जीपीएस रिसीवर और इंडीविजुअल सेटेलाइट के बीच मे टाइम के साथ ठीक तालमेल बिठा पाना। 
  • जीपीएस सेटेलाइट की सटीक लोकेशन की ताजा जानकारी प्राप्त करना। 
  • फ्लाइट के उड़ने के समय की वास्तविक जानकारी देना। 
  • दूसरे सिग्नल की वज़ह से होने वाली इंटरफेरेंस। 

जीपीएस के इतने सारे यूजे़स और अवेलेबिलिटी की वजह से लोगों के बीच ये काफी पॉपुलर हो गया है। असल में, जीपीएस ने इस दुनिया को रहने के लिए इतनी आसान और अच्छी जगह बना दिया है। 

आज के टाइम पर हमारी लाइफ मे जीपीएस का रोल काफी ज्यादा और इम्पोर्टेंट हो गया है। ये हमारे ज्यादातर वीइकल और स्मार्ट फोन्स मे लगाया जाता है, जिससे हम कहीं भी आसानी से आ जा सके। हम जब कहीं किसी अनजाने रास्ते पर खो जाते हैं या ऐसी जगह जाना चाहते हैं, जिसके बारे मे हमे कुछ पता नहीं होता, तब हमारे फोन मे मौजूद यही जीपीएस हमारे सबसे ज्यादा काम आता है।

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स्मार्ट फोन और ईमेल के जैसे ही जीपीएस टेक्नोलॉजी भी हमारी डेली लाइफ का हिस्सा बन चुकी है और काफी हद तक अपने काम के लिए हम इस पर निर्भर बन चुके हैं। जीपीएस ने मैप को रिप्लेस कर दिया है और ये नेविगेशन का सबसे जरूरी टूल बनकर उभर आया है। इसके अलावा अब जीपीएस गेम्स और दूसरी एप्लीकेशन जैसे फ़ेसबुक मे भी यूज किया जाने लगा है। 

जीपीएस का उपयोग GPS System use

आज के टाइम पर हमारी डेली यूज की लगभग हर डिवाइस मे भी जीपीएस टेक्नोलॉजी सेट अप की जाती है, जिससे जरूरत पड़ने पर ये हमारे काम आए और हमारे एक्सपीरियंस को बढ़ाने मे मदद करे। डेली डिवाइस जैसे कि स्मार्ट फोन, टेबलेट, वीइकल और खास तौर पर ऐसे पैकेज जो हम ऑनलाइन खरीदते हैं, उनमे भी एक छोटी सी ट्रैकिंग डिवाइस फिट की जाती है, जिससे उस सामान की पल पल की लोकेशन कस्टमर को मिलती रहे।

इसके अलावा अब एरोप्लेन भी आजकल जीपीएस डिवाइस की मदद से ही आसमान मे उड़ते हुए अपनी डेस्टिनेशन तक पहुंचने के रास्ते को ट्रैक करते हैं। इसकी वज़ह से ही एयरपोर्ट पर मौजूद कंट्रोल रूम को आसमान मे उड़ते हुए एरोप्लेन की लाइव लोकेशन मिलती रहती है।

इसके अलावा किसी प्लेन मे मौजूद पैसेंजर भी जीपीएस के कारण अपनी लोकेशन देख सकते हैं। जीपीएस टेक्नोलॉजी की वज़ह से किसी चोरी किए गए वीइकल को ढूँढ़ पाना भी अब आसान हो गया है, और ये कस्टमर को ज्यादा सिक्युरिटी का अनुभव भी करवाते हैं। 

हर चीज के दो पहलू होते हैं। जहां एक तरफ जीपीएस की वज़ह से लोगों की लाइफ इतनी आसान बन गई है। वहीं कुछ जीपीएस एप्स की वज़ह से युवा खासकर टीनएजर्स गलत आदतों का शिकार बन रहे हैं और अपने जीवन को गलत दिशा में ले जा रहे हैं।

इन जीपीएस एप्स की वज़ह से कई सारे इशू भी देखने को मिले हैं, जिन पर गौर करना और उन्हें कंट्रोल मे लाना जरूरी है। कुछ एप्स और गेम्स जैसे कि पोकेमोन गो, ब्लू व्हेल चैलेंज टीनएजर्स की लाइफ के साथ खेल रहे हैं। इन गेम्स के एडिक्ट बनने की वज़ह से वे अपनी जिंदगी की परवाह नहीं करते और उसे खतरे मे डाल बैठते हैं।

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सिर्फ इतना ही नहीं अक्सर पेरेंट्स को भी अपने बच्चों की लोकेशन ट्रैक करते देखा जाता है। उनके लिए ये अपने बच्चे की केयर की बात होती है, लेकिन देखा जाए तो ये उनका ये ऐक्शन एक तरह से किसी इंसान की निजता का हनन कर रहा है, जो कि कानूनी तौर पर गलत है। 

अलग लोगों द्वारा अपने अलग अलग तरह के यूज के कारण जीपीएस ट्रैकर को भी दोष रहित नहीं माना जा सकता है। हमारे लिए बहुत अधिक काम का होने बावजूद इस पर सवाल करना लाजिमी है कि क्या ये सच मे जैसे हम आज के टाइम पर जीपीएस का यूज कर रहे हैं, वो नीतिपरक है?

क्या हम जैसे इसका इस्तेमाल कर रहे वो सही है? इतनी पावरफुल टेक्नोलॉजी का जैसा यूज अब किया जा रहा है, उसने निश्चित रूप से हमारे समाज और एथिक्स मे नए सवालों को जन्म दे दिया है, जिसका अभी तक हम कोई ज़वाब ढूँढ़ नहीं पाए हैं। 

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