भारत में महिलाओं की स्थिति Article on Status of Women’s in India Hindi

भारत में महिलाओं की स्थिति पर आलेख Article on status of women’s in India

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एवं राष्ट्रवादी आंदोलनों में अहम भागीदारी से लेकर, घरेलू कार्यों तक सीमित रहने के लिए बाध्य होने तक एवं आज की शताब्दी की उभरती हुई सशक्त नारी, हमारा देश स्त्री विकास के इन सभी काल चक्रों का साक्षी रहा है।

भारत में महिलाओं की स्थिति पर आलेख Article on Status of Women’s in India

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एवं राष्ट्रवादी आंदोलनों में अहम भागीदारी से लेकर, घरेलू कार्यों तक सीमित रहने के लिए बाध्य होने तक एवं आज की शताब्दी की उभरती हुई सशक्त नारी, हमारा देश स्त्री विकास के इन सभी काल चक्रों का साक्षी रहा है।

वर्षों से लैंगिक समानता को लेकर हमारे देश में अनेक वाद-विवाद होते चले आ रहे हैं। जिनमे से कुछ मुख्यतः स्त्री का समाज में स्थान, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति, लैंगिक भेदभाव का खात्मा इत्यादि हैं। अतः यह कहना गलत नही होगा कि भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था में स्त्रियों की स्थिति को लेकर सदैव विरोधाभास रहा है।

जहाँ एक ओर स्त्रियों के मध्य साक्षरता एवं शिक्षा का प्रतिशत निरंतर बढ़ रहा है तथा स्त्रियाँ पेशेवर क्षेत्रों में अपने कदम जमा रही हैं, वहीं दूसरी ओर कन्या भ्रूण हत्या, निम्न स्वास्थ्य स्थिति एवं शिक्षा का अभाव उन्हें आगे आने से रोक रहा है। अगर वास्तव में हमे महिलाओं की स्थिति जाननी है तो इसके दोनों पहलुओं पर गौर करना ज़रूरी है एक पहलू जो बेहद आशाजनक है तथा दूसरा पहलू जो बिलकुल ही बेरंग है।

स्वतंत्रता आंदोलन

भारतवर्ष की स्वतंत्रता के पश्चात्, स्वतंत्रता आंदोलन में सम्मिलित महिला राष्ट्रवादियों के योगदान पर उनकी अभिस्वीकृति विशेष रूप से की गई थी। जब भारतीय संविधान की रचना की गई, उसमे स्त्रियों को समानता का अधिकार एवं चुनाव का समान अधिकार प्रदान किया गया।

संविधान के अंतर्गत स्त्रियों को अभिव्यक्ति एवं समान अवसर के अधिकार प्रदान किये गए। उस समय का लिंग-अनुपात वर्तमान लिंग-अनुपात से बेहतर था। परंतु फिर भी महिलाओं की वास्तविक स्थिति कुछ और ही थी।

उन्हें हमेशा की तरह घरेलू जिम्मेदारियां सौंप कर, पुरुष के अधीन कर दिया गया। उनको भारतीय नारी का झूठा जामा पहनाकर घर की सीमाओं के भीतर जकड़ दिया गया। ये वही महिलाएं थी जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया; भारतवर्ष को अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्रता भी मिली, पर स्त्रियों की स्वतंत्रता छीन ली गई।

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उन्होंने इस देश में दोयम दर्जे का नागरिक माना गया। उस समय महिला साक्षरता दर 8.6% के निम्न स्तर पर थी। समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक एवं सांस्कृतिक, स्त्री शिक्षा की विरोधी कुरीतियां व्याप्त थीं।

स्थिति में सुधार

1950 के दशक में ‘शारदा अधिनियम’ के द्वारा स्त्रियों के विवाह की उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष की गई। इसके बावजूद विशेषकर उत्तर भारत में बाल विवाह का प्रचलन अपने चरम पर था। स्त्रियों के शिक्षा के अधिकार, स्वास्थ्य, शारीरिक एवं आर्थिक संसाधन तथा राजनैतिक,सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में अवसर की समानता पर बुरी तरह असंगति पसरी हुई थी।

इसके अलावा स्त्रियों को विवाह, कार्य एवं जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने का भी अधिकार नही दिया गया। उनकी आवाज़ का दमन किया गया। एवं यही वह समय था जब दहेज़ प्रथा अपने शीर्ष पर थी।

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परंतु धीरे धीरे समय के साथ स्त्रियों की दशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन आये। इसके पीछे मुख्य वजह समाज में शिक्षा का बढ़ता प्रचार-प्रसार था। सरकार द्वारा चलाई गई सर्व शिक्षा अभियानएवं साक्षर भारत अभियानआदि योजनाओं की मदद से महिला साक्षरता दर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।जिसका परिणाम यह हुआ कि आज विश्व में भारत ऐसा शीर्ष देश है जिसमे सर्वाधिक योग्य पेशेवर महिलाएं हैं, जो अलग अलग संगठित क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं।

भारतीय महिलाएं मंद गति से ही सही, परंतु अपनी वास्तविक योग्यताएं एवं सामर्थ्य को पहचान रही हैं। वे अपनी बेड़ियां तोड़कर, देश तथा विदेश में अलग अलग क्षेत्रों में अपना वर्चस्व जमा रही हैं।

आज के समय में मुश्किल ही ऐसा कोई क्षेत्र होगा जहाँ भारतीय महिलाओं ने अपने कदम न रखे हो तथा अपनी काबिलियत सिद्ध करने में नाकाम रही हो। बात चाहे राजनीति, खेल, मनोरंजन जगत, साहित्य अथवा तकनीकी की ही क्यों ना हो, उन्होंने हर कदम पर साबित किया है कि वे किसी से भी कम नही।

आज की आधुनिक महिलाएं इतनी कुशल, दक्ष एवं स्वयंसिद्धा हैं, जिस कारण उन्हें शक्तिकहना गलत नही होगा। आज की भारतीय महिलाएं अत्यंत दृढ़ निश्चयी एवं महत्वाकांक्षी हैं, तथा वे अपने क्षेत्र में पूरे विश्व के समक्ष अपना लोहा मनवा रही हैं। वे शिक्षा को लेकर अधिक से अधिक उत्साही हैं एवं हर तरह के क्षेत्र जैसे राजनीति, अभियांत्रिकी, चिकित्सा अथवा शिक्षण कार्य ही क्यों न हो, में अपने कदम जमा रही हैं।

यह सत्य है कि एक राष्ट्र की स्थिति का अंदाज़ा आप उस राष्ट्र की महिलाओं की स्थिति को देखकर लगा सकते हैं। परन्तु यह बात भी नज़रंदाज़ नही की जा सकती कि महिलाओं को कार्यक्षेत्र में उपलब्धियों के अलावा भी, एक माँ अथवा पत्नी के रूप में अपनी जिम्मेदारियां भी वहन करनी होती हैं। अतः हम कह सकते हैं कि नजरिया अभी भी बहुत अधिक नही बदला है। आज भी बड़े स्तर पर कानूनन उम्र से पहले ही लड़कियों का विवाह कर दिया जाता है।

बहुत कम संख्या में महिलाएं संगठित क्षेत्रों से जुडी हैं एवं आर्थिक स्वतंत्र हैं। शहरी क्षेत्रों में केवल 13.9% महिलाएं कार्यरत हैं एवं 29% महिलाएं घरेलू एवं कृषि कार्य में संलिप्त हैं। जिसमे भी पुरुषों द्वारा उनका शोषण किया जाना कोई अचरज का विषय नही है।

निष्कर्ष 

महिला सशक्तिकरण का रास्ता गड्ढो तथा बाधाओं से भरा हुआ है। वर्षों के प्रयासों के बावजूद , देश महिलाओं के प्रति मानसिक परिवर्तन के विषय में बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहा है। इतने अधिक संख्या में कानून पारित होने के बाद भी महिलाओं से विरुद्ध होने वाले अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। हर वर्ष दहेज़, बलात्कार, शारीरिक शोषण की बढ़ती घटनाएं देश को वापस उसी गर्त की तरफ धकेल रही हैं।

जब कोई स्त्री एक हाथ के सहारे से अपनी कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रही होती है वहीं दूसरे हाथ से वह अपने ही परिवारीजन द्वारा की जा रही हिंसा का प्रतिरोध कर रही होती है। पुराने समय के सन्दर्भ में आज की महिलाओं ने बहुत उपलब्धियां अर्जित की हैं, परंतु सत्य यह भी है कि ये रास्ता अभी बहुत लंबा एवं संघर्ष से भरा हुआ है।

महिलाएं अपने घर को दूर छोड़कर बाहर तो आती हैं, परंतु यहाँ बाहर एक अत्यधिक क्रूर, निष्ठुर तथा शोषणकारी समाज उसकी प्रतीक्षा कर रहा होता है, एवं यहाँ ऐसे समाज में उसे अपनी काबिलियत साबित करनी होती है जो उसे भोग की वस्तु तथा वंश को आगे बढ़ने वाली मशीन से अधिक कुछ नही मानता।

भारतीय महिलाओं को अपने विरोध में उठने वाले सभी स्वरों को निरुत्तर करके, अपना रास्ता स्वयं ही बनाना है, तथा यह पुरुष की जिम्मेदारी है कि वह महिलाओं को देश के विकास में बराबर का साझीदार एवं भागीदार मानकर उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें

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