भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का इतिहास व कथा Bhimshankar Jyotirling History Story in Hindi

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का इतिहास व कथा Bhimshankar Jyotirling History Story in Hindi

12 ज्योतिर्लिंगों में से छठवां ज्योतिर्लिंग भीमशंकर है। इस मंदिर के विषय में ऐसा कहा जाता है कि भीमशंकर ज्योतिर्लिंग नाम से दो मंदिर हैं। एक महारष्ट्र के पुणे में स्थित है और दूसरा आसाम के कामरूप जिले में स्थित है।

पहले के समय में आसाम कामरूप के नाम से ही जाना जाता था। आसाम के कामरूप में ज्योतिर्लिंग स्थित है ऐसा शिवपुराण के कोटिरुद्रसंहिता में बताया गया है।

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का इतिहास व कथा Bhimshankar Jyotirling History Story in Hindi

Story 1

इस ज्योतिर्लिंग की कथा शिवपुराण के अध्याय 20 के श्लोक 1 से 20 तक और अध्याय 21 के श्लोक 1 से 54 तक में बताई गयी है। प्राचीन काल में भीम नामक कोई राक्षस था। वह अपनी माता कर्कटी के साथ जंगल में अकेला रहा करता था। जब भीम रक्षस बड़ा हुआ तो उसने अपनी माता से पूछा कि उसके पिता का क्या नाम है और वे कहाँ हैं?

तब कर्कटी ने बताया कि तुम्हारे पिता महाबली कुम्भकर्ण थे। तुम्हारे पिता का वध श्री राम के द्वारा कर दिया गया था और उससे पहले भी मेरे पति विरोध थे। उनका वध भी श्री राम के द्वारा हुआ था। उनकी मृत्यु के पश्चात मैं अपने माता-पिता के साथ रहने लगी थी।

एक बार मेरे माता – पिता ने अगस्त्य ऋषि के कोई शिष्य थे उनको आहार बनाना चाहा। वह ऋषि अत्यंत ही विष्णु भक्त थे । उसने तुरंत ही मेरे माता-पिता को भष्म कर डाला। उस घटना के बाद मैं यहाँ इस पर्वत पर अकेली रहने लगी।

अपने परिजनो की मृत्यु के कारण को जानकार भीम ने देवताओं से बदला लेने का निर्णय किया। भीम ने 1000 वर्षों तक भगवान भ्रह्मा जी की घोर तपस्या की। जिससे ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने भीम से मन चाहा वर मांगने को कहा। भीम ने वरदान के रूप में और अधिक बलवान होने का वरदान माँगा।

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वरदान मिलते ही उसने सबसे पहले इंद्र सहित और भी देवताओं को युद्ध में परास्त किया और अंत में भगवान विष्णु को भी हरा दिया। इसके बाद वह पृथ्वी को जीतना चाहता था। इसके लिए उसने सबसे पहले आसाम के कामरूप के राजा सुदक्षिण पर हमला किया।

राजा को पराजित कर उसे बंदीगृह में बंध कर दिया। राजा सुदक्षिण भगवान शिव जी के बहुत बड़े भक्त थे। उन्होंने कारागार में ही भगवान शिव का शिवलिंग बनाकर तपस्या करनी शुरू कर दी। इस बात की खबर भीम को लगी और उसने शिवलिंग को नष्ट करने के लिए तलवार उठाई।

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ऐसा करते ही शिवलिंग में से शिव भगवान जी प्रकट हो गए। शिव जी ने अपने धनुष से राक्षस की तलवार के दो टुकड़े कर दिए और एक हुंकार भरते ही शिव जी ने उस राक्षस को नष्ट कर डाला।

तभी वहां देवता और ऋषि-मुनि प्रकट हो गए और शिव भगवान से बोले कि आप लोगों के कल्याण के लिए सदा के लिए यहाँ विराजमान हो जाइये। तब भगवान शिव जी उसी स्थान पर लिंग रूप में स्थापित हो गए। इस स्थान पर भीम राक्षस के साथ युद्ध करने के कारण ही इस स्थान का नाम भीमशंकर पड़ गया।

ऐसा कहा जाता है कि 24 सों घंटे इस ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक होता रहता है। वर्षा ऋतू के समय तो ज्योतिर्लिंग पूरी तरह से जल में डूब जाता है। सैंकड़ों वर्षों से पुजारी लोग चुप-चाप ही निष्ठा भावना से ज्योतिर्लिंग की पूजा -अर्चना करते आ रहे हैं।

मोटेश्वर महादेव मदिर

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पुणे में स्थित ज्योतिर्लिंग सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। यह स्थान पुणे से लगभग 110 किलोमीटर दूर शिराधन गाँव में है। यहीं से भीमा नदी भी निकलती है।

कहा जाता है कि राक्षस को युद्ध में परास्त करके शिव भगवान को जो पसीना आया था वह पृथ्वी पर गिरा था, उसी पसीने से इस नदी का प्रादुर्भाव हुआ है। यह नदी दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर बहती हुयी रायचूर जिले में कृष्णा नदी के नाम से जानी जाती है।

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नासिक से इस ज्योतिर्लिंग की दूरी लगभग 120  किलोमीटर है। यह मंदिर 3250 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर मोटेश्वर महादेव नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह शिवलिंग बहुत मोटा है। इस मंदिर के लिए ऐसी मान्यता है कि जो भक्त प्रतिदिन सूर्य निकलने के बाद 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम जपते हुए भगवान के दर्शन करता है उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

यह मंदिर अत्यंत भव्य और वास्तुकला का प्रतीक है। मराठा शासक शिवाजी ने इस मंदिर के दर्शन करने वाले भक्तगणों को कई प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं।  इस मंदिर का शिखर निर्माण पेशवाओं के राजनेता नाना फड़नवीस द्वारा 18 वीं शताब्दी में करवाया गया था। इस मंदिर का घंटा अत्यंत सुन्दर है। इस मंदिर के आस-पास कई सारे स्थान हैं जो घूमने के लिए हैं।

जैसे – हनुमान झील, बॉम्बे पॉइंट, नागफनी, गुप्त भीमशंकर, भीम नदी, साक्षी विनायक आदि। इस स्थान के दर्शन के लिए भक्तगण अधिकतर अगस्त से फ़रवरी महीने के बीच में आते हैं। भीमशंकर मंदिर के पास कमलजा मंदिर भी है।

कमलजा, पार्वती देवी को कहा जाता है।  इस मंदिर के दर्शन के लिए भी श्रद्धालु दूर – दूर से आते हैं।  वास्तव में यह स्थल दर्शनीय और पूज्यनीय है। इन स्थलों का भ्रमण करने मात्र से ही भक्तगणों के संकट दूर हो जाते हैं।

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By ସୁରଥ କୁମାର ପାଢ଼ୀ [CC BY-SA 3.0 (https://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0)], from Wikimedia Commons

By आशीष भटनागर [CC BY-SA 3.0 (https://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0)], from Wikimedia Commons

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