गोवर्धन पूजा पर निबंध, कथा, पूजा विधि Essay on Govardhan Puja in Hindi

गोवर्धन पूजा पर निबंध, कथा, पूजा विधि Essay on Govardhan Puja in Hindi

गोवर्धन पूजा दीपावली के अगले दिन की जाती है। सभी हिंदू धर्म के लोग इस पूजा को श्रधा के साथ करते हैं। इस पूजा में गाय की पूजा की जाती है। हमारे देश में गाय को माता कहा जाता है। वह दूध देकर हमारा पोषण करती है। गाय एक पवित्र जानवर है। वह देवी लक्ष्मी का रूप है।

गोवर्धन पूजा पर निबंध, कथा, पूजा विधि Essay on Govardhan Puja in Hindi

सभी हिंदुओं के लिए गाय पूजनीय होती है। गोवर्धन पूजा में हम सभी गाय की पूजा करते उसके प्रति आभार प्रकट करते हैं। गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजा के नाम से भी जाना जाता है। यह त्यौहार कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन मनाया जाता है।

  • नाम:  गोवर्धन व्रत पूजा
  • अनुयायी: सभी हिंदू, भारतवासी
  • तिथि: कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा

गोवर्धन पूजा 2018 तिथि

15 नवंबर 2020 ब्रहस्पतिवार

गोवर्धन पूजा मुहूर्त का समय 2020

गोवर्धन पूजा सायंकाल मुहूर्त :15:18:37 से 17:27:15 तक
अवधि :2 घंटे 8 मिनट

गोवर्धन पूजा की कथा

एक बार देवराज इंद्र को बहुत अहंकार हो गया। उनके अहंकार को दूर करने के लिए विष्णु के अवतार में श्री कृष्ण ने एक लीला रची। उस दिन सभी बृजवासी तरह तरह के पकवान बना रहे थे और पूजा की तैयारी हो रही थी।

उस समय श्री कृष्ण बालक थे। उन्होंने अपनी माता यशोदा से प्रश्न किया- “मैया सभी बृजवासी किस पूजा की तैयारी कर रहे हैं?” यशोदा बोली- “हम सभी देवराज इंद्र की अन्नकूट पूजा की तैयारी कर रहे हैं”

श्री कृष्ण ने पूछा कि हम सभी देवराज इंद्र की पूजा क्यों करते हैं? यशोदा ने उत्तर दिया कि देवराज इंद्र वर्षा के देवता हैं। उनकी कृपा से अच्छी वर्षा होती है और हमारी फसलें उगती हैं। उनका आभार प्रकट करने के लिए हम सभी अन्नकूट की पूजा करते हैं।

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इससे हमें अन्न मिलता है और हमारी गायों को भी चारा मिलता है। भगवान श्री कृष्ण बोले कि हमारी गाय तो गोवर्धन पर्वत पर जाकर घास खाती हैं, तो सभी ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। इंद्र तो कभी दर्शन ही नहीं देते हैं।

इस तरह श्री कृष्ण भगवान ने अपनी लीला रचाई और सभी ब्रजवासियों ने इंद्र की नहीं बल्कि गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इससे देवराज इंद्र नाराज हो गए। वो खुद को अपमानित समझने लगे।

क्रुद्ध होकर देवराज इंद्र ने मूसलाधार बारिश (वर्षा) शुरू कर दी। वे मथुरा को जल में डूबो देना चाहते थे और सभी ब्रज वासियों को दंडित करना चाहते थे। धीरे धीरे वर्षा ने विकराल रूप धारण कर लिया और चारों ओर पानी ही पानी हो गया।

सभी बृजवासी बालक कृष्ण को भला बुरा कहने लगे। मुरलीधर (श्री कृष्ण भगवान) ने बंसी अपनी कमर पर बांधी और कनिष्ठा उंगली पर संपूर्ण गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। इस तरह कोई भी ब्रजवासी बारिश में नहीं भीगा।

सभी लोग अपनी गायों और बछड़ों के साथ गोवर्धन पर्वत के नीचे आ गये। सभी की रक्षा हो गई। श्री कृष्ण की लीला देखकर इंद्र और भी अधिक क्रोधित हो गये। उन्होंने मूसलाधार बारिश (वर्षा) शुरू कर दी।

तब शेषनाग ने मेढ़ बना कर भीषण वर्षा के जल को गोवर्धन पर्वत की तरफ आने से रोका। देवराज इंद्र क्रुद्ध होकर 7 दिनों तक मूसलाधार वर्षा करते रहे। परंतु गोवर्धन पर्वत और उसके नीचे शरण लिए हुए सभी बृजवासी पूरी तरह सुरक्षित रहे।

देवराज इंद्र का अहंकार चूर चूर हो गया। वह समझे कि कृष्ण कोई और नहीं स्वयं ब्रह्मा का रूप है। इंद्र ब्रह्मा के पास गये और सारी बातें बताई। ब्रह्मा जी बोले कि कृष्ण तो भगवान विष्णु का अवतार है।

देवराज इंद्र श्रीकृष्ण के पास पुनः लौटे और माफी मांगने लगे। इस पौराणिक घटना के बाद सभी मथुरा वासी गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। तब से आज तक दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है।

इस दिन गाय बैलों को स्नान कराकर रंग लगाया जाता है। उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है। गाय बैलों को गुड और चावल खिलाया जाता है।

गोवर्धन पूजा का महत्व

इस पूजा को सभी हिंदू धूम-धाम से मनाते हैं। हमारा जीवन प्रकृति के बिना पूरा नहीं हो सकता है। इस पूजा में सभी मनुष्य प्रकृति, पेड़ पौधे, फूल, हवा, पर्वत, पठार, सूर्य, सूर्य की रोशनी जैसी सभी प्राकृतिक चीजों के प्रति आभार प्रकट करते हैं। प्रकृति से प्राप्त सब्जियां, दूध, फल खाकर ही मनुष्यों का पोषण होता है।

प्रकृति के बिना कोई भी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। पृथ्वी, धरा (मिट्टी) में ही सभी खाने योग्य फसलें और सब्जियां उगती हैं। गोवर्धन पूजा करके हम सभी लोग ईश्वर को धन्यवाद देते हैं कि उसने हमें विभिन्न प्राकृतिक चीजें देकर हमारा पोषण किया है।

गोवर्धन पूजा विधि

इस पूजा को मुख्य रूप से किसान (कृषक) करते हैं क्योंकि जीविका के लिए वो प्रकृति पर सबसे अधिक निर्भर रहते हैं। इस पूजा में सभी लोग सुबह उठकर स्नान करते हैं। घर की रसोई में ताजे पकवान बनाए जाते हैं। गोबर और मिट्टी को मिलाकर गाय, गोवर्धन पर्वत, श्रीकृष्ण, खेत के औजारों की प्रतिमा बनाई जाती है। सभी की पूजा की जाती है। नैवेद्य चढ़ाया जाता है।

भगवान कृष्ण की भी पूजा की जाती है। पूजा के बाद पूरा परिवार एक साथ भोजन ग्रहण करता है। मथुरा के निवासी इस दिन गोवर्धन पर्वत की सात परिक्रमा करते हैं। इस पूजा में दूध, दही, गंगाजल, शहद, बताशे प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है और फिर भक्तों में बांटा जाता है।  

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