एक पेड़ की आत्मकथा Autobiography of A Tree in Hindi

एक पेड़ की आत्मकथा Autobiography of A Tree in Hindi

इस आर्टिकल में हमने एक वृक्ष के द्वरा अपने स्वयं के विषय में कहे हुए आत्माकथा (ऑटोबायोग्राफी) को प्रस्तुत किया है।  यह वृक्ष पर आत्मकथा हमें पेड़-पौधों के महत्व को समझाता है।

एक पेड़ की आत्मकथा Autobiography of A Tree in Hindi

मैं एक पेड़ हूं। मैं ईश्वर द्वारा इस प्रकृति को दिया गया एक अमूल्य वरदान हूं। मैं ही इस सम्पूर्ण जगत में घटित होने वाली समस्त प्राकृतिक घटनाओं का प्रमुख कारण हूँ। इस संसार के सभी जीव जंतुओं के जीवन का आधार मैं ही हूं। इस पृथ्वी पर सबसे पहले मेरा ही जन्म हुआ था।

अपने जन्म से पहले जब मैं पृथ्वी के भूगर्भ में एक बीज के रूप में सुप्तावस्था में पड़ा हुआ था, तब मैंने पृथ्वी के भूगर्भ में उपस्थित जल एवं खनिज तत्वों से अपना पोषण करके स्वयं का विकास किया और इस धरती के भूगर्भ से बाहर एक तने के रूप में आ गया।

मेरे अंदर हरे रंग का एक विशेष प्रकार का पदार्थ पाया जाता है, जिसे पर्णहरित कहते हैं। इस पर्णहरित की सहायता से मैं वायुमंडल एवं पृथ्वी के अंदर मौजूद कार्बनिक पदार्थों जैसे कि जल एवं कार्बन डाइ ऑक्साइड को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करके, एक विशेष विधि द्वारा अपने भोजन का निर्माण करता हूं।  

इस विधि को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं। क्योंकि प्रकाश के बिना इस विधि से मेरे भोजन का निर्माण संभव नहीं है। मैं किसी अन्य सजीव पर निर्भर न रह कर अपना भोजन स्वयं बनाता हूँ। इसीलिये मानव मुझे स्वपोषी सजीव की श्रेणी में रखता है।

मेरा जन्म तो इस सम्पूर्ण जगत के सभी जीवो के जीवन में खुशियां एवं उनके भरण पोषण के लिए हुआ है। मैं इस वायुमंडल की खतरनाक कॉर्बन डाई ऑक्साइड गैस को अपने अंदर ले कर उसका विघटन करके ऑक्सीजन गैस को वायुमंडल में छोड़ता हूँ।

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ऑक्सीजन गैस इस पृथ्वी पर मानव एवं जीव के जीवन के लिए बहुत ही आवश्यक घटक है इसीलिए मुझे मानव का प्राणदाता भी कहा जाता हैं। मेरा अस्तित्व इस सम्पूर्ण जगत के प्रत्येक कोने में है। मैं मनुष्य के घरों में छोटे से पौधे के रूप में तथा मैदानों में विशाल जंगलों के रूप में, इस धरती पर मेरा अस्तित्व है। यह धरती मेरी ही हरियाली से शोभायमान है।

जब मैं एक छोटा पौधा था तब मैं अपने आसपास के बड़े पेड़ो को देखकर ये सोचा करता था कि कब मैं इनकी तरह बड़ा पेड़ बन पाऊंगा और इनकी बड़ी बड़ी शाखाओ की तरह, मेरी भी शाखायें कब इस आसमान की ऊंचाइयों को छुयेगी।

समय बीतने के साथ ही मेरा भी विकास होता गया और धीरे धीरे मैं भी बड़ा हो गया। मैं भी अपनी युवावस्था को प्राप्त कर चुका था। तब मेरी भी शाखायें बड़ी हो गयी थी। और मेरी शाखायें हरी-हरी पत्तियों से ढ़क गयी थी। ये शाखाये अब आसमान छू रही थी। इन पर फल और फूल लग चुके थे। मैं भी अपने साथ के अन्य बड़े पेड़ो की तरह अब प्रकृति को हरियाली, और पंछियो को उनके रहने के लिए घर तथा मानव को छाया आदि देने लगा।

मेरी छोटी छोटी टहनियों और शाखाओ पर लगे हुए विभिन्न रंगों के फूलों को तोड़कर मानव को अपने घरों को सजाता हुआ तथा मंदिरो में ईश्वर को भी समर्पित करता देखकर मैं खुशी की अनुभूति करता हूँ।

हर सुबह जब शुद्ध एवं मन्द मन्द ठंडी  हवाएँ, सूरज की पहली किरण के साथ मेरी शाखाओ पर लगी पत्तियों को स्पर्श करती और पंछी इन पर बैठ कर अपनी मधुर आवाज से इस वातावरण को मधुरिम बनाते तो मैं आनन्दित होकर झूम उठता हूँ।

प्रत्येक वर्ष बसंत ऋतु में, मैं अपनी शाखाओ पर लगी हुई सभी पुरानी पत्तियों को नीचे गिरा देता हूँ, जो मिट्टी में मिल कर मिट्टी को उपजाऊ बनाती है। और इसके बाद फिर से मैं नयी नयी हरी पत्तियों से स्वयं को सुसज्जित करता हूँ।

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मेरी शाखाओ पर लगे फलों को खाकर मानव अपना पोषण करके प्रसन्न हो उठता। और इस संसार के सभी शाकाहारी जानवर भी मेरी पत्तियों को ही खाकर अपना भरण पोषण करके अपना जीवन यापन करते है।

जीव जंतुओं को अपनी वजह से प्रसन्नचित्त देख कर, मैं भी यह सोचकर खुश हो जाता की मेरी वजह से सब इतने खुश हैं। मेरे सघन वनों को सभी जीव जंतुओं ने अपना रैन बसेरा बना लिया है।

जहाँ सभी जीव जंतु, हम पेड़ो के बीच खेलते मस्ती करते है और अपने छोटे बच्चों को जीवन जीने की कला सिखाते। यह सब देखकर मुझे सुखद अनुभूति होती है। मैं भी अब बूढ़ा हो चला हूँ। मेरी शाखाएं कमजोर हो गई हैं परंतु मेरी जड़े आज भी उतनी ही मजबूत हैं जितनी की युवावस्था में थी। मेरी शाखाओ से अब पत्तियां झड़ गयी है इसलिए मैं फल भले ही नहीं दे सकता हूँ परंतु मनुष्य को छाया तथा पक्षियों को आश्रय अवश्य दे सकता हूँ।

समय बीतने के साथ ही साथ मानव ने अपना विकास बहुत तेजी से किया। अब मानव ने अपने जीवन मे हमारे महत्व को बिना सोचे समझे ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति एवं अपना निवास स्थान बनाने के लिए, मेरे जैसे बड़े-बड़े पेड़ों को काटकर, हम पेडों का विनाश करना प्रारंभ कर दिया।

मानव  पेड़ो एवं उसकी मोटी-मोटी शाखाओ को काट कर अपनी जरूरत के हिसाब से विभिन्न प्रकार के फर्नीचरो को बनाता है। जैसे-जैसे मानव की जनसँख्या बढ़ती गयी वह उतनी ही तेजी से मेरा विनाश करता गया।

अब पृथ्वी पर पेड़ो के जंगल की जगह कंक्रीट के जंगल अर्थात हर जगह मानव द्वारा निर्मित ईंट एवं कंक्रीट के मकान दिखाई देते है। परन्तु मानव अब यह भूल गया कि पेड़ो की वजह से ही इस पृथ्वी पर वर्षा होती है जिससे किसानों को खेती करने में मदद मिलती है।

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हमारी वजह से ही वह ग्लोबल वार्मिंग, जिससे की वातावरण का तापमान बढ़ रहा है, जैसी घटनाओं से बचा हुआ है। अब मेरे विनाश के साथ-साथ मानव भी भूकम्प, ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण असन्तुलन, सूखा, बाढ़, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक समस्याओ से जूझने लगा है। इन प्राकृतिक घटनाओं से जूझने के बाद शायद अब मानव दोबारा मेरे महत्व को समझ जाएं और मेरा संरक्षण करना शुरू कर दे।

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