आदिवासी जनजातियों का जीवन Life of Tribal people in India

आदिवासी जनजातियों का जीवन Life of Tribal people in India

कबीलाई बस्तियां, गांव तथा कस्बे; यह तीन भारतीय सामाजिक संरचना के प्रमुख अंग हैं। चूँकि यह तीनों ही आपस में बहुत प्रकार से समानताएं समेटे हुए हैं, जिस कारण इन तीनो में भेद कर पाना आसान नही है। भारत देश में अनेक ऐसे बड़े कबीलाई गांव उपस्थित हैं, जो किसी भी मायने में सामान्य जन तथा बहुजातीय कस्बों एवं गांवों से भिन्न नही हैं।

आदिवासी जनजातियों का जीवन Life of Tribal people in India

आदिवासी जनजातियों का इतिहास

भारत की आदिवासी जनजातियां सिर्फ सैद्धांतिक ही नही, अपितु अत्यंत प्राचीन काल से भारतीय सभ्यता का हिस्सा रहीं हैं। यह दुखद है कि गैर-कबीलाई लोगों द्वारा उनका आर्थिक शोषण किया गया। परंतु समय समय पर, इसी के परिणामस्वरूप, इन जनजातियों ने स्वयं पर हो रहे अत्याचार एवं शोषण के खिलाफ न सिर्फ आवाज़ उठाई है, बल्कि अनेक युद्ध भी लड़े हैं। 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 46 के द्वारा प्रत्येक राज्य सरकार को विभिन्न पिछड़ी जातियों एवं जनजातियों के हित में अनेक सहायताएं एवं प्रावधान अपनाने का निर्देश दिया गया है। संविधान के अंतर्गत, जो जनजातियां अनुसूचित श्रेणी में नही आती हैं, उन्हें पिछड़ा वर्ग अथवा अनुसूचित जातियों की श्रेणी में स्थान दिया गया है।

यह कबीलाई जनजातियां शैक्षिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण से पिछड़ी हुई हैं। यह प्रमुख कारण है, जिस वजह से वर्षों से समाज के ऊँचे वर्ग जैसे ज़मींदार, साहूकार, उद्योगपति इत्यादि द्वारा इनके मूल अधिकारों का हनन एवं शोषण किया जा रहा है। इन जनजातियों द्वारा उत्पादित वस्तु को अत्यंत निम्न कीमत पर खरीदकर, बड़े बाज़ारों में ऊँचे दामों पर बेचा जाता रहा है।

आदिवासी जनजातियों को अपनी विशिष्टता का भली-भांति ज्ञान है, यही कारण है उन्होंने स्वयं को अन्य जातियों एवं संप्रदायों से अलग रखते हुए अपना अस्तित्व बचा कर रखा है। उनकी विशिष्ट पहचान का एक प्रमुख आधार उनकी भाषा है। मुण्डा, संथाल, हो कुछ ऐसी प्रजातियां हैं, जो विशेषकर अपनी भाषा के लिए जानी जाती हैं।

भारत में जनजातियां पूरे उपमहाद्वीप पर फैली हुई हैं, परन्तु इनके समूह विशेषकर पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात एवं महाराष्ट्र राज्यों में पाये जाते हैं। झारखण्ड की संथाल, ओराओं, मुण्डा तथा राजस्थान में बसी भील, मीना अथवा गरासिया जनजातियां अपना जीवन स्वराज एवं स्वतंत्रता के साथ, किसी अन्य जनजाति के हस्तक्षेप के बिना, व्यतीत करते हैं।

झारखण्ड में मुण्डा, ओराओं, हो तथा संथाल प्रमुख जनजातियां है, जो अपने जीवन व्यापन के लिए पूर्ण रूप से भूमि स्वामित्वता, जंगल से प्राप्त पदार्थों, स्थिर कृषि, उद्योगों में कर्मचारिता, कोयले की खदानों, तथा सरकारी नौकरियों पर निर्भर रहते हैं।

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इस प्रकार, कबीलाई संस्कृति के कुछ हिस्से में ग्रामीण तो कुछ हिस्से में शहरी सभ्यता की छाप देखने को मिलती है। झारखण्ड की जनजातियों को एस. सी. रॉय द्वारा ‘खेतिहर’ भी कहा गया। एवं इन जनजातियों ने 300 वर्षों तक सामंतवादी शक्तियों के खिलाफ संघर्ष किया।

1930 के दशक में, ब्रिटिश सरकार द्वारा, भारतीय जनजातियों की विस्तृत गणना करवाई गई। इस गणना द्वारा ही आदिवासी जनजातियों को विभिन्न जातियों से धार्मिक तथा पारिस्थितिकीय आधार पर वर्गीकृत किया गया।

डी.जी.मंडेलबॉम के द्वारा आदिवासी जनजातियों की प्रमुख विशेषताएं

डी.जी.मंडेलबॉम के द्वारा भारतीय आदिवासी जनजातियों की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। यह विशेषताएं निम्नलिखित हैं:-

  1. आदिवासियों में समानता का भाव सामाजिक जुड़ाव को मजबूत बनाता है।
  2. पुरुषों तथा अन्य दलों के मध्य अनुक्रम प्रणाली की अनुपस्थिति।
  3. मजबूत, जटिल तथा औपचारिक संगठन की अनुपस्थिति।
  4. भूमि पर सामुदायिक स्वामित्व।
  5. धार्मिक आधार पर सामाजिक विशिष्टता का अभाव, इत्यादि।

भारत में जनसंख्या पर आधारित बड़े कबीलों में प्रमुख रूप से छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र तथा आंध्र प्रदेश के गोंड; राजस्थान,गुजरात, महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश के भील; एवं झारखण्ड, उड़ीसा, तथा पश्चिम बंगाल की संथाल जनजाति सम्मिलित है।

बी.के.रॉय बर्मन द्वारा आदिवासी जनजातियों का विभाजन

भारतीय आदिवासी जनजातियों के इतिहास, प्रजातीय एवं सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, बी.के.रॉय बर्मन द्वारा इन्हें 5 प्रमुख जनजाति समूहों में विभाजित किया गया है।

जो निम्नलिखित हैं:- 

  1. उत्तर-पूर्वी भारत: जिसमे असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर तथा त्रिपुरा को शामिल किया गया है।
  2. उत्तर-पश्चिमी भारत एवं हिमालय का कुछ हिस्सा: इसके अंतर्गत उत्तर प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र आते हैं।
  3. पूर्वी एवं मध्य भारत: जिसमे पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश सम्मिलित हैं।
  4. दक्षिण भारत: जिसमे तमिल नाडु, केरल व कर्नाटक आते हैं। 
  5. पश्चिमी भारत: जिसके अंतर्गत राजस्थान, गुजरात एवं महाराष्ट्र सम्मिलित हैं।

भारतीय जनजातियाँ आपस में नस्ल, भाषा, सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक पृष्ठ के आधार पर विभक्त की जा सकती हैं। सर्वाधिक संख्या में प्रोटो-ऑस्ट्रेलियाड यहाँ निवास करती है। हिमालय के निचले हिस्से में मंगोलियाड नस्ल प्रबल है।बाकी हिस्सों में मेडिटेरेनियन तथा नेग्रीटो प्रजाति निवास करती है।

जिनमे भाषा प्रमुखता से ऑस्ट्रिक, द्रविड़ियन तथा चीनी-तिब्बती ही प्रचलित हैं। आदिवासी लोग अधिकांशतः द्विभाषी होते हैं। कुछ जनजातियों जैसे कि भूमिज तथा भीलों ने स्वयं को हिन्दू धर्म से मिश्रित कर लिया है।

कबीलाई जनजातियों के रोजगार

कबीलाई जनजातियों के रोजगार के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं:-

  1. वानिकी एवं भोजन एकत्रित करना।
  2. स्थान्तरण करते हुए खेती करना।
  3. स्थिर कृषि।
  4. कृषि सम्बंधित श्रम।
  5. पशु-पालन।
  6. घरेलू उद्योग।

इतिहासकार डी. डी. कोसांबी के अनुसार छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में गंगा के मैदान में निवास करने वाली जनजातियों को जीतकर कोसल तथा मगध के साम्राज्य में मिश्रित कर लिया गया था। प्राचीन काल से लेकर ब्रिटिश राज्य तक, हर जगह पर आदिवासी जनजातियों को गैर-आदिवासी लोगों द्वारा लूटा गया है। ब्रिटिश सरकार द्वारा संस्कृतिकरण के नाम पर वर्ष 1873 में जनजातियों को जातियों में शामिल करने का प्रयास किया गया। 

परंतु धीरे धीरे ही सही, भारतीय आदिवासी जनजातियां अपने सामाजिक एवं राजनैतिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं। वे आज भी अपनी प्रजातीय एवं सांस्कृतिक पहचान को बनाये रखने का भरसक प्रयास कर रही हैं एवं स्वयं को बाहरी गैर-आदिवासी लोगों अथवा दिक्कुओं से सुरक्षित कर रही हैं।

भारतीय जनजातियों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। झारखण्ड में उद्योगों की स्थापना के कारण, जनजाति के लोग जागरूक हो रहे हैं एवं रोजगार के लिए स्वयं ही आगे आ रहे हैं।

जनजातियों के मध्य परिवर्तन एवं गतिशीलता के आगमन से निश्चय ही आदिवासी तथा गैर-आदिवासी लोगों के बीच का अंतर कम हुआ है। वर्तमान में जनजातियां भी अपनी पहचान, अधिकारों के प्रति जागरूक एवं सचेत हो रही है।

शिक्षा ही एकमात्र ऐसा साधन है, जिसके द्वारा उन्हें इस राष्ट्र का नागरिक होने के अधिकार एवं कर्तव्यों से अवगत कराया जा सकता है, जिससे कि वे स्वयं समृद्ध एवं संपन्न जीवन यापन करते हुए राष्ट्र की प्रगति में भागीदारी भी कर सकें।

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