दोल जात्रा पर निबंध Essay on Doljatra Festival in Hindi

इस लेख में आप दोल पूर्णिमा या दोल जात्रा पर निबंध (Essay on Doljatra Festival in Hindi) पढेंगे। इसमें यह पर्व कब है, महत्व, तारीख और उत्सव की पूरी जानकारी दी गयी है।

दोल जात्रा पर निबंध Essay on Doljatra in Hindi

दोल जात्रा को दोल यात्रा या दोल पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन पश्चिम बंगाल में मुख्या रूप से सार्वजनिक अवकाश का दिन होता है।

ओडिशा और असम में इस दिन को अवकाश का दिन होता है और दोल पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। यह पर्व होली त्यौहार के दिन ही मनाया जाता है जिस कारन इस त्यौहार का अपने-अपने राज्यों में अलग ही महत्व बढ़ जाता है।

दोल जात्रा क्या है? What is Doljatra Festival in Hindi

दोल जात्रा (Doljatra) पश्चिम बंगाल का एक प्रसिद्ध त्यौहार है जिसे भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम को याद करते हुए मनाया जाता है। इस दिन को बंगाली वर्ष या कैलंडर का अंतिम पर्व भी माना जाता है।

दोल जात्रा (दोल पूर्णिमा) कब है? When is Dol Jatra (Dol Purnima)? 2022

इस वर्ष दोल जात्रा (दोल पूर्णिमा) 18 मार्च 2022 को बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जायेगा।

दोल जात्रा का महत्व Importance of Dol Jatra in Hindi

दोल जात्रा त्यौहार में भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है। यह त्यौहार होली त्यौहार के साथ ही मनाया जाता है।

इस दिन लोग श्री कृष्ण जी के चित्र या मूर्ति की पूजा करते हैं और पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम में बहुत ही बड़े तौर पर मनाते हैं। इस दिन श्रीकृष्ण और राधा जी की प्रतिमा को रंगों से सजाया जाता है।

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बंगाली भाषा में इस सूखे रंग के पाउडर को ‘अबीर’ कहा जाता है। भगवान श्री कृष्णा जी की प्रतिमा को सुन्दर रूप से फूलों से सजाया जाता है।

सजाने के बाद कृष्ण की प्रतिमा या मूर्ति को सुन्दर झूले में बिठा कर फूलों, कपड़ों, पत्तों और रंगीन कागजों से सजा दिया जाता है और जुलुस निकला जाता है जिसे हम दोल जात्रा / दोल यात्रा (Doljatra / Dol Yatra) के नाम से जानते हैं।

इस जुलुस में लोग नाचते हैं, एक दुसरे को रंग लगाते हैं, खूब सारे संगीत और शंख के पवित्र ध्वनि के साथ आगे बढ़ते हैं। रंग के पाउडर को बंगाली में अबीर और ओडिया में फगु कहते है।

दोल जात्रा कैसे मनाया जाता हैं? How Dol Jatra is Celebrated in Hindi?

दोल पूर्णिमा बंगाली लोगों के लिए और भी महत्वपूर्ण दिन होता है क्योंकि यह दिन चैतन्य माहाप्रभु जी का जन्म दिवस भी होता है।

वह एक महान वैष्णव संत थे जिन्होंने आधुनिक संकीर्तन को आगे बढ़ाया और लोकप्रिय बनाया। उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम को अध्यात्मिक रूप से लोगों को समझाया और ज्ञान को आगे बढाया।

इस दिन सभी लोग अपने से बड़ों के पैरों में रंग लगा कर उनसे आशीर्वाद लेता हैं। भारत में ज्यादातर राज्यों में इस दिनको छोटी होली के नाम पर मानते हैं और गुलाल खेलते हैं।

साधारण रूप से दोल पूर्णिमा या दोल जात्रा एक से दो दिन मनाया जाता है। पर मथुरा और वृन्दावन में दोल यात्रा 16 दिन लगातार मनाया जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रथम दिन कृष्ण अपनी पत्नी गुहुंचा के घर जाते हैं। इसमें भक्त गण पालकी में बैठा कर कृष्ण को ले जाते हैं और द्वितीय दिन उन्हें वापस लाते हैं.

इस दिन भगवान कृष्ण की मूर्ति को होलिका के चारों और घुमाया जाता है। ज्यादातर राज्यों में इस दिन दूध से बने मिठाइयाँ बने जाती है और लोग अपने सगे-सम्बन्धियों के घर घूमने जाते हैं।

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निष्कर्ष Conclusion

सही मायने से देखा जाये तो दोल जात्रा भी होली त्यौहार का एक अभिन्न अंग है परन्तु इसमें देखने को थोडा अलग रंग-रूप मिलता है। आशा करते हैं दोल जात्रा (दोल पूर्णिमा) पर निबंध (Essay on Doljatra Festival in Hindi) से आपको इस त्यौहार के विषय में जानकारी मिल पाई होगी।

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