सूरदास के प्रसिद्ध दोहे हिंदी अर्थ सहित Surdas Ke Dohe with Hindi meaning

सूरदास के प्रसिद्ध दोहे हिंदी अर्थ सहित Surdas Ke Dohe with Hindi Meaning

सूरदास का जन्म रुनकता ग्राम में 1483 ई में पंडित रामदास जी के घर एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे श्री कृष्ण के भक्त थे। वे भक्ति काल के प्रमुख कवि थे। उन्हें हिंदी साहित्य का विद्वान कहा जाता है। सूरदास की रचनाओं में कृष्ण भक्ति का उल्लेख मिलता है।

श्री कृष्ण की बाल लीलाएं और बचपन की कहानियों का उन्होंने सुंदर वर्णन किया है। उनकी रचनाएं भारतीय साहित्य और कक्षा 8, 10, 11, 12 में अत्यंत लोकप्रिय हैं। वे जन्म से अंधे थे या नहीं थे इस पर विद्वानों में मतभेद है परंतु उन्हें भाषा का अच्छा ज्ञान था।

साहित्य और कला के क्षेत्र में सूरदास जी का अद्वितीय योगदान रहा है। सूरदास जी एक महान संत और साहित्यकार थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं से कृष्ण भक्ति की तरफ़ लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।

कवि सूरदास जी की रचनाओं में बेहद मार्मिक ढंग से भक्ति भाव का उल्लेख मिलता है। ऐसा कहा जाता है कि सूरदास जी जन्म से ही अंधे थे, लेकिन उनके द्वारा लिखी गई रचनाएं कई लोगों के मन में यह सवाल पैदा करती हैं कि बिना आंख के कोई इतना स्पष्ट और अनोखी रचनाएं कैसे कर सकता है।

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सूरदास के प्रसिद्ध दोहे हिंदी अर्थ सहित Surdas Ke Dohe with Hindi meaning

Contents

महान कवि सूरदास जी के दोहे भक्ति काल से ही समाज में बेहद प्रचलित रहे हैं। अपने जीवन काल में सूरदास जी ने अधिकतर भगवान श्री कृष्ण के जीवन के विषय में साहित्य की रचना की है जिनमें से कुछ प्रमुख दोहें निम्नलिखित दिए गए हैं –

दोहा 1: चरन कमल बन्दौ हरि राई
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई।
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चले सिर छत्र धराई
सूरदास स्वामी करुनामय बार-बार बंदौं तेहि पाई।।

अर्थ – उपरोक्त दोहे में सूरदास जी कहते हैं कि जिस पर भगवान श्री कृष्ण का अमृत रूपी कृपा हो जाए तो उसका जीवन सफल हो जाता है। जीवन के सारे दुख और दुविधाएं नष्ट हो जाती हैं। श्री कृष्णा की महिमा अपरंपार है, वे बेहद दयालु हैं। सच्चे दिल से जो कोई भी श्री कृष्ण की आराधना करता है तो उसे अच्छे फल की प्राप्ति जरूर होती है। अगर लंगड़े पर प्रभु कृपा कर दें, तो वह चलने लगता है और बड़े-बड़े पर्वतों को भी लांघ जाता है। अंधकार में डूबे किसी अंधे पर श्री कृष्ण की कृपा हो जाए तो वह अपनी आंखों से इस सुंदर दुनिया को देख सकता है। भगवान का आशीर्वाद पाकर गूंगे भी बोल उठते हैं और दीन- दुखी गरीब का जीवन खुशियों से भर जाता है। ऐसे परम दयालु परम पिता श्री कृष्ण के चरणों में सूरदास बार-बार नमन करते हैं।

दोहा 2: मैया री मोहिं माखन भावै
मधु मेवा पकवान मिठा मोंहि नाहिं रुचि आवे
ब्रज जुवती इक पाछें ठाड़ी सुनति स्याम की बातें
मन-मन कहति कबहुं अपने घर देखौ माखन खातें
बैठें जाय मथनियां के ढिंग मैं तब रहौं छिपानी
सूरदास प्रभु अन्तरजामी ग्वालि मनहिं की जानी

अर्थ – उपरोक्त दोहे में कृष्ण और यशोदा के बीच हो रहे वार्ता का वर्णन करते हुए सूरदास जी कहते हैं कि अपनी मैया यशोदा से श्री कृष्ण कह रहे हैं कि मुझे मिष्ठान, पकवान, मेवा और मधु कुछ भी अच्छा नहीं लगता मुझे केवल माखन ही अच्छा लगता है। उनके इस वार्ता को एक ग्वालिन पीछे छुपकर सुन रही थी। वह मन ही मन सोच रही थी कि हे कृष्णा! तुमने कभी अपने घर से भी माखन खाया है। मेरे घर से तुम सदैव माखन चुरा के खाते हो। उपरोक्त रचना में सूरदास जी का आशय है कि भगवान श्रीकृष्ण अंतर्यामी है, वह बिना कुछ कहे ही समझ जाते हैं, जिस प्रकार वे उस ग्वालिन के मन की बात जान गए।

दोहा 3: मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥

अर्थ- प्रस्तुत सूरदास के दोहे में सुरदासजी अपने मन के बुराइयों को उजागर करते हुए, भगवान श्री कृष्ण से कृपा करने की याचना करते हैं। कवि कहते हैं कि संसार में मेरे जैसा कोई भी दूसरा कुटिल, दुष्ट और पापी नहीं है। मोह माया के बंधन में जकड़ा हुआ मैं इस शरीर को ही सुख समझ बैठा हूं। मैं नमक हराम हूं, जो अपने आराध्य अपने रचयिता को ही भूल गया। मैं गांव के कचड़ों में रह रहे सूअरों की भांति अपने जीवन में वासनाओं और बुरी आदतों में जकड़ा हुआ हूं। मैं पापी हूं क्योंकि सज्जनों और संतों की संगति छोड़कर धूर्तों की गुलामी करता हूं। भला मुझसे अधिक पापी और कौन हो सकता है? सूरदास जी भगवान श्री कृष्ण के समक्ष अपने बुराइयों को उजागर करके उनसे आश्रय की विनती करते हैं।

दोहा 3: जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै।
यह ब्योपार तिहारो ऊधौ, ऐसोई फिरि जैहै॥
यह जापे लाये हौ मधुकर, ताके उर न समैहै।
दाख छांडि कैं कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै॥
मूरी के पातन के कैना को मुकताहल दैहै।
सूरदास, प्रभु गुनहिं छांड़िकै को निरगुन निरबैहै॥

अर्थ- ज्ञान का संदेश लेकर आए उधो को गोपियां कहती हैं कि हे उधो ज्ञान का प्रचार करने के उद्देश्य से जो तुम यहां आए हो तुम्हारा यह व्यापार यहां नहीं चलेगा तुम्हे वापस लौटना होगा। एक बात यह जान लो कि जिनका सौदा आप लेके आए हैं उन्हें यह बिल्कुल भी रास नहीं आएगा। आखिर तुम्ही बताओ कि कौन मूर्ख मीठे अंगूरों की जगह कड़वे नीम की निम्बौरी खाना पसंद करेगा। कौन है जो अनमोल मोती को मूली के पत्तों की जगह देगा। उपरोक्त से सूरदास जी का आशय है कि कौन साकार ईश्वर (भगवान श्री कृष्ण) को छोड़कर निराकार ब्रह्म की आराधना करेगा।

दोहा 4: अबिगत गति कछु कहति न आवै।
ज्यों गुंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै।।
परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।
मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै।।
रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चक्रत धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं तातों सूर सगुन लीला पदगावै।।

अर्थ – श्री कृष्ण के परम भक्त सूरदास जी इस रचना के माध्यम से यह कहते हैं कि इस संसार में कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें चाह कर भी दूसरों को नहीं समझाया जा सकता है। कुछ ऐसी चीजें जिन्हें केवल महसूस किया जा सकता है, इस प्रकार के आनंद को केवल हमारा मन ही समझ सकता है। अक्सर जिन चीजों से हमें परम आनंद की अनुभूति होती है, दूसरों के सामने वह कोई महत्व नहीं रखता। यदि किसी गूंगे को स्वादिष्ट मिठाई खिला दी जाए तो, मिष्ठान का स्वाद गूंगा चाह कर भी दूसरों को नहीं समझा सकता। उपरोक्त दोहे में सूरदास जी का आशय यह है कि सूरदास जी ने अपने पूरे जीवन में केवल श्री कृष्ण की ही गाथा गाई है। भगवान श्री कृष्ण के बाल लीला का वर्णन करते समय उन्हें जिस प्रकार के परम आनंद की अनुभूति होती है, उसे दूसरा कोई नहीं समझ सकता।

दोहा 5: गुरू बिनु ऐसी कौन करै।
माला-तिलक मनोहर बाना, लै सिर छत्र धरै।
भवसागर तै बूडत राखै, दीपक हाथ धरै।
सूर स्याम गुरू ऐसौ समरथ, छिन मैं ले उधरे।।

अर्थ – कविवर भगवान श्री कृष्ण को अपना गुरु मानते हैं और गुरु की महिमा का महत्व बताते हुए सूरदास जी कहते हैं कि गुरु के बिना इस अंधकार में डूबे संसार से बाहर निकालने वाला दूसरा और कोई भी नहीं होता। अपने शिष्यों पर गुरु के अलावा ऐसी कृपा कौन कर सकता है इससे वे अपने कंठ में हार तथा मस्तक पर तिलक धारण कर सकें। संसार के मोह माया रूपी विशाल समुद्र से एक सच्चा गुरु अपने शिष्य को बचाता है। ज्ञान स्वरूप संपत्ति को गुरु अपने शिष्य को सौंपता हैं जिससे कि मानव कल्याण हो सके। ऐसे गुरु को सूरदास जी बार-बार नमन करते हैं। कवि कहते हैं कि उनके गुरु श्री कृष्ण ही उन्हें हर क्षण इस संसार सागर में उनकी नैया पार लगाते हैं।

दोहा 6: हमारे निर्धन के धन राम।
चोर न लेत, घटत नहि कबहूॅ, आवत गढैं काम।
जल नहिं बूडत, अगिनि न दाहत है ऐसौ हरि नाम।
बैकुंठनाम सकल सुख-दाता, सूरदास-सुख-धाम।।

अर्थ – सूरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि इस सृष्टि में जिनका कोई नहीं होता उनके श्रीराम हैं। राम नाम एक ऐसा अनोखा खजाना है जिसे हर कोई प्राप्त कर सकता है। धन अथवा संपत्ति को एक बार खर्च करने पर वह कम हो जाता है, लेकिन राम नाम एक ऐसा अनमोल रत्न है जिसे कितने भी बार पुकारा जाए उसका महत्व कभी भी नहीं घटता। ऐसा अनमोल रत्न ना तो चोरों द्वारा चुराया जा सकता है, ना ही इसके मूल्य को घटाया जा सकता है। राम रूपी अनमोल रत्न ना तो गहरे पानी में डूबता है और ना ही आग में जलता है। अर्थात इस संसार में एक चीज सत्य है जिसे कभी भी नष्ट नहीं किया जा सकता वह है, राम नाम। सूरदास जी कहते हैं की समस्त संसार को सुख प्रदान करने वाले सुखों के भंडार अथवा राम नाम से उन्हें सुख पहुंचाता है।

दोहा 7: हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह कान्ह जकरी।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।।

अर्थ – उधो जब गोपियों को योग विद्या का ज्ञान देते हैं तब गोपियां कृष्ण भक्ति के सामने योग विद्या को कड़वी ककड़ी के समान बताकर उसे अपने लिए अनावश्यक बताती हैं। जिस प्रकार हारिल पक्षी अपने पंजों में लकड़ी के लोभ के कारण हमेशा लकड़ी का टुकड़ा पकड़े रहता है, उसी प्रकार गोपियों की स्थिति भी हारिल पक्षी की भांति हो गई है जो कृष्ण नाम को अपने हृदय में संजोए बैठी हैं। दिन-रात, सोते-जागते, सभी स्थानों पर केवल कृष्ण ही नजर आते हैं। ऐसे में उन्हें योग के ज्ञान की आवश्यकता नहीं बल्कि वे केवल कृष्ण भक्ति में मगन रहना चाहती हैं।

दोहा 8: हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।।

अर्थ – कृष्ण ने जब योग का संदेश अपने मित्र ऊधो के द्वारा गोपियों तक पहुंचाया तब गोपियों ने कृष्ण को चतुर बताते हुए कहा कि अब श्री कृष्ण ने राजनीति का ज्ञान भी प्राप्त कर लिया है, जो उन्होंने चतुराई दिखाते हुए योग का संदेश उद्धो द्वारा हम तक पहुंचाया है। गोपियां कहती है कि कृष्ण बचपन से ही बहुत चतुर थे इसलिए उन्होंने आज भी बुद्धिमानी दिखाते हुए हमारे हाल जानने के लिए अपने मित्र को भेजा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि श्री कृष्णा ब्रजभूमि छोड़कर के बाद बदल गए हैं। गोपियां इस बात से बेहद दुखी हैं कि श्रीकृष्ण स्वयं नहीं आए। गोपिया कहती हैं की अब उन्हें कृष्णा से मुंह फेर लेना चाहिए, क्योंकि अब उनके हृदय में हमारे लिए कोई स्नेह नहीं है। श्री कृष्ण ने हमारे साथ अन्याय किया है, क्योंकि राजधर्म के मुताबिक प्रजा को सताना एक अन्याय है।

दोहा 9: मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौं, तू जसुमति कब जायौ।।
कहा करौन इहि के मारें खेलन हौं नहि जात
पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात।।
गोरे नन्द जसोदा गोरीतू कत स्यामल गात
चुटकी दै-दै ग्वाला नचावत हँसत-सबै मुसकात।।
तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुं न खीझै
मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै।।
सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत
सूर स्याम मौहिं गोधन की सौं, हौं माता तो पूत।।

अर्थ – भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप के एक संदर्भ का वर्णन करते हुए सूरदास जी कहते हैं, कि श्री कृष्ण बचपन में अपनी माता यशोदा रानी से बलराम की शिकायत करते हुए कहते हैं, कि दाऊ भैया मुझे यह कहते हुए चिढ़ाते रहते हैं, कि कान्हा तुम्हें कहीं बाहर से मोल लेकर मंगवाया गया है तुम इस घर के नहीं हो। मुझे दाऊ भैया प्रतिदिन चिढ़ाते हैं, जिसकी वजह से मैं खेलने भी नहीं जा पा रहा हूं। दाऊ भैया यह भी कहते हैं कि नंद बाबा और यशोदा मैया दोनों ही उजले रंग के हैं लेकिन तुम तो सांवले रंग के हो। आखिर तुम्हरे मैया बाबा कौन है? ऐसा कहकर वे ग्वालों के साथ खेलने चले जाते हैं और नाचते हैं। हे मैया! आप मुझे कोई भूल करने पर डांटती रहती हैं, लेकिन दाऊ भैया को आप कुछ भी नहीं कहती हैं। बाल कृष्ण के मुख से इतने मीठे वचन सुनकर यशोदा मैया मन ही मन मुस्कुराती है। मैया को मुस्कुराता हुआ देखकर कान्हा उनसे कहते हैं कि गौ माता की कसम खाकर कहिए की मैं आपका ही पुत्र हूं।

दोहा 10: बूझत स्याम कौन तू गौरी,
कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी।
काहे कों हम ब्रजतन आवतिं खेलति रहहिं आपनी पौरी,
सुनत रहति स्त्रवननि नन्द ढोता करत फिरत माखन दधि चोरी।।
तुम्हरो कहा चोरि हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी।
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भुरइ राधिका भोरी।।

अर्थ- उपरोक्त सूरदास के दोहे में, ब्रज में एक अनजानी सखी को देखकर श्री कृष्ण उनसे पूछते हैं की मैंने तुम्हें पहले ब्रज में कभी नहीं देखा है, तुम कहां रहती हो? और कौन हो? तुम्हारी माता कौन है? तुम्हारी बेटी मेरे साथ खेलने क्यों नहीं आती? श्री कृष्णा गोपी से निरंतर प्रश्न करते रहते हैं, जिसे वह शांत होकर सुनती रहती है। कृष्ण कहते हैं कि एक सखी और हमें खेलने के लिए मिल गई है। सूरदास जी अपनी रचना में श्रृंगार रस का भाव डालते हुए श्री कृष्ण और राधा तथा गोपियों के बीच हुए वार्ताओं को अद्भुत तरीके से प्रस्तुत करते हैं।

दोहा 11: मुखहिं बजावत बेनु
धनि यह बृंदावन की रेनु।
नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु।।
मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन।
चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु।।
इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनि के ऐनु।
सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुरधेनु।।

अर्थ: जिस पवित्र भूमि पर भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया, उसकी गाथा गाते हुए सूरदास जी अपने इस दोहे में में व्रजभूमि की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि जिस धरती पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं, जहां वे बांसुरी बजाते हैं ऐसे स्वर्ग समान ब्रजभूमि की जितनी प्रशंसा की जाए उतना कम होगा। ब्रजभूमि में मन समस्त प्रकार के दुखों को भूलकर शांत हो जाता है। यहां भगवान श्री कृष्ण के स्मरण मात्र से मन में एक नई ऊर्जा का आगमन होता है। अपने ही मन को समझाते हुए सूरदास जी यह भी कहते हैं कि हे मन! तू इस माया रुपी संसार में यहां वहां क्यों भटकता है, तू केवल वृंदावन में रहकर अपने आराध्य श्री कृष्ण की स्तुति कर। केवल ब्रजभूमि में रहकर ब्रज वासियों के जूठे बर्तनों से जो कुछ भी अन्न प्राप्त हो उसे ग्रहण करके संतोष कर तथा श्री कृष्ण की आराधना करके अपना जीवन सार्थक कर। जहां स्वयं परमात्मा ने जन्म लिया हो ऐसी पवित्र भूमि की बराबरी स्वयं कामधेनु भी नहीं कर सकती हैं।

दोहा 12: धेनु चराए आवत
आजु हरि धेनु चराए आवत।
मोर मुकुट बनमाल बिराज पीतांबर फहरावत।।
जिहिं जिहिं भांति ग्वाल सब बोलत सुनि स्त्रवनन मन राखत।
आपुन टेर लेत ताही सुर हरषत पुनि पुनि भाषत।।
देखत नंद जसोदा रोहिनि अरु देखत ब्रज लोग।
सूर स्याम गाइन संग आए मैया लीन्हे रोग।।

अर्थ: श्री कृष्णा अपनी गायों को वन में ग्वालों के साथ चरवाने ले जाते हैं, जिसका वर्णन सूरदास जी ने इस अद्भुत रचना में किया है। पहले दिन जब कान्हा अपने मित्रों के संग वन में गायों को चराने जाते हैं, तो श्री कृष्ण के मुकुट में मोर का पंख बहुत ही सुशोभित हो रहा है। पितांबरी धारण किए हुए तथा बांसुरी लिए हुए श्री कृष्ण गायों के साथ बहुत ही अच्छे लग रहे हैं। जिस प्रकार ग्वालें गायों को चराते हुए आगे बढ़ रहे हैं, उनके शब्दों को सुनकर बालकृष्ण भी उन्हीं की भांति गायों को चरवा रहे हैं। इस सुंदर दृश्य को बृजवासी तथा नंद बाबा यशोदा मैया तथा रोहिणी दूर से ही देखकर प्रसन्न चित्त हो रहे हैं। जब गायों को चराने के पश्चात कान्हा पुनः लौटते हैं, तो यशोदा मैया अपने लल्ला को हृदय से लगाकर उनकी बलैया लेती हैं।

दोहा 13: गाइ चरावन जैहौं
आजु मैं गाइ चरावन जैहौं।
बृन्दावन के भांति भांति फल अपने कर मैं खेहौं।।
ऐसी बात कहौ जनि बारे देखौ अपनी भांति।
तनक तनक पग चलिहौ कैसें आवत ह्वै है राति।।
प्रात जात गैया लै चारन घर आवत हैं सांझ।
तुम्हारे कमल बदन कुम्हिलैहे रेंगत घामहि मांझ।।
तेरी सौं मोहि घाम न लागत भूख नहीं कछु नेक।
सूरदास प्रभु कह्यो न मानत पर्यो अपनी टेक।।

अर्थ: उपरोक्त सूरदास के दोहे में भगवान श्री कृष्ण के बाल हठ का चित्रण किया गया है। अन्य ग्वालो को गायों को चराता देख एक दिन श्री कृष्ण अपनी मैया के समक्ष इस बात पर अड़ गए, कि उन्हें भी गायों को चराने वन में जाना है। गायों को चराने के साथ ही उन्हें वृंदावन के वनों से स्वादिष्ट फलों का सेवन भी स्वयं अपने हाथों से करना है। नन्हे कृष्णा के हठ के समक्ष मैया यशोदा उनसे कहती है, कि हे कन्हैया अभी तू तो बहुत छोटा है और अपने नन्हे नन्हे पैरों से तू इतना दूर कैसे चल पाएगा और वैसे भी पुनः लौटते समय संध्या हो जाती है। तुझसे अधिक आयु वाले अपनी गायों को चरवाकर सीधे संध्या को घर लौटते हैं, जब चारों तरफ अंधेरा हो जाता है। गायों को चराने के लिए कड़ी धूप में पूरे वन में घूमना पड़ता है। तेरा शरीर तो पुष्प के समान कोमल है, तू भला ऐसे कड़े धूप को कैसे सहन कर पाएगा? यशोदा मैया के समझाने के बाद भी कृष्ण अपनी हठ पर अड़े रहे और मैया की सौगंध खाते हुए कहने लगे की तेरी कसम मैया मुझे धूप तथा भूख नहीं सताती है। मुझे गायों को चराने के लिए कृपया जाने दे।

दोहा 14: चोरि माखन खात
चली ब्रज घर घरनि यह बात।
नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात।।
कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ।
.कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ।।
कोउ कहति किहि भांति हरि कों देखौं अपने धाम।
हेरि माखन देउं आछो खाइ जितनो स्याम।।
कोउ कहति मैं देखि पाऊं भरि धरौं अंकवारि।
कोउ कहति मैं बांधि राखों को सकैं निरवारि।।
सूर प्रभु के मिलन कारन करति बुद्धि विचार।
जोरि कर बिधि को मनावतिं पुरुष नंदकुमार।।

अर्थ: पूरे ब्रज में यह बात फैल गई है, कि कृष्ण अपने मित्रों के साथ मिलकर माखन चोरी करके खाते हैं। पूरे गांव में इसी बात की चर्चा हो रही है कि नंद पुत्र श्री कृष्ण वह दूसरों के घर से माखन चुराते हैं। सभी गोपियां एक साथ मिलकर यह चर्चा कर रहे हैं। तभी एक सखी कहती है, कि मैंने अभी-अभी कान्हा को अपने घर में देखा। दूसरी करती है की कृष्ण मेरे घर में प्रवेश कर रहे थे लेकिन मुझे द्वार पर खड़े देख भाग गए। एक गोपी कहती है कि यदि श्री कृष्ण मुझे मिल जाए, तो मैं जीवन भर उन्हें स्वादिष्ट माखन खिलाऊं जितना वे सेवन कर सकें। सभी ग्वालिन कहती है कि यदि कृष्ण उन्हें मिल जाए तो वह उसे कहीं जाने नहीं देगी सदैव अपने घर में रखेगी। अन्य सखियां यह भी कहती है, कि यदि कृष्ण मेरे हाथ लग जाए तो मैं उन्हें बांधकर अपने पास रख लूंगी। उनकी झलक पाने के लिए भी गोपियां व्याकुल रहती हैं। ब्रज की गोपियां नंद पुत्र नन्हे श्रीकृष्ण को हाथ जोड़कर अपने पति रूप में स्वीकार करने के लिए भी तैयार है।

दोहा 15: कबहुं बोलत तात
खीझत जात माखन खात।
अरुन लोचन भौंह टेढ़ी बार बार जंभात।।
कबहुं रुनझुन चलत घुटुरुनि धूरि धूसर गात।
.कबहुं झुकि कै अलक खैंच नैन जल भरि जात।।
कबहुं तोतर बोल बोलत कबहुं बोलत तात।
सूर हरि की निरखि सोभा निमिष तजत न मात।।

अर्थ- राग रामकली में रचित इस सूरदास के दोहे में भगवान श्री कृष्णा के बाल कृणाओं का वर्णन किया है। एक बार कान्हा माखन खाते खाते हैं इस प्रकार रूठ गए कि रोने लगे, जिसके कारण उनकी आंखें भी लाल हो गई। माखन खाते हुए कभी श्री कृष्ण घुटनों के बल मिट्टी में चलते तो कभी अपने छोटे-छोटे पैरों पर खड़े होकर धीरे-धीरे चलने का प्रयास करते, जिससे उनके पैरों की पैजनिया झनझन बजने लगती। लीला करते हुए कान्हा स्वयं अपने बालों को खींचते और आंखों से आंसू निकालते तो कभी अपनी तोतली मधुर बोली से कुछ बोलने लगते। कृष्ण की इन शरारतों को देखकर यशोदा मैया उन्हें एक क्षण के लिए भी अपने से दूर करने के लिए तैयार नहीं। अर्थात भगवान कृष्ण के प्रत्येक लीलाओं का आनंद यशीदा उठाती हैं, जिसे सूरदास जी ने इस दोहे के द्वारा प्रस्तुत किया है।

दोहा 16: अरु हलधर सों भैया
कहन लागे मोहन मैया मैया।
नंद महर सों बाबा बाबा अरु हलधर सों भैया।।
ऊंच चढि़ चढि़ कहति जशोदा लै लै नाम कन्हैया।
दूरि खेलन जनि जाहु लाला रे! मारैगी काहू की गैया।।
गोपी ग्वाल करत कौतूहल घर घर बजति बधैया।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कों चरननि की बलि जैया।।

अर्थ: देवगंधार में रचित उपरोक्त पंक्ति जिसमें सूरदास जी ने बालकृष्ण से संबंधित मधुर प्रवृत्तियों का चित्रण किया है। जब नन्हे कृष्ण अपनी माता को मैया मैया तथा नंद बाबा को बाबा बाबा कहकर पुकारने लगे हैं और अपने बड़े भाई बलराम को भैया कहकर बुलाने लगे हैं। इतनी छोटी उम्र में ही श्री कृष्ण अपनी तोतली बोली से शब्दों का उच्चारण करने लगे हैं और साथ ही थोड़े शरारती भी हो गए हैं। जब नटखट कृष्ण खेलते खेलते दूर चले जाते हैं, तब यशोदा मैया उन्हें ऊंची आवाज में नाम से पुकार कर कहती हैं, कि लल्ला दूर मत जा नहीं तो गाय तुझे मारेगी। नन्हे कृष्ण के ऐसी लीलाओं को देखकर सभी ग्वाले – गोपियां आश्चर्यचकित रह गए हैं। बृजवासी नंद बाबा और यशोदा मैया को बधाइयां दे रहे हैं।

दोहा 17: भई सहज मत भोरी
जो तुम सुनहु जसोदा गोरी।
नंदनंदन मेरे मंदिर में आजु करन गए चोरी।।
हौं भइ जाइ अचानक ठाढ़ी कह्यो भवन में कोरी।
रहे छपाइ सकुचि रंचक ह्वै भई सहज मति भोरी।।
मोहि भयो माखन पछितावो रीती देखि कमोरी।
जब गहि बांह कुलाहल कीनी तब गहि चरन निहोरी।।
लागे लेन नैन जल भरि भरि तब मैं कानि न तोरी।
सूरदास प्रभु देत दिनहिं दिन ऐसियै लरिक सलोरी।।

अर्थ: भगवान श्री कृष्ण बाल रूप में बड़े ही सुशोभित लगते हैं लेकिन साथ ही बड़े शरारती भी, जिससे बृजवासी की गोपियां उनकी शिकायत यसोदा से कर देती हैं। एक बार श्री कृष्ण ने एक गोपी के घर से माखन चोरी करके खा लिया तो, ग्वालिन यशोदा मैया से शिकायत करने उनके घर पहुंच गई। गोपी कहने लगी की एरि यशोदा तेरा लल्ला मेरे घर आया था और मटकी से माखन चोरी करके खा रहा था। मैंने उसे देखा तो मैं केवल शांत भाव से उसके कृणा का आनंद उठा रही थी लेकिन जब मैंने जाकर मटकी को देखा तो उसमें से सारा मक्खन खत्म हो चुका था। इसके पश्चात मुझे बहुत ही पछतावा हुआ। कान्हा को जाकर मैने पकड़ लिया जिसके पश्चात वह मेरे पैरों में गिर कर शिकायत न करने की याचना करने लगा और उसकी आंखों में आंसू भर आए, जिसके पश्चात मेरा भी हृदय पिघल गया और मैंने उसे जाने दिया।

दोहा 18: हरष आनंद बढ़ावत
हरि अपनैं आंगन कछु गावत।
तनक तनक चरनन सों नाच मन हीं मनहिं रिझावत।।
बांह उठाइ कारी धौरी गैयनि टेरि बुलावत।
कबहुंक बाबा नंद पुकारत कबहुंक घर में आवत।।
माखन तनक आपनैं कर लै तनक बदन में नावत।
कबहुं चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लोनी लिए खवावत।।
दुरि देखति जसुमति यह लीला हरष आनंद बढ़ावत।
सूर स्याम के बाल चरित नित नितही देखत भावत।।

अर्थ: सूरदास के इस दोहे में बालकृष्ण अपने ही घर के आंगन में प्रसन्न चित्त होकर जो मन में आए वह गुनगुना रहे हैं। अपने छोटे-छोटे पैरों पर थिरकते तथा स्वयं ही मन ही मन प्रसन्न हो रहे हैं। कभी वे अपने हाथों को उठाकर दूर खड़ी गायों को अपने पास बुलाते, तो कभी अपने नंद बाबा को पुकारते। कभी बाहर निकल कर वापस घर में आ जाते हैं, तो कभी अपने नन्हे हाथों में थोड़ा मक्खन लेकर अपने शरीर पर लगाने लगते। स्तंभ के नजदीक जाकर उसमे नजर आने वाले अपने ही प्रतिबिंब को अपने हाथों से मक्खन खिलाने लगते है। श्री कृष्ण के इन सभी शरारतों को यशोदा दूर खड़ी होकर छुप कर देख मन ही मन हर्षित हो रही हैं।।

दोहा 19: कबहुं बढ़ैगी चोटी
मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी।
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी।।
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी।
काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुई लोटी।।
काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी।
सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी।।

अर्थ: बाल श्री कृष्ण दूध पीने में आनाकानी करते तथा मैया के बार-बार कहने पर भी दूध नहीं पीते थे। लेकिन एक दिन यशोदा ने लालच देकर उनसे कहा की कान्हा तू प्रतिदिन कच्चा दूध पिया कर जिससे तेरी चोटी बलराम के भांति लंबी और मोटी हो जाएगी। प्रलोभित होकर श्री कृष्ण प्रतिदिन बिना कोई नाटक किए कच्चा दूध का सेवन करने लगे। कुछ समय बाद श्री कृष्ण यशोदा मैया से पूछते हैं कि मैया तूने तो बोला था कि कच्चा दूध का सेवन करने से मेरी छोटी सी चुटिया दाऊ भैया से भी मोटी और लंबी हो जाएगी लेकिन मेरे बाल अभी भी उसी प्रकार है जैसे पहले थे। शायद इसीलिए मुझे प्रतिदिन स्नान करवाकर बालों को संवारती थी और चोटी भी गूंथती थी, जिससे मेरी चोटी बढ़कर नागिन जैसी लंबी हो जाए। इसीलिए कच्चा दूध भी पिलाती थी और माखन रोटी भी नहीं देती थी। मैया से इतना कहकर श्री कृष्ण रूठ जाते हैं। उपरोक्त रचना में सूरदास जी कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण और बलराम की जोड़ी तीनों लोकों में अद्भुत है, जो मन को आनंदित करती है

दोहा 20: ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी।
सब नदियाँ जल भरि-भरि रहियाँ सागर केहि बिध खारी॥
उज्ज्वल पंख दिये बगुला को कोयल केहि गुन कारी॥
सुन्दर नयन मृगा को दीन्हे बन-बन फिरत उजारी॥
मूरख-मूरख राजे कीन्हे पंडित फिरत भिखारी॥
सूर श्याम मिलने की आसा छिन-छिन बीतत भारी॥

अर्थ- श्री कृष्ण के कहने पर जब ऊधौ मथुरा जाकर निराकार ब्रह्म के विषय में बताने के लिए गोपियों से वार्ता करते हैं, तो भक्ति भाव में डूबी हुई गोपियां उल्टा उन्हें ही सच्चे ज्ञान की अनुभूति कराती हैं, जिसका वर्णन सूरदास जी ने उपरोक्त पंक्ति में किया है। ऊधौ यह भाग्य और कर्म का खेल बड़ा ही अनोखा है। जिस प्रकार सागर नदियों के मधुर जल से भरता है, लेकिन फिर भी समुद्र का जल खारा ही रहता है। बिना किसी गुण वाले बगुले को प्रकृति ने श्वेत रंग प्रदान किया हैं लेकिन गुणों से परिपूर्ण मधुर आवाज वाली कोयल को काले रंग का बना दिया है। निर्जन वनों में भटकने वाले मृग को प्रकृति ने सुंदर नेत्र प्रदान किया है, जिनका उसके लिए कोई महत्व ही नहीं है। इस सृष्टि में कई मूर्ख लोगों को प्रकृति ने राज सिंहासन प्रदान किया है, तो वही बुद्धिशाली लोगों को गरीब बना दिया। गोपियां श्री कृष्ण से मिलने की आश में प्रत्येक क्षण बहुत ही मुश्किल से काट रही हैं।

दोहा 21: निसिदिन बरसत नैन हमारे।
सदा रहत पावस ऋतु हम पर, जबते स्याम सिधारे।।
अंजन थिर न रहत अँखियन में, कर कपोल भये कारे।
कंचुकि-पट सूखत नहिं कबहुँ, उर बिच बहत पनारे॥
आँसू सलिल भये पग थाके, बहे जात सित तारे।
‘सूरदास’ अब डूबत है ब्रज, काहे न लेत उबारे॥

अर्थ- भगवान श्री कृष्ण का संदेश देने के लिए बृज गए उनके मित्र ऊधौ तथा गोपियों के बीच वार्ता का वर्णन करते हुए सूरदास जी कहते हैं, कि जब उद्धव ब्रज भूमि में प्रवेश करते हैं तो उन्होंने जल की एक धारा देखी, वह जल नहीं बल्कि अश्रु है, जो गोपियों के श्री कृष्ण से बिछड़ने के दुख में निरंतर बहते हैं। पूछने पर गोपियां कहती हैं कि जब से श्री कृष्ण ने ब्रजभूमि छोड़ी है तब से हमारी आंखों से निरंतर आंसू बह रहे हैं। बृज वासियों के लिए वर्षा ऋतु के अलावा दूसरा और कोई भी मौसम नहीं होता। हमारी नेत्रों से अश्रु बहने के कारण काजल स्थिर नहीं रह पाता, आंसुओं को पोछते हुए गालों और नेत्रों के नीचे काले धब्बे पड़ गए हैं। अश्रु बहने के कारण हमेशा हमारे वस्त्र गीले ही रहते हैं। चारों तरफ केवल असुरों की धाराएं बह रही हैं। हे कृष्ण हमारे उदासी के कारण पूरा व्रजभूमि डूबता जा रहा है तुम आकर इसकी सुरक्षा क्यों नहीं करते।

दोहा 22: जसुमति दौरि लिये हरि कनियां।
“आजु गयौ मेरौ गाय चरावन, हौं बलि जाउं निछनियां॥
मो कारन कचू आन्यौ नाहीं बन फल तोरि नन्हैया।
तुमहिं मिलैं मैं अति सुख पायौ,मेरे कुंवर कन्हैया॥
कछुक खाहु जो भावै मोहन.’ दैरी माखन रोटी।
सूरदास, प्रभु जीवहु जुग-जुग हरि-हलधर की जोटी॥

अर्थ- सूरदास जी के इस दोहे में भगवान श्री कृष्ण के प्रथम बार गाय चराने जाने का वर्णन करते हैं। जब श्री कृष्ण पहली बार वन में गायों को चराकर वापस घर लौटे तो यशोदा मैया ने बड़े ही प्रेम से उनसे पूछा कि आज गायों को चराने के लिए पहली बार वन में गए थे, इसलिए तुम पर बहुत प्रसन्न हूं। वन से क्या तुम मेरे लिए कोई फल- फूल साथ नहीं लाए हो? इतने देर के पश्चात तुमसे पुनः मिलकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। हे कृष्ण तुम्हें जो कुछ खाने का मन हो मुझे बताओ। यशोदा मैया के पूछने पर कृष्णा माखन रोटी खाने की इच्छा व्यक्त करते हैं।

दोहा 23: संदेसो दैवकी सों कहियौ।
`हौं तौ धाय तिहारे सुत की, मया करति नित रहियौ॥
जदपि टेव जानति तुम उनकी, तऊ मोहिं कहि आवे।
प्रातहिं उठत तुम्हारे कान्हहिं माखन-रोटी भावै॥
तेल उबटनों अरु तातो जल देखत हीं भजि जाते।
जोइ-जोइ मांगत सोइ-सोइ देती, क्रम-क्रम करिकैं न्हाते॥
सूर, पथिक सुनि, मोहिं रैनि-दिन बढ्यौ रहत उर सोच।
मेरो अलक लडैतो मोहन ह्वै है करत संकोच॥

अर्थ- सूरदास के इस दोहे में भगवान श्री कृष्ण मथुरा वापस लौट गए तब यशोदा मैया ने देवकी के लिए एक संदेश भेजा, जिसमें उन्होंने लिखा की मैं तो आपके पुत्र की दाई हूं! अपनी कृपा दृष्टि सदैव मुझ पर बनाए रखना। भले ही आप मेरी सभी बातों को भलीभांति जानती हैं, लेकिन फिर भी मैं स्वयं अपनी तरफ से कह रही हूं की आपके कृष्णा को सवेरे उठकर माखन रोटी खाना बहुत अच्छा लगता है। लेकिन उबटन, तेल और ठंडे पानी को देखते ही वह दूर भाग जाता है और प्रलोभन देने के बाद भी नहाता नहीं। इतना ही नहीं मेरे घर को कृष्णा पराया समझकर संकोच करता है जिसका दुख मुझे सदैव ही रहता है।

दोहा 24: उधो, मन न भए दस बीस
उधो, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥
सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस।
स्वासा अटकिरही आसा लगि, जीवहिं कोटि बरीस॥
तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस।
सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥

अर्थ- श्री कृष्णा जब अपने सखा उधो को गोपियों के पास अपना संदेश देने भेजते हैं, तो व्रजभूमि में ब्रह्म ज्ञान देने गए उद्धव को गोपियों ने ही सत्य का बोध करवा दिया। गोपियां उधो से कहती हैं कि हम सभी के पास दस या बीस नहीं बल्कि एक ही मन है, जो बहुत पहले ही कृष्ण के साथ जा चुका है। कृष्ण के चले जाने के बाद हम सभी का मन सिथिल हो गया है और शरीर ने काम करना बंद कर दिया है। हम केवल इसी आस में अपनी सांसे गिन रहे हैं की श्री कृष्ण करोड़ों वर्षों तक जीवित रहें तथा फिर से हमें अपने दर्शन करवाएं। गोपियां उधो से यह भी कहती हैं कि तुम तो श्री कृष्ण के सखा हो और नाना प्रकार के विद्या के ज्ञाता भी हो। सूरदास जी अपनी रचना में भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं की वे इन गोपियों की इच्छाओं को जरूर पूरा करें।

दोहा 25: निरगुन कौन देश कौ बासी
निरगुन कौन देश कौ बासी।
मधुकर, कहि समुझाइ, सौंह दै बूझति सांच न हांसी॥
को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि को दासी।
कैसो बरन, भेष है कैसो, केहि रस में अभिलाषी॥
पावैगो पुनि कियो आपुनो जो रे कहैगो गांसी।
सुनत मौन ह्वै रह्यौ ठगो-सौ सूर सबै मति नासी॥

अर्थ- कृष्ण की याद में डूबी हुई गोपियां ज्ञान का संदेश देने आए उधो से यह प्रश्न करती हैं कि हे उधो तुम तो बहुत ज्ञानी तो, जिस ब्रम्हा का ज्ञान देने तुम यहां आए हो क्या तुम हमे बता सकते हो कि यह ब्रम्हा कहा निवास करते हैं? हम तुमसे ठिठोली नही कर रहे हैं बल्कि हम यह वास्तव में जानना चाहते हैं कि आखिर उन निर्गुण निराकार ब्रह्म के माता पिता कौन हैं? उनका पहनावा कैसा है? और उन्हें क्या अच्छा लगता है? हमारे इस जिज्ञासा को तुम व्यंग कतई मत समझना। गोपियों की इन बातो को सुनकर उधो खुद को ठगा सा महसूस करने लगे और गोपियों के एक भी प्रश्न का उत्तर नही दे सके।

दोहा 26: कहां लौं कहिए ब्रज की बात
कहां लौं कहिए ब्रज की बात।
सुनहु स्याम, तुम बिनु उन लोगनि जैसें दिवस बिहात॥
गोपी गाइ ग्वाल गोसुत वै मलिन बदन कृसगात।
परमदीन जनु सिसिर हिमी हत अंबुज गन बिनु पात॥
जो कहुं आवत देखि दूरि तें पूंछत सब कुसलात।
चलन न देत प्रेम आतुर उर, कर चरननि लपटात॥
पिक चातक बन बसन न पावहिं, बायस बलिहिं न खात।
सूर, स्याम संदेसनि के डर पथिक न उहिं मग जात॥

अर्थ- ब्रज में जब श्री कृष्ण के सखा उधो गोपियों की स्थिति को देखकर पुनः भगवान श्री कृष्ण के पास लौटे तो वहां की स्थिति का वर्णन करते हुए उद्धव श्री कृष्ण से कहते हैं, कि हे कृष्णा! तुम्हरे बिना व्रजवासी कितने दुखी हैं, जिसका मैं ठीक प्रकार से वर्णन भी नहीं कर सकता हूं। वे सभी तुमसे बिछड़कर बिन प्राण के केवल एक शरीर मात्र रह गए हैं। गाय, बछड़े, ग्वाले – गोपियां सभी तुम्हारे चले जाने के शोक में दिन रात अश्रु बहाते हैं। उन सभी का जीवन बेहद कष्टदाई हो गया है। वे दुखियारे शिशिर ऋतु के हिमपात के कारण केवल बिन पत्तियों के कमल मात्र बन गए हैं। यदि किसी यात्री को व्रज में आता देखते हैं, तो शीघ्र ही तुम्हारी हालचाल पूछते है। केवल तुम्हारे नाम का संदेश पाकर ही उत्साह से भर जाते हैं और यात्री को प्रसन्नतावस जाने ही नहीं देते और उनके पैरों से लिपट कर तुम्हारे विषय में और बातें पूछने लगते है। आपके जाने के दुख से केवल मनुष्य मात्र नहीं बल्कि पशु-पक्षी भी दुख की अंधेरी छाया में डूबे रहते हैं। चातक, कोयल और अन्य पक्षी अब वनों में निवास नहीं करते तथा तुम्हारे जाने के दुःख में अब कौवे बाली का अन्न भी नहीं खाते हैं। हे केशव! आपके लिए मथुरा संदेश ले जाने के भय से अब उस मार्ग से गुजरने वाले पथिक भी वहा नहीं जाते हैं।

दोहा 27: मैया मोहि मैं नहि माखन खायौ,
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो,
चार पहर बंसीबट भटक्यो, साँझ परे घर आयो।।
मैं बालक बहियन को छोटो, छीको किही बिधि पायो,
ग्वाल बाल सब बैर पड़े है, बरबस मुख लपटायो।।
तू जननी मन की अति भोरी इनके कहें पतिआयो,
जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो।।
यह लै अपनी लकुटी कमरिया, बहुतहिं नाच नचायों,
सूरदास तब बिहँसि जसोदा लै उर कंठ लगायो।।

अर्थ – भगवान कृष्ण के मनमोहक बाल लीलाओं का अद्भुत वर्णन करते हुए सूरदास जी उपरोक्त दोहे में कहते हैं, कि जब गोपियों के मटकी को श्री कृष्ण अन्य ग्वालों के साथ मिलकर तोड़ देते हैं, तो गोपियां यशोदा मैया से उनके घर पर आकर कान्हा की शिकायत करती हैं, जिससे यशोदा मैया कान्हा को बहुत डांटती हैं। अपने बचाव में बाल कृष्णा अपनी मैया से कहते हैं कि हे मैया! मैंने माखन नहीं खाया है। आप सुबह होते ही मुझे गायों को चरवाने के लिए भेज देती हैं और दोपहर तक मैं यूं ही यहां-वहां भटकता रहता है और सांझ को वापस घर लौटता हूं। मैया मैं तो एक नन्हा सा बालक हूं और मेरी बाहें भी छोटी-छोटी हैं, तो मैं भला किस प्रकार इतने ऊंचे माखन के मटकों तक पहुंच पाऊंगा। मेरे मित्र भी मुझसे जलते हैं, इसलिए उन सभी ने मेरे मुंह पर जबरदस्ती मक्खन लिपटा दिया है। मैया तू बहुत भोली है जो इन लोगों की बातों में आ जाती है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तेरे दिल में मेरे लिए कोई प्रेम नहीं है, जो तू मुझे अपना समझती नहीं हमेशा पराया समझती है। तभी तो हर क्षण मुझ पर शंका करती रहती है। वापिस ले तेरी लाठी और कंबल तूने मुझे बहुत ही उदास किया है। कान्हा के मुख से इतना सुनते ही यशोदा मैया का हृदय पसीज जाता है और वह मुस्कुरा कर कृष्ण को गले लगा लेती हैं।

दोहा 28: अब कै माधन मोहिं उधारि।
मगन हौं भाव अम्बुनिधि में कृपासिन्धु मुरारि।।
नीर अति गंभीर माया लोभ लहरि तरंग।
लियें जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग।।
मीन इन्द्रिय अतिहि काटति मोत अघ सिर भार।
पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सिबार।।
काम क्रोध समेत तृष्ना पवन अति जकझोर।
नाहिं चितवत देह तियसुत नाम-मौका ओर।।
थक्यौ बीच बेहाल बिह्वल सुनहु करुनामूल।
श्याम भुज गहि काढि डारहु सूर ब्रज के कूल।।

अर्थ – सूरदास के इस दोहे में सूरदास जी इस समस्त दुनिया को एक मायाजाल बताते हुए अपनी पीड़ा को भगवान श्री कृष्ण के समक्ष व्यक्त करते हैं। कवि कहते हैं कि हे परमपिता यह समस्त सृष्टि माया रूपी जल से भरी हुई है। इस जल में लालच के रूप में ऊंची ऊंची लहरे उछाल मार रही हैं। दोष और कामवासना के रूप में मगरमच्छ अपना कब्जा जमाए हुए हैं और जल में तैरती हुई मछलियां इंद्रियां है जिन पर अब कोई भी काबू नहीं रहा है। हे श्री कृष्ण इस पाप से भरे दुनिया से मुझे मुक्त कीजिए, मेरे सिर पर पाप की ढेरों गठरियां पड़ी है जो मुझे मोह माया से बाहर नहीं निकलने दे रही हैं। हे प्रभु मेरे मन को क्रोध और काम रूपी हवाएं बहुत सताती हैं, कृपया मुझ पर दया करिए मेरा उद्धार करिए। समुद्र जैसे विशाल इस बड़ी सी दुनिया में मुझे केवल श्रीकृष्ण के नाम की नैया ही डूबने से बचा सकती है। हे प्रभु मायाजाल के चंगुल में मैं इस प्रकार फस गया हूं कि मुझे अपने पुत्र और पत्नी के सिवाय दूसरा कोई भी नहीं दिखाई देता। हे भगवान श्री कृष्ण मेरा बेड़ा पार करिए मुझ पर कृपा करिए।

दोहा 29: जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै॥
मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै।
तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै॥
कबहुं पलक हरि मूंदि लेत हैं कबहुं अधर फरकावैं।
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि करि सैन बतावै॥
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरैं गावै।
जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनि पावै॥

अर्थ: सूरदास के इस दोहे में श्री कृष्ण के बाल अवस्था का अद्भुत चित्रण करते हुए कवि कहते हैं कि मैया यशोदा कान्हा को सुलाने के लिए पालने में रखकर झूला झूला रही हैं। यशोदा मैया कभी कान्हा को पालने में झूला झुलाती तो कभी उसे अपनी बाहों में उठा कर प्यार करने लगती और कभी कान्हा का मुख चूमती। लेकिन फिर भी श्री कृष्णा को नींद नहीं आई तो उन्हें सुलाने के लिए मैया मधुर गीत गुनगुनाने लगती, लेकिन कान्हा को फिर भी नींद नहीं आई। बार-बार प्रयास करने के पश्चात भी जब कान्हा नहीं सोए तब यशोदा नींद पर खीझते हुए कहती कि एरी निंदिया तू मेरे लल्ला को सुला क्यों नहीं रही है? तू मेरे लल्ला के पास क्यों नहीं आती देख तुझे मेरा कान्हा पुकार रहा है। जब यशोदा नींद को पुकारती तब धीरे से कान्हा की पलकें भी मूंद जाती तो कभी कान्हा के होंठ कच्ची नींद में फड़फड़ाने लगते। मैया के मीठे लोरी से जब कान्हा ने अपनी आंखे मूंदी तो यशोदा को ऐसा लगा कि अब कृष्ण सो गए हैं। लेकिन तभी कुछ गोपियां वहां आती हैं। शोरगुल सुनते ही नन्हे कन्हैया की जी नींद टूट जाती है, जिसके पश्चात यशोदा पुनः अपने लल्ला को मीठी मीठी लोरियां गाकर सुलाने का प्रयास करती हैं। इस रचना में सूरदास जी कहते हैं कि नंद पत्नी यशोदा वास्तव में सबसे भाग्यशाली हैं जिन्हें स्वयं भगवान के बाल रूप का सुख प्राप्त हुआ है। ऐसे सुख तो देवताओं और ऋषि-मुनियों को सदियों तक प्रतीक्षा करने के पश्चात भी नहीं प्राप्त होते हैं।

दोहा 30: मुख दधि लेप किए
सोभित कर नवनीत लिए।
घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए।।
चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए।
लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए।।
कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए।
धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए।।

अर्थ: सूरदास जी को भक्त शिरोमणि भी कहा जाता है, उपरोक्त दोहे में उन्होंने श्री कृष्ण के बाल रूप का अति सुंदर रूप से वर्णन किया है जो किसी का भी मन मोहित कर ले। भगवान श्री कृष्ण के बाल लीला को प्रस्तुत करते हुए सूरदास जी कहते हैं की कान्हा अभी बहुत छोटे हैं और वह आंगन में केवल घुटनों के सहारे ही चल सकते हैं। एक दिन यशोदा द्वारा निकाला गया ताजा माखन अपने नन्हे हाथों में लेकर श्री कृष्णा आंगन में धीरे धीरे घुटनों के बल चल रहे हैं। उनके पैरों में मिट्टी लगी है और मुख पर मक्खन लिपटा हुआ है। कान्हा के घुंघराले बाल मुख पर आ रहे हैं उनके गाल बहुत ही कोमल और सुंदर हैं तथा नेत्र मनमोहित कर लेने वाले हैं। कान्हा के नन्हे से मस्तक पर गोरोचन का तिलक लगा हुआ है। नन्हे श्री कृष्ण अपने हाथों में मक्खन लिए हुए इतने सुंदर लग रहे हैं जिसका वर्णन करना बेहद कठिन है। बाल लीला करते हुए कान्हा को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे मानो फूलों के मधुर रस को पाकर भ्रमण करते हुए भौरे मतवाले हो गए हैं। कृष्णा के गले में लटक रही सुंदर माला और सिंहनख उनकी शोभा को और भी बढ़ाते जा रहे हैं। श्री कृष्ण के इस रूप को देखकर कोई भी मोहित हो जाए।

दोहा 31: मिटि गई अंतरबाधा
खेलौ जाइ स्याम संग राधा।
यह सुनि कुंवरि हरष मन कीन्हों मिटि गई अंतरबाधा।।
जननी निरखि चकित रहि ठाढ़ी दंपति रूप अगाधा।।
देखति भाव दुहुंनि को सोई जो चित करि अवराधा।।
संग खेलत दोउ झगरन लागे सोभा बढ़ी अगाधा।।
मनहुं तडि़त घन इंदु तरनि ह्वै बाल करत रस साधा।।
निरखत बिधि भ्रमि भूलि पर्यौ तब मन मन करत समाधा।।
सूरदास प्रभु और रच्यो बिधि सोच भयो तन दाधा।।

अर्थ: इस सूरदास के दोहे में राधा-कृष्ण के बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि बृज की भूमि राधा कृष्ण के इस पवित्र रासलीला को देखकर धन्य हो उठी है। जब राधा रानी के माता-पिता वृषभानु तथा कीर्ति राधिका को श्री कृष्ण के संग खेलने की अनुमति प्रदान करते हैं, तो इसे सुनकर राधारानी बहुत प्रसन्न होती हैं क्योंकि अब उन्हें कान्हा के साथ खेलने के लिए कोई भी रोक टोक करने वाला नहीं था। सारी बाधाएं दूर हो गई तो राधा श्याम संग खेलने चली जाती हैं। जब राधिका और श्याम खेल रहे होते हैं तो राधा की माता कीर्ति दूर खड़ी होकर राधा कृष्ण को खेलते हुए देखती है। राधा कृष्ण की जोड़ी को देखकर वे बहुत प्रसन्न होती हैं। सौंदर्य के पराकाष्ठा को देखकर वे मंत्रमुग्ध रह जाती हैं। लेकिन तभी राधा कृष्ण खेलते खेलते झगड़ने लगते हैं। राधा कृष्ण के झगड़े में भी इतना सौंदर्य था जिसकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती। राधा और कृष्ण की जोड़ी को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे सूर्य, चंद्र, मेघ और दामिनी बाल रूप में लीलाए रच रहे हो। ऐसा मनमोहक दृश्य देखकर तो एक समय के लिए परम ब्रह्मा भी भ्रम में पड़ गए कि कहीं जगतपति श्री कृष्ण ने कोई नई सृष्टि की रचना तो नहीं कर दी है। ऐसा विचार करके एक समय के लिए ब्रह्मा जी भी भगवान श्रीकृष्ण से बैर कर बैठे।

आशा करते हैं सूरदास के यह 30+ प्रसिद्ध दोहे हिंदी अर्थ सहित Surdas Ke Dohe with Hindi meaning से आपके स्कूल और कॉलेज प्रोजेक्ट में मदद मिली होगी।

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